Showing posts with label जिहादी. Show all posts
Showing posts with label जिहादी. Show all posts

माँ का दुध पीने से अगर ताकत नही मिलता है तो बाप का छाती चाटने से कुछ नही होता है

ज्यादा नही सिर्फ एक महीना पहले रुस में हमारे प्रधानमंत्री शेर के तरह चिंघार कर आये थे यैसा लग रहा था कि मुम्बई पर पाकिस्तानी के आक्रमण के बाद हिन्दुस्ताने पाकिस्तान को कच्चा खा जायेंगे यैसा लग रहा था कि इस बार तो पाकिस्तान गया काम से मेरे एक मित्र ने कहा पाकिस्तान को इसकी सजा मिलनी चाहिये इस बार हमारी सरकार पाकिस्तान को नही छोडे़गा हो सकता है शायद हिन्दुस्तान इस बार पाकिस्तान पर आक्रमण कर दे और पाकिस्तान का नामोनिशान इस मिटा देगा। मैं मुस्कुराया और कहा "माँ का दुध पीने से अगर ताकत नही मिलता है तो बाप का छाती चाटने से कुछ नही होता है"। और अब मेरा बात सच्च हो गया हम हिन्दुस्तानी को अपने अन्दर तो मर्दानगी नही है किसी और किसी और विधी से अपने नंपूसकता को छिपाते फिरते हैं।

वैसे इसमें हमारे प्रधानमंत्री का कोई कसूर नही है उन्हों ने वही किया जो 62 साल से कांग्रेस सरकार करते आ रहा है हिन्दुस्तान के मुस्लमानों को तुष्ट करने के लिये पाकिस्तान पर किसी भी तरह के कार्यवाही करने से बच रहा है इसके चलते हम हिन्दुस्तानी का कफी नुक्सान कर रहें हैं। मिश्र में प्रधानमंत्री के द्वारा दिये गरे संयुक्त घोषणा पत्र से यह सिद्धा हो गया है कि हमारे देश के नेताओं के पास अपने देश के रक्षा करने का कोई ठोस नीति नही है हिन्दुस्तान का रक्षानीति अमेरिका तैयार करता है और अमेरिका जो कहेगा हमारे देश के शासक वर्ग वही करेंगे।

आखिर 26/11 को हिन्दुस्तान पर पाकिस्तानी हमले में पाकिस्तान के क्या कार्यवाही कि कुछ भी तो नही और पाकिस्तान अपने नागरिकों या सेनानायक के उपर किसी भी तरह का कोई कार्यवाही क्यों करेगा? जब उसका सारा आपरेश्न पाकिस्तान हूक्मराने के कहने पर ही चल रहा था पाकिस्तान आर्मी के आफिसर अभी आतंकवादियों को अपने संरक्षण में ट्रेनिग दे रहा था और पाकिस्तान सरकार इस पुरे आपरेश्न को पैसा मुहय्या करवा रहा था तो आखिर हम इस इन्तजार में क्यों हैं कि पाकिस्तान अपने नागरिकों और आर्मी आफिसर को सजा देगा उलटे पाकिस्तान तो उन सभी को ईनाम देने के फिराक में होगा।

लेकिन हमारे देश के भाग्यविधाता को इस बात का समझ कब आयेगा कि पाकिस्तान हमारा दोस्त कभी नही हो सकता जिसने कसम खा रखा हो हिन्दुस्तान के तबाह और बर्वाद करने का और जिसके सहयोगी हिन्दुस्तान के हर शहर में बैठे हो उस स्थिती में पाकिस्तान के बन्दरघुरकि से हम कैसे डरा कर अपना दोस्त बना सकते हैं। इस बार हमारे देश के सैनिकों तो जीत गये लेकिन मेज पर हम फिर हार गयें और बलुचिस्तान का कंलक अलग से।
read more...

