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हिन्दु आतंकवादी: कांग्रेस खुद फंसी अपने जाल में

साध्वि प्रज्ञा सिंह काग्रेस सरकार के गले कि फांस बन गई है अब काग्रेस इस मुद्दे को ना निगल पा रही है और ना उगलने में बन रहा है। हो भी क्यों ना बिना विचारे जो करे वो पिछे पश्चाताये कहावत चरिथार्थ हो रहा है। मुद्दाविहीन और संवेदहीन काग्रेस सरकार लालू यादव, राम विलास पासवान और अब अमर सिंह जैसे नेताओं के द्वारा लगभग पाँच साल तक खिंचा लेकिन इस देश को काग्रेस सरकार जिहादी विस्फोट के अलावा और कुछ दे नही पाया, जिसके नतीजतन काग्रेसी रणनीतिकार ने एक नया सगुफा छेड़ना पडा़ और हिन्दु आतंकवाद का नया राग छेड़ना सुरु किया लेकिन नया राग बेसुरा हो गया नतिजा काग्रेस रणनीतिकार को उसी तरह मुह कि खानी पडी जैसे कभी जवाहर लाल नेहरु द्वारा सरदार पटेल के हाथ से काश्मिर को अपने हाथ में लेकर नासुर बना कर किया, इन्दरा गांधि के द्वारा इमरजेन्सी लगा कर हिन्दुस्तानीयों को अपने घर में कैद कर दिया था , राजीव गांधी के द्वारा श्री लंका में अपने 3000 हजार सैनिकों को जान से हाथ धो कर करवाया था। लेकिन साध्वि प्रज्ञा सिह का मुद्धा कुछ ज्यादा तुल पकड लिया है सरकार के सामने अब समस्या है कि साध्वि प्रज्ञा सिंह को झूठे मुद्दे में पकड तो लिया गया है लेकिन झूठे सबूत कहा से पैदा करे। साध्वि प्रज्ञा सिंह का बार बार वैज्ञानिक विधी द्वारा टेस्ट करवाया गया लेकिन हमेशा ढाक के दो पात कुछ नही निकला, आज फिर से नार्को टेस्ट होने जा रहा है। इस मामले में कुछ नेताओं का समाजवादी कुरुप चेहरा भी देखने को मिला। जो एक ओर खुलेआम जिहादी आतंकियों का समर्थन करते नजर आते हैं और दुसरी ओर निर्दोश हिन्दु के बारे में कहा गया कि इन्हे बीच चौराहा में गोली मार देना चाहिये। सरकार एटीएस से झुठ पर झुठ बुलवाये जा रही है। किस तरह से झूठ का सहारा लेकर साध्वि को फँसाया जा रहा है एटीएस के बयान से समझ में आ जाता है।

एटीएस के अनुसार साध्वि प्रज्ञा सिंह का जन्म ग्वालियर में हुआ है लेकिन साध्वि प्रज्ञा सिंह का जन्म भिंड नामक शहर में हुआ थ। और पढा़ई के लिये ग्वालियर गई थी। साध्वि प्रज्ञा सिंह का हिन्दु सगठन से सबन्ध के बारे में भी एटीएस का बयान में सदेह नजर आ रहा है। सबसे पहले साध्वि प्रज्ञा सिंह का सबन्ध विश्व हिन्दु परिषद से बताया गया लेकिन विश्व हिन्दु परिषद में महिला को सदस्य नही बनाया जाता है । बाद में एटीएस और काग्रेस सरकार ने अपना सुर बदला और बजरंग दल और हिन्दु जागरण मंच का कार्यकर्ता बताया गया लेकिन इन दोनो सगठन में महिला को सदस्य नही बनाया जाता है। इस मामले में कांग्रेस एटीएस को जब हताशा हाथ लगा तो नित्य नये संगठन का नाम साध्वि प्रज्ञा सिंह के नाम के साथ जोड़ दिया गया। दुसरी ओर साध्वि प्रज्ञा सिंह का हिन्दु संगठन से वास्ता श्री राम आन्दोलन से हो गया था और वह बचपन से राम मंदिर का प्रचार करना सुरु कर दिया था। कुछ और भी बातें जो कि मिडीया द्वारा कुप्रचार किया जा रहा है उसके बारे में भी हमें जानना चाहिये। साध्वि प्रज्ञा सिंह का विश्वविद्यालय छात्र संघ का पदाधिकारी लेकिन साध्वि प्रज्ञा सिंह कभी भी आज तक चुनाव लडी़ नही हैं तो वे कैसे बन गई किसी छात्र संघ कि पदाधिकारी इस मामलें भी एटीएस और मिडीया का दुष्प्रचार नजर आ रहा है।

