भय हो





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आखिर क्यों जय हो?

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हिन्दु तो गली के कुत्ता जैसा है।

जब मुगलों ने हिन्दुस्तान पर हमला किया एक उनकें एक हाथ में तलवार और दुसरे हाथ में कुरान था बहुत ही भयावह आक्रमण था मुगलों का। मुगल शासक हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके सिर्फ हिन्दुस्तान को लुटना ही नही चाहते थे हिन्दुस्तान की संस्कृ्ती को भी नाश करके इस्लाम का प्रचार प्रसार करना चाहते थे। मुगलों ने वैसा ही किया लेकिन जैसा वे चाहते थे लेकिन हिन्दु शासको विरोध भी झेलना परा । हिन्दुस्तान को जितने के लिये मुगलों को काफी मेहनत करना पर रहा था देशभक्त राजा मुगलों के रास्तों में किसी ना किसी तरह से परेशानी खरा कर रहे थे। आखिर मुगलों ने एक नया रास्ता निकाला हिन्दुओं के आपस में बाटनें का बिना हिन्दु को बाटें मुगल अपने मकसद में कभी कामयाब नही हो सकते थे। नतिजा कुछ युद्ध में हारे हुये, डरपोक, दलाल हिन्दु राजा मुगलों के साथ मिल गये तथा अपने राज्य सत्ता को बचाने के लिये किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार हो गये और अपने बहू-बेटीयों को नंगा करके बजार में खरा कर दिया मुगलों को खुसामद करने के लिये । नतीजा उन्हें सत्ता तो मील गया लेकिन हिन्दुस्तान का आत्मसम्मान नंगा हो गया। मुगलों द्वारा हिन्दुओं को तरह-तरह से यातना दिया जाने लगा और जो कोई भी इस्लाम कबुल नही करता उन्हें या तो जेल में सड़ने के लिये डाल दिया जाता या सडे़ आम तड़पा तड़पा के मार दिया जाता फिर भी मुगलों का विरोध इस धरती पर होता रहा जहा एक ओर यैसे राजा थे जो अपने बहू-बेटीयों का बोली लगवा दिया वही वैसे राजा भी थे जो जीवन भर मुगलें से लड़ते रहें और उनकी बहू-बेटीया मुगलों के हाथ में आने से पहले सामूहिक आत्मदाह करके अपने आपको धधकते आग के हवाले कर दिया और अपना तथा हिन्दुओं के आत्मसम्मान को कभी आँच नही आने दिया। हिन्दु समाज उस समय भी दो हिस्सों में बट था चापलुस हिन्दु और देशभक्त आत्मसम्मान के साथ जीने बाले हिन्दु।

जहाँगीर के शासन काल में अंग्रेज व्यापार करने के लिये हिन्दुस्तान में आये हिन्दुस्तान उनहें कभी भाय। सिर्फ 500 पाउण्ड लेकर हिन्दुस्तान में व्यापार करने आये अंग्रेज से जहाँगीर ने पुछा तुम हिन्दुस्तान में क्या बेचना चाहते हो तो अंग्रेज ने कहा कुछ नही तो क्या खरीदोंगे अंग्रेजों ने कहा कुछ नही। फिर भी अंग्रेज यहा व्यापर करने लगें। व्यापार करते-करते हिन्दुस्तान में शासन भी करने लगें और अंग्रेजो को साथ दिया यही के दलाल हिन्दुस्तानीयों नें। अंग्रेजो ने वही सब किया जो मुगलों ने किया था हिन्दुओं में कभी एकता मत आने दों| एक ओर तो राष्टृभक्त अंग्रेजो से लड़ते रहे दुसरी ओर दलालों की फौज अंग्रेजों के तलवें चाटते रहें और रायबहादुर, चौधरी साहब, जमीन्दार साहब बन कर अंग्रेजो के बीबीयों का चुम्बन लेते रहें और अपने बीबी का चुम्बन अंग्रेजो को दिलवाते रहें। उस समय भी हिन्दु समाज में आत्मसम्मान नही आने दिया गया नतीजा हमारा हिन्दुस्तान अंग्रेजो के गुलामी करता रहा।

समय बदला सुभाषचन्द्र बोष की आजाद हिन्द सेना से, वीर सावरकर आत्मबल से, डा. हेडगेवाल के खाकी निक्कर बाले देशभक्तों से, भगत सिह के हैसला से, चन्द्रशेखर आजाद के जुझारुपन से रामप्रसाद विस्मिल के निडरता के डर से अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड कर भाग गये। देश आजाद हो गया। शासन करने बाले बदल गये शासकों का चमरा का रंग उजला से काला हो गया लेकिन शासन करने का पद्धती वही रहा कभी हिन्दुओं मे एकता नही आने दो हिन्दु को गली का कुत्ता बना कर रखो जब जिसका मन करे लतिया कर चला जाये आज समस्या इस कदर बढ गया है कि हिन्दुओं के आत्मसम्मान का बात करना सप्रदायीक हो गया। वरुण गाँधी ने भी हिन्दुओं के आत्मसम्मान की रक्षा करने का जिम्मा उठाया फिर क्या था रायबहादुर, चौधरी साहब, जमीन्दार साहब के वंशज को बुरा लग गया क्यों कि उनहें पता है जिस दिन हिन्दुओं में आत्मसम्मान जग जायेगा रायबहादुर, चौधरी साहब, जमीन्दार साहब के वंशजों को जुता लेकर दौरायेगा। इस लिये वरुण गाँधी के उपर एक साथ सभी ने हल्ला बोल दिया कि हिन्दु आत्मसम्मान की बात करना संप्रदायिक लगने लगा। हिन्दु आत्मसम्मान की बात करना संप्रदायिक हो गया दुसरे तरफ मुसलमान नेताओं के द्वारा हिन्दु को गाली देना संप्रदायिक नही है। पिलीभीत में हिन्दु औरतों का बलात्कार होना शर्म की बात नही है लेकिन वरुण गाँधी द्वारा उनके रक्षा की बात करना संप्रदायिक। मस्जिद के इमाम का फतवा जारी करके एक राजनितीक पार्टी को फायदा पहुचाना संप्रदायिक नही है। गुजरात में ट्रेन में मासुम बच्चों को जला कर मार देना संप्रदायिक नही है उसके प्रतीउत्तर देना संप्रदायिक हो गया है। मुम्बई में बम बिस्फोट करना संप्रदायिक नही है लेकिन हिन्दु इस के खिलाफ अवाज उठाये तो संप्रदायिक हो गया। भागलपुर में हिन्दुओं के देवी-देवता का मुर्ती तोड़ देना संप्रदायिक नही लेकिन हिन्दुओं मे इस बात का विरोध करना संप्रदायिक हो गया। हिन्दुओं के धार्मिक यात्रा में व्यवधान करना संप्रदायिक नही है लेकिन अगर कोई इसके खिलाफ आवाज उठाये तो वे संप्रदायिक हो गया। वरुण गाँधी का हिन्दु के पक्ष में बोलना संप्रदायिक है लेकिन कांग्रेसी नेता का हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलना संप्रदायिक नही है। साध्वी प्राज़ा सिह आतकवादी है और अफजल गुरु को आंतकवादी कहना संप्रदायिक। आखिर कब तक इस देश में जयचन्द, मानसिंह, मिरजाफर, रायबहादुर, चौधरी साहब, जमीन्दार साहब के वंशजों का नीति चलता रहेगा।

एक देश में दो विधान जरुर डुबेगा हिन्दुस्तान।
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क्या तालिबान के ताण्डव से बच पायेगा हिन्दुस्तान?

जिस तरह से तालिबान और पाकिस्तान शासन में बैठे तालिबानी शासक पुरे पाकिस्तान को लगभग तालिबानिस्तान बना दिया है। आज पाकिस्तान का स्थिती ऎसा है कि वहाँ रह रहे मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग इस्लाम के नाम पर तालिबान का खुले आम समर्थन कर रहें है और वहाँ का सरकार भी आँख बन्द कर समर्थन कर रहा है। और पाकिस्तान से बाहर रह रहें मुस्लिम समप्रदाय भी किसी न किसी तरह तालिबान का समर्थन कर ही रहा है। तालिबान का सपना है पुरे विश्व को दारुल इस्लाम बनाने का इसके लिये इसके लिये तालिबान गैर इस्लामिक समुदाय को या तो डरा-धमका कर इस्लाम कबूलबा कर या फिर मौत के घाट उतार कर दारुल इस्लाम का सपना साकार करने में लगा है।

हिन्दुस्तान के दो परोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनो देश में इस्लाम का शासन है बांग्लादेश जब पाकिस्तान के आतंक से त्रस्त था तब हिन्दुस्तान के शरण में आया था लेकिन आजादी के कुछ दिन बाद से बांग्लादेश को अपने इस्लामिक भाईचारा का ख्याल हो आया और हिन्दुस्तान का साथ छोड़ इस्लामिक भाई पाकिस्तान का दामन थाम लिया और पाकिस्तान का कसम हिन्दुस्तान को बर्बाद करके दम लुगा को सार्थक करने में लग गया। और किसी ना किसी तरह से हिन्दुस्तान को परेशान करने लगा चाहे जिहाद हो, आंतकवाद हो, नकली नोट या फिर बांग्लादेशी नागरीक को अवैध रुप से हिन्दुस्तान में भेज कर मुग्लिस्तान बनाने में पाकिस्तान का सहयोग देना हो। इन सब स्थिती में हिन्दुस्तान क्या करेगा।

हिन्दुस्तान में राजनीतिक दल मुस्लमानों के चन्द वोट के चलते हिन्दुस्तान के आने वाले खतरे को हमेशा से अनदेखा करते रहें है। जब भाजपा सरकार आयी थी तो आतंकवाद विरोधी कानुन टाडा और पोटा लगाया था जिसको की कांग्रेस की सरकार ने मुस्लमानों के दवाब के चलते हटा दिया। आतंकवाद निरोधक कानून किसी एक विशेष समुदाय के लिये नही बनाया गया था ये कानून समान रुप से हिन्दु और मुस्लिम दोनो के लिये था लेकिन मुस्लमानों को इस कानून से ज्यादा समस्या था जिसके कारण कांग्रेस सरकार जब बना तो सबसे पहला काम आंतकवाद निरोधक कानून को हटाने का किया जिसका नतिजा आज पुरा हिन्दुस्तान भोग रहा है आज हिन्दुस्तान का कोई शहर, कस्बा, गाँव आतंकवादियों से सुरक्षीत नही है। कही भी कभी भी इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा बम विस्फोट किया जा सकता है। आज की तारिख में विश्व में सबसे ज्याद इस्लामिक आतंकवादी सुरक्षित है तो वह देश है हिन्दुस्तान। अफजल गुरु इसका उदाहरण है फांसी की सजा मिलने के बाद भी अफजल को कांग्रेस सरकार के द्वारा सिर्फ इस लिये फांसी नही दिया कि इस से मुस्लिम समुदाय खफा हो जायेगा और कांग्रेस को वोट नही देगा। हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लमानों का किसी ना किसी रुप से इस्लामिक आंतकवाद को सर्मथन दिया जा रहा है। पाकिस्तान तो सिर्फ अपने यहाँ आतंकवादियों को विस्फोट करना सिखाया जाता है लेकिन हिन्दुस्तान में आकर उसी आतंकवादि को हर तरह का सुविधा मुहय्या किया जाते है। इस्लामिक आतंकवाद हिन्दुस्तान में आकर कही भी घर लेकर रह सकता है और उसको सहयोग करने वाले और विस्फोट के बाद बचाव करने वाले लगभग हर राजनितीक दल में मौजुद है और उनके समर्थक खुले आम घुम रहें हैं और चुनाव के दिन मुस्लिम समुदाय सिर्फ उन्ही दल को वोट देता है जिनके आने से आतंकवाद और हिन्दुस्तान को दारुल इस्लाम बनाने में सहयोग मिलता रहें।

तालिबान के पाकिस्तान और बांग्लादेश पर कब्जा करने के बाद तालिबान क्या चुप बैठेगा। शायद नही उसका अगला निशाना जरुर हिन्दुस्तान होगा। और हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय इस्लामिक भाईचारा के नाम पर हो सकता है कि वे तालिबानियों के साथ करें हो जायें क्यों की आजादी के इतने सालों बाद भी मुस्लमानों का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा है हिन्दुस्तान से इसका उदाहरण है क्रिकेट का मैच जब भी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का मैच होता है तो मुस्लिम समुदाय हमेशा से पाकिस्तान के सर्मथन में खरा रहता है। अभी कुछ दिन पहले जब हिन्दुस्तान 20-20 का विश्व कप के फाइनल में पाकिस्तान को औकाद बता कर 20-20 विश्व चैंम्पियन बना तो हिन्दुस्तान में रह रहें मुस्लिम समुदाय को पाकिस्तान का हिन्दुस्तान के हाथों हारना नागावार लगा जिसका नतिजा कई जगह दंगा भड़का। जब हिन्दुस्तान में तालिबान का इस्लामिक ताण्डव भडकेगा उस स्थिती में हमारे देश के शासक और हमारा फौज क्या इस स्थीती में रहेगा कि तालिबानीयों से और हिन्दुस्तान में रह रहें तालिबानी सर्मथको से लोहा ले सकेगा। कांग्रेस के इस पाँच साल के शासन काल में हम लोगों ने देखा की हिन्दुस्तान से नेपाल जैसा पिद्दी सा देश भी नही डरा। मुम्बई धमाका के बाद कि स्थिती तो हिन्दुस्तान के शासको के लिये हास्यपद बन गया है पाकिस्तान हिन्दुस्तान को लतिया रहा है और हमारे शासक नित्य नयें बहाने बना कर मुम्बई हमालाबरों को बचाने के कोशीश कर रहें हैं तो क्या हमारे मुस्लिम चापलुस शासको के पास इतना हिम्मत होगा की तालिबान का सफाया हमारे देश से कर सकें।

सोचों
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चुनाव भारत-भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर हैं

पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के प्रति समर्पित राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत हैं

पार्टी और विचारधारा को तिलांजलि देकर राजनेता चुनाव की इस तरह तैयारियां कर रहे दिखते हैं मानो भारत की संसद में प्रवेश राष्ट्र पर छाए संकटों के समाधान के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत ऐश्वर्य और सत्ता सुख में हिस्सेदारी के लिए हो। जिस प्रकार टिकटों की बिक्री और चुनाव खर्च के लिए इकट्ठा किए जा रहे धन का ब्यौरा सामने आ रहा है उससे तो यही अंदाजा लगता है कि देश अभी भी उन राजनेताओं की प्रतीक्षा में है जो चुनावी अखाड़े को पूंजी निवेश का लाभप्रद क्षेत्र मानने के बजाय अपने हितों को दांव पर लगाते हुए राष्ट्रीय हितों को आंखों में धारण कर सत्ता के सूत्र संभालेंगे। भारत विभाजन के बाद से आज तक राजनीति दुराचरण के धब्बों से कलंकित रही है। 1947 में जब भारतीय सैनिक कश्मीर पर अचानक धोखे से हुए पाकिस्तानी हमले झेल रहे थे तो लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्णामेनन से जुड़ा जीप घोटाला हुआ। फिर मूंदड़ा कांड, नागरवाला और बोफोर्स कांड, सुखराम मामला, चारा घोटाला, तहलका, पनडुब्बी खरीद, गेहूं आयात घोटाला जैसे प्रकरण राजनेताओं की साख पर आंच डालते रहे।
एक ओर सामान्य नागरिक दुनिया भर में अपनी व्यक्तिगत मेधा और निपुणता के बल पर भारतीय पहचान को श्रेष्ठता का सर्वोच्च स्थान दिला रहे थे और भारतीय कंपनियां विश्वविख्यात ब्रांड अधिग्रहीत कर रही थीं तो दूसरी ओर राजनेता बोरियां भर-भर कर नोट इकट्ठा कर अपनी आत्मा के बजाय तिजोरी के निर्देश पर भारतीय संसद में सांसद धर्म निभाने का परिदृश्य उपस्थित कर रहे थे। क्या ऐसे टिकाऊ और बाजारू लोगों के सौदों पर टिकी सरकार चुनना राष्ट्रहित में होगा? जिस देश की प्रजा अपने शासक को चुनने में लापरवाही बरते या उसका चुनाव जाति, भाषा और धनबल के प्रभाव की कसौटी पर करे, क्या उसका कभी अच्छा परिणाम निकल सकता है?
कुछ ऐसी स्थिति पिछली शती के प्रारंभ में ब्रिटेन में थी, जब हाउस आफ ला‌र्ड्स की सीटें नीलाम हुआ करती थीं। फिर भी वहां की जनता ने अपने देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को बदला और एक ऐसे प्रजातंत्र का ढांचा मजबूत किया जो राज-वंश भी परंपरागत रूप से जीवित रखे हुए है और जहां प्रखर राष्ट्रवाद हर नीति को निर्देशित करता है। अमेरिका और चीन भी भले ही परस्पर अत्यंत भिन्न समाज हों, लेकिन अपने देश को दुनिया में सबसे श्रेष्ठ, समृद्ध और शक्तिशाली बनाना वहां की राजनीति का मुख्य धर्म परिलक्षित होता है। भारत के सामने आसन्न चुनावों ने यह चुनौती उपस्थित की है कि जनता ऐसे सांसदों को चुने जो राष्ट्र-धर्म के प्रति सजग और प्रतिबद्ध हों। दुर्भाग्य से वर्तमान चुनाव पद्धति में सिर्फ जीतना ही एकमात्र कसौटी है, चरित्र और गुण का स्थान यदि कभी आया भी तो बाद में आता है। फलत: ऐसे सांसद चुने जाते हैं जिन्हें न अपने देश के इतिहास का ज्ञान होता है, न भूगोल का और न ही राष्ट्रीय संघर्ष के विभिन्न सोपानों से वे परिचित होते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनसे पहले भी अनेक मंत्री हो चुके हैं, जिनमें से कोई भी अपने धनबल और असीम ऐश्वर्य के कारण यशस्वी नहीं हुआ। केवल पैसा और पद कभी प्रतिष्ठा नहीं दिला सकते।