आतंकवाद और इच्छाशक्ति

आज हिन्दुस्तान में आतंकवादियों की स्थीति काफी मजबूत हो गई है। कट्टरपंथी तबके का यहां बोलबाला हो गया है। यहां सिमी, लश्कर, हिजबुल मुजाहिदीन व हरकत उल जेहादी इस्लामी से जुड़े कई स्थानीय सेल्स हैं जिनका मकसद हर हाल में दहशत फैलाना है। विस्फोटकों और नकली नोटों की बरामदगी से भी साफ है कि आतंकवादी यहां अफरातफरी फैलाना चाहते हैंअब सवाल यह है कि इन्हें चोट पहुंचाने के लिए किया क्या जाए? जाहिर है जिस एक उपाय पर आज लोग सबसे कम ध्यान दे रहे हैं वह है पोटा या टाडा जैसे कानून की जरूरत। ऐसा कानून जो पकड़े गए आतंकवादियों को फांसी या सख्त सजा सुनाए।
लेकिन हकीकत क्या है आतंक का सामना करने की बात जब आती है
तो भारत की तस्वीर एक नपुंसक राष्ट्र के रूप में उभरती है। पुलिस और नेता पुराना राग अलापते हैं लेकिन वास्तव में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं होता। कब कहाँ सीरियल बम ब्लास्ट हो जाये किसी को पता नही हम घर से निकलते है घर लैटे या नाही पता नही। आतंकवादी बार-बार मानवाता का चीर-हरण करते रहे हैं। आतंकवादियों के हौसले बुलंद हैं और एक एक करके नए शहर उनके निशाने पर चढ़ते जा रहे हैं और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। स्थितियां भयावह हैं। चिंताजनक बात यह है कि हमारा राजनेता आतंकवादी हमलों को रोकने में तो नाकाम है आतंकवादियों को पकर कर सजा दिलाने में भी उनका आज तक कुछ खास नही कर पायें हैं। 1993 के मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में अभियुक्तों को अंजाम तक पहुंचाने में 14 साल लग गए, संसद भवन के हमलावर अभी तक सरकारी मेहमान बने हैं और सरकार आतकवादियों को बचाने के लिय टालमटोल कर रही है । हमारे तंत्र में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति की कमी सदैव खलती है। और इससे भी खतरनाक है ऐसे तत्वों के बारे में राजनीतिक प्रटेक्शन की मुहैया करतें हैं।
9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई की चौतरफा निंदा भले ही हो रही हो लेकिन दुनिया के सामने आज यह एक सच्चाई है कि 2001 के बाद से अमेरिका की ओर आतंकवादियों ने आंख उठाकर भी नहीं देखा है। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि आतंकवाद के प्रति अमेरिका के अप्रोच का हम समर्थन कर रहे हैं। लेकिन कब तक हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे और निर्दोष लोगों को आतंकवादियों के हाथों मरते देखते रहेंगे ? अबतो वक्त आ ही गया है कि हम आतंकवाद पर जवाबी हमला बोलें।
read more...

यह लडा़ई नही देशभक्ती है।

अखनूर सेक्टर के जोरियान में पुलिस फायरिंग में कम से कम १० लोग घायल हो गये जिनमें एक की हालत गंभीर है। अभी कुछ दिन पहले 35 वर्षीय कुलदीप कुमार डोगरा नामक एक युवक ने देश के लिय जान दिया। जम्मू में अब हालात विस्फोटक हो चुके है। प्रदर्शनकारी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि लौटाने की मांग कर रहे हैं। कल जिले में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में दो युवकों की मौत हो गयी थी। यह आंदोलन आम आदमियों के नेतृत्व में केन्द्र की संप्रग सरकार और राज्य सरकार द्वारा किये गये कायरतापूर्ण और औचित्यहीन समर्पण के विरूद्ध चलाया जा रहा एक राष्ट्रीय आंदोलन है। यह आंदोलन पूरी तरह अलगाववादी शक्तियों द्वारा उठायी गयी दासतापरक मांगों के विरूद्ध है और उन अलगाववादियों के विरूद्ध है जिन्होंने सदैव ही जम्मु-कश्मीर के भारत का अभिन्न अंग होने पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं।

यह लडाई सिर्फ श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जुडे़ हुये भूमी का नही है इसके पीछे अलगावदियों की मनसा कश्मीर से हिंदुओं को मार भगाना चाहते हैं कश्मीरी पंडीत कश्मीर को पहले ही निकाल बाहर किया गया है अब बचे हैं जम्मु के हिन्दु उन्हें भी किसी तरह मार भगाया जाय। लेकिन बार बार धोखा खाकर भी हिंदू वर्ग कुछ नहीं समझता। हिन्दुस्तान का हिंदू कश्मीरी मुसलमानों से यह पूछने की ताब नहीं रखता कि जब देश भर में मुस्लिमों के लिए बड़े-बड़े और पक्के हज हाउस बनते रहे है, यहां तक कि हवाई अड्डों पर हज यात्रियों की सुविधा के लिए ‘हज टर्मिनल’ बन रहे है और सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये की हज सब्सिडी दी जा रही है तब अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले हिंदुओं के लिए अपने ही देश में अस्थाई विश्राम-स्थल भी न बनने देना क्या इस्लामी अहंकार, जबर्दस्ती और अलगाववाद का प्रमाण नहीं है?