इस मामले मे अब साध्वि प्रज्ञा सिंह कटघरे में खरी नही दिख रही हैं कटघरे में कांग्रेस मिडीया और एटीएस है। कांग्रेस एटीएस को इस मामलें में इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस सीबीआई की स्पेशल टास्क फोर्स का अपने राजनितीक हित को साधने में इस्तेमाल कर रही है। जो कि देश और समाज के लिये खतरनाक है। एटीएस अभी तक झुठ का पुलिन्दा लिये खडा है। नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिग इत्यादी टेस्ट का नतिजा जब कुछ नही निकला तो साध्वि प्रज्ञा सिंह के साधना का हवाला दिया जाने लगा कि साधना के बल पर साध्वि अपने मन को अपने बस में कर लेती है लेकिन क्या एटीएस और कांग्रेस सरकार बतायेगा साध्वि के और जो भी साथी पकडा़ये हैं क्या उनके मन को भी साध्वि प्रज्ञा सिंह अपने साधना के द्वारा काबु में कर लेती है जिसके कारण नार्को टेस्ट का नतिजा शुन्य निकल कर आ रहा है। क्या जबाब है कांग्रेस के पास। कुछ अहम सवाल दिमाग में कौधता है जैसे साध्वि का टेस्ट मुंबई की ही फॉरेंसिक लेबोरेटरी में क्यों बार बार करवाया जा रहा है जबकि बैगलोर का फॉरेंसिक लेबोरेटरी को सबसे अच्छा लेबोरेटरी का दर्जा प्राप्त है। साध्वि प्रज्ञा सिंह को स्पेशल पुलिस सिर्फ इस लिये पकडा़ कि मालेगांव में विस्फोट बाले जगह पर एक मोटर बाईक मिला जो 4 साल पहले साध्वि का था जो किसी आदमी को बेच दिया गया क्या स्पेशल टास्क फोर्स मोटर बाइक के मालिक को खोजने का कोशीश किया।

पुरे मामले को देखे तो अब कांग्रेस खुद अपने बनाये जाल में फंस चुकी है साध्वि प्रज्ञा सिंह को बिना किसी सबूत के अपने राजनितीक फायदे के लिये गिरफ्तार कर तो लिया गया लेकिन सबुत के नाम पर हाथ में कुछ है नही और स्पेशल टास्क फोर्स के काम के उपर भी सवालिया निशान लगवा दिया है। विदेशी पैसा, राजनितीक पार्टीयों के द्वारा और चर्च के आदमीयों के द्वारा चलाया जा रहा कुछ मिडीया तो पहले से भडोसे लायक नही है|
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देश हित्त के लिय अब जग जाओ

आज सेकुलर नेता गला फाड़ कर चिल्लये जा रहें हैं बजरंग दल और विश्व हिन्दु परिषद पर पाबन्दी लगे। कारण सिर्फ और सिर्फ एक है मुस्लिम तुष्टीकरण और कोई कारण नही है। सिमी के उपर बैन लगा है। आतंकवादि संस्था इन्डियन मुजाहिदीन को बैन किया गया है। बस अब चुनाव आ गया है अब जयचन्दी नेता को अपने भाई बन्धु के सामने मुहँ दिखाना है बेचारे जयचन्दी नेता क्या मुहँ लेकर जामा मस्जिद से फतवा जारी करवायेगे, हिन्दुस्तान के मस्जिद आजादी के पहले से देशविरोधी गतिवीधी में लगा है और आज भी है। जामा मस्जिद के मैलाना समय समय पर यह ऎहसास दिलवा देता है यह कह कर हम आईएसआई के ऎजेन्ट है। किसी पकरे गये आतंकवादि के घर पर जाकर हिन्दुस्तान के पुलिस और आतंक के सर्मथन में भाषण देकर आता है। और उपर के कहता है किसी में हिम्मत है तो पकर के दिखाये। लेकिन जयचन्दी नेता को अगर चिन्ता है तो सिर्फ वोट का। देश जाये भाड़ में जयचन्दी नेता वोट लिये जितना निचे गिर सकते है गिर जायेगा अपना फेका थुक तक चाटने को तैयार रहता है।

84 साल के हिन्दु साधु लक्ष्मणा नन्द सरस्वति को बेरहमी से मार डाला गया इसमें कोई सक नही की इसमें चर्च का हाथ है। चर्च के पादरी इस बात को मानते है लेकिन जयचन्दी नेता इस बात को मानने को तैयार नही है कि लक्ष्मणा नन्द को पादरीयों ने मरवाया है। लेकिन किसी जयचन्दी नेता में इतना हिम्मत नही था कि खुल कर कह सके कि बुढे़ धर्म गुरु को मारना अपराध है।