जिन लोगों को सत्ता के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के बाबू और रायबहादुर बनने में शर्म नहीं आई, वैसे ही लोग आज विदेशी हितों और विदेशी मूल के नेतृत्व के सामने झुककर राष्ट्रीयता दांव पर लगा रहे हैं। जिस देश में पांच लाख देशभक्त नागरिक निर्वासित कर दिए गए हों, जहां एक करोड़ से अधिक विदेशी अवैध घुसपैठिए वोट बैंक राजनीति का संरक्षण पा रहे हों, जहां शासक को पुलिस, प्रशासन और चुनाव पद्धति में सुधार की कोई आवश्यकता ही महसूस न हो, बल्कि ब्रिटिश काल के कानून आज भी देश में लागू हों, ऐसे देश में यथास्थिति के दब्बूपन के बजाय जन-विद्रोह के परिवर्तनकारी स्वर बुलंद होने चाहिए। देश को ऐसी राजनीति चाहिए जो शत्रु के प्रति निर्गम और प्रतिशोधी हो, जो देश को सैन्य दृष्टि से विश्व में सबसे सबल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो तथा नि:संकोच भाव से अपने अगल-बगल के क्षेत्र पर ऐसा प्रभुत्व स्थापित करे ताकि वहां की अराजकता और तालिबानी शरारतों का हम पर असर न पड़े। चारों ओर से पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे असफल और अराजकता ग्रस्त देशों से घिरे भारत को आंतरिक और सीमावर्ती शांति के लिए ऐसा सैन्य और कूटनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना ही होगा जिसे देखकर विरोधी भयभीत रहें। आज तो पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, श्रीलंका व नेपाल तक हमारी सुरक्षा और संवेदना की कद्र नहीं करते।

चीन के बढ़ते क्षेत्रीय विस्तार के प्रति राजनीतिक दलों में कोई दीर्घकालिक सर्वसम्मत चिंतन ही नहीं है। तीस करोड़ से अधिक भारतीय आज भी गरीबी रेखा से नीचे पशुवत जीवन बिताने पर विवश हैं। गत दस वर्षों में दो लाख किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। खेती में रासायनिक खाद और जीन अंतरित बीज के जहर फैल रहे हैं। देश की कृषि योग्य भूमि पर सिनेमा, होटल और कारखाने लगाने की अनुमति देकर अमीरों को और ज्यादा अमीर तथा भूमिपति किसानों को स्लमडाग बनाया जा रहा है। ऐसे ही सांसद फिर चुने जाएं तो किस प्रकार के भारत का वे निर्माण करेंगे? भारत एक ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा में है जो सबसे बड़ा तीर्थत्व गुण और शक्ति संचय में माने, जिसके प्रेरणा केंद्र और मन भारत में हों, जो दरिद्रता निवारण और विज्ञान-प्रौद्योगिकी प्रसार को देवालय निर्माण जैसा महत्वपूर्ण माने, जिसके सर्वोच्च आराध्य भारत के नागरिक हों। वर्तमान चुनाव हमें भारत भाग्य बदलने का दुर्लभ अवसर दे रहे हैं-एक ऐसा भारत भाग्य विधाता चुनें जो सच में जन-गण-मन का अधिनायक बन सके।

क्या हम परिवर्तन के लिए तैयार हैं?

लेखक - तरुण विजय
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लोकतान्त्रिक देश के युवराज श्री राहुल गाँधी का समान्यज्ञान हा हा हा हा!

भारत के होने बाले प्रधानमंत्री और लोकतान्त्रिक देश के युवराज श्री राहुल गाँधी उर्फ राहुल बाबा, कांग्रेस के पालनहार श्री राहुल गाँधी, कांग्रेस पार्टी के कर्ताधर्ता श्री राहुल गाँधी, चुनाव के स्टार प्रचारक श्री राहुल गाँधी, विदेश से पढा़ई करके वापस हिन्दुस्तान आयें श्री राहुल गाँधी, लालू प्रसाद यादव के महात्मा गाँधी श्री राहुल गाँधी, कांग्रेस के ह्र्दय सम्राट श्री राहुल गाँधी, मिडीये के पुज्यनीय श्री राहुल गाँधी-चलिये इतना काफी है।

अब काम कि बात अभी कुछ दिन पहले लोकतान्त्रिक देश के युवराज श्री राहुल गाँधी गुजरात गये थे वहाँ उन्हों ने विकास पुरुष नरेन्द्र मोदी को खरी खोटी सुना कर वापस आये। वहाँ एक प्रस कान्फ्रेन्स में लोकतान्त्रिक देश के युवराज श्री राहुल गाँधी का ज्ञान भंडाफोर हो गया। लालू प्रसाद यादव के महात्मा गाँधी श्री राहुल गाँधी के अनुसार गुजरात का क्षेत्रफल युनाइटेड किगंडम के क्षेत्रफल से बडा़ है। और उससे भी मजेदार बात ये रही कि उनके साथ बैठे कांग्रेसी चमचों ने उनके इस बात पर जोडदार ताली बजाया। लेकिन सच्चाई है गुजरात का क्षेत्रफल 196,024 Sq KM है और युनाइटेड किगंडम का क्षेत्रफल 244,820 km2 है। गणित के किस फार्मुला से गुजरात युनाइटेड किंगडम बडा़ हो गया पता नही ये बात हामारे देश के युवा तुर्क भावी प्रधानमंत्री को नही पता है। लेकिन बात यही खत्म नही हो गया। कांग्रेस के पालनहार श्री राहुल गाँधी के अनुसार युनाइटेड स्टेट और अमेरिका को मिला दिया जाये तो उसका क्षेत्रफल हिन्दुस्तान के इतना नही होता है। लेकिन सत्यता यह है कि सिर्फ अमेरिका का अकेला क्षेत्रफल है 9,826,630 km2 युनाइटेड किंगडम का 244,820 km2 देखने योग्य बात है सिर्फ अमेरिका का क्षेत्रफल ही हमारे हिन्दुस्तान से बडा़ है युनाइटेड किंगडम को अलग भी रख दिया जाय तो भी हिन्दुस्तान का क्षेत्रफल कम है। (विडीयो देखें)। सोनिया गाँधी जी अगर ये सब बात बोलती तो ठिक भी लगता क्यों कि वे विदेशी है लेकिन श्री राहुल गाँधी तो देशी है। अगर राहुल बाबा का समान्यज्ञान अगर ऎसा है तो देश का क्या होगा।

आप सोचों आखिर ये क्या हो रहा है।

जय हो !

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जय महाराष्टृ, जय मुम्बई और हिन्दुस्तान जाये भाड़ में

हिन्दुस्तान भी ऑस्कर की किताब में अपना नाम लिखवा लिया। इज्जत से ना सही बेईज्जत से ही लेकिन हिन्दुस्तान का भी नाम हो गया। स्लमडॉग के निर्माता विदेशी हैं तथा इसमें काम करने बाले कुछ कलाकार भी मानसिक रुप से विदेशी है। इसी में एक है श्री मान अनिल कपुर जी जब उन्हें ऑस्कर के मंच पर पैर रखने का थोडा़ सा जगह मिला तो दिखा दिये अपना राज ठाकरे मानसिकता और दे दिया नारा जय महाराष्ट्रा, जय मुम्बई लेकिन जिस देश का नाम लेकर गये थे हिन्दुस्तान का बेइईज्जती करने उस हिन्दुस्तान का जयकारा उन्कें मुहँ से नही फुट पाया मि़ अनिल कपुर के मुह से जय हिन्दुस्तान या जय भारत का बोल नही निकल पाया। हिन्दुस्तान आज भी विश्व मानचित्र में एक असभ्य, बर्बर, अशिक्षीत, सपेरों का देश के रुप में जाना जाता है और स्लमडॉग फिल्म में भी यही सब दिखाया गया है। और तो और हिन्दू के भगवान श्री राम का गलत चित्रन भी किया गया है। हिन्दूओं को दंगाई भी दिखाया गया है। और हिन्दुस्तान में रहने बाला हर आदमी भीखारी है ये बात सही है लेकिन स्लमडॉग के माध्यम से अब इस बात को पुरा विश्व देखेगा।

हिन्दुस्तान आज महाशक्ति बनने का दंभ भर रहा हैं लेकिन यहाँ के नागरिक का मानसिकता अभी भी गुलामों जैसा है। आज के समय में हिन्दुस्तान के इंजिन्यर, डाक्टर, साफ्टवेयर डेव्लपर जैसे प्रोफेसनल का माँग विश्व को सबसे ज्यादा है हम हिन्दुस्तानीयों के बिना इन सबका काम शायद ना चले तभी तो अमेरिका के हर चुनाव के पहले आउटसोर्सिंग को लेकर हल्ला मचाया जाता है लेकिन वहाँ जो भी राष्टृपति बनता है इस मुद्दे पर चुप्पी साध लेता है कारण सिर्फ एक है हम हिन्दुस्तानीयों के बिना उनका देश सुपरपावर नही बन सकता है। लेकिन बीच-बीच में इन्ही देश से हमें ये एहसास दिया जाता है कि हिन्दुस्तानीयों तुम कितने भी तरक्की कर लो तुम रहोगे तीसरी दुनिया के असभ्य ही इसमें कुछ हिन्दुस्तानियों का भी भरपुर सहयोग रहता है। स्लमडॉग फिल्म के बनाने बाले विदेशी फिल्म बना हिन्दुस्तान में इसमें काम करने बाले कलाकार हिन्दुस्तानी, और यही कलाकारों के द्वारा हम हिन्दुस्तानियों को अपना औकाद बता दिया गया कि हिन्दुस्तानी तुम कितने भी तरक्की करलो तुम रहोंगे दंगाई ही।

स्लमडॉग को ऑस्कर मिला समाचार चौनलों के माध्यम से देख रहा हू आज सारा हिन्दुस्तान जय हो के नारा लगा रहा यहाँ तक कि स्लमडॉग का नाम सुनकर मेरा पालतु कुत्ता भी दुम हिलाने लगता है जैसे कि स्लमडॉग और कोई नही मेरा कुत्ता का कुम्भ के मेले में खोया हुआ कोई भाई हो। आज हिन्दुस्तान के नागरिक किसी और देश के मुहताज नही है हिन्दुस्तानी मेहनत से अपना और इमान्दारी से अपना एक अलग मुकाम हासिल कर लिया है और यही मेहनत और इमान्दारी आज विश्व के हर कोने में फैले हुये हिन्दुस्तानि को सिना तान कर जिना सिखा रहा है लेकिन शायद हमारे देश के चन्द कलाकारों को शायद यह इज्जत पसन्द नही है इस लिये चले जाते है ऑस्कर के मन्दिर में सर छुकाने। क्या होता अगर स्लमडॉग को ऑस्कर मिलता और हमारे हिन्दुस्तान के कलाकार वहाँ नही जाते, क्यों नही अनिल कपुर जैसे कलाकार ने पटकथा में हिन्दुस्तान का बुराई देखकर फिल्म में काम करने से मना कर दिया। कोई जलजला नही आता, कही आग नही लगता, कोई नागरिक नही मरते, कोई पाकिस्तान हिन्दुस्तान पर परमाणु बम नही गिराता। सिर्फ इतना होता कि हिन्दुस्तान का इज्जत बचा रह जाता और हम हिन्दुस्तानी विश्व को दिखा देते देखो हम हिन्दुस्तानि के पास अपना जमीर है हम इमान्दार हैं हम मेहनती हैं हम समझदार हैं हम खुद्दार है। स्लमडॉग से भी कई अच्छी फिल्मों को आस्कर नही दिया गया। लगान अच्छी फिल्म थी आस्कर मिलना चाहिये था लेकिन गोरी चमरी बाले ये कैसे बर्दास्त कर लेते कि अग्रेज हिन्दुस्तानियों से पीटे। अच्छी फिल्म होने के बावजुद लगान को ऑस्कर नही मिला। और आज जाकर स्लमडॉग को ऑस्कर मिला। और हम खुश हो गये अपने उपर ही बेहायायी हँसी हँसते हुये हम अपना ही पिठ ठोक रहें हैं चलो हिन्दुस्तान को भी ऑस्कर मिल गया।

वाह रे मानसिकता ----- जय हो
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राजनीति का अपराधीकरण या अपराधीयों का राजनीतिकरण।

संजय दत्त, मोहम्मद अजहरउद्दीन, आबू सलेम जैसे लोग भी आज इस देश में शासन करना चाहतें है जिनका इतिहास दागदार रहा है। यैसे नेता जो खुद अपराधी एवम भ्रष्टाचारी रहें हैं वे इस देश को क्या देगें। हम शायद भुल गयें है, वीर सावरकर, सुभाष चन्द्र वोष, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, डा. हेडगेवार, महात्मा गाँधी सरीखे नेता इस देश को अंग्रेज को खदेर कर इस देश को आजाद करवायें है ना कि अंग्रेज से इस देश को खैरात में ले कर आयें थे।

स्वतंत्रता के पश्चात हमने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्वीकार की है। लोकतंत्र में राजनीति दल चुनाव लड़ते हैं जीतकर सत्ता संभालतें हैं। देश के स्वीकृ्त संविधान के अनुसार राष्टृहित व समाजहित को सर्वोपरि मानकर शासन चलाने की प्रक्रिया है। वर्तमान में राजनीतिक दलों का एक मात्रउद्देश रह गया है कि सब प्रकार के हथकण्डों को अपनाकर सत्ता प्राप्त करना, वोट खरीदना, विरोधी दल के वोट न पड़ने देना, राजनीति हत्या, अपहरण आदि सभी कार्य करवाना। इन कार्यों के लिये धन, बल की आवश्यकता है। अत: वे अपराधियों से सम्बन्ध रखते हैं इस प्रकार अपराधी राजनेता और राजनेता अपराधी बने। आज तो राजनीति अपराधी, गुण्डों, तस्करों, काला धन्धा करने वालो का पूँजीपतियों की शरणस्थली बन गई है और देश में राजनीति का अपराधीकरण और अपराधीयों का राजनीतिकरण हुआ है यह खतरनाक है।

