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जीत भार्गव जी का जवाब - जब वंश ही लोकतंत्र का आधार होगा

कल मैने एक कविता अपने ब्लाग में डाला था उस के जवाब जीत भार्गव जी ने भी एक कविता में दिया है।

जब वंश ही लोकतंत्र का आधार होगा,
देश ऐसे ही लाचार होगा.
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जब ईमान पर भारी मजहब होगा,
नेतृत्व का ऐसा ही भ्रष्टाचार होगा.
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जब बिका हुआ मानवाधिकार होगा,
बेक़सूर ही गिरफ्तार होगा.
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जब मीडिया ही दरबान होगा,
जन हित का मुद्दा बेकार होगा.
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जब जनमानस अचेत हो तो,
देश में ऐसा ही अंधार होगा.
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सुशासन को कौन पूछेगा,
जब सेकुलर ही जीत का आधार होगा.
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मालेगाँव मामले में जाँच हो रही है या कुछ और?

29 सितम्बर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगाँव में हुए विस्फोट के पश्चात जिस प्रकार जाँच के बहाने हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा का सृजन करने का प्रयास हुआ है उसके अपने निहितार्थ हैं और अब तक यदि पूरे घटनाक्रम में बयानबाजी से लेकर मीडिया ट्रायल को ध्यान से देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह जाँच नहीं कुछ और है और यह कुछ और क्या है इसका निर्णय आप कुछ तथ्यों के आधार पर स्वयं करें।

29 सितम्बर को मालेगाँव विस्फोट में महाराष्ट्र एटीएस की ओर से जाँच की प्रक्रिया आरम्भ ही की गयी थी कि 5 अक्टूबर को एनसीपी के नेता शरद पवार ने घोषणा कर दी कि आतंकवादी मामलों में मुसलमानों को बदनाम किया जाता है लेकिन हिन्दू आतंकी गुटों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। इससे दो बातें स्पष्ट हैं कि एक तो शरद पवार ने जाँच से पूर्व ही घोषित कर दिया कि मालेगाँव विस्फोट हिन्दुओं ने किया है और वे आतंकवादी हैं। इसके बाद तो जाँच मात्र औपचारिकता ही रह गयी थी जिसकी दिशा स्पष्ट थी। शरद पवार के बयान के एक सप्ताह पश्चात मालेगाँव विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा को एटीएस ने पूछताछ के लिये सम्पर्क किया। इसी के साथ महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर.पाटिल भी समाचार माध्यमों से कहते रहे कि आरोपियों के विरुद्ध ठोस साक्ष्य हैं।

इसके बाद आरम्भ हुआ जाँच की प्रक्रिया के दौरान कुछ चुनी हुई खबरों को लीक करने का दौर। सबसे पहले एटीएस ने भारत के सबसे तेज हिन्दी न्यूज चैनल को कान में बताया कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित ने अपनी पूछताछ और नार्को टेस्ट में एक धर्मगुरु और हिन्दू संगठन के बडे नेता का नाम लिया है। इसके बाद मीडिया को इस बात का लाइसेंस मिल गया कि वह किसी भी धर्माचार्य को ललकारे और उसे कटघरे में खडा कर दे। इस पूरी कसरत में स्टार न्यूज और एनडीटीवी की भूमिका अग्रणी रही।