लक्ष्मणा नन्द सरस्वति को मरने कि खुशी में चर्च ने विजय उत्सव मनाया जगह जगह हवा में गोली चला कर खुशी मनाया गया। मिशनरी के 2500 स्कूल इस खुशी में सामिल हो गये और 1 दिन के लिये स्कूल बन्द रखा। स्कूल में पढ़ने बाले लाखो हिन्दु छात्र को भी इस खुशी में सामिल किया गया। किसी हिन्दु के द्वारा इसका विरोध किया गया। जब सिर्फ कंधमाल के हिन्दु द्वारा स्वामी जी के हत्या का विरोध किया गया तो इटली, फ्रास, अमेरिका तक को फटने लगा हिन्दुस्तान में रह रहे अपने ऎजेन्टों के द्वारा चिल्लम पो मचाना सुरु किया लेकिन स्वामी लक्ष्मणा नन्द सरस्वति के हत्या के विरोध में कितना स्कूल बन्द किया गया। कितने ऎसे नेता हैं जो विरोध किये। आखिर कारण क्या है। हम संगठित नही है हम में एकता नही है जिसके कारण जाने अनजाने में जयचन्दीयों का हम मदद कर रहें है। देश हित्त के लिय अब जग जाओ
* जयचन्द - पृ्थ्विराज चैहान का भाई जिसके दगाबाजी कारण पृथ्विराज चैहान लडा़ई में हारा और कैद में रह कर अपना जान दिया
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कंधमाल की सच्चाई ईसाई मिशनरियों का आतंक

उडी़सा में जन्माष्टमी से ठीक पहले स्वामी श्री लक्ष्मणान्द सरस्वती को ईसाई मिशनरियों के सर्मथकों ने मौत के घाट दिया मसीही धर्मावलम्बी आजादी के पहले गरीब हिन्दुओं का धर्मान्तरण कर रही है। कुछ दिन पहले तक ईसाई मिशनरि का कहना था कि वो धर्मान्तरण नही करते हैं । लेकिन पर्दे के पिछे धर्मान्तरण का गंदा खेल चलता रहता था लेकिन अब हालात खुछ बदल गयें है देश के दलालों का साथ मिलने से अब ईसाई मिशनरियों अब खुल कर कहती है कि हिन्दु का धर्मान्तरण ईसाई मिशनरि करती है और तर्क के अनुसार इसे धर्मान्तरण नही हिन्दुओं का ह्रदय परिवर्तन कहती है। हृदय-परिवर्तन कर रहे हैं,उन्हें बेहतर इन्सान बना रहे हैं। लेकिन क्या ईसाई धर्म ग्रहण कर लेने के बाद क्या कोई आदमी इन्सान बन सकता है क्या बाइबिल में इन्सान बनाने बाले श्लोक हैं जो वेद में है|

बाइबिल यूहन्ना 6:53 में लिखा है

यीशू ने उनसे कहा:
मैं तुमसे सच सच कहता हूं जब तक तुम मनुष्य मे पुत्र का मांस न खाओ,
और उसका लहू न पीओ, तुममें जीवन ही नही है।

Then Jesus said unto them, Verily, verily, 
I say unto you, Except ye eat the flesh of 
the Son of man, and drink his blood, 
ye have no life in you.

इन्सान को मार कर उसको खाना लहू पीना ये ईसाई धर्म है|

यशायाह 13:15/16
जो यहोबा को न माने) वह तलवार से मार डाला जाएगा। 
उनके बाल बच्चे उनके सामने पटक दिये जाएंगे और
घर लूटे जाएंगे उनकी स्त्रियों से बलात्कार किया जाएगा।
किसी का घर लुटना स्त्रियों से बलात्कार करने को धर्म कहते हैं।

मत्ती 10 :34 से 38 तक में लिखा है।
 मैं धरती पर एक आग भड़काने आया हूँ। मेरी कितनी इच्छा है कि वह कदाचित् अभी तक भड़क उठती। मेरे पास एक बपतिस्मा है जो मुझे लेना है जब तक यह पूरा नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ।  तुम क्या सोचते हो मैं इस धरती पर शान्ति स्थापित करने के लिये आया हूँ? नहीं, मैं तुम्हें बताता हूँ, मैं तो विभाजन करने आया हूँ। 
क्योंकि अब से आगे एक घर के पाँच आदसी एक दूसरे के विरुद्ध बट जायेंगे। तीन दो के विरोध में और दो तीन के विरोध में हो जायेंगे। 53 पिता पुत्र के विरोध में, और पुत्र पिता के विरोध में, माँ बेटी के विरोध में, और बेटी माँ के विरोध में, सास, बहू के विरोध में और बहू सास के विरोध में हो जायेंगी।"