स्वतंत्रता के इन वर्षों में काग्रेस अधिकाशं रुप से केन्द्र की सत्ता में रही है। सत्ता में बने रहने ले लिये मतदान केन्द्रों पर कब्जा, मतदान के पहले शराब पिलाना तथा धन वितरण करना अर्थात ओछे से ओछे तरीकों के अपनाये जाने लगें। अपराधीयों का राजनेताओं से गहरे तालूकात रहें रहें है। आज हिन्दुस्तान का दुश्मन न. 1 दाउद इब्राहम कभी महाराष्ट्रा के पुर्व मुख्यमंत्री तथा तात्कालिक मंत्री का सहयोगी रहा है। कुख्यात तस्कर खगोशी, चन्द्रास्वामी का सम्बन्ध तो पुर्व प्रधानमंत्री तक से था। नायना साहनी तन्दूर हत्याकाण्ड जिसमें कांग्रेस के कई बडे़-बडे. नेता शामिल थे....... इत्यादी।

संसद के विरोधी दलों के द्वारा कई बार इन अपराधि नेताओ के उपर लगाम लगाने का कोशीश भी किया गया लेकिन सत्तालोलुप नेताओं ने इस पर ध्यान भी नही दिया और सत्ता में चिपके रहने के लिये अपराधियों के नेता का टोपी पहनाते रहें। इन्हीं नेताओं और अपराधीयों के सम्बन्ध की जाँच करने के लिये बोहरा जाँच समिति बनी। जिसका रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं होने दिया गया। परन्तु कुछ मुख्य सूचना निम्न प्रकार है।

1. सरकार की अपराधी जगत का राजनितीक नेताओं का सम्बन्ध का खुलासा करने में रुचि नहीं है।

2.अपराधी जगत वास्तव में समानान्तर सरकार चला रहें हैं।

3. दाउद इब्राहम तथा मेमन बन्धुओं की अपराधिक कार्वाहियाँ वर्षों से चल रही हैं यह सरकारी अफसरों तथा राजनेताओं के सम्बन्ध से ही संभव है।

4.सी.बी.आई. ने 1986 में ही सरकार को मुम्बई के इस अपराध जगत की कार्यवाहियों की जानकारी दी थी परन्तु जानबूझकर कोई कार्यवाही नहीं कि गई।

5.इन अपराधियों ने तस्करी, अवैध वसुली के अपहरण, सट्टा के द्वारा अरबों की सम्पत्ती बनाई है। यह अन्तर्राष्टीय गैंग है और इस्लामिक कट्टरपंथी देश से भी इसके सम्बन्ध है।

6.मुस्लिम आतंकवादी तथा मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन ऎसे अपराधीयों के साथ मिल कर देश में तोड़फोड़, दंगा, बम विस्फोट, निर्दोश नागरिकों का हत्या कर रहें हैं। इन्हें पेटृो-डालर के रुप में धन प्राप्त हो रहा है। यह धन इसी देश के जाने माने मुस्लिम नेताओं के नाम पर आता है।

7. देशी-विदेशी सरकारी कार्यों मेंकमीशन मिलता है। इस धन का उपयोग वोट खरीदने में किया जाता है। विशेष रुप से मुस्लिम तथा झुग्गी झोंपडी़ में रहने वाले लोगो को खरीदा जाता है।

8. माफिया लोग इन पैसों का राजनेताओं तथा नौकरशाही से सम्बन्ध बनाने में उपयोग करते है।

बोहरा जाँच समिती के इस रिपोर्ट से समझ में आ सकता है कि आज के नेता इस देश को कहा लेकर जा रहें है तथा आने बाला पीढी़ को इस देश में सुरक्षा एवम सम्मान भी मिलना मुसकिल है।
नेताओं के द्वारा नैतिकता की बात केवल भाषणों और लेखों तक ही सीमित रह गई है। राजनेता तथा अधिकारीयों भी स्वयं उससे परे नही है। शासन के सर्वोच्च पदों पर भष्ट, समाज से तिरस्कृ्त, छोटी दलगत मानसिकता के लोग बिठाये जाते हैं। उनसे आखिर इस देश के नागरीकों को क्या अपेक्षा है? विधान सभा, लोकसभा तथा राज्यसभा में झूठ बोलना उनका धर्म हो गया है। इस प्रकार आज की राजनीति छलबल, धनबल और बाहुबल के भरोसे चल रहा है। चारों ओर अपराध और अपराधी तत्वों का संरक्षण, भ्रष्टाचार अनौतिकता का माहौल है।

जागरुक और देशभक्तों को यही मौका मिला है कि इस देश को अपराधीक नेताओ का पत्ता साभ कर दिया जाय और वैसे राजनितीक दल जो अपराधियों का संरक्षण लेता है उसे नकार दें।
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वेलेन्टइन्डे मनाने के फायदे

14 फरवरी को वेलेन्टइन्डे है सभी इसका इन्तजार कर रहें होगें। कुछ विरोध करने के लिये तथा कुछ मनाने के लिये इन्तजार में दिन गिन रहें होगें। तो मैं सोचा क्यों ना सभी को इसका फायदा बताया जाय जिससे वेलेन्टइन्डे मनाने का मजा दुगना हो जायेगा। तथा जो इसके विरोध में हैं उनका भी मुह बन्द हो जायेगा।

फायदा नम्बर 1 - वेलेन्टइन्डे मानाने से विदेश की कई कम्पनियों को बहुत फायदा होता है जैसे गर्भनिरोधक दवाई, कोण्डम, कार्ड, गिफ्ट, चाकलेट, पिंक चड्डी बनाने बाली कम्पनि का बिक्री बढ़ जाने के कारण उनका फायदा होता है। ( हम हिन्दुस्तानी तो हमेशा से दुसरों का ही फायदा देखते है अपना नुक्सान हो जाये तो कोई बात नही)

फायदा नम्बर 2 - लड़को एवम लड़कियों को नया नया साथी मिलता है जिससे उन्हें औफिस, स्कूल, कालेज, इन्सटीट्युट जाने में एक साथी मिल जाता है अगर किसी लड़के पास अपना मोटर बाइक, कार इत्यादी हो तो और लड़कियों को और भी अच्छा रहता है उनका कम से कम एक साल तक का यात्रा का खर्चा बच जाता है फिर अगले साल किसी और के साथ वेलेन्टइन्डे मनाने पर उसका नया बाइक का यात्रा का आनन्द। होटल में खिलाने, सिनेमा दिखाने, माँल घुमाने और खर्च करने वाला एक साथी मिल जाता है इसके बदले में ज्यादा कुछ देना भी नही परता है बस थोडा़ सा ......................................... ।(अन्दर की बात है)

फायदा नम्बर 3 - विदेश से आने वाला करोडो़ रुपय के गुलाब - गुलदस्ता, कार्ड, गीफ्ट इत्यादी को सही सलामत पहूचाने के लिये मजदुरों को कुछ आमदनी हो जाता है। (ये अलग बात है कि इससे हिन्दुस्तान के पिछले साल 7 हजार करोड़ खर्च वेलेन्टइन्डे मनाने के चक्कर में खर्च हो गये| हमारे यहाँ के किसान आत्महत्या करे , 30% जनता आधा पेट खाकर सोये।)

फायदा नम्बर 4 - सरकार को चाहियें कि वेलेन्टइन्डे के दिन नेशनल होलीडे मनाया जाय इसके बदले में 2 अक्टुवर, 15 अगस्त या फिर 26 जनवरी को स्कूल, कालेज कार्यालय को खोल कर रखा जाय जिससे कि वेलेन्टइन्डे के दिन लड़को - लड़कियों को प्रेमालाप करने में किसी तरह का कोई डिस्टरवेन्स ना हो। ( वैसे भी आज कितनो को पता है कि 2 अक्टुबर, 15 अगस्त या 26 जनवरी को क्या हूआ था)

फायदा नम्बर 5 - सभी काँलेज और स्कूल में वेलेन्टइन बाबा के बारें में पढाया जाय और जिससे हमें देश-द्रोह कैसे किया जाता है का शिक्षा मिलेगा। (अखिर प्रेम गुरु बाबा वेलेन्टइन देश-द्रोह के जुर्म में अपना जीवन जेल में काटा है उनके बारे में जानना हमारा परम कर्तव्य है) टिचर ना मिले तो पाकिस्तान से बुलवाया जा सकता है जिससे दोनो देश के सम्बन्ध भी सुधरेंगे वैसे जरुरत नही परेगा पाकिस्तानीयों के कई भाई बन्धु यहाँ रहते हैं।

फायदा नम्बर 6 - सभी समुद्र के किनारे, पार्क में या किसी मैदान में टेम्परोरि टेन्ट का इन्तजाम किया जाना चाहिये जिससे लड़को - लड़कियों को प्रेमालाप करने में किसी तरह का परेशानी नही हो और जो वेलेन्टइन्डे नही मनाते हो उन्हें भी किसी तरह का झीझक ना हो तथा टेन्ट के पास कुछ अस्थाई कोण्डम, गर्भनिरोधक इत्यादी का दुकान रहना चाहिये। जिससे कि वेलेन्टइन्डे मनाने वालों को किसी तरह का तकलीफ ना हो और दुकान चलाने वालों को भी एक दिन के लिये कमाने का जरीया मिल जायेगा।

फायदा नम्बर 7 - गुलाबी चड्डी (महीलाओं को पहनने बाला) बनाने के लिये अभी से सभी फैक्ट्री में कह दिया जाय क्यों कि कुछ पत्रकार उस दिन सभी को चड्डी गिफ़्ट करना चाहती है। देखे यहाँ

फायदा नम्बर 8 - वेलेन्टइन्डे के दिन घर के बडे़ बुजुर्गो का भी कुछ योगदान होना चाहिये उन्हें चाहियें कि वे अपने घर की लड़कियों सुबह जल्दी से उठाकर अच्छा कपडा़ (सेक्सी भी चलेगा) अच्छी तरह मेकअप करके घर से जाने दे जिससे अमीर लड़का (मुर्गा) पटाने में उनकी बच्चीयों को तकलिफ नही हो।

फायदा नम्बर 9 - वेलेन्टइन्डे के दिन अगर मोटा लड़का (मुर्गा) फसे तो जितना जल्दी हो सके उससे शादी कर देना चाहिये जिससे शादी का पैसा बचेगा। (ज्यादा अच्छा कोर्ट मैरेज रहेगा या फिर घर से भगवाया भी जा सकता है समाज में बदनामी का डर दिल से निकाल दें आखिर पैसा जो बचाना है) (जल्दी का शादी सफल नही होता है कोई बात वेलेन्टइन्डे फिर से अगले साल आयेगा नया लड़का (मुर्गा) पकडायेगा)।

फायदा नम्बर 10 - लड़कों को चाहीयों कि इस दिन दिल खोल कर पैसा खर्च करें अगर पैसा ना हो तो किसी से उधार ले सकते है अपने पिताजी के पर्स से भी उधार ले सकतें है, स्कूल, कालेज, ट्युसन का पैसा मार कर खर्च कर सकतें है जो नौकरी करते हैं उन्हें भी खर्च करने में किसी तरह का संकोच नही करना चाहिये आखिर साल में एक बार तो आता है वेलेन्टइन्डे फिर शर्माना कैसा। (आखिर सब खेला पैसा का ही है)

वैधानिक चेतावनी

आपके देस्तरुपी दुश्मन के चलते हो सकता है आपका वेलेन्टइन्डे का मजा फिका पर जाये इस लिये कुछ बातों का ध्यान रखे।

अगर कोई कहे कि वेलेन्टइन्डे का सांस्कृतिक या वैज्ञानिक आधार नही है तो उसे तुरन्त भगा दे हो सकता है वे आपका दुश्मन हो। सांस्कृतिक या वैज्ञानिक क्या लेना देना जब कोई फोकट में कोई आत्मा को तृ्प्त करे तो क्या फर्क परता है सांस्कृतिक या वैज्ञानिक आधार का।

अगर कोई कहें कि वेलेन्टइन्डे के दिन पब में, समुद्र तट, होटल, कॉलेज, पार्क आदि में अश्लील हररकत करके कानून मत तोड़ना इत्यादी समझाये तो उसे कह देना साले यहाँ के नेता, अभिनेता कौन सा कानून का रक्षा करतें हैं सो हम करें।

एक आम आदमी को लड़का-लड़की का अश्लील हररकत से शर्मिन्दगी महसुस करें तो उस ओर ध्यान मत देना और अपने काम में मशगुल रहना। आखिर साल में 1 दिन ही तो मिला अश्लील हररकत करने के लिये।

अगर कोई कहे कि वेलेन्टइन्डे का हिन्दुस्तान से कोई लेना देना नही है तो उसे कह सकते हो मेरा कौन सा हिन्दुस्तान से लेना देना है हम तो जब पैदा हुये थे उसी समय अमेरिका का वीजा माँगे थे कोई नही दिया अब सड़ रहें हैं हिन्दुस्तान में।

चलो अब मनाओ वेलेन्टइन्डे। बिन्दास होकर मनाओ, स्टौक में दो तीन रख कर मनाओ वेलेन्टइन्डे, किसी तरह का कोई परेशानी झीझक हो तो अभी बता दो 14 फरवरी को मैं भी व्यस्त रहूगा।

अहो एक परेशानी है आपको आपके साथ कोई लड़की नही है वेलेन्टइन्डे मनाने के लिये कोई बात नही इधर-उधर नजर दौडा़ओ देखो कई वेलेन्टइन्डे के सर्मथन में कई खडे़ है उनसे उनकी बहन, बेटी, बहू या फिर एक दिन के लिये माँ ही माग लो टी.वी. रिपोर्टर, रेडीयो के र.जे. बाले से भी मांग सकते हो अगर लड़की हो तो और भी आच्छा है उनहें ही साथ चलने को कह सकते हो आखिर एक दिन का ही बात है मैं भी उन्ही लोग से मागने बाला हूँ।

जय बोलो वेलेन्टइन बाबा की
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श्री राम जन्मभूमि पर मुस्लिम आक्रामण का इतिहास

राम का नाम मत लो राम का नाम लेना पाप हो गया है हो गया जब नागपुर में श्री राजनाथ सिंह ने राम का नाम लिया मैं उसी समय खुश हो गया मेरे कई ब्लागर साथियों को तीन-चार ब्लाग का मैटर मिल गया अब कई दिन तक सभी हाय तौबा मचाने के लिये। ज्यादा ब्लागरों को मिर्ची लगेगी यही सोच कर में चिट्ठाजगत खोल कर बैठ गया और देखने लगा आखिर कितने ब्लागर हैं जिन्हें राम से परहेज या शायद राम से नही भा.ज.पा के मुह से राम शब्द सुनने से परहेज है। वैसे ज्यादा लेखकों को श्री रामजन्ममूमि का इतिहास नही पता है लेकिन अपना आधा-अधुरा ज्ञान (अज्ञान) एवम चर्च के पैसों से चल रहें समाचार चैनल के दुस्प्रभाव के कारण अपनी संस्कृ्ती को मिटाने पर ज्यादा रुची दिखाते हैं।

श्री राम जन्मभूमि पर मुस्लिम आक्रामण का इतिहास

लगभग 7बी शताब्दी से ही हिन्दुस्तान पर मुस्लिम लुटेरों का आक्रमण हिन्दुस्तान पर होने लगा था। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सिर्फ मन्दिरों के खजाना लुटने में ही अपनी रुची नही दिखाई मन्दिरों को लूटने के बाद मन्दिरों को तोड़ कर उसको मस्जिद का रुप देना उन्हें ज्यादा भाया। अफजल खाँ ने छत्रपति शिवाजी की अराध्यदेवी तुलाजी भवानी का मन्दीर को तोडा़। दिल्ली के कुतुबमीनार के पास पुरातत्व विभाग के लगाये सरकारी बोर्ड पर लिखा है कि 21 जैन मन्दिरों को तोड़ कर उनके मलबे से कुव्वत-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किया गया।