एटीएस द्वारा धर्माचार्य का नाम लेकर संशय की स्थिति निर्माण करने के पीछे प्रयोजन कुछ भी रहा हो परंतु इस बहाने देश के कुछ बडे संतों को पूरे मामले में घसीटने का प्रयास हुआ। इसी बीच एटीएस ने मीडिया को बताया कि इस विस्फोट के आरोपियों के उन विस्फोटों से सम्बन्ध होने की जाँच की जा रही है जिसमें मुसलमान ही मारे गये हैं और यह विस्फोट हैं समझौता ट्रेन विस्फोट, मक्का मस्जिद विस्फोट, अजमेर शरीफ विस्फोट। इस विषय को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि सन्देह के आधार पर सम्बन्धित एजेंसियों या राज्य सरकारों की पुलिस की जाँच को अंतिम निष्कर्ष मान कर प्रस्तुत किया और एनडीटीवी ने तो अपने कार्यक्रम हम लोग में तो बकायदा इन विस्फोटों को हिन्दू आतंकवादियों पर चस्पा करते हुए हिन्दू आतंकवाद पर बहस ही आरम्भ कर दी। अब प्रश्न यह है कि इन विस्फोटों की पूरी जाँच होने से पूर्व इसे कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा और दयानन्द पांडे के माथे मढने के पीछे मंतव्य क्या था? जब इन विस्फोटों की जाँच करने के लिये सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने कर्नल पुरोहित से सम्पर्क किया तो पता लगा कि इन विस्फोटों अर्थात समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद विस्फोट और अजमेर विस्फोट से इन आरोपियों का कोई सम्बन्ध नहीं है। इस पूरे मामले में जिस प्रकार एटीएस ने अति सक्रियता दिखाई और जाँच को मीडिया केन्द्रित रखा उससे स्पष्ट है कि एटीएस निष्पक्ष रूप से कार्य करने को स्वतंत्र नहीं है। इस बीच एटीएस का बयान देना फिर खण्डन करने का दौर भी चलता रहा। यहाँ तक कि समझौता एक्सप्रेस में आरडीएक्स से विस्फोट करने की कहानी आयी और फिर उसका खण्डन एटीएस ने किया।

इन बयानबाजियों के बाद पूरी कहानी में मोड आया जब मालेगाँव विस्फोट के दायरे को बढा कर कुछ वर्ष पूर्व हुए बम विस्फोटों की सीबीआई जाँच को भी इसके साथ जोड दिया गया। यह प्रयास भी यही सिद्ध करता है कि अब इतनी सक्रियता क्यों? आखिर इन मामलों की जाँच पहले क्यों नहीं की गयी और यदि की गयी तो क्या अब उस जाँच पर भरोसा नहीं रह गया।

वास्तव में एटीएस और उनके राजनीतिक आकाओं के सामने एक समस्या है कि इस पूरी जाँच को ये लोग दो स्तर पर प्रयोग करना चाहते थे। एक तो देश में हिन्दू आतंकवाद का एक सुव्यवस्थित नेटवर्क दिखाने का प्रयास ताकि न्यायालय में इसे साक्ष्य बनाया जा सके और सामान्य जनता को दिखाया जा सके कि देश में हिन्दू आतंकवाद है। वास्तव में आतंकवाद की परिभाषा है और इसके अनुसार आतंकवाद के लिये एक नेट्वर्क होना चाहिये, उसकी वित्तीय सहायता होनी चाहिये, आतंकवादियों के प्रशिक्षण के लिये लोग और हथियार होने चाहिये, आतंकवादियों को हथियार मिलने चाहिये और उसे उपलब्ध कराने वाले लोग चाहिये। यही कारण है कि एटीएस ने इन तथ्यों के लिये साक्ष्य प्राप्त करने में गोपनीयता बरतने के स्थान पर मीडिया को समय समय पर लीक किया और कुछ समाचार चैनलों और समाचार पत्रों को इस आधार पर कपोलकल्पित कहानियाँ बनाने का पूरा अवसर दिया।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है वह यह कि जिस प्रकार कुछ राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा सृजित करने में दिन रात लगे हुए हैं उसके अपने निहितार्थ हैं।

अब कुछ समाचार चैनलों की अति सक्रियता पर दृष्टि डालें। स्टार न्यूज, एनडीटीवी और न्यूज 24 ने इस विषय में अति सक्रियता दिखाई। इसमें न्यूज 24 और एनडीटीवी की बात तो समझ में आती है कि एक तो कांग्रेस के बडे नेता का चैनल है और दूसरे का सम्बन्ध कम्युनिस्ट पार्टी से है। परंतु स्टार न्यूज की सक्रियता इस लिये महत्वपूर्ण है कि यहाँ पूरा जिम्मा इस चैनल में सबसे बडे पद पर बैठे एक सदस्य ने उठा रखा है जो एक समुदाय विशेष से हैं। इन सज्जन के बारे में बताया जाता है कि जब दिल्ली में जामिया नगर में एनकाउंटर हुआ था तो इन्होंने सभी मीडिया के लोगों को एसएमएस कर आग्रह किया था कि इस पूरे मामले में संयम रखें और जामिया नगर का नाम न लें और न ही जामिया मिलिया विश्वविद्यालय का नाम लें क्योंकि इससे स्थान और संस्थान बदनाम होता है। इसके साथ ही उनका तर्क था कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन यही सिद्धांत तब गायब हो गया जब मालेग़ाँव में हिन्दू आरोपी बनाये गये। ये सज्जन पूरे मामले में व्यक्तिगत रूचि लेकर न्यूज फ्लैश चलाने से लेकर स्क्रिप्ट बनाने तक का पूरा विषय स्वयं देखते हैं और पूरे चैनल को इनका निर्देश है कि मालेगाँव मामले को विशेष कवरेज दिया जाये। इन सज्जन की व्यक्तिगत रूचि थी कि साध्वी की दीक्षा को इन्होंने आतंकवाद से जोड्ने का प्रयास किया। साध्वी प्रज्ञा के गुरु को ललकारा और कहा कि वे भाग खडे हुए हैं। जबकि बाद में इन्हीं संत ने अपनी प्रेस कांफ्रेस में बताया कि वे कथाओं में व्यस्त थे और उनकी कथाओं का सीधा प्रसारण कुछ टीवी चैनल पर भी हो रहा था। इसी प्रकार इन सज्जन ने श्री श्री रविशंकर को भी इस पूरे मामले में घसीटने का प्रयास किया।