क्या ये धर्म है और इसे पालन कर क्या मनुष्य इंसान बन सकता है शायद कभी नही ठीक इसके विपरीत हिन्दु धर्म सर्वे भवन्तु सुखिन्: । वसु धैवकुटुम्बकम पराई स्त्री को माता, बहन, बेटी समझना। आज इन्सानियत कही बचा है तो सिर्फ हिन्दु धर्म में जो ना तो जिहाद का बात करता है और धर्मान्तरण का| आखिर कन्धमाल की वस्तुस्थिती के बारे में हमें जानना चाहिये। कंधमाल जिला में ज्यादा जनसंख्या कंध जनजाति और दलित जाति के लोग रहते हैं। ईसाई मिशनरियों का नजर इन पर 1827 में परा और ईसाई मिशनरियों सबसे पहले कंधमाल क घुमसर में डेरा डाला। धीरे - धीरे ईसाई मिशनरियों समाजिक सुधार कार्य के आड़ में दलित जाति के गरीबों का धर्मान्तरण किया। 2001 के जनगणना के अनुसार कंधमाल जिले के कुल आबादी 6,47,000 है जिसमें से 1,20,2000 से ज्यादा धर्मांतरित ईसाई हैं। 1894 में दिगी में सबसे पहला चर्च बना और आज 1014 से ज्यादा चर्च हैं जो धर्मांन्तरण के कार्य में लगे हैं।
                                                                              सरकार को चाहिये वोट नीति को छोड देश हित में ईसाई मिशनरियों के अनैतिक कार्य को जल्दी से जल्दी बन्द कराये। स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती के हत्यारों को सजा दिलवाये। और ईसाई मिशनरियों के अनैतिक गतीविधीयों पर लगाम लगा कर देशहित में कुछ काम करे।
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चर्च के फादरों के चरित्र

विश्व इतिहास देखें तो मुस्लमान के बाद सबसे ज्यादा धर्म के नाम पर अगर किसी ने खुन बहाया है तो ईसाइयत है इसमें कोई शक नही। ईसाइयत हिन्दुस्तान धर्मातरण के द्वारा राष्ट्रान्तरण करने के लिये सिद्धांत प्रेम, शांति तथा सत्य का छद्म का नकाब पहन रखा हैं किंतु संसार का इतिहास गवाह है ईसाइयत के नाम पर कितनी बार खुन की नदियां बहाई गई। धर्मयुद्ध के नाम पर, उसके पहले और उसके बाद शांति स्थापित करने के लिए ईसा के नाम पर कई घोर नृशंस कार्य किये गए।

हिन्दुस्तान में हिन्दु के मानस को पूरी तरह से बदलने के लिए विदेशी ताकतों से सीधा संरक्षण प्राप्त कर ईसाई मिशनरियां हिंदुओं के राष्ट्रातंरण का कार्य कर रही हैं जिससे भारत की भूमि पर हमेशा के लिए यूनियन जैक फहराया जा सके। मिशनरियों ने अनुभव किया कि हिंदुओं के लिए धर्म पर विश्वास से ज्यादा महत्वपूर्ण जीवित रहना है। उन्होंने हिन्दू समाज को दलित वर्ग और सवर्ण हिन्दू में बाँट कर तथा आर्य बाहर से आए हैं व द्रविड़ यहां के मूल निवासी हैं, ऐसा कह कर हिन्दू समाज को बाँटकर हिन्दुओं को ईसाइयत में राष्ट्रातंरण करने के अपने प्रयासों को जारी रखा। उन्होंने हिन्दुओं के बच्चों को मिथ्या इतिहास से परिचित कराने के उद्देश्य से स्कूलों की स्थापना की किंतु इस सबसे भी उन्हें सफलता नहीं मिली, तब उन्होंने बोर्डिंग स्कूल, अनाथालय स्थापित करने शुरू किये व तथाकथित दलित वर्ग एवं जनजातीय समुदायों के, जिन्हें वे यहां का मूल निवासी बतलाते थे, अनपढ़ व गरीब परिवारों से बच्चों को सीधे उन स्कूलों में भरना शुरू किया। इसके पश्चात् मिशनरी बोडिग स्कूलों में ऐसे ईसाई पादरी तैयार किये जो दलित व पिछड़े वगो के बीच धर्मांतरण का कार्य कर सकें। इन सभी प्रयास के तहत आज मिशनरी हिन्दुस्तान के लगभग सभी हिस्सों में राष्ट्रातंरण करवाने में जुटी हुई है। आज ये इतनें निरकुस हो गये हैं कि इनके रास्ते में आने बालों का हत्या तक करने से नही चुकते।
हिन्दुस्तान में पैसे के बल पर इन्सानीयत का पाठ पढा़ने बाले ईसाई चर्च के फादरों के चरित्र पर अगर ध्यान दें तो उजला कपडा़ के अन्दर का सच्च सामने आ जाता है। चर्च के फादरों के द्वारा नावालिक लड़कियों के यौन शोषण का मामला बार बार उठता रहा है इस मामलें में वेटिकन सिटी सिर्फ के पौप जाँन साल में आठ-दस बार माफी तो जरुर मांग लेता है। अभी कुछ दिन पहले अस्ट्रेलिया के दौरे पर गये पौप जॉंन का वहां के नागरिकों के द्वारा किया गया विरोध सिर्फ इस बात पर था कि चर्च धर्म का काम छोड़ कर हर एक अनैतिक कार्य में संलगन था चाहे वो नन का यौन शोषण हो या नाबालिक या बालिक लड़कियों को बहला फुसला कर किया गया यौन शोषण। इस मामलें में जाँन के द्वारा अस्ट्रेलिया में मांफी मांगने के बाद ही पौप जाँन को अस्ट्रेलिया में घुसने दिया गया। ईसाई मिशनरी को चाहिये कि इन्सानीयत का पाठ पढा़ने से पहले हिन्दुस्तानियों से आदमियता का पढ़ पढ ले नही तो बेचारे को पौप जाँन को गला में माफीनामा गला में लटका कर घुमना होगा।
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ईसाई मिशनरी का नंगा नाच का टिप्‍पणी