चूंकि कांग्रेस और बुद्धिजीवी वर्ग के हिंदू यह प्रश्न नहीं पूछते इसलिए कश्मीरी मुसलमान शेष भारत पर धौंस जमाना अपना अधिकार मानते है। वस्तुत: इसमें इस्लामी अहंकारियों से अधिक घातक भूमिका सेकुलर-वामपंथी हिंदुओं की है। कई समाचार चैनलों ने अमरनाथ यात्रियों के विरुद्ध कश्मीरी मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा पर सहानुभूतिपूर्वक दिखाया कि ‘कश्मीर जल रहा है’। मानों मुसलमानों का रोष स्वाभाविक है, जबकि यात्री पड़ाव के लिए दी गई भूमि वापस ले लेने के बाद जम्मू में हुए आंदोलन पर एक चैनल ने कहा कि यह बीजेपी की गुंडागर्दी है। भारत के ऐसे पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नेताओं ने ही अलगावपरस्त और विशेषाधिकार की चाह रखने वाले मुस्लिम नेताओं की भूख बढ़ाई है। इसीलिए कश्मीरी मुसलमानों ने भारत के ऊपर धीरे-धीरे एक औपनिवेशिक धौंस कायम कर ली है। वे उदार हिंदू समाज का शुक्रगुजार होने के बजाय उसी पर अहसान जताने की भंगिमा दिखाते है। पीडीपी ने कांग्रेस के प्रति ठीक यही किया है। इस अहंकारी भंगिमा और विशेषाधिकारी मानसिकता को समझना चाहिए। यही कश्मीरी मुसलमानों की ‘कश्मीरियत’ है। यह मानसिकता शेष भारत अर्थात हिंदुओं का मनमाना शोषण करते हुए भी उल्टे सदैव शिकायती अंदाज रखती है।

सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते चुप्पी साधे हुये है और आम जनता का खून रहा है। लेकिन ध्यान देने वाली बात तो कुछ और ही है जम्मू का इलाका हिन्दु बहुल है और ये बात कश्मीरी मुसलमानों और अलगाववादी को आख की कीड़कीडी बना हुआ है जम्मु में रह रहे हिन्दु की अवाज को उनके हित को मुस्लिम तुष्टिकरण बाले तथाकथीत धर्मनिरपेक्ष दल कब से जम्मु में रह रहे हिन्दुओं की भावना को दबायें रखा है। जम्मु क्षेत्र कश्मीर से ज्यादा बडा़ होने के वाबजुद सिर्फ दो लोकसभा की और विधानसभा की 36 सीटे मिली हैं जबकी कश्मीर को 3 लोकसभा की और 46 विधानसभा की क्षेत्र है। अब समय आ गया है हिन्दुस्तान के हिन्दु या राष्ट्रभक्त धारा 370 हटाने की मांग करना चाहिये।
read more...

कोई इन्हें बचाओ

हिन्दुस्तान में मुस्लमानों को हर तरह कि सुख सुविधा सरकार के द्वारा दिया जा रहा है यहा तक कि मुस्लिम आतकवादियों भी सरकार फाँसी पर लटकाने से गुरेज कर रही है। आतंकवाद कि पाढ़शाला मदरसा को दिल खोल कर सरकारी सुविधा मील रहा है जिसका नतीजा है कि हिन्दुस्तान में आये दिन कही न कही बम विस्फोट या फिर दंगा फसाद होते रहता है लेकिन इसके ठीक उलट पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की हालत चिंता का विषय है और सरकार इस ओर से आँख बन्द कर रखा है।

पाकिस्तान के हिंदुऒं ने अपने समुदाय के खिलाफ जानमाल को लक्ष्य बनाकर हो रही घटनाऒं के प्रति चिंता जताई है। गौरतलब है कि देश में हिंदुऒं के धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