आज यदि स्टार न्यूज को ध्यान से देखा जाये तो यह बात साफ तौर पर दिखाई देती है कि इस चैनल की मालेग़ाव विस्फोट की जाँच में विशेष रूचि है। यह मामला अत्यंत संवेदनशील है कि यदि किसी चैनल के शीर्ष पद पर बैठा कोई व्यक्ति पत्रकारिता के सिद्धांतों के अतिरिक्त किसी अन्य भाव से प्रेरित है तो यह बात निश्चय ही चौंकाने वाली है।

स्टार न्यूज ने मकोका अदालत में मालेगाँव विस्फोट के 7 आरोपियों की पेशी पर जिस प्रकार स्वयं अदालत से पहले निर्णय सुना दिया और संवाददाता शीला रावल ने मकोका अदालत में साध्वी के आरोपों पर सुनवाई से पूर्व ही अपना निर्णय सुना दिया और कह दिया कि ये आरोप निराधार हैं और इन्हें सिद्ध करना साध्वी और अन्य आरोपियों के लिये आसान नहीं होगा। यह जल्दबाजी क्यों जबकि मकोका अदालत इन आरोपों पर सुनवाई मंगलवार को करेगी। सारे चैनल जब साध्वी के आरोपों पर एटीएस को घेर रहे थे उस समय स्टार न्यूज का एटीएस की पैरवी करना कुछ सन्देह पैदा करता है। आखिर स्टार न्यूज ने यही पुलिस प्रेम जामिया नगर एनकाउंटर में क्यों नहीं दिखाया था? यही नहीं यदि मीडिया का कार्य सूचनाओं को सामने लाना ही है तो एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के बारे में कुछ समाचार माध्यमों में सनसनीखेज तथ्य आने पर इस बारे में कोई खोज क्यों नहीं हुई कि जब वे रोजा इफ्तार में कांग्रेस की पार्टी में शामिल हुए। अपने पुत्र के सऊदी अरब के व्यवसाय में वे कांग्रेसी नेताओं के सम्पर्क का लाभ उठाते हैं और इससे भी बडी बात कि वे पहले रा ( रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) में थे और कन्धार विमान अपहरण में अपनी लापरवाही के चलते वहाँ से हटा दिये गये थे। बाद में काफी लाबिंग के बाद वे महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख बने। अब सारे न्यूज चैनल जो हिन्दू आतंकवाद से सम्बन्धित सारी खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं इस मामले में कोई खोज क्यों नहीं करते जबकि यह अत्यंत गम्भीर तथ्य हैं।