कल के लेख ईसाई मिशनरी का नंगा नाच का टिप्‍पणी पढे

अनुनाद सिंह जी के अनुसार
मै आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि इसाई मिशनरियाँ केवल प्रलोभन से ही धर्मान्तरण कराती हैं। इसके लिये वे - साम, दान, दण्ड, भेद - सब कुछ अपनाती हैं।

मेरे पड़ोस में एक गणित के प्रवक्ता रहते थे। उनकी पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं। यह बात हमारे अस्पताल के 'हेड नर्स' को पता थी। वह केरल की रहने वाली पेन्टाकोस्ट इसाई है। एक दिन वह उनके घर आयी और कमरे में इधर-उधर देखकर बोली - "तुमारे ये बगवान क्या कर रहे हैं? ये हनुमान और दुर्गा से कुछ नहीं होगा। हमारा जेसस तुमको बिल्कुल ठीक कर देगा। ये सब फोटो फ़ेक दो। हम तुमको बड़ौदा में भेज देगा; वहाँ का प्रिष्ट तुमको बिल्कुल ठीक कर देगा।...

आप सोच सकते हैं कि उस नर्स की 'ट्रेनिंग' कितनी अच्छी तरह से हुई होगी।
उसे लोगों को 'रीड' करना कितनी अच्छी तरह पता है? वह अच्छी तरह जानती है कि 'मरता क्या नहीं करता।' 'ट्रबुल्ड वाटर' में मछली पकड़ने में वह पारंगत है।

यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। हर धर्मान्तरित होने वाले के पीछे इसी तरह की कथा मिलेगी।

रंजना जी लिखती हैं
एकदम सही कहा आपने.इसाई देशों की यह दूरगामी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.उन्हें मालूम है कि किसी राष्ट्र को समाप्त करना हो तो सबसे पहला वार उस देश की धर्म और संस्कृति पर करना चाहिए.अकूत धन खर्च कर ये चर्च /मिशनरियां ख़ास मिसन के तहत चुपके से धीरे धीरे एक ऐसी कौम तैयार कर रही है जिसे वे समय आने पर धर्म के नाम पर ललकार कर अपने ही देश (हिन्दुस्तान)के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकें.

Umesh ji
माओवादी हो या नकसली, इन्हे चर्च प्रभावित राष्ट्रो से धनराशी मिल रही है। नेपाल मे माओवादीयो को धन और योजना उपल्ब्ध कराने वाला मुख्य संगठन रिम था, जिसका मुख्यालय अमरीका मे है। भारत मे भी वहीं नक्सली/माओवादी सक्रिय हैं जहां धर्मानंतरण हो रहा है।

संगीता पुरी जी
बहुत दुखद है। धर्म की आड़ में ऐसी गतिविधियां। वास्तव में लोग धर्म की परिभाषा भूल गए हैं।

Deepak Bhanre ji
ताली एक हाथ से नही बजती है . क्या करें यह देश का दुर्भाग्य है की वोट बैंक के खातिर हमेशा बहुसंख्यक को ही दोषी बताया जाता है . मीडिया भी इस पक्ष को अनदेखा करता है.
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ईसाई मिशनरी का नंगा नाच

एक स्वयंसेवी संगठन जस्टिस आन ट्रायल ने अपनी जांच के आधार पर आरोप लगाया है कि उड़ीसा के कंधमाल जिले में साम्प्रदायिक हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों की धर्मपरिवर्तन की गतिविधियां दोषी हैं। जस्टिस आन ट्रायल की जांच समिति के अध्यक्ष और राजस्थान के अतिरिक्त महाधिवक्ता सरदार जी एस गिल ने शुक्रवार को यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उड़ीसा में धर्मपरिवर्तन रोकने के लिए सन् १९६७ में बनाए गए सख्त कानून के बावजूद ईसाई मिशनरी संस्थाएं प्रलोभन से भोले-भाले आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन करा रही हैं जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है। उन्होंने कहा कि उड़ीसा के हिन्दू नेता स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती ने एक साक्षात्कार में स्वयं कहा था कि मिशनरी तत्व उन पर आठ बार हमला कर चुके हैं। नवें हमले में गत महीने उनकी मौत हो गई। जांच समिति ने हिन्दू नेता पर हुए हमले के लिए माओवादियों को जिम्मेदार ठहराए जाने के बारे में कहा कि ऐसा कोई ठोस कारण नहीं है कि माओवादी स्वामी जी की जान लें। जांच समिति ने कहा कि इस बात की छानबीन होनी चाहिए कि क्या हिन्दू विरोधी ताकतों ने माओवादियों के जरिये इस अपराध को अंजाम दिया। जांच समिति में पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी डोगरा, राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व सदस्य नफीसा हुसैन सामाजिक कार्यकर्ता कैप्टन एमके अंधारे और रामकिशोर पसारी शामिल थे।
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इस्लाम में बेचैनी ?