अल्पसंख्यक हिंदु समुदाय की पाकिस्तान हिंदू परिषद् (पीएचसी) के प्रतिनिधिमंडल ने चिंता जताई है कि सिंध प्रांत में हिंदुऒं को लगातार लूट और डकैती का निशाना बनाया जा रहा है। उनके खिलाफ इस तरह की घटनाऒं में वृद्धि हो रही है। परिषद ने मांग की है कि इस्लामाबाद की संघीय सरकार इन घटनाऒं को रोकने के तुरंत कोई कदम उठाए और देश में अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करे।

जाकोकाबाद में हाल ही में हुई लूट की घटना के विरोध प्रदर्शन में कराची में बड़ी संख्या में हिंदुऒं ने भाग लिया। जाकोकाबाद में कुछ हथियारबंद लोगों ने मंदिर में घुस कर करीब ३५० हिंदू महिलाऒं से लाखों रूपये की नगदी तथा जेवरात लूट लिए थे। सिंघ के पूर्व सांसद डा. रमेश लाल ने पुलिस और अन्य कानूनी एजेंसियों पर आरोप लगाया है कि वह नागरिकों खासतौर पर अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम रही हैं।

पीएचसी के सचिव हरी मोटवानी ने डेली टाइम्स अखबार को बताया कि डाकुऒं ने करीब सात करोड़ की लूट की है और जाकोकाबाद की हाल ही की घटना के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोग खासतौर पर महिलाएं धार्मिक स्थानों पर जाने में डरने लगे हैं। मोटवानी ने कहा कि इसलिए हम मांग करते हैं कि सरकार डकैतों को तुरंत गिरफ्तार करे और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्र्चित करे। उन्होंने कहा कि यह घटना दिन के समय हुई है बावजूद इसके पुलिस इसे रोक नहीं पाई।

पीएचसी के अध्यक्ष राजा असेरमल मांगलानी ने कहा कि सिंध के उत्तरी जिलों में हिंदुऒं के साथ लूट और अपहरण की घटनाएं हो रही हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में डर और असुरक्षा की भावना घर कर गई है। सरकार को चाहिए कि वह लोगों में व्याप्त इस इस डर की भावना को दूर करे।
read more...

आतंकवादीयों को दमाद क्यों नही बना लेते

बेंगलूर के बाद अहमदाबाद भी सीरियल बम धमाकों से दहल उठा हिन्दुस्तान। 24 घंटे में दुसरा हमला । देश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। कुत्ता को घुमाने और ई-मेल कहा से आया बस यही तक खबर आती है। फिर मुआवजा देने का दौर चलता है अगर हिन्दु मरा है तो 1 लाख और मुस्लमान मरा है तो 5 से 10 लाख तक का मुआवजा मिलता है। सरकार के किसी मंत्री घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।

आखीर कब रुकेगा आतंकवादियों का हमला। हिन्दुस्तान में आतंकवाद को सदैव वोट बैंक और मुस्लिम तुस्टीकरण की राजनीति से जोड्कर देखा जाता है और इसी का परिणाम है कि पहले 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार के मुसलमानों के दबाव में आकर टाडा कानून वापस ले लिया और उसके बाद 2004 में सरकार में आते ही एक बार फिर कांग्रेस ने पोटा कानून वापस ले लिया। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। यहा तक कह दिया कि अफजल को फांसी देने पर इस देश में दंगा भरक सकता है कांग्रेसी आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी दमाद बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है। क्या एक आतंकवादी को फांसी देने से दंगा भरक सकता है तो इसमें हमे कहने से कोई गुरेज नही है कि दंगाई का राष्टृभक्ति कभी भी हिन्दुस्तान के साथ नही है और इसमें भी कांग्रेसी ही दोषी है जब देश आजाद हूआ था तभी कांग्रेसी जन यैसे देशद्रेही को गले लगा-लगा कर इस देश में रहने के लिये रोक रहे थे जो आज हमारे लिये नासूर बन गये हैं।
हिन्दुस्तान यैसा देश है जहा आतंकवादि सरकारी नैकरी करते हैं सरकार उन्हें पैसा भी देती है और आतंकवाद फैलाने के सहायता। "भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।" गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। क्या यही है आतंकवादियों से लड़ने क माद्दा, शायद नही।