मालेगाँव विस्फोट की पूरी जाँच ने भारत में एक नये युग का पदार्पण किया है और इससे देश में राजनीतिक, बौद्धिक और मानवाधिकार के स्तर पर एक स्पष्ट ध्रवीकरण देखने को मिल रहा है। आज देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर राजनीति कर रहे दल, कुछ मीडिया संस्थान, मानवाधिकार संगठन और बुद्धिजीवी लोग पूरी तरह मुस्लिम परस्त और एकांगी हो गये हैं। इस जाँच ने एक बडा जटिल सवाल खडा किया है कि हिन्दू जिसका इस विश्व में केवल एक देश है और बहुसंख्यक होकर भी अपने देश में बेबस है तो वह क्या करे? आखिर बिडम्बना देखिये कि देश में जेहाद के नाम पर इस्लाम और अल्लाह के नाम पर इस्लामी आतंकवादी मन्दिरों, संसद और बाजारों में आक्रमण करते हैं और निर्दोष हिन्दुओं का खून बहाते हैं और फिर सरकार इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के स्थान पर हिन्दुओं को अपमानित, लाँक्षित और प्रताडित करती है। इस विषम स्थिति का क्या करें कि दोनों ओर से हिन्दुओं को ही मरना है आतंकवादी आक्रमण मुसलमान करें, जेहाद वे करें, चिल्ला चिल्ला कर कहें कि हम इस्लाम और अल्लाह के नाम पर हिन्दुओं को मार रहे हैं तो मुस्लिम समाज को खुश करने के लिये और इस्लाम की छवि सुधारने के लिये हिन्दुओं को प्रताडित किया जाये। ऐसा न्याय और आतंकवाद के विरुद्ध ऐसी लडाई विश्व के किसी कोने में न तो लडी गयी और न भविष्य में लडी जायेगी। अमेरिका और यूरोप ने अपने देशों पर हुए आक्रमणों के बाद इस्लामी आतंकवाद का उत्तर ईसाई आतंकवाद की अवधारणा सृजित कर नहीं दिया और न ही इजरायल ने इस्लामी आतंकवाद के समानान्तर यहूदी आतंकवाद को सृजित किया फिर भारत में ऐसा आत्मघाती कदम क्यों?

आज इस विषय पर बहस होनी चाहिये कि सेक्युलर दल और मीडिया ऐसा केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते कर रहे हैं या फिर इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। अभी एक दिन पूर्व कुछ समाचार पत्रों ने समाचार प्रकाशित किया कि खुफिया एजेंसियाँ उन संतों और संगठनों पर नजर रखे हुए हैं जिनमे इजरायल के साथ अच्छे सम्बन्ध हैं क्योंकि उन्हें शक है कि कहीं एक लोग इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद से तो नहीं जुडे हैं। अर्थात भारत को एक सक्षम, सशक्त और सम्पन्न बनाने के गैर सरकारी प्रयासों के लिये समाज में शंका का भाव उत्पन्न किया जा रहा है।

जिस देश में सेक्युलरिज्म के नाम पर कोयम्बटूर बम धमाकों के आरोपी को सरकार के आदेश पर जेल में पंच सितारा सुविधायें दी जाती हैं। जिस देश में फिलीस्तीनी नेता और सैकडों यहूदियों को इंतिफादा में मरवाने वाले यासिर अराफात के नाम पर केरल के विधानसभा चुनावों में वोट माँगे जाते हैं उसी देश में खुफिया एजेंसियों को आदेश दिया जाता है कि इजरायल के साथ सम्बन्ध रखने वालों पर नजर रखी जाये।

मालेगाँव विस्फोट की जाँच को इसके व्यापक दायरे में समझने की आवश्यकता है यह विषय वोट बैंक की राजनीति से भी बडा है और ऐसा प्रतीत होता है कि शरियत के आधार पर विश्व पर शासन करने की आकाँक्षा से प्रेरित इस्लामवादी आन्दोलन ने भारत की व्यवस्था में अपनी जडें जमा ली हैं और व्यवस्था उनका सहयोग कर रही है और देश में हर उस प्रयास और संस्था को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है जो इस्लामवादी और जेहादी आन्दोलन को चुनौती दे सकता है।
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आरुषि के बहाने मीडिया का पलायनवाद

पिछले चार पाँच दिन से समाचार माध्यमों में नोएडा की रहने वाली आरुषि की रहस्यमय हत्या का मामला छाया है। मीडिया द्वारा इस विषय को महत्व देना कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है, इससे पूर्व भी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुई हत्याओं को काफी महत्व मिलता रहा है। परंतु इस घटना के समय को लेकर एक प्रश्न मन में अवश्य उठता है कि जब इसी समय अभी कोई दस दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हुआ है और उस सम्बन्ध में भी जाँच चल रही है तो हमारे समाचार माध्यमों का ध्यान उस ओर क्यों नहीं जा रहा है या फिर यूँ कहें कि उनका ध्यान उस ओर से पूरी तरह हट गया है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर गम्भीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है।