लोकमंच ने अपने पिछले कुछ लेखों में उल्लेख किया है कि किस प्रकार पश्चिम और इस्लाम आपस में टकराव की मुद्रा में आ गये हैं। इस्लामी और पश्चिम जगत में घट रही घटनायें इसी प्रवृत्ति की ओर बार बार संकेत कर रही हैं। पिछ्ले महीने दो विशेष घटनायें घटित हुईं जो इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्धों में और तनाव उत्पन्न कर सकती हैं और इनमें से एक घटना तो निश्चय ही ऐसी है जो दीर्घगामी स्तर पर प्रभाव डाल सकती है।

22 मार्च को ईसाइयों के मह्त्वपूर्ण पर्व ईस्टर के दिन वेटिकन में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट ने मिस्र मूल के मुसलमान और पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे मगदी आलम को पूरे विधिविधान से ईसाइत में दीक्षित कर लिया। मगदी आलम पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे थे और इस विषय पर भी मतभेद था कि मगदी आलम क्या आस्थावान मुसलमान थे या नहीं। यह विषय सर्वप्रथम 2007 में चर्चा में आया था जब लन्दन के मेयर द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में मध्य पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और इस्लामी विषयों के जानकार डा. डैनियल पाइप्स ने इस्लामवाद से लडाई के लिये सभ्यतागत लोगों के मध्य सहयोग की आवश्यकता जताते हुए उन्होंने मगदी आलम को एक इस्लाम धर्मानुयायी बताया जो नरमपंथी हैं और उनका सहयोग लेने की बात कही। इस बात पर एक और इस्लामी विद्वान तारिक रमादान ने आपत्ति जताते हुए डा. डैनियल पाइप्स पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि मगदी आलम एक ईसाई हैं। डा. डैनियल पाइप्स ने इसका खण्डन किया और प्रमाणित किया कि मगदी आलम एक मुसलमान हैं। यह सन्दर्भ यहाँ इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस्लामी विषयों पर नजर रखने वाले लोगों के मध्य यह खासी चर्चा का विषय बना था। यह भ्रम इसलिये भी बना क्योंकि मगदी आलम का मध्य का नाम क्रिस्टोफर है। परंतु जब 22 मार्च को पोप ने विधिवत ढंग से मगदी आलम का धर्मांतरण कराया तो इस विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया कि मगदी आलम एक मुसलमान थे।

यह विषय अत्यंत मह्त्व का इसलिये है कि इतने बडे पैमाने पर एक वैश्विक मह्त्व वाले दिन एक महत्वपूर्ण मुसलमान का धर्मांतरण करा कर कैथोलिक चर्च ने क्या सन्देश देने का प्रयास किया है। विशेषकर इन समाचारों के मध्य कि विश्व में कैथोलिक जनसंख्या अब मुसलमानों के बाद दूसरे स्थान पर आ गयी है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कुल ईसाई अब भी मुसलमानों से अधिक हैं केवल कैथोलिक सम्प्रदाय दूसरे स्थान पर आ गया है।

मगदी आलम ने धर्मांतरण के उपरांत तत्काल एक बयान दिया और अपने पुराने धर्म पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समस्त विश्व में जो कुछ भी आतंकवाद इस्लाम के नाम पर चल रहा है उसके लिये इस्लाम धर्म भी उत्तरदायी है। इस घटना के अपने निहितार्थ हैं। अर्थात कैथोलिक सम्प्रदाय अपनी संख्या की पूर्ति के लिये उन मुसलमानों को अपने शिविर में लाने से परहेज नहीं करेगा जो इस्लाम धर्म बदलना चाहेंगे। इससे इस्लाम और कैथोलिक चर्च में टकराव सुनिश्चित है। क्योंकि अभी तक चर्च खुलेआम मुसलमानों का धर्मांतरण करने से परहेज करता था और अंतर्धार्मिक बह्स के लिये इस्लाम से बातचीत के लिये अधिक उत्सुक दिख रहा था। परंतु अब इस नये घटनाक्रम से स्पष्ट है कि चर्च इस्लाम के विषय पर अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने की फिराक में है जिसमें धर्मांतरण का जवाब धर्मांतरण से देने की नीति अपनाई गयी है।