सेनापति मीरबांकी ने बाबर के आदेश पर अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि पर बना विशाल भगवान राम के मन्दिर को तोडा़ था, जिसका उल्लेख वहाँ खडे़ ढाँचे पर लगे पत्थर पर अरबी लिपि में खुदा था। औरंगजेब के आदेश से मथुरा में श्री कृ्ष्ण जन्मभूमि पर बना मन्दिर को तोडा़ गया। मौहम्म्द गौरी के इतिहासकार हसन कि पुस्तकों से पता चलता है कि मौ़. गौरी ने काशी पर हमला कर भगवान विश्वनाथ मन्दिर सहित लगभग हजार मंदिरों को तोडा़ और मुस्लमानों के इवादतगाह का रुप दिया। ऎसे हजारों मन्दिरों को तोड़ने के अवशेष देश भर में फैले पडे़ हैं।

इन आक्रमणों के विरुद्ध हिन्दुस्तानीयों ने हमेशा से संघर्ष किया है जो आज भा.ज.पा. भी कर रहा है। तोडे़ गये मन्दिरों के बारबार पुननिर्माण कराया है, और अपने अपमान का बदला लिया है। सिन्ध के राजा की पुत्रियों ने आक्रमणकारी के देश में जाकर अपमान का बदला लिया है, आक्रमणकारी सेनापति मौ. बिन कासिम को उसी के राजा से मृ्त्युदण्ड दिलाया। छत्रपति शिवाजी ने अफजल खाँ का पेट फाड़कर समाज के सम्मान की रक्षा की। हिन्दु समाज ने बाबा विश्वनाथ का मन्दिर पुन: बनवाया लेकिन जैनपुर के मुस्लिम बादशाह ने तोड़ दिया जिसका निर्माण राजा टोडर मल के द्वारा किया गया जिसे पुन: औरंगजेब के हुक्म पर उसे फिर से तोड़ दिया गया। मथुरा के जिस स्थान पर औरंगजेब ने ईदगाह बनवाया उस स्थान को मराठों ने जीत लिया परन्तु मराठा अंग्रेज से पराजीत हो गये जिसके कारण श्री कृ्ष्णजन्मभूमि उद्धार का कार्य वही रुक गया।

भा.ज.पा द्वारा लिया गया श्री राम जन्मभूमि मुक्ति का संकल्प कोई पहला नही है इस से पहले 72 बार जन्मभूमि के लिये लडा़ई हो चूका है। बाबर और हुमायूँ के काल में ही 10 बार सघर्ष हुये जिनमें रानी जयराजकुमारी और स्वामी महेश्वरानन्द जी महराज की भुमिका प्रमुख रहा था। औरंगजेब के राज्य में श्री रामजन्म भूमि के लिये 30 लडा़ईया लडी़ गई। गुरु गोविन्द सिंह जी महराज ने मन्दिर की मुक्ति के लिये निहंगों की सेना अयोध्या भेजी था। अवध के नवाब के राजकाल में हिन्दुओं ने 5 बार धावा बोला कर श्री राम जन्मभूमि को मुस्लमानों के आजाद कराने का कोशीश किया। 1857 के समय हिन्दुओं के विजय के बाद मुस्लमानों ने श्री रामजन्मभूमी को हिन्दुओं को सौपने का निर्णय लिया था लेकिन अंग्रेजों के द्वारा समझौता लागू नहीं होने दिया गया और श्री रामचरण दास जी को इमली के पेड़ से लटका कर मार दिया गया।

1947 में भारत अंग्रेज की गुलामी से मुक्त हो गया। अंग्रेज गुलामी के सभी प्रतीक चिन्हों को हटाया जाने लगा। इसी क्रम में सरदार बल्लभ भाई पटेल के दृढ़ निश्चय के कारण सोमनाथ का मन्दिर का जनता के द्वारा किया गया चँदा ( जबकि जामा मस्जिद का खर्चा सरकार ने वहन किया लेकिन गाँधी जी ने सोमनाथ मन्दिर के पैसा देने से साफ शब्दों में मना कर दिया था) के द्वारा पुन:निर्माण किया गया और हिन्दुस्तान के प्रथम राष्टृपती श्री राजेन्द्र प्रसाद जी उस समारोह में मौजुद थे। लेकिन हिन्दुस्तान की बदकिस्मती ने हमेशा की तरह यहाँ भी साथ नही छोडा़ और सरदार बल्लभ भाई पटेल इस दुनिया से कूच कर गये।

इसके पश्चात कांग्रेस व कांग्रेस से टुट कर बने राजनीतिक दलों ने मुस्लिम गुलामी के चिन्हों को हटाकर राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक चिन्हों की प्रतिष्ठा का विचार छोड़ कर सिर्फ वोट के मिले मुस्लिम आक्रमणकारियों को महीमा मण्डन किया जाने लगा। एवमं राष्टृभक्तों एवम मुस्लमानों से लड़ने वाले को देशद्रोही, आतंकवादी इत्यादी नामों से पुकारा जाने लगा। मिडीया एवम शिक्षा जगत पर कब्जा करके पाठयपुस्तकों में भी राष्टृभक्तों के खिलाफ जहर उगल कर हमारी मान्सिकता को दुषित करने का प्रयास किया गया जिसमें कई हद तक ये सफल भी हुये जिसके कारण आज 6 दिसम्बर को हिन्दु नेताओं के पिछ्छलग्गू कंलक दिवस मनाते हैं, गोधरा में हिन्दुओं के जला कर मारने की घटना को हिन्दु का षडयन्त्र, राम सेतु को तोड़ने की घटना को भा.ज.पा. का चुनावी स्टंट अमरनाथ जमीन में हिन्दु के साथ किये गये धोखा को वोट बैंक की राजनीति के रुप में दिखाया जाने लगा। ये हमारे मानिष्क दिवालीयापन है कि हम अपने दिमाग से सोचने की बजाय चर्च के पैसे सो चल रहे मिडीया के सुर में सुर मिलाते नजर आतें है। तथा अपने बुद्धी विवेक को ताक पर रख कर अपने समाज देश पर लगें कलंक को धोने की जगह नेताओं के सुर में सुर मिला कर इस देश को कमजोर करने में लगें हुयें है।
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पाकिस्तान से शान्ति वार्ता या शस्त्र वार्ता

26/11/2008 की घटना के 1 महीना से ज्यादा गुजर गया है। 10 आतंकवादी सिर्फ मुम्बई को ही नही सारे देश को 60 घंटो से ज्यादा के लिये बन्धक बना कर रख लिया था (100 होते तो क्या होता) ताज होटल, नरीमन हाउस, ओबेराय, व छत्रपती शिवाजी स्टेशन सहीत 10-12 जगह हमला किया, ताबड़तोड़ फायरिंग, बम विस्फोट 200 के करीब आदमी मारे गये, जिसमें कई विदेशी भी थे, 300 से ज्यादा घायल, 3 अफसर समेत 14 पुलिस वाले व 2 एन.एस.जी. कमाण्डो शहीद। 9 आतंकी मारे गये और 1 को गिरफ्तार करके फिक्स-डीपोजीट (कभी जहाज का अपहरण होने पर आतंकी हो दे कर जहाज छुराया जा सके, अफजल को भी इसी तरह रखा गया है) में डाल दिया गया। इतना सब होने के बाद नतिजा क्या निकला वही हमेशा कि तरह ढाक के तीन पात। वही आरोप प्रत्योप, वही मिडीया का आतंक से लड़ने का संकल्प, मोमबत्ती जला कर हम एक हैं हम आतंकवाद से नही डरते जैसे तकियानुसी बातें, सुरक्षा ऎजेन्सी और खुफिया ऎजेन्सी पर देषारोपण, सरकार का वही घीसा पिटा व्यान : हम आतंकवाद से नही डरेंगे , हम आतंकवाद का भर्त्तसना करते हैं, आतंकीयों को मुहतोड़ जबाब दिया जायेगा, ये पाकिस्तान का कायराणा हरक्कत है ये, हम पाकिस्तान को नही छोडे़गे , जरुरत परने पर पाकिस्तान में घुस कर आतंकवादी को मारेंगे, इत्यादी-इत्यादी ( ये सब बातें मुझे याद हो गया है)। निन्दा प्रस्ताव, मरेने वालों के लिये शोक संदेश और 20 आतंकियों का वही पुराना लिस्ट जो हिन्दुस्तान 10-12 साल से लिये घुम रहा है।

लेकिन क्या सरकार ने अपना आतंकवाद के सफाया के रवैया में थोडा भी बदलाव लाया है। अफजल अभी तक फिक्सडीपोजीट मे बन्द है। अब एक और एक और आतंकी हाथ लग गया कसाव उसके साथ क्या होगा। उपर से 20 आतंकी का सूची सोचो क्या होगा अगर पाकिस्तान ने ये सभी 20 आतंकी को भारत को सौप दिया तो। हिन्दुस्तान की सरकार इन्हें फाँसी लगा नही सकता है क्यों कि एक समुदाय भड़क जायेगा और इन्हें वोट देना बन्द कर देगा जिससे शायद 10-12 सिट इन्हें कम मिलेगा। क्या होगा अगर ये 20 आतंकि भारत आ गये तो इनका हमारे देश के सरकार उनका क्या करेगा (इस पार आप अपना विचार दें)। अबू सलेम की तरह एक नया राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव के मैदान में ताल ठोकते नजर आयेंगें या फिर किसी राजनितीक दल के जा घुसेंगे और हमारे कर्णधार बन जायेंगे। हो सकता या किसी विशेष समूदाय के होने के कारण राष्टृपति तक बन जाये।

हमारे नेतागण कह रहें है हमारे पास आतंकी के खिलाफ सबूत है कि आतंकि पाकिस्तानी है पक्के सबूत हैं तो फिर आखिर हिन्दुस्तान किस शुभ मुहुर्त का इन्तजार कर रहा है पाकिस्तान पर कार्यवाही करने का। क्या 30-40 और बम विस्फोट और हो जायेगा तब हिन्दुस्तान सोचेंगा कि पाकिस्तान पर कार्यवाही करना है या नही। आखिर क्यों हम हमेशा की तरह इस बार भी अमेरिका का मुँह देख रहें है कि अमेरिका हमें हूक्म दे तो हिन्दुस्तान पाकिस्तान पर हमला करे या फिर सहिष्णुता व अहिंसा के नाम पर शान्ति की वार्ता दुबारा सुरु किया जाय, दोस्ती के नाम पर बस, रेल, प्लेन, बस का आवागमन किया जाय। कार्यवाही के नाम पर अमेरिका का मुँह देखें। हिन्दुस्तान की जगह अगर अमेरिका रहता तो अमेरिका क्या करता क्या अमेरिका। क्या अमेरिका आतंकवाद के खात्मे के नाम पर पर इराक पर हमला नही लिया क्या अफगानिस्तान में आतंकवादीयों को खदेड़-खदेड़ कर नही मारा। एक प्रश्न उठता है क्या ये यह अहिंसा है या कायरता, सहिष्णुता है या हिनभावना या फिर अपने स्वाभिमान का मौत। अगर यैसा नही तो फिर हिन्दुस्तान किस रास्ता पर चल रहा है। क्यों सारे सबूत होने के बावजूद हिन्दुस्तान पाकिस्तान पर कार्यवाही करने से क्यों कतरा रहा है? आज क्यों हिन्दुस्तान अपने स्वाभीमान की रक्षा के लिये अमेरिका जैसा व्यापारी देश का तलवा चाट रहा है क्या कारण है कि हमारे यहाँ के नेता सुटकेस में सबूत का पुलिन्दा बान्ध कर सारे विश्व का परिकर्मा कर रहा है। हमारे नेता क्यों नही वोट प्रेम को छोड़ अफजल को फाँसी पर लटका रहें हैं, लादेन के हमशक्ल को लेकर घुमने बाले नेताओं को देशद्रोह के मामले में जेल में क्यों नही डाला जा रहा है उन्हें पुरस्कार स्वरुप मंत्री पद क्यों दिया जा रहा है। क्यों नही तुष्टीकरण की नीति को छोड़ कर हिन्दुस्तान में पल रहे पाकिस्तान के ऎजेन्ट को किसी चौक चौराहे पर खरा करके गोली मारा जा रहा है। क्यों नही पाकिस्तान के साथ सभी संबन्ध को खत्म किया जा रहा है क्यों शान्ति वार्ता की जगह पाकिस्तान को शस्त्र वार्ता का न्योता नही भेजा जा रहा है। क्यों हमारे देश के कर्णधार राम व कृ्ष्ण के धर्म का पालन करते हूये पाकिस्तान में पल-बढ रहे आतंकि ठिकानों के खत्म करके अपने राजकीय धर्म का पालन क्यों नही कर पा रहें हैं।
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पाकिस्तान को मिटाओं नही तो पाकिस्तान हमें मिटा देगा

दो दिन पहले जैसे टी.वी. खोला समाचार चैनल का ब्रेकीग न्यूज सुनने को मिला कि नोयडा में यु.पी पोलिस और ए.टी.स. ने मिल कर दो आतंकी को ढेर कर दिया खबर मेरे लिये तो चौंकाने वाला था क्यों कि मैं भी नोयडा में रहता हू। लेकिन कुछ नेता के लिये ये खबर खुशखबरी लेकर आया है। जो सेक्यूलरिज्म का ढोंग करके वोट बैंक के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। जिन्हें इन दो मारे गयें आतंकवादियों के नाम पर राजनीति करने का मौका मिलेगा और आतंकवादियों को देशभक्त सिद्ध करके एक समुदाय को खुश करने का कोशिश करेंगे जिससे उस समुदाय का वोट उन्हें मिले। आखिर कब तक ये देश इन नेताओं के घिनौना नाटक को देख और सुन कर चुप बैठेगा।

ये हिन्दुस्तान हैं जहा लादेन का डुपलीकेट को लेकर चुनाव प्रचार में घूमें और उनकी इस देश विरोधी हरकत के लिये यहा कोई अँगुली तक उठाने वाला कोई नही । 26/11 कि घटना हो गई हमारे नेतागण सिर्फ गीदर भभकी देते रह गये तब तक पाकिस्तान ने नोयडा में दो और आतंकी भेज दिये।आखिर हिन्दुस्तान ने क्या कर लिया पाकिस्तान का, पाकिस्तान के नेताओं को हमारे हिन्दुस्तान के नेताओं का गिदर भभकी वाला औकाद पता था इस लिये पहले दिन से पाकिस्तान ने कह दिया पाकिस्तान किसी आतंकवादी को नही सौंपेगा हिन्दुस्तान को जो करना है कर ले। हिन्दुस्तान आज से नही लगभग 10-12 साल हिन्दुस्तान से मोस्ट वान्टेड अपराधी का एक लिस्ट बना कर जेब में रख कर घुम रहा है और पाकिस्तान का पैर पुज कर निहोरा कर रहा है कि दे दो हमारे मोस्ट वान्टेड अपराधी को दे दो जबकि पाकिस्तान हमेंशा से हिन्दुस्तान को लतीयाते रहा है। हमारा देश और यहा के नेता पाकिस्तान का एक बाल भी बांका नही कर पायें। हमारे देश का नींव ही कमजोर है। ये देश स्वार्थी, लोभी, अपराधियों, दलालों, अनाडींयों के हाथ का खिलौना बना गया है।

आज तक कई बार हिन्दुस्तान के पाकिस्तान का तलवा चाटा । लियाकत अली से मेल मिलाप करके अपने मंत्रीमण्डलीय साथियों को त्याग पत्र देने को बाध्य करते रहेंगे, फिरोज खाँ नून को बेरुवाडी़ सौंपते नहीं शर्मांयेगे, अयूब खाँ से हाथ मिलाने ताशकन्द जा पहूचेंगे, भुट्टो को शिमला की सैर करायें और अपने सौनिकों की विजय को उनके हाथ में दे कर अपना पीठ ठोंकेगें, जियाउल्ल हक के तलवा चाटने के लिये क्रिकेट मैच देखने के लिये बुलायें। हजरतबल आतंकियों को बिरयानी खिलाकर अपना चार बीघा नामक क्षेत्र 999 साल के लिये शत्रू को दे दिये। जन्मजात शत्रु से हाथ मिलाने के लिये बस ले कर पाकिस्तान गयें। कारगील और संसद पर हमला करने बाले मुशरफ को अपने गोद में बीठा कर आगरा घुमाये। जिन्ना को सेकूलर होने का प्रमाण पत्र देने का ठिका हम पाले। बेनजीर और जरदारी को शान में कशीदे का पाठ करें। नतीजा ढाक के तीन पात हिन्दुस्तान जितना पाकिस्तान का तलवा चाटता है पाकिस्तान उतना ही हिन्दुस्तान को लतीयाता है।

हमें ये बात याद करके रखना चाहिये कि पाकिस्तान हमारा अपना कभी नही था और ना होगा चाहे हिन्दुस्तान के नेता कितना भी तलवा चाट ले पाकिस्तान हमारा दोस्त नही बन सकता है, जिसने कसम खा रखा है हिन्दुस्तान को बरबाद करने का आखिर उस देश के साथ हम क्यों दोस्ती का हाथ मिलायें आखिर कब तक हमारे नेता चम्मचागीरी नीति ला पालन करतें रहेंगें। हमारें नेता कभी बस से, कभी प्लेन से तो कभी रेल पाकिस्तान गये क्या मिला हिन्दुस्तान को धोखा, बम ब्लास्ट कारगील युध्द, पाकिस्तान से इससे ज्यादा उम्मीद भी नही कि जा सकती है। हिन्दुस्तान को चहीये बस, रेल, प्लेन सब भुल कर सिर्फ एक बार टैंक पर चठ कर पाकिस्तान चले जायें पाकिस्तानीयों को छीपने के लिये एक नया बाप को खोजना पडे़गा । हमें यें बात गाठ बाध कर रख लेना चाहियें कि अगर पाकिस्तान को हम नही मिटाये तो पाकिस्तान हमें मिटा देगा।
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सिर्फ एक सुभाष चाहिये

हर रात में किरण की एक आश चाहिये,
सबके दिलों में एक विश्वास चाहिये,
भारत बनेगा फिर से विश्व गुरु
माँ भारती को सिर्फ एक
सुभाष चाहिये

जय हिन्द
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इजरायल की निन्दा क्यों?