आरुषि हत्याकाण्ड में जिस प्रकार समाचार माध्यमों ने रुचि दिखाई और पुलिस प्रशासन को दबाव में लिया कि नोएडा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को बकायदा प्रेस कांफ्रेस करनी पडी और इस मामले में जाँच में हो रही प्रगति के सम्बन्ध में मीडिया को बताना पडा। यह मीडिया की शक्ति की ओर संकेत करता है पर वहीं एक प्रश्न यह भी उठता है कि आरुषि के मामले को इतना तूल देकर कहीं मीडिया ने जयपुर मामले में बहस से लोगों का ध्यान हटाने का शुभ कार्य तो नहीं किया है। निश्चय ही मीडिया के इस कार्य से सरकार काफी राहत मिली है और उसी राहत का अनुभव करते हुए भारत के गृहमंत्री ने बयान दे डाला कि मोहम्मद अफजल को फांसी की पैरवी नहीं करनी चाहिये।

आरुषि मामले को मीडिया द्वारा तूल देने के पीछे कोई षडयंत्रकारी पक्ष देखना तो उचित तो नहीं होगा पर इससे कुछ प्रश्न अवश्य उठते है। क्या मीडिया जयपुर जैसी घटनाओं को नजरअन्दाज करने की रणनीति अपना रहा है। इस बात के संकेत मिलते भी हैं। पिछले तीन वर्षों में यदि इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में मीडिया की रिपोर्टिंग पर नजर डाली जाये तो कुछ स्थिति स्पष्ट होती है। 11 जुलाई 2006 को देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में लोकल रेल व्यवस्था पर आक्रमण हुआ और उस समय की रिपोर्टिंग और अब जयपुर में हुए आक्रमण की प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया की रिपोर्टिंग में कुछ गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यह गुणात्मक परिवर्तन इस सन्दर्भ में है कि ऐसी घटनाओं की क्षति, लोगों पर इसके प्रभाव और इस आतंकवाद में लिप्त लोगों पर चर्चा को उतना ही रखा जाये जितना पत्रकारिता धर्म के विरुद्ध नहीं है। इस नजरिये से घटना की रिपोर्टिंग तो होती है परंतु घटना के बाद इस विषय से बचने का प्रयास किया जाता है। यह बात 2006 से आज तक हुए प्रत्येक आतंकवादी आक्रमण के सम्बन्ध में क्रमशः होती रही है। यदि जयपुर आक्रमण के बाद विभिन्न समाचार पत्रों में सम्पादकीय या उससे सम्बन्धित लेखों की संख्या देखी जाये तो ऐसा लगता है कि इस सम्बन्ध में खाना पूरी की जा रही है और जोर इस बात पर अधिक है कि यह घटना लोगों के स्मरण से कितनी जल्दी दूर हो जाये या इसे लोग भूल जायें।

मीडिया के इस व्यवहार की समीक्षा इस पृष्टभूमि में भी की जा सकती है कि कहीं आतंकवादी घटनाओं की अधिक रिपोर्टिंग और उस पर अधिक चर्चा नहीं करने को भी इस आतंकवाद से निपटने का एक तरीका माना जा रहा है जैसा कि प्रसिद्ध आतंकवाद प्रतिरोध विशेषज्ञ बी रमन ने हाल के अपने एक लेख में सुझाव दिया है। उनका मानना है कि आतंकवादी आक्रमणों के बाद ऐसा प्रदर्शन नहीं करना चाहिये कि हमारे जीवन पर इसका कोई प्रभाव हो रहा है क्योंकि इससे आतंकवादियों को लगता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बी रमन मानते हैं कि आतंकवादी न तो साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड पाये हैं और न ही पर्यटन स्थलों पर आक्रमण कर लोगों को ऐसे स्थलों पर जाने से रोक सके हैं।

इसी प्रकार का सुझाव जुलाई 2006 में मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के पश्चात संसद एनेक्सी में कुछ मुस्लिम संगठनों द्वारा बुलाए गये आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में प्रधानमंत्री और सूचना प्रसारण मंत्री की उपस्थिति में दिया गया था और मीडिया को अमेरिका और यहूदियों का एजेंट बताकर उनपर आरोप लगाया गया था कि वे आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे सुझाव अब असर करने लगे हैं और इस्लामी आतंकवाद को लेकर मीडिया ने अपने ऊपर एक सेंसरशिप थोप ली है और इस सम्बन्ध में क्षमाप्रार्थना का भाव व्याप्त कर लिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि इस रूख से किसे लाभ होने जा रहा है और क्या इस रूख से आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के इस युग में हम आतंकवाद पर विजय प्राप्त कर सकेंगे? निश्चित रूप से इससे आतंकवाद के युद्ध में आतंकवादियों को ही लाभ होने जा रहा है और उन राजनीतिक दलों को लाभ होने जा रहा जो इस्लामी आतंकवाद से मुस्लिम समुदाय के जुडाव के कारण इस विषय में न कोई चर्चा करना चाहते हैं और न ही कोई कार्रवाई।