इस्लामी विश्व में किसी मुसलमान को अपना धर्म छोडने की आज्ञा नहीं है और ऐसा करने पर उसके लिये मृत्युदण्ड का विधान है। मगदी आलम के धर्मांतरण से भी ऐसे ही प्रश्न उठने वाले हैं क्योंकि मगदी आलम एक इस्लामी राज्य का मूलनिवासी है। तो क्या यह माना जाये कि यह धर्मांतरण एक विशेष राजनीतिक सन्देश है जो इस्लाम धर्म के उन तमाम अनुयायियों को एक सन्देश है जो इस्लाम में बेचैनी अनुभव कर रहे हैं परंतु धर्मांतरण के कडे नियमों के चलते धर्म बदलने के बारे में नहीं सोच पाते। यह इस्लाम की दृष्टि से एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि इससे पूर्व जितने भी मुसलमानों ने इस्लाम की आलोचना की थी उन्होंने धर्म परिवर्तन के विकल्प पर विचार नहीं किया था चाहे वह सलमान रश्दी हों, तस्लीमा नसरीन हों या फिर सोमालिया मूल की अयान हिरसी अली हों। इन लोगों ने यूरोप के देशों में या अन्य देशों में शरण तो ले ली परंतु धर्म नहीं छोडा।

इसके पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख कारण थे एक तो ये लोग इस्लाम धर्म छोडने को लेकर इस्लाम में मृत्युदण्ड की व्यवस्था से चिंतित थे और अपने जीवन पर और अधिक संकट नहीं लाना चाह्ते थे और दूसरा कारण यह कि सामान्य रूप से पश्चिम और विशेष रूप से कैथोलिक चर्च इस्लाम के साथ प्रत्यक्ष रूप से टकराव मोल नहीं लेना चाह्ता था। तो प्रश्न यह उठता है कि अब परिस्थितियों में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है कि चर्च इस्लाम के मह्त्वपूर्ण व्यक्ति का धर्मांतरण करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा है जबकि कैथोलिक चर्च के साथ इस्लाम की ओर से अंतर्धार्मिक बातचीत में लगे प्रतिनिधि भी मानते हैं कि मगदी आलम के ईसाई बनने से से दोनों के मध्य सद्भाव के प्रयास को झटका लगेगा और दोनों पक्षों के सम्बन्धों में तनाव आ सकता है।

कैथोलिक चर्च के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। कैथोलिक चर्च पिछ्ले कुछ वर्षों से इस्लामी जगत के मध्य यह विषय उठाता रहा है कि यदि ईसाई बहुल देशों में इस्लाम धर्म के अनुयायियों को हर प्रकार की धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है और उन्हें प्रार्थना करने या मस्जिद बनाने की स्वतंत्रता है तो फिर मुस्लिम बहुल देशों में भी ईसाई धर्म के अनुयायियों को यही स्वतंत्रता मिलनी चाहिये और समानता के इस सिद्धांत पर जोर पोप जान पाल के समय से ही देना आरम्भ कर दिया गया था जब वैटिकन के विदेश मंत्री स्तर के जीन लुइस तौरोन ने पहली बार 2003 में स्पष्ट रूप से कहा था कि मुस्लिम बहुल देशों में ईसाइयों के साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा व्यवहार हो रहा है। पोप बेनेडिक्ट के समय में इस सिद्धांत पर अधिक आग्रह किया जाने लगा। इसी का परिणाम था कि अनेक अरब देशों में चर्च बनाने के प्रस्तावों पर चर्चा होने लगी यह बात और है कि इसका स्थानीय कट्टरपंथी मौलवियों ने कडा विरोध किया और ऐसे प्रस्तावों का प्रतिफल अभी तक सामने नहीं आया है परंतु ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा कैथोलिक चर्च के कठोर रूख की ओर संकेत अवश्य देता है तो क्या माना जाये कि चर्च अब अधिक मुखर होकर इस्लाम और ईसाइत के मध्य समानता के सिद्धांत को अपनाना चाह्ता है।

इसके अतिरिक एक और घटनाक्रम है जो पश्चिम के कठोर रूख की ओर संकेत करता है वह है हालैण्ड के सांसद और नेशनल फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स द्वारा कुरान पर एक फिल्म का निर्माण और उसका प्रदर्शन। इस फिल्म के सम्बन्ध में पिछ्ले अनेक महीनों से चर्चा थी और इसके निर्माण से पूर्व ही इस पर काफी विवाद हो रहा था। हालाँकि इस फिल्म में सनसनीखेज या विवादित कुछ भी नहीं है फिर भी तमाम विवादों के बीच इस कानून निर्माता ने जिस प्रकार फिल्म के निर्माण फिर इसके प्रसारण में अपनी सक्रियता दिखाई है वह यूरोप की इस्लाम के प्रति बदलती मानसिकता का परिचय देता है।