इजरायल ने गाजा पट्टी में हमास पर आक्रमण किया नहीं कि समस्त विश्व एकजुट होकर इस देश की निन्दा करने लगा। विश्व की सर्वोच्च विधिक संस्था में संयुक्त राष्ट्र संघ में इजरायल की निन्दा के प्रस्ताव पारित किये जाने लगे और हर ओर से प्रयास होने लगा कि किसी प्रकार हमास और इजरायल के मध्य युद्ध विराम हो जाये। भारत सरकार भी इजरायल की निन्दा करने में पीछे नहीं रही और विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से इजरायल को आक्रांता की संज्ञा देने में कोई हिचक नहीं दिखाई। लेकिन विश्व की इजरायल के विरुद्ध प्रतिक्रिया के पीछे अनेक प्रश्न खडे होते हैं जिनका संतोषजनक उत्तर अवश्य मिलना चाहिये।

इजरायल की निन्दा करने की भारत की पुरानी परम्परा रही है और भारत ने इजरायल के निर्माण की प्रक्रिया में भी फिलीस्तीन के विभाजन की शर्त पर इजरायल के निर्माण का विरोध किया था और इसके बाद भारत ने आधिकारिक रूप से अरब इजरायल संघर्ष में अरब देशों के साथ खडे होने का निर्णय लिया और इजरायल के हर उस कार्य की निन्दा की जो उसने अपनी आत्मरक्षा में किया। इजरायल के साथ भारत की नीति सदैव दोहरी रही है। एक ओर तो अरब देशों की सहानुभूति प्राप्त करने के लिये, इस्लामी उम्मा के असंतुष्ट हो जाने के भय से और भारत में स्थित मुस्लिम समाज को तुष्ट करने के लिये भारत सरकार सदैव अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इजरायल की निन्दा करती रही तो वहीं अनेक रणनीतिक कारणों से इजरायल को साधने के प्रयास भी गैर सरकारी स्तर पर चलते रहे। वैसे तो भारत और इजरायल के मध्य कूटनीतिक स्तर पर सम्बन्ध 1992 में पी.वी.नरसिम्हाराव की सरकार में आरम्भ हुए परंतु खुफिया और सामाजिक स्तर पर दोनों देशों के मध्य सम्बन्ध 1965 से ही आरम्भ हो गया था। इजरायल को लेकर भारत सदैव दुविधा का शिकार रहा है और इसी कारण 1992 के बाद भी इजरायल की निन्दा का दौर चलता रहा है।

अब यदि इजरायल के हमास पर किये गये वर्तमान आपरेशन पर दृष्टि डालें तो कुछ प्रश्न उभरते हैं। गाजा में हमास पर इजरायल की कार्रवाई के बाद सभी विश्लेषकों ने एक स्वर से इजरायल की कार्रवाई को बर्बर कहना आरम्भ कर दिया परंतु 1948 में अपने जन्म से लेकर आज अतक इजरायल जिस स्थिति का सामना कर रहा है उस सन्दर्भ में विश्लेषकों की राय पूरी तरह एकतरफा लगती है जो इस धारणा पर आधारित है कि इजरायल अरब संघर्ष में स्वाभाविक सहानुभूति अरब देशों या फिलीस्तीनियों के प्रति होनी चाहिये। राजनीतिक रूप से सही होने की परम्परा, छ्द्म उदारवाद और सेक्युलर दिखने की होड में इजरायल की निन्दा तथ्यों के विश्लेषण के बिना की जाती है। 1948 से लेकर आजतक इजरायल ने अरब देशों के साथ जो संघर्ष किये हैं उसकी पृष्ठभूमि जानने के लिये इतिहास में जाना होगा। 1924 में ओटोमन साम्राज्य को समाप्त कर ब्रिटिश ने इस्लामी साम्राज्यवाद की धुरी खिलाफत संस्था को ध्वस्त कर दिया और उसके बाद इस साम्राज्य को अनेक भागों में विभक्त कर मध्य पूर्व में अनेक नये देशों का निर्माण हुआ और इससे पूर्व 1917 में ब्रिटिश साम्राज्य ने विश्व भर के यहूदियों को इजरायल नामक नया देश देनी की उनकी माँग को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया था। इसके बाद फिलीस्तीन में यहूदियों को बसने की छूट दे दी गयी और द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत इजरायल राज्य के निर्माण का विषय संयुक्त राष्ट्र संघ को हस्तांतरित कर दिया गया जिसने अनेक बैठकों के बाद इस क्षेत्र का विभाजन स्वीकार कर इजरायल को यहूदियों के नये राज्य के रूप में स्वीकार कर लिया और 1948 में इजरायल का जन्म हुआ। इजरायल के जन्म से पूर्व फिलीस्तीन में यहूदियों के बसने की प्रक्रिया में भी फिलीस्तीनी मुसलमानों और यहूदियों में खूनी झडप होती थी और 1940 के दशक में तो यहूदियों के विरुद्ध आतंकवाद का अभियान चलाया गया। 1948 में इजरायल के जन्म के साथ ही उसे अरब देशों के प्रतिरोध का सामना करना पडा और इजरायल को तत्काल युद्ध लड्ना पडा। इसके बाद जितने भी युद्ध हुए उसमें इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार न करने की जिद और उसका अस्तित्व समाप्त करने प्रयास हुआ। 1969 में जब इजरायल ने अरब की सभी सेनाओं को जो मिस्र के नेतृत्व में इजरायल से युद्दरत थी उन्हें इजरायल ने मात्र 6 दिनों में परास्त कर दिया तो अरब देशों और इजरायल के मध्य सम्बन्धों में नया मोड आया और मिस्र ने इजरायल के साथ सन्धि की।

वास्तव में इजरायल और फिलीस्तीन के मध्य समस्या को दो देशों के मध्य समस्या के रूप में देखा जाता और उसे राज्यक्षेत्र के विवाद से जोड्कर देखा जाता है। यह एक गलत धारणा है वास्तव में इस संघर्ष का मूल कहीं अधिक गहरा और जटिल है। मध्य पूर्व में पिछले साठ दशक में जितने भी इस्लामवादी आन्दोलनों ने जन्म लिया है उनके मूल में एक ही प्रेरणा रही है कि जेरुशलम पर नियंत्रण को लेकर अनेक शताब्दियों तक क्रुसेड और जिहाद चलता रहा (क्योंकि तीनों ही सेमेटिक धर्म इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी तीनों ही इसे अपने लिये पवित्र मानते हैं) और अंत में पश्चिमी शक्तियों ने यहूदियों के साथ मिलकर एक षड्यंत्र कर जेरुशलम का स्थान यहूदियों को दे दिया और इस प्रक्रिया में उन्होंने इस्लाम की एकता का आधार रही खिलाफत संस्था को नष्ट कर दिया। खिलाफत को नष्ट कर इस्लामी एकता को बिखेर दिया गया और जिस इस्लाम में नेशन स्टेट की कल्पना नहीं थी उसे छोटे छोटे देशों में बाँट दिया गया और इस्लाम के पवित्र स्थल अरब और मक्का मदीना में ऐसी शक्तियाँ सत्ताशीन हो गयीं जो पश्चिमी देशों की कठपुतली सरकारें हैं और वे इस्लाम और शरियत के अनुसार शासन नहीं चला रही हैं। इस भावना के चलते मध्य पूर्व में इस्लामवादी आन्दोलनों का जन्म हुआ जो जिहाद का सहारा लेकर इसे वैश्विक इस्लामी आन्दोलन बना रहे हैं।

इजरायल और हमास के वर्तमान संघर्ष को यदि इस पृष्ठभूमि में देखें तो कुछ प्रश्न उठते हैं। विश्व के जो देश इजरायल की निन्दा करते हैं उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि क्या वे इजरायल के जन्म को अवैध मानते हैं और यदि ऐसा है तो उन्होंने इजरायल को मान्यता क्यों दे रखी है क्योंकि मुस्लिम देश उसे स्वीकार नहीं करते और इसी कारण उसे मान्यता नहीं दे रखी है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ सहित सभी देशों को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये कि क्या वे इजरायल को खिलाफत के अवशेषों पर निर्मित मानते हैं और इसी कारण फिलीस्तीन और अरब देशों से सहानुभूति रखते है। क्योंकि आत्म रक्षा में इजरायल द्वारा की गयी कार्रवाई की निन्दा करना उसके अस्तित्वमान रहने के अधिकार से उसे वंचित करना है। इसलिये जो भी देश, मीडिया, विचारक और लेखक या विश्लेषक़ इजरायल की निन्दा करते हैं उन्हें छ्द्म उदारवाद और छवि निर्माण के प्रयासों से बाहर आकर इस समस्या के मूलभूत विचारों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये।

जहाँ तक हमास के विरुद्ध इजरायल के प्रतिरोध का प्रश्न है तो इजरायल ने एक बार फिर यह कदम अपने नागरिकों की रक्षा में उठाया है। हमास ने गाजा पट्टी में अपनी सरकार स्थापित करने के बाद भी इजरायल को नष्ट करने के अपने मूलभूत उद्देश्य को छोडा नहीं और पिछले अनेक वर्षों से इजरायल के भीतर राकेट दागकर निर्दोष नागरिकों को अपना निशाना बनाया। इजरायल ने अपने बेहतर प्रयासों से नागरिकों की रक्षा के प्रयास किये और राकेट की चेतावनी के लिये ठोस प्रयास किये जिससे इन राकेट हमलों में निर्दोष नागरिक अधिक मात्रा में नहीं मरे लेकिन इजरायल के इस प्रयास से हमास का आशय और अपराध कम नहीं हो जाता। इजरायल के विरुद्ध आरोप लगाया जा रहा है कि उसने गाजा में निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया लेकिन इन आरोपों की चर्चा करते हुए भी लोग उसी भावुकता का शिकार हो जाते हैं जिसके चलते उनकी स्वाभाविक सहानुभूति फिलीस्तीन या अरब देशों के प्रति रहती है। यह कोई पहला अवसर नहीं है इससे पूर्व 2000-1 में जब यासिर अराफात ने इजरायल के विरुद्ध एक प्रकार का आतंकवादी आन्दोलन इंतिफादा के रूप में घोषित कर दिया था तो भी यासिर अराफात की आलोचना नहीं की गयी थी और इजरायल के प्रतिरोध की तत्काल निन्दा आरम्भ कर दी गयी थी।

वास्तव में इजरायल और फिलीस्तीन का संघर्ष पूरी तरह धारणागत छवि युद्ध का शिकार हो गया है। एक ओर तो आतंकवाद के प्रतिरोध और खुफिया एजेंसियों की सन्नद्धता को लेकर अनेक देश इजरायल की विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहते हैं वहीं जब इजरायल के आत्म रक्षा का विषय आता है तो उसकी निन्दा आरम्भ हो जाती है। व्यावहारिक विवशताओं और छवि खराब होने के भय से इस पूरे संघर्ष की वस्तुनिष्ठ व्याख्या का साहस कोई भी नहीं करता। यह छद्म उदारवाद और सेक्युलरिज्म के एकाँगी स्वरूप का सबसे बडा उदाहरण है। एक ओर तो इस्लामवादी और वामपंथी यहूदियों के विरुद्ध षड्यंत्रकारी सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं और आरोप लगाते हैं कि कुछ अदृश्य हाथों से वे समस्त विश्व पर शासन कर रहे हैं लेकिन बिडम्बना है कि जब इजरायल फिलीस्तीन के संघर्ष का विषय आता है तो इस्लामवादियों का जनसम्पर्क अधिक सफल होता दिखता है। आज समय आ गया है कि छद्म उदारवाद का चोला छोडकर छवि निर्माण की चिंता के बिना इजरायल फिलीस्तीन संघर्ष के मूल कारण पर चर्चा की जाये क्योंकि इस समस्या का एक ही समाधान है कि इजरायल के पडोसी यह जान जायें कि वे आतंकवाद या सैन्य तरीकों से इतिहास के हिसाब नहीं चुका सकते और इजरायल एक वास्तविकता है जो उनके मध्य रहेगा। इजरायल की विजय केवल इस क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं करेगी वरन उन इस्लामवादी आन्दोलनों और देशों को हतोत्साहित करेंगी जो वर्तमान को अस्वीकार कर भूतकाल में जीना चाहते हैं और एक काल्पनिक विश्व का निर्माण प्रछन्न युद्ध और आतंकवाद के सहारे करना चाहते हैं।
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एक देश में दो विधान निश्चित टूटेगा हिन्‍दुस्थान


खबर पढ़ी (टेलीविजन देखने का समय नही मिल रहा, और कोई टी0वी चैनल देखने लायक है भी नही) की चन्‍द्र मोहन अब से मियॉं चाँद मुहम्‍मद के नाम से जाने जायेगे। ऐसा क्‍यो हुआ, इसके लिये हमारा स‍ंविधान, व्‍यवस्था और सरकार दोषी है। आखिर कब तक इस देश में धर्म के नाम पर अलग-अलग कानून होगे? कब तक हिन्‍दू प्रेमिका पाने के लिये मुस्लिम बनते रहेगे। आज देश के सभी नागरिको के लिये समान नागरिक संहिता की जरूरत है। नही तो एक देश में दो विधान निश्चित टूटेगा हिन्‍दुस्थान ।
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हिन्दुस्ताने के नेता और अमेरिका के नेता