जयपुर पर हुए आक्रमण के बाद जिस प्रकार आक्रमण में घायल हुए लोगों, जाँच की प्रगति और आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह असफल केन्द्र सरकार की कोई खबर मीडिया ने नहीं ली उससे एक बात स्पष्ट है कि आज लोकतंत्र के सभी स्तम्भ यहाँ तक कि पाँचवा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया भी शुतुरमुर्गी रवैया अपना रहा है और इन सबकी स्थिति उस कबूतर की भाँति है जो बिल्ली के सामने अपनी आंखें बन्द कर सोचता है कि बिल्ली भाग जायेगी। लोकतंत्र में मीडिया की अपनी भूमिका होती है लेकिन जिस प्रकार मीडिया बहस से भाग रहा है उससे इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वालों को यही सन्देश जा रहा है कि हमारे अन्दर इच्छाशक्ति नहीं है और मुकाबले के स्थान पर पलायन का रूख अपना रहे हैं।

आखिर यह अंतर क्यों आया है। जयपुर के सम्बन्ध में अंतर यह आया है कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में स्थानीय मुसलमानों का एक वर्ग इस्लाम के नाम पर पूरे विश्व में चल रहे जिहाद के साथ जुड चुका है और वह देश में आतंकवादियों के लिये हर प्रकार का वातावरण निर्माण कर रहा है। इसी कारण इस मामले से हर कोई बचना चाहता है।

इस प्रकार का रवैया अपना कर हम पहले दो बार जिहादवाद के विस्तार को रोकने का अवसर खो चुके हैं और तीसरी बार वही भूल करने जा रहे हैं। पहली बार जब 1989 में जम्मू कश्मीर में आतंकवाद ने प्रवेश किया तो हमारे नेताओं, पत्रकारो और बुद्धिजीवियों ने उसे कुछ गुमराह और बेरोजगार युवकों का काम बताया और बाद में इन्हीं गुमराह युवकों ने हिन्दुओं को घाटी से निकाल दिया और डंके की चोट पर घोषित किया कि यह जिहाद है। इसी प्रकार जब भारत में कश्मीर से बाहर पहली जिहादी घटना 1993 में मुम्बई में श्रृखलाबद्ध बम विस्फोटों के रूप में हुई तो भी इसे जिहाद के स्थान पर बाबरी ढाँचे के 1992 में ध्वस्त होने की प्रतिक्रिया माना गया। वह अवसर था जब जिहादवाद भारत में विस्तार कर रहा था पर उस ओर ध्यान नहीं दिया गया। आज हम तीसरा अवसर खो रहे हैं जब हमें पता चल चुका है कि भारत में मुस्लिम जनसंख्या का एक बडा वर्ग वैश्विक जिहाद के उद्देश्य से सहानुभूति रखता है तो उस वर्ग का विस्तार रोकने के लिये कठोर कानूनी और विचारधारागत कदम उठाने के स्थान पर हम इस पर बहस ही नहीं करने को इसका समाधान मानकर चल रहे हैं।

जयपुर में हुए आतंकवादी आक्रमण के बाद जिस प्रकार इस मामले को मीडिया ने ठण्डे बस्ते में डाला है वह सराहनीय नहीं है। इस सम्बन्ध में लोगों की सहनशीलता को असीमित मानकर चलने की यह भावना खतरनाक है। ऐसे आक्रमणों का सामना इनकी अवहेलना कर नहीं इस पर बहस कर किया जा सकता है। क्योंकि बहस न होने से यह पता लगा पाना कदापि सम्भव नहीं होगा इस विषय पर देश में क्या भाव है और लोग इसके मूलभूत कारणों के बारे में क्या सोचते हैं। कहीं ऐसा न हो कि इस विषय में संवादहीनता का परिणाम आगे चलकर भयावह हो जाये जैसा कि पहले कई अवसरों पर हम देख भी चुके हैं।
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