मगदी आलम के धर्मांतरण और वाइल्डर्स की फिल्म के निर्माण और प्रसारण में जो अत्यंत उल्लेखनीय बात रही वह यह कि दोनों ही घटनाओं पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई जिसकी आशंका जतायी जा रही थी। प्रतिक्रिया नहीं होने से ऐसी घटनाओं को करने या अपने धर्म और मूल्यों के प्रति अधिक आग्रह की प्रवृत्ति पश्चिम में और बढेगी और इससे इस्लाम में बेचैनी और अधिक बढेगी।
इस्लाम में बेचैनी की कुछ मह्त्वपूर्ण घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जिस पर विश्व की मीडिया का ध्यान बिल्कुल नहीं गया। इसी वर्ष यूरोप के कुछ समाचार पत्रों में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून पुनः प्रकाशित होने पर इस्लामी विश्व में एक दूसरे प्रकार का चिंतन आरम्भ हुआ। फरवरी के अंत में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए यमन के प्रधानमंत्री अली मोहम्मद मुजावर ने प्रस्ताव किया कि विश्व स्तर पर ऐसे कानून का निर्माण होना चाहिये जो किसी भी धर्म के अपमान को आपराधिक कृत्य घोषित करे और धर्मों के समान सम्मान की भावना पर जोर दे। उन्होंने पश्चिम से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की भावनाओं का सम्मान करें अन्यथा अस्थिरता ही बढेगी।

इसी प्रकार का प्रस्ताव सऊदी अरब सलाहकार समिति ने सऊदी सरकार को दिया तथा विदेश मंत्रालय से आग्रह किया कि वह अन्य अरब देशों, मुस्लिम देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर ऐसे प्रस्ताव पर विचार करें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सन्धि की जाये कि प्रत्येक धर्म के प्रतीकों, पैगम्बरों का सम्मान करते हुए सभी धर्मों के सम्मान को बल प्रदान किया जाये। सऊदी अरब सलाहकार समिति या मजलिसे अश शुरा की ओर से यह प्रस्ताव मोहम्मद अल कुवाहेश ने यूरोप और अमेरिका में पैगम्बर के कार्टूनों के प्रकाशन की प्रतिक्रिया में रखे थे। परंतु यह प्रस्ताव समिति ने 77 के मुकाबले 33 मतों से निरस्त कर दिया। इस प्रस्ताव को निरस्त करने के पीछे प्रमुख कारण यह बताया गया कि सभी धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करने की अंतरराष्ट्रीय सन्धि का अर्थ होगा शेष धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करना जो कि मुसलमानों के लिये सम्भव नहीं है। दूसरा कारण यह बताया गया कि इससे इस्लामी देशों में गैर मुसलमानों को अपने उपासना केन्द्र स्थापित करने की अनुमति मिल जायेगी।

इस घटनाक्रम के अपने निहितार्थ हैं। एक तो यह घटनाक्रम बताता है कि चतुर्दिक इस्लाम पर हो रहे हमलों से इस्लामी धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक नेतृत्व बेचैन है और इसके लिये रास्ता निकालने का प्रयास कर रहा है और वहीं दूसरी ओर समस्त विश्व में इस्लाम की अनेक प्रवृत्तियों को लेकर मंथन आरम्भ हो गया है और इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद या फिर शरियत लागू करने की इस्लामी मतानुयायियों की इच्छा के आगे विश्व झुकने के स्थान पर अधिक आग्रह पूर्वक इसका प्रतिरोध करने की तैयारी कर रहा है। इस सम्बन्ध में यूरोप ने पहल की है और इस्लाम को कठोरतापूर्वक सन्देश देने का प्रयास किया है कि वह अपने इस्लामीकरण के लिये तैयार नहीं है इसके स्थान पर वह अपनी संस्कृति और मूल्यों के प्रति अधिक सजग हो रहा है।


जहाँ यूरोप और चर्च ने अपना आग्रह दिखाकर राजनीतिक और सांस्कृतिक सन्देश दिया है वहीं इस्लाम मतावलम्बी बेचैनी अनुभव कर रहे हैं और अनेक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं कि इस्लाम की छवि को सुधारा जा सके। इस क्रम में भारत में बडे बडे मुस्लिम सम्मेलन आयोजित कर आतंकवाद की निन्दा की जा रही है परंतु ये प्रयास छवि सुधारने की कवायदें मात्र हैं क्योंकि आज तक इस्लामी धर्मगुरुओं ने उन मुद्दों को स्पर्श करने का प्रयास कभी नहीं किया जो वास्तव में समस्त विश्व के गैर मुसलमानों के लिये आशंका और चिंता के कारण हैं।

आज समस्त विश्व में जो वातावरण बन रहा है वह कतई उत्साहजनक नहीं है और संकेत यही मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में टकराव का यह वातावरण और भी तनावपूर्ण ही होने वाला है। विशेषकर कैथोलिक चर्च और यूरोप की भावभंगिमा से तो यही संकेत मिलता है कि इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं और विश्व की शेष सभ्यतायें भी शीघ्र ही इसका अनुसरण करने लगें और इस्लाम के प्रति सशंकित हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
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