मुम्बई में इस्लामिक आतंकवाद के बाद के घटनाकम्र पर अगर हम नजर डालें तो हमें क्या नजर आता है। क्या कुछ नया नजर आया । मुझे एक बात नया इस बार नजर आया कि इस इस्लामिक आतंकी घटना के बाद काग्रेस का कलह सतह पर आ गया काग्रेंसी नेता का देश की जगह कुर्सी प्रेम साफ झलक गया। बेचारे शिवराज पाटिल को कुर्सी पर से उठा कर पटक दिया गया। जैसे कि आज तक जितने आतंकी घटना हुआ उसका नैतिक जिम्मेदारी सिर्फ शिवराज पाटिल ही हैं और कोई नही। हमें याद है सिर्फ शिवराज पाटिल ही नही काग्रेंस के हर एक नेता ताल ठोक कर पोटा जैसा कानून हिन्दुस्तान में लागु नही करने का कसम खाते थें। उन सभी नेताओं को काग्रेंस बाहर का रास्ता नही दिखाया निकाला गया तो सिर्फ शिवराज पाटिल को। काग्रेंस के सहयोगी दल जो सरकार में काग्रेंस के साथ में गलवहिया डाले घुमतें हैं जिन्होंने तो खुल कर आतंकवाद का सर्मथन किया लालु प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, काग्रेंस के खुद सबसे बडें नेता अर्जुन सिंह, काम्यूनिष्ट के नेतागण , इन सबके तरफ काग्रेंस ने देखा तक नही, बेचारे शिवराज पाटिल को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जिससें हम जनता समझें काग्रेंस आतंकवादीयों के खिलाफ भयानक कदम उठा रहा है। शिवराज पाटिल को निकाल बाहर करने के बाद अब हिन्दुस्तान में कभी किसी तरह की कोई आतंकी घटना होगा ही नही जैसे शिवराज पाटिल को निकाल कर हिन्दुस्तान में पोटा लगा दिया गया है। शिवराज पाटिल के बाहर निकालने का सिर्फ एक कारण है चार राज्यों में चुनाव है काग्रेस को वहा भी जाकर सभी को मूँह दिखाना है इस लिये शिवराज पाटिल को धन्यवाद कह दिया गया और जो असली समस्या है उसे अनदेखा कर दिया गया। काग्रेंस ने फिर से आतंकवादीयों के खिलाफ ठुलमुल नीति अपनाई और किसी तरह का कोई कठोर कानून कागज के पन्नों और मीटिंग से बाहर निकल कर नही आया। हमें अपने देश के नेताओं को और अमेरिका के नेताओं का मिलान करना चाहियें इस आतंकि घटना में अमेरिका के कुछ नागरीक भी मारे गयें हैं सिर्फ इस बात पर अमेरिका ने पाकिस्तान में अपने विदेश मंत्री को भेज कर वहा के प्रधानमंत्री का गिरेवान तक पकर लिया और कह दिया या तो तुम आतंकवादीयों के खिलाफ कठोर कदम उठाओ नही तो अमेंरिका खुद पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिरायेगा। इस पुरी घटना कम्र में हिन्दुस्तान के नेताओं का कुर्सी प्रेम और अमेंरिकी नेताओं का देशप्रेम साफ झलक रहा है। हमारे देश में 1970 से अभी तक पुरे देश में 4100 आतंकि हमला हो चुका है। लेकिन अभी तक एक बार भी ठोस कदम नही उठाया गया। लेकिन अमेरीका में सिर्फ एक आतंकी घटना के कारण उसनें कई देशों मे घुस कर उसने आतंकियों के खात्मा करने का कसम खा लिया।

आतंक से बार-बार लहू-लुहान होने के बाद भी हम अपने तथाकथित विदेशनीतिक सिद्धांतों के पाखंड से चिपके रहते हैं। यह हमारी राजनीति ही नहीं अफसरशाही और कूटनीति का भी किस्सा है। अगर हम वास्तव में आंतक से लड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। अगर दहशतगर्दी के विरूद्ध निर्णायक मुकाबला करना चाहते हैं तो हमें दोस्तों और दुश्मनों का अब वक्त आ गया है कि चुनाव साफ-साफ करना होगा। अपने दम पर किसी से मुकाबला करना गौरव की बात होती है लेकिन जब बार-बार हम मुकाबला करने के नाम पर सिर्फ चोटे ही खा रहे हों तो ऐसे में अकेले मुकाबले का पाखंड नहीं करना चाहिए। यह साबित करने की जरूरत है कि भारत आज दुनिया में आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित है हालांकि हाल के सालों में अमेरिका दहशतगर्दी का सबसे बड़ा हमला झेला है। ९/११ के रूप में। लेकिन तथ्य यह भी है कि अमेरिका ने इस हमले के बाद से आंतकवादियों की कमर तोड़ कर रख दी है। नौ व ग्यारह के बाद अमेरिका में बडी तो छोड़िए आतंक की छोटी वारदात भी नहीं हुई।
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मुम्बई आक्रमण से क्या सीखें?

मुम्बई पर आतंकवादी आक्रमण को आज चार दिन बीत गये हैं और आज कहीं जाकर मेरा कुछ लिखने का मन हो रहा है। कुछ भी न लिख पाने के पीछे दो मुख्य कारण हैं। एक तो इस घटना ने मुझे इतना दुखी और स्तब्ध कर दिया कि तीन दिन तक ठीक से सो भी नहीं सका। दूसरा कारण कुछ भी न लिखने के पीछे यह था कि प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के बाद चर्चायें होती हैं, मीडिया में बहस होती है, टीवी पर विशेषज्ञ आते हैं और सुझाव देते हैं और फिर यह कर्मकाण्ड कुछ दिनों बाद समाप्त हो जाता है और फिर सब कुछ सामान्य और प्रतीक्षा अगले आतंकवादी आक्रमण की होने लगती है। 26 नवम्बर को मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद से ताज होटल में अंतिम आतंकवादी के मार गिराये जाने तक मैं पूरा घटनाक्रम टीवी पर चिपक कर देखता रहा। इस घटनाक्रम को देखते हुए एक प्रश्न मेरे मस्तिष्क में बार बार कौंध रहा था कि क्या वास्तव में इससे कोई सबक लेगा और निश्चित रूप से मुझे यही लगा कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला। क्योंकि आतंकवादी आक्रमण कोई पहला नहीं है और मानवीय क्षति के सन्दर्भ में इससे भी बडी घटनायें हो चुकी हैं। तो फिर इस आतंकवादी आक्रमण के सन्दर्भ में नया क्या है? एक तो यह घटना देश के उस शहर में हुई जिसे देश की आर्थिक राजधानी माना जाता है और मुम्बई में हुई अन्य घटनाओं की अपेक्षा इस बार इसका अंतरराष्ट्रीय सन्देश अधिक था और यही वह कारण है जिसने इस आक्रमण को विश्वव्यापी स्तर पर चर्चा में ला दिया। जिस प्रकार विदेशी नागरिकों और विशेष रूप से अमेरिकी, ब्रिटिश और इजरायल और भारतीय यहूदियों को निशाना बनाया गया उसने इस बात की आशंका बढा दी कि इस आतंकवादी आक्रमण की पीछे कहीं न कहीं वैश्विक जेहादी आन्दोलन और नेटवर्क की भूमिका है।

मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद दो तीन दिनों तक पूरे विश्व का ध्यान भारत की ओर लगा रहा कि हम इस स्थिति से कैसे निपटते हैं। मुम्बई का यह संकट समाप्त होने के उपरांत इसकी समीक्षा आरम्भ हुई है। विश्व के अनेक देशों की खुफिया एजेंसियाँ इस बात पर एकमत हैं कि इस आक्रमण के पीछे पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादियों की भूमिका है परंतु उनका यह भी मानना है कि यह आक्रमण कुछ नये संकेत भी दे रहा है। एक तो यह कि अल कायदा अब आतंकवादी आक्रमण करने वाला आतंकवादी संगठन मात्र ही नहीं रह गया है वरन वह एक विचारधारा बन चुका है जो विश्व के अनेक क्षेत्रों में विभिन्न इस्लामी उग्रवादी संगठनों को एक छतरी के नीचे लाकर उनसे घटनाओं को अंजाम दिलाता है और निर्णय और विचार उसका होता है और घटनायें विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय इस्लामी उग्रवादी संगठन करते हैं। मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण से यही संकेत मिलता है कि यह योजना अल कायदा की है और इसे अंजाम देने का दायित्व भारत में अपनी पैठ जमा चुके लश्कर-ए- तोएबा को दी गयी।

मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से समस्त विश्व हिल गया है क्योंकि इस आक्रमण ने जेहादी इस्लामी आन्दोलन की विश्वव्यापी पहुँच को रेखाँकित किया है। अमेरिका के खुफिया एजेंसी के अधिकारी और आतंकवाद विषय के विशेषज्ञ मानते हैं कि अल कायदा अमरिका की वर्तमान स्थिति को देखते हुए किसी बडी घटना को क्रियान्वित करने की फिराक में है ताकि बुश को बिदाई दी जा सके और बराक ओबामा का स्वागत किया जा सके। इस आधार पर इस बात की आशंका व्यक्त की जा रही है कि मुम्बई का आतंकवादी आक्रमण अल कायदा की योजना का ही परिणाम है क्योंकि जिस लश्कर ने आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया वह 1998 में ओसामा बिन लादेन द्वारा गठित किये गये इण्टरनेशनल इस्लामिक फ्रंट का घटक है।

इस्लामी आतंकवाद और अल कायदा विषयों के विशेषज्ञ डां रोहन गुणारत्ना के अनुसार अल कायदा अब एक विचार बन चुका है और मध्य पूर्व, एशिया, उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में अपनी गहरी पैठ बना चुका है। अब अल कायदा एक केन्द्रीय कमान के रूप में कार्य करने के स्थान पर विभिन्न इस्लामी उग्रवादी संगठनों को अपनी योजना और निर्णय को आउटसोर्स कर रहा है। अल कायदा ने जिस प्रकार मीडिया, इंटरनेट के सहारे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के द्वारा समस्त विश्व के मुसलमानों के मध्य एक वातावरण बना दिया है कि इस्लाम खतरे में है और उसे निशाना बनाया जा रहा है और इस प्रचार ने सामान्य मुसलमानों को ध्रुवीक्रत किया है और विशेष रूप से नयी पीढी के मुसलमानों को अधिक कट्टरपंथी और मुखर बनाने का कार्य किया है। अल कायदा के इसी अभियान का परिणाम है कि अमेरिका की विदेश नीति और इजरायल तथा अरब देशों का संघर्ष सभी मुसलमानों के मध्य न केवल चर्चा का विषय बन चुका है वरन इस्लामी आतंकवादियों के आक्रमणों को कुछ हद तक न्यायसंगत ठहराने का माध्यम भी बन चुका है।

भारत के प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध के विशेषज्ञ बी रमन ने मुम्बई पर आतंकवादी आक्रमण के बाद अपने एक आलेख में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि नवम्बर 2007 में उत्तर प्रदेश के न्यायालयों में श्रृखलाबद्ध विस्फोटों के बाद इसकी जिम्मेदारी लेनेवाले इंडियन मुजाहिदीन संगठन को लेकर भारत सरकार और खुफिया एजेंसियों के पास अत्यन्त कम सूचनायें हैं। जबकि इसने 2007 से 2008 के मध्य अनेक बडी घट्नायें अंजाम दी हैं। इंडियन मुजाहिदीन के कुछ लोग जब दिल्ली में हुए विस्फोटों के बाद पकडे गये तो उनका कार्य करने का ढंग, उनकी प्रेरणा और मीडिया का उनका उपयोग पूरी तरह अल कायदा से प्रभावित था और उनके पास से फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकवादी अब्दुल्ला अज़्ज़ाम का साहित्य भी मिला था जो ओसामा बिन लादेन का गुरु है और अल कायदा उसी की जेहाद की भावना से प्रेरित है। इसी प्रकार मुम्बई पुलिस ने कुछ महीनों पूर्व जब इंडियन मुजाहिदीन के मीडिया विंग के लोगों को पकडा था तो उसमें भी अनेक तकनीक विशेषज्ञ पकडे गये थे। इंडियन मुजाहिदीन को जिस प्रकार से हल्के में लिया गया वह भारी पड सकता है क्योंकि इंडियन मुजाहिदीन के कार्य करने का तरीका पूरी तरह अल कायदा से प्रभावित है और यह इस आशंका को पुष्ट करता है कि विभिन्न देशों में विभिन्न इस्लामी संगठन सामने आ रहे हैं जो आवश्यक नहीं कि अल कायदा से सीधे सीधे निर्देश ग्रहण करते हों पर वे उसी इस्लामी जेहादी विचार को आगे बढाने के लिये कार्य कर रहे हैं।

मुम्बई में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि अब इस समस्या से अनेक स्तरों पर लडना होगा। इस प्रकार के आतंकवाद से लड्ने में खुफिया विभाग की सक्षमता, आतंकवाद प्रतिरोध संस्थाओं का राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता प्रमुख तत्व हैं पर इसके अतिरिक्त इस समस्या से विचारधारागत स्तर पर भी लडना आवश्यक है। जिस प्रकार इस्लामी आतंकवादियों ने समस्त विश्व में 48 घण्टे से अधिक समय तक टीवी पर लोगों को अपनी ताकत देखने के लिये बाध्य किया उसके दो निहितार्थ हैं एक तो इससे सामान्य लोगों में आतंकवादियों के एजेण्डे को जानने की उत्सुकता होती है और दूसरा खौफ और अराजकता फैलती है जो राज्य को कमजोर बनाता है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार के कार्य न केवल फिदायीन बन कर जन्नत प्राप्त करने की इस्लामी आतंकवादियों की मंशा को उजागर करते हैं वरन और अधिक युवकों के मुजाहिदीन के रूप में भर्ती होने को प्रेरित करते हैं। क्योंकि ऐसे आतंकवादियो के लिये वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के भरभराते भवन, मैरियट होटल का धू धू कर जलता दृश्य अधिक प्रेरित करता है। इस बात को समझने की आवश्यकता है और इसलिये इस्लामी जेहाद के इस आन्दोलन को उसकी समग्रता में समझ कर उसका समाधान करने की आवश्यता है।

आज इस बात पर बहस करने से कोई लाभ नहीं है कि इस्लाम शांति की शिक्षा देता है कि नहीं और इसका भी कोई मतलब नहीं है कि कितने इस्लामी संगठनों ने आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया आज मानवता के अस्तित्व का प्रश्न है और इस अस्तित्व पर प्रश्न खडा किया है ऐसे इस्लामवादी आन्दोलन ने जो विश्व पर फिर से इस्लामी साम्राज्य स्थापित करने की आकाँक्षा लिये शरियत का शासन स्थापित करना चाहता है और इसके लिये कुरान और हदीथ का उपयोग कर रहा है। इस इस्लामवादी आन्दोलन ने प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध के मध्य हुए नाजी आन्दोलन, फासीवादी आन्दोलन और शीत युद्ध में चले कम्युनिस्ट आन्दोलन से अधिनायकवादी विचार लेकर एक नया आन्दोलन खडा किया है जिसने इस्लाम के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण से एक सन्देश स्पष्ट है कि अब यदि समस्या को नही समझा गया और इसके जेहादी और इस्लामी पक्ष की अवहेलना की गयी तो शायद भारत को एक लोकतांत्रिक और खुले विचारों वाले देश के रूप में बचा पाना सम्भव न हो सकेगा और यही चिंता समस्त विश्व को हुई है कि कहीं इस्लामवादी आन्दोलन अब मध्य पूर्व के बाद दक्षिण एशिया में अपनी पैठ न बना ले क्योंकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश पहले ही इस्लामी चरमपंथियों के हाथ में खेल रहे हैं और भारत सहित दक्षिण एशिया की मुस्लिम जनसंख्या कुल जनसंख्या के 57 प्रतिशत से भी अधिक है और यदि यह क्षेत्र इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथ में आ गया तो विश्व का नक्शा क्या होगा?

अब पाकिस्तान और बांग्लादेश को दोष देने से ही काम नहीं चलेगा और इन देशों की खुफिया एजेंसियों द्वारा जिस प्रकार भारत में इस्लामी तत्वो में घुसपैठ की गयी है उस पर कठोर कदम उठाना होगा और विभिन्न इस्लामी विचारधाराओं चाहे वह अहले हदीस. बरेलवी, देवबन्द, सलाफी, वहाबी हो इनसे सम्बन्धित मस्जिदों, मदरसों, आर्थिक स्रोतों पर नजर रखते हुए इनके इस्लामवादी आन्दोलन के साथ सम्बन्धों की जाँच करते रहनी होगी। आज पाकिस्तान और बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियों ने भारत के हर हिस्से में अपनी पैठ कर ली है फिर वह उत्तर पूर्व हो, दक्षिण भारत हो, उत्तर भारत हो, मध्य भारत हो या पश्चिम भारत हो। मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण ने हमें अंतिम अवसर दिया है कि हमारे राजनेता आतंकवाद को वोट बैंक की राजनीति से जोडकर देखने के बजाय समस्या की गहराई को समझें और जानें कि आतंकवाद क्या है? इसके पीछे सोच क्या है? इसे कौन सहायता दे रहा है? न कि इस्लामी आतंकवाद के समानांतर हिन्दू आतंकवाद को खडाकर स्थिति को और अधिक उलझायें।

मुम्बई पर हुए आतंकवादी आक्रमण ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया है और हमारी कमजोरियों की पोल खोल दी है आज विश्व स्तर पर भारत सरकार की नरम नीतियों को लेकर लेख लिखे जा रहे हैं फिर भी लगता है कि कुछ ही दिनों में घटिया राजनीति फिर आरम्भ हो जायेगी और केन्द्र सरकार आतंकवाद को अल्पसंख्यक वोट से जोडकर बयानबाजी और आरोप प्रत्यारोप आरम्भ कर देगी।
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आंतकवादीयों से कोई उसका धर्म तो पुछ लो।

आतंकवादीयों का धर्म सिर्फ आंतक फैलाना है आखिर किसने बताया कि आतंकवादीयों सिर्फ आंतक फैलाना है क्या नाम है उस आंतकवादी का उस आतकवादी के बारे में हम सभी को पता होना चाहिये। शायद कोई नही है यह सिर्फ भर्म फैलाया जा रहा है कि आंतकवादी का धर्म सिर्फ आतंक फैलाना है। सबसे बडी़ बात है कि हमारे देश के रहनूमा इस देश से आतंकवाद का खात्मा करना ही नही चाहते हैं। हमेशा हर आतंकवादी घटना के बाद हमारे प्रधानमंत्री का रटा - रटाया ब्यान आता है पाकिस्तान का हाथ हैं तो अगर पाकिस्तान का हाथ है तो हमें हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने चाहिये। निर्दोश नागरिकों को तड़प-तड़प के मरने देना चाहिये क्या करना चाहिये अगर पाकिस्तान का हाथ है तो। पाकिस्तान के पास परमाणु बम है तो क्या हमारे पास छुरछुरी है। क्या पाकिस्तान अमेरीका जैसा महाशक्ती है जिसके भिख से हमार देश पल रहा है। अखिर क्या कारण है पाकिस्तान जैसे अदना सा देश से हमारे नेता डर कर बैठे हैं। पाकिस्तानियों से तो लड़ने के लिये हमें आर्मी का जरुरत भी नही पडे़गा सिर्फ बिहार में रहने बाले बेरोजगार अपना डंडा ले कर चले गये तो सभी पाकिस्तानीयों की घीघ्घी बंध जायेगा। लेकिन क्या कारण है कि हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान को सिर्फ एक बन्दर घुरकी तक मारने के नाम से पसीना छुटता है। क्या हमारे देश के नेता इसका कारण बतायेंगे। कारण सिर्फ एक है हिन्दुस्तान में रहने वाले पाकिस्तान सर्मथक कही नाराज ना हो जाये उसका वोट पाने के लिये हम आतकवाद से लड़ने नही चाहतें हैं। बस नित्य नये वहाने बना कर अगला आतंकवादीयों के घटना का इन्तजार करते हैं और फिर से वही बेतुकी ब्यानवाजी का सिलसीला सुरु हो जाता है। हर आतंकवादी घटना के बाद रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, काम्यूनिष्ट जैसे सिमी सर्मथक नेताओं के भी अन्दर देशभक्ती का ज्वार फूटने लगता है।
हम सभी जानते हैं कि हिन्दुस्ताने में कौन है जो आतंक फैला रहा है और उसका कारण भी क्या है सभी जानते हैं। आखिर क्या कारण है कि सिर्फ हिन्दूओं कि ओर से आवाज आती है कि निरोधक कानून लगाया जायें। यहां तक कि कुछ राजनितीक पार्टीयाँ सिर्फ इस लिये निरोधक कानून इस देश में नही लागा रहा है कि हिन्दुस्तान में रह रहें आतंकवादीयों के खिलाफ सोफ्ट पालिसी रखने वाले उस पार्टी को वोट नही देगा। मुम्बई में जो कुछ हुआ सारा देश देखा और तो और अब आगे जो कुछ नही होगा उसे भी हम देखेंगे । आज आतंक की लडाई में हिन्दुस्तान का नम्बर 0 है शुन्य यह राष्टृ आतंक की लडाई में नपुंस्क है। अगर हिन्दुस्तान आतंकवादियों से लडना चाहता है तो सबसे पहले कार्यवाही वैसे तत्वों से लड़ना होगा जो आतंकवादियों के साथ मेल-जोल रखतें है। क्या किसी ने सोचा है कि आखिर पाकिस्तानीयों को मुम्बई के रास्तो का पता कैसे चला उन्हें कैसे पता चला कि ताज होटल कहां है। ताज होटल का गेट किधर है आखिर किस ओर से ताज होटल में घुसा जाता है। किसने बताया मुम्बई के रास्तो का आखिर किसने बताया ये सब। कुछ समाचार चैनल वालों के अनुसार कुछ आंतकवादी नरीमन प्वांट के एक घर में पिछले छ: महीना से रह रहा है। आखिर कैसे एक आतंकवादी हमारी अपनी ही धरती में रह कर छ: महीना से इस देश को बर्बाद करनें का शाजिश रचता रहा है और हामारे किसी खुफिया एंजेसी को पता नही चला। हिन्दुस्तान ही एक यैसा देश है जहाँ 9 तरह के खुफिया एंजेसी काम करती है और सबसे ज्यादा आतंकी हमला भी हिन्दुस्तान में ही होता है। नेता इस बारें में कुछ करने धरने वाले नही है हर आतंकवादी हमले के बाद उनके पास रटा - रटाया एक ब्यान है आतंकवादी हमले में पाकिस्तान का हाथ है। मुम्बई में आतंकी हमले के सिर्फ 2 घंटे बाद समाचार चैनल में ये खबर आने लगा कि सरकार की तरफ से ब्यान आया है कि इस घटना में पाकिस्तान का हाथ हैं क्या सरकार के खोजी मंत्री ये बतायेंगे की आखिर हिन्दुस्तान का कौन सा खुफिया एंजेसी है जो कि सिर्फ दो घंटा में पता लगा लिया कि आतंकी हमला में पाकिस्तान का हाथ है और अगर खुफिया एंजेसी इतना तेज है तो फिर 26 आतंकी समुन्द्र के रास्ते हमारे देश में घुस गये किसी नेता और खुफिया एंजेसी को क्यों नही पता चला। अरे जब अपना सिक्का अगर खोटा हो तो दुसरे को गाली देने से कोई फायदा नही। क्या सही में हम लडना चाहते है आतंकवाद से। मैं एक प्रतिष्ठीत समाचार पढ़ रहा था उसमें लगभग सब जगह सिर्फ मुम्बई आतंकवाद और आतंकवादीयों का चर्चा नजर आया लेकिन कही भी नही लिखा था कि ये आतंकवादी मुस्लमान है लेकिन एक जगह बाक्स बना कर उसे अच्छी तरह हाइलाइट करके उसमें लिखा था कि 20-22 साल के युवक जिसके एक हाथ में ए.के.47 था और दुसरे हाथ में कलावा (पुजा में हिन्दुओं के द्वारा बाधें जाने वाला रक्षा शुत्र) जिसके कारण ये आतंकवादी हिन्दु आतंकवादी है। सोच सकते हो आज आंतकवादीयों क पहूँच कहा तक हो गया है।

मुझे हिन्दुस्तान के पुलिस, आर्मी और खुफिया एंजेसी पर किसी तरह का कोई शक नही है उन्हें 1 सप्ताह के लिये गृह मंत्रालय के अन्दर से हटा दिया जाये ये जाबांज सिर्फ जमीन पर रहने वाले आतंकियों को ही नही अगर किसी के गर्भ के अन्दर भी छिपा होगा तो ये उसे ये पाठ पढा़ देगे इसमें किसी भी हिन्दुस्तानीयों को शक नही है। लेकिन क्या किया जाय हमने अपने आस्तिन में ही सांप पाल कर रखे हैं और हमारे रहनुमा उस सांप को दुध पीला कर तैयार कर रहें हैं जो मैका मिलने पर हमें ही काटने को तैयार हैं। हर आतंकी घटना के बाद हमारे प्रधानमंत्री जी का ब्यान आता है हम आतंकवादी से लडेंगे आज तक प्रधानमंत्री जी ने कभी नही बताया कि कब लडेंगे और कितने मासूम के खुन बहने के बाद लड़गे। आतंक से लडाई का शुभ मुहुर्त आखिर कब आयेगा। प्रधानमंत्री के अनुसार हमारा कानून इन आतंकीयों से लडने के लिये सक्षम है। हमारे प्रधानमंत्री के मुह से मिठा मिठा बातें तो निकलेगा ही क्यों की खुद तो सुरक्षा के लिये हिन्दुस्तान के सबसे काबिल कंमाण्डो के साथ घुमतें है सोनिया गाँधी और उनके बच्चों के लिये तो सुरक्षा के सभी उपाये किये गये चाहे उसके लिये कानून का ही संसोधन क्यों ना करना परे। उन सबके लिये तो कानून सख्त है लेकिन हम मासूम के लिये आतंकवाद रोकने के लिये कौन सा कानून है अगर हमारा कानून इतना सक्ष्म है तो फिर हर 10 वे दिन ये आतंकी घटना क्यों क्या प्रधानमंत्री बतायेंगे। अगर इनमें सक्षम कानून बनाने का ताकत नही है तो फिर गद्दी छोड़ क्यों नही देते।

आतंकवादीयों से अब हम आम जनता को ही लडना होगा क्यों कि ये देश भी हमारा है इस देश पर मुसीबत आतें ही विदेशी तो अपने बाल बच्चे के साथ इटली चले जायेंगे। हम कहाँ जायेंगे। चुनाव नजदीक है वोट डालने जरुर जाये वोट डालने से पहले आँख बन्द करके एक बार उन चित्तकार करते हुये चेहरा को जरुर देख ले जिसका अपना इस आंतकी घटना में मारा गया है फिर अपना वोट डाले।
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मुम्बई में जिहादी आतंकी हमला

मुम्बई में फिर से जोड़दार जिहादी आतंकी आक्रमण हुआ लगभग 100 से ज्यादा आदमीयों को जिहादीयों ने मार गिराया। इस घटना ने पुरे देश के समझदार आदमीयों को शायद झकझोड़ कर रख दिया। लेकिन मेरा कुछ अलग ही चिन्ता है।

मेरा पहला चिन्ता हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्रीयों श्री मनमोहन सिंह जी को लेकर है। अगर कोई आतंकवादी जिन्दा बच गया तो बेचारे प्रधानमंत्री को रात भर निन्द नही आयेगा। 6 महीना के अन्दर जिहादीयों ने लगभग 1000 बेगुनाह आदमीयों को मार गिराया हमारे प्रधानमंत्री को इस का चिन्ता नही है। लेकिन काग्रेस ने कसम खा रखा है कि इस देश से वे जिहादीयों के खिलाफ किसी तरह का कारवाही नही करेंगे काग्रेस आतंकवादी निरोधक कानून नही लागु करेगा चाहे जिहादीयों के द्वारा कितना भी खून बहाया दिया जाये। क्यों कि मुस्लमानों के द्वारा दिये गये वेट बैंक खिसकने का डर है। ये भी सोचने लायक बात है आखिर मुस्लमान यैसी ही राजनितीक पार्टीयों को ही अपना सर्मथन क्यों देतें हैं जो आतंकवाद के खिलाफ नरम भाव रखतें हैं कई मुस्लमानों को हमेंशा से यही चिन्ता रहती है कि हिन्दुस्तान के सभी मुस्लमान आतंकवादी नही है तो फिर मुस्लमानों आमंकवादीयों से का इस तरह का प्रेमभाव क्यों। हम तो प्रधानमंत्री से मांग करते हैं कि संविधान में संसोधन करके महीना में 4दिन निश्चित कियों जायें जिस दिन आतंकवादी देश के किसी भी हिस्से में खुलेआम कत्ले आम मंचा सकते हैं उन्हें किसी तरह का कोई पुलिस के द्वारा रोक-टोक ना किया जाय। क्यों की हमारे देश के नेतो में आंतकियों को रोकने का शक्ति नही है ये अपना सारा शक्ति निर्दोश हिन्दुओं को आंतकवादी सिद्ध करनें में लगा दिये है।

दुसरा चिन्ता कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह जी को लेकर है इस वाटला हाउस में जिहादीयों का सख्या कम था उनका केश लडने के लिये 1-2 वकिल से काम चल जाता लेकिन यहाँ मुम्बई में तो आतंकियों का संख्या ज्यादा कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिह जी को तो इनका केस लड़ने के लिये ज्यादा वकिल का इंतजाम करना होगा। और तो और पैसा भी ज्यादा लगेगा लेकिन मुझे पैसे का चिन्ता नही है नेताओं के पास पैसा का कोई कमी नही रहता है हिन्दुस्तान के नेताओं के चलते तो स्विस बैक इतना फल फुल रहा है। नही तो इस मंदी की मार में स्विस बैंक भी बन्द हो गया होता। जिस तरह से मुम्बई में आतंकी घटना हुआ है आंतकीयों का सख्या लगभग 15 से 20 लगभग होगा अब इतने आंतकवादीयों के लिये वकिल भी ज्यादा चाहिये। कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह को एक मुफ्त का सजेशन देता हू अगर वकील कम पड जाये तो वे अपने ही पार्टी के नेताओं का सेवा ले सकतें है आखिर घर बाले कभी तो काम में आने चाहीये।

तीसरा चिन्ता श्री शिवराज पाटील के बारे में हैं रहने दो इनके बारें में सोचना ही बेकार है अभी कही व्यस्त होगें अपना कपडा सिलवाने या धुलवानें में या फिर अपना पुराना पेपड़ खोजने में जिसमें अनका पिछला व्यान छपा था क्यों कि कुछ देर में हिन्दुस्तान के सबसे तेज चैनल के तेज पत्रकार तेजगती से श्री शिवराज पाटील जी का ब्यान लेने आ जायेगा। मेरा मुफ्त का सजेशन तेज चैनलों के बारें में क्यों अपना समय बर्बाद करते हो तेज पत्रकारों श्री शिवराज पाटील जी का पुराना रिकार्डीग निकालो कमप्यूटर के द्वारा उन्हें आठ - दस तरह के नये कपडें पहनाओं और दिखा दो आखिर श्री शिवराज पाटील जी अभी 10-12 दिन पहले तो ब्यान दिये थी आतंकीयों के खिलाफ जब आसाम में धमाका हुआ था। अब इतना जल्दी नया ब्यान लेने का जरुरत क्या है।

चौथा चिन्ता श्री माननीय अमर सिंह जी के बारे में है इस बार उनका पैसा कुछ ज्यादा खर्च होने वाला है। आखिर आतंकवादीयों के सच्चे हित्तैसी इस देश में कोई है तो वे हैं श्री अमर सिंह उन्हे आतंकवादीयों का हमेंशा से ख्याल रहता हैं। आंतकवादीयों के परिवार वालें के लिये उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी में जिलाध्यक्ष का पद रिजर्व रहता है। और अगर सुरक्षाबल के ना-समझी के कारण कोई आंतकी मारा गया तो श्री अमर सिंह जी है उन पुलिस वाले के खैर खबर लेने के तैयार रहतें है और आतंकवादीयों का परिवार वालें को देने के लिये श्री अमर सिंह जी ने का फंड है 10 लाख रुपये। लेकिन इस बार शायद आतंकी मदद फंड का पैसा कुछ घटाना होगा क्यों कि आंकवादीयों का सख्या वाटला हाउस से ज्यादा है अगर मुम्बई में आतंकियों का संख्या 15 से 20 रहा तो सोच सकते है कि अमर सिंह जी का कितना पैसा इस बार खर्च होगा 1 करोड से ज्यादा। मेरा मुफ्त का सजेशन श्री आतंकी रक्षा मंच के सस्थापक श्री अमर सिह जी के लिये माननिय अमर सिंह जी इस बार क्यों न इस बार इन आतकीयों के परिवार वालों को गलत साइन किया हुआ चेक दे दिया जाये। क्यों की चेक तो आपके सामने कोई बैंक में डालेगा नही कुछ दिन बाद डालेगा तब तक हिन्दुस्तान के सभी मुस्लमानों के बीच ये खबर तो पहूच ही जायेगा कि आपने आतंकवादीयों को 10 लाख का सहायता प्रदान किया वैसे भी आपको चेक पर गलत साईन करने का आदत तो है मुस्लमानों का वोट आपके लिये भी पक्का साला देश जाये भाड़ में।

मेरा अंतीम चिन्ता बहुत ही तेज मिडीया वालों के लिये है कम से कम दो दिन तक इन बेचारे क्या करेंगे मुझे समझ नही आ रहा है क्यों कि रात के 9 से 10 बजे का समय तो कम से कम दो दिन के लिये ही सही मुम्बई धमाकों पर घरीयालि आँसु तो बहायेंगे । हिन्दु धर्म गुरु को गरीयाने के लिये दो दिन का झुट्टी मिल गया इन्हें।

पाढ़को आपका भी कोई चिन्ता होगा तो निचे कामेंन्ट में लिख दिजीयें
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मालेगाँव मामले में जाँच हो रही है या कुछ और?

29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुए विस्फोट के पश्चात जिस प्रकार जाँच के बहाने हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का सृजन करने का प्रयास हुआ है उसके अपने निहितार्थ हैं और अब तक यदि पूरे घटनाक्रम में बयानबाजी से लेकर मीडिया ट्रायल को ध्यान से देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह जाँच नहीं कुछ और है और यह कुछ और क्या है इसका निर्णय आप कुछ तथ्यों के आधार पर स्वयं करें।

29 सितम्बर को मालेगाँव विस्फोट में महाराष्ट्र एटीएस की ओर से जाँच की प्रक्रिया आरम्भ ही की गयी थी कि 5 अक्टूबर को एनसीपी के नेता शरद पवार ने घोषणा कर दी कि आतंकवादी मामलों में मुसलमानों को बदनाम किया जाता है लेकिन हिन्दू आतंकी गुटों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। इससे दो बातें स्पष्ट हैं कि एक तो शरद पवार ने जाँच से पूर्व ही घोषित कर दिया कि मालेगाँव विस्फोट हिन्दुओं ने किया है और वे आतंकवादी हैं। इसके बाद तो जाँच मात्र औपचारिकता ही रह गयी थी जिसकी दिशा स्पष्ट थी। शरद पवार के बयान के एक सप्ताह पश्चात मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को एटीएस ने पूछताछ के लिये सम्पर्क किया। इसी के साथ महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल भी समाचार माध्यमों से कहते रहे कि आरोपियों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं।

इसके बाद आरम्भ हुआ जाँच की प्रक्रिया के दौरान कुछ चुनी हुई खबरों को लीक करने का दौर। सबसे पहले एटीएस ने भारत के सबसे तेज हिन्दी न्यूज चैनल को कान में बताया कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित ने अपनी पूछताछ और नार्को टेस्ट में एक धर्मगुरु और हिन्दू संगठन के बडे नेता का नाम लिया है। इसके बाद मीडिया को इस बात का लाइसेंस मिल गया कि वह किसी भी धर्माचार्य को ललकारे और उसे कटघरे में खडा कर दे। इस पूरी कसरत में स्टार न्यूज और एनडीटीवी की भूमिका अग्रणी रही।

एटीएस द्वारा धर्माचार्य का नाम लेकर संशय की स्थिति निर्माण करने के पीछे प्रयोजन कुछ भी रहा हो परंतु इस बहाने देश के कुछ बडे संतों को पूरे मामले में घसीटने का प्रयास हुआ। इसी बीच एटीएस ने मीडिया को बताया कि इस विस्फोट के आरोपियों के उन विस्फोटों से सम्बन्ध होने की जाँच की जा रही है जिसमें मुसलमान ही मारे गये हैं और यह विस्फोट हैं समझौता ट्रेन विस्फोट, मक्का मस्जिद विस्फोट, अजमेर शरीफ विस्फोट। इस विषय को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि सन्देह के आधार पर सम्बन्धित एजेंसियों या राज्य सरकारों की पुलिस की जाँच को अंतिम निष्कर्ष मान कर प्रस्तुत किया और एनडीटीवी ने तो अपने कार्यक्रम हम लोग में तो बकायदा इन विस्फोटों को हिन्दू आतंकवादियों पर चस्पा करते हुए हिन्दू आतंकवाद पर बहस ही आरम्भ कर दी। अब प्रश्न यह है कि इन विस्फोटों की पूरी जाँच होने से पूर्व इसे कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पांडे के माथे मढने के पीछे मंतव्य क्या था? जब इन विस्फोटों की जाँच करने के लिये सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने कर्नल पुरोहित से सम्पर्क किया तो पता लगा कि इन विस्फोटों अर्थात समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट और अजमेर विस्फोट से इन आरोपियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस पूरे मामले में जिस प्रकार एटीएस ने अति सक्रियता दिखाई और जाँच को मीडिया केन्द्रित रखा उससे स्पष्ट है कि एटीएस निष्पक्ष रूप से कार्य करने को स्वतंत्र नहीं है। इस बीच एटीएस का बयान देना फिर खण्डन करने का दौर भी चलता रहा। यहाँ तक कि समझौता एक्सप्रेस में आरडीएक्स से विस्फोट करने की कहानी आयी और फिर उसका खण्डन एटीएस ने किया।

इन बयानबाजियों के बाद पूरी कहानी में मोड आया जब मालेगाँव विस्फोट के दायरे को बढा कर कुछ वर्ष पूर्व हुए बम विस्फोटों की सीबीआई जाँच को भी इसके साथ जोड दिया गया। यह प्रयास भी यही सिद्ध करता है कि अब इतनी सक्रियता क्यों? आखिर इन मामलों की जाँच पहले क्यों नहीं की गयी और यदि की गयी तो क्या अब उस जाँच पर भरोसा नहीं रह गया।

वास्तव में एटीएस और उनके राजनीतिक आकाओं के सामने एक समस्या है कि इस पूरी जाँच को ये लोग दो स्तर पर प्रयोग करना चाहते थे। एक तो देश में हिन्दू आतंकवाद का एक सुव्यवस्थित नेटवर्क दिखाने का प्रयास ताकि न्यायालय में इसे साक्ष्य बनाया जा सके और सामान्य जनता को दिखाया जा सके कि देश में हिन्दू आतंकवाद है। वास्तव में आतंकवाद की परिभाषा है और इसके अनुसार आतंकवाद के लिये एक नेट्वर्क होना चाहिये, उसकी वित्तीय सहायता होनी चाहिये, आतंकवादियों के प्रशिक्षण के लिये लोग और हथियार होने चाहिये, आतंकवादियों को हथियार मिलने चाहिये और उसे उपलब्ध कराने वाले लोग चाहिये। यही कारण है कि एटीएस ने इन तथ्यों के लिये साक्ष्य प्राप्त करने में गोपनीयता बरतने के स्थान पर मीडिया को समय समय पर लीक किया और कुछ समाचार चैनलों और समाचार पत्रों को इस आधार पर कपोलकल्पित कहानियाँ बनाने का पूरा अवसर दिया।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है वह यह कि जिस प्रकार कुछ राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा सृजित करने में दिन रात लगे हुए हैं उसके अपने निहितार्थ हैं।

अब कुछ समाचार चैनलों की अति सक्रियता पर दृष्टि डालें। स्टार न्यूज, एनडीटीवी और न्यूज 24 ने इस विषय में अति सक्रियता दिखाई। इसमें न्यूज 24 और एनडीटीवी की बात तो समझ में आती है कि एक तो कांग्रेस के बडे नेता का चैनल है और दूसरे का सम्बन्ध कम्युनिस्ट पार्टी से है। परंतु स्टार न्यूज की सक्रियता इस लिये महत्वपूर्ण है कि यहाँ पूरा जिम्मा इस चैनल में सबसे बडे पद पर बैठे एक सदस्य ने उठा रखा है जो एक समुदाय विशेष से हैं। इन सज्जन के बारे में बताया जाता है कि जब दिल्ली में जामिया नगर में एनकाउंटर हुआ था तो इन्होंने सभी मीडिया के लोगों को एसएमएस कर आग्रह किया था कि इस पूरे मामले में संयम रखें और जामिया नगर का नाम न लें और न ही जामिया मिलिया विश्वविद्यालय का नाम लें क्योंकि इससे स्थान और संस्थान बदनाम होता है। इसके साथ ही उनका तर्क था कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यही सिद्धांत तब गायब हो गया जब मालेग़ाँव में हिन्दू आरोपी बनाये गये। ये सज्जन पूरे मामले में व्यक्तिगत रूचि लेकर न्यूज फ्लैश चलाने से लेकर स्क्रिप्ट बनाने तक का पूरा विषय स्वयं देखते हैं और पूरे चैनल को इनका निर्देश है कि मालेगाँव मामले को विशेष कवरेज दिया जाये। इन सज्जन की व्यक्तिगत रूचि थी कि साध्वी की दीक्षा को इन्होंने आतंकवाद से जोड्ने का प्रयास किया। साध्वी प्रज्ञा के गुरु को ललकारा और कहा कि वे भाग खडे हुए हैं। जबकि बाद में इन्हीं संत ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में बताया कि वे कथाओं में व्यस्त थे और उनकी कथाओं का सीधा प्रसारण कुछ टीवी चैनल पर भी हो रहा था। इसी प्रकार इन सज्जन ने श्री श्री रविशंकर को भी इस पूरे मामले में घसीटने का प्रयास किया।

आज यदि स्टार न्यूज को ध्यान से देखा जाये तो यह बात साफ तौर पर दिखाई देती है कि इस चैनल की मालेग़ाव विस्फोट की जाँच में विशेष रूचि है। यह मामला अत्यंत संवेदनशील है कि यदि किसी चैनल के शीर्ष पद पर बैठा कोई व्यक्ति पत्रकारिता के सिद्धांतों के अतिरिक्त किसी अन्य भाव से प्रेरित है तो यह बात निश्चय ही चौंकाने वाली है।

स्टार न्यूज ने मकोका अदालत में मालेगाँव विस्फोट के 7 आरोपियों की पेशी पर जिस प्रकार स्वयं अदालत से पहले निर्णय सुना दिया और संवाददाता शीला रावल ने मकोका अदालत में साध्वी के आरोपों पर सुनवाई से पूर्व ही अपना निर्णय सुना दिया और कह दिया कि ये आरोप निराधार हैं और इन्हें सिद्ध करना साध्वी और अन्य आरोपियों के लिये आसान नहीं होगा। यह जल्दबाजी क्यों जबकि मकोका अदालत इन आरोपों पर सुनवाई मंगलवार को करेगी। सारे चैनल जब साध्वी के आरोपों पर एटीएस को घेर रहे थे उस समय स्टार न्यूज का एटीएस की पैरवी करना कुछ सन्देह पैदा करता है। आखिर स्टार न्यूज ने यही पुलिस प्रेम जामिया नगर एनकाउंटर में क्यों नहीं दिखाया था? यही नहीं यदि मीडिया का कार्य सूचनाओं को सामने लाना ही है तो एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के बारे में कुछ समाचार माध्यमों में सनसनीखेज तथ्य आने पर इस बारे में कोई खोज क्यों नहीं हुई कि जब वे रोजा इफ्तार में कांग्रेस की पार्टी में शामिल हुए। अपने पुत्र के सऊदी अरब के व्यवसाय में वे कांग्रेसी नेताओं के सम्पर्क का लाभ उठाते हैं और इससे भी बडी बात कि वे पहले रा ( रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) में थे और कन्धार विमान अपहरण में अपनी लापरवाही के चलते वहाँ से हटा दिये गये थे। बाद में काफी लाबिंग के बाद वे महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख बने। अब सारे न्यूज चैनल जो हिन्दू आतंकवाद से सम्बन्धित सारी खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं इस मामले में कोई खोज क्यों नहीं करते जबकि यह अत्यंत गम्भीर तथ्य हैं।

मालेगाँव विस्फोट की पूरी जाँच ने भारत में एक नये युग का पदार्पण किया है और इससे देश में राजनीतिक, बौद्धिक और मानवाधिकार के स्तर पर एक स्पष्ट ध्रवीकरण देखने को मिल रहा है। आज देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर राजनीति कर रहे दल, कुछ मीडिया संस्थान, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवी लोग पूरी तरह मुस्लिम परस्त और एकांगी हो गये हैं। इस जाँच ने एक बडा जटिल सवाल खडा किया है कि हिन्दू जिसका इस विश्व में केवल एक देश है और बहुसंख्यक होकर भी अपने देश में बेबस है तो वह क्या करे? आखिर बिडम्बना देखिये कि देश में जेहाद के नाम पर इस्लाम और अल्लाह के नाम पर इस्लामी आतंकवादी मन्दिरों, संसद और बाजारों में आक्रमण करते हैं और निर्दोष हिन्दुओं का खून बहाते हैं और फिर सरकार इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के स्थान पर हिन्दुओं को अपमानित, लाँक्षित और प्रताडित करती है। इस विषम स्थिति का क्या करें कि दोनों ओर से हिन्दुओं को ही मरना है आतंकवादी आक्रमण मुसलमान करें, जेहाद वे करें, चिल्ला चिल्ला कर कहें कि हम इस्लाम और अल्लाह के नाम पर हिन्दुओं को मार रहे हैं तो मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये और इस्लाम की छवि सुधारने के लिये हिन्दुओं को प्रताडित किया जाये। ऐसा न्याय और आतंकवाद के विरुद्ध ऐसी लडाई विश्व के किसी कोने में न तो लडी गयी और न भविष्य में लडी जायेगी। अमेरिका और यूरोप ने अपने देशों पर हुए आक्रमणों के बाद इस्लामी आतंकवाद का उत्तर ईसाई आतंकवाद की अवधारणा सृजित कर नहीं दिया और न ही इजरायल ने इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर यहूदी आतंकवाद को सृजित किया फिर भारत में ऐसा आत्मघाती कदम क्यों?

आज इस विषय पर बहस होनी चाहिये कि सेक्युलर दल और मीडिया ऐसा केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते कर रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। अभी एक दिन पूर्व कुछ समाचार पत्रों ने समाचार प्रकाशित किया कि खुफिया एजेंसियाँ उन संतों और संगठनों पर नजर रखे हुए हैं जिनमे इजरायल के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं क्योंकि उन्हें शक है कि कहीं एक लोग इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद से तो नहीं जुडे हैं। अर्थात भारत को एक सक्षम, सशक्त और सम्पन्न बनाने के गैर सरकारी प्रयासों के लिये समाज में शंका का भाव उत्पन्न किया जा रहा है।

जिस देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर कोयम्बटूर बम धमाकों के आरोपी को सरकार के आदेश पर जेल में पंच सितारा सुविधायें दी जाती हैं। जिस देश में फिलीस्तीनी नेता और सैकडों यहूदियों को इंतिफादा में मरवाने वाले यासिर अराफात के नाम पर केरल के विधानसभा चुनावों में वोट माँगे जाते हैं उसी देश में खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया जाता है कि इजरायल के साथ सम्बन्ध रखने वालों पर नजर रखी जाये।

मालेगाँव विस्फोट की जाँच को इसके व्यापक दायरे में समझने की आवश्यकता है यह विषय वोट बैंक की राजनीति से भी बडा है और ऐसा प्रतीत होता है कि शरियत के आधार पर विश्व पर शासन करने की आकाँक्षा से प्रेरित इस्लामवादी आन्दोलन ने भारत की व्यवस्था में अपनी जडें जमा ली हैं और व्यवस्था उनका सहयोग कर रही है और देश में हर उस प्रयास और संस्था को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है जो इस्लामवादी और जेहादी आन्दोलन को चुनौती दे सकता है।
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