आज भारत में एक भी ऐसा कानून नहीं है जो आतंकवाद की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए और आतंकवादियों के विशेष चरित्र को देखते हुए उन्हें तत्काल और प्रभावी प्रकार से दण्डित करने के लिये प्रयोग में आ सके। आज सभी राजनीतिक दलों के नेता केवल भाजपा को छोड्कर इस बात पर सहमत दिखते हैं कि सामान्य आपराधिक कानूनों के सहारे आतंकवाद से निपटा जा सकता है। हमारे सामने एक नवीनतम उदाहरण है कि किस प्रकार टाडा के विशेष न्यायालय में मुकदमा होते हुए भी मुम्बई बम काण्ड के अपराधियों को सजा मिलने में कुल 15 वर्ष लग गये और सजा मिलने के बाद भी एक के बाद एक आतंकवादियों जमानत पर छूटते जा रहे हैं। आखिर जब हमारी न्याय व्यवस्था जटिल तकनीकी खामियों का शिकार हो गयी है जो आतंकवादियों को बच निकलने का रास्ता देती है तो फिर कडे और ऐसे कानूनों के आवश्यकता और भी तीव्र हो जाती है जो तत्काल जमानत या फिर आतंकवाद के मामले में जमानत के व्यवस्था को ही समाप्त कर दे। यह कोई नयी बात नहीं है। पश्चिम के अनेक देशों ने ऐसे कठोर कानून बना रखे हैं और इसके परिणामस्वरूप वे अपने यहाँ आतंकवादी घटनायें रोकने में सफल भी रहे हैं। परंतु भारत के सम्बन्ध में हम ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते। अगर हिन्दुस्तान की सरकार आतंकवादियों से लड़ नही सकती है तो उसे अपना दमाद बना ले लफडा खत्म हो जायेगा। हम मुर्ख जनता जात-पात उँच-नीच के नाम पर दुबारा नपुसंको के हाथ में इस देश की बागडोर दे देंगे।
read more...

राजनैतिक दलों का सच हुआ उजागर

रामसेतु का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है जहां कांग्रेसी के पुरातत्वविदों ने भगवान राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाकर हिन्दू भावनाओं को चोट पहुंचाई है। अभी इस प्रकरण पर अंतिम सुनवाई होनी बाकी ही थी कि एक बार फिर अमरनाथ यात्रा से जुड़े प्रसंग न केवल हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं वरन् वर्तमान सत्ताधीश अलगाववादियों के समक्ष आत्मसमर्पण को भी उजागर कर रहे हैं। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा ४९.८८ एकड़ की जमीन आवंटित करने के निर्णय पर जम्मू कश्मीर के मुस्लिम नेताओं ने जिस तरह की अलगाववादी स्थितियां बनायी और जहर भरे वक्तव्य दिये उससे उनकी असलियत पूरे राष्ट्र के समक्ष आ गयी, जम्मू कश्मीर में सत्ता सुख भोग रही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का छद्म पंथनिरपेक्षता का मुखौटा भी उतर गया है। इस्लाम की दुहाई देने वाली आल इंडिया हुर्रियत कांफे्रस व उसके सहयोगी दलों ने जिस प्रकार पूरी श्रीनगर घाटी व जम्मू में अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड को भूमि आवंटन के विरोध में जोरदार हिंसक प्रदर्शन किया उसमें पाकिस्तान समर्थक नारे लगवाए, पाकिस्तान झण्डे फहराए, सी.आर.पी.एफ. वे सेना के जवानों पर हमले किए उससे यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि ये सभी राष्ट्रविरोधी आतंकवाद समर्थक हैं। आश्चर्य है कि कांग्रेस ने इनके समक्ष आत्मसमर्ण किया हुआ है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में भारत सरकार जहां अल्पसंख्यकों के विकास व उनकी धार्मिक सुरक्षा के नाम पर उनके धामिक क्रिया-कलापों को पूर्ण कराने के लिए बिजली, पानी, सड़क, आवास, खाने-पीने, चिकित्सा जैसी सुविधाओं की पूर्ति करवाने के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं व हज यात्रा पर जाने वाले हजियों के साथ अपने दो-दो मंत्रियो तक को उनके साथ भेजती है। इतनी सारी सुविधाओं व सब्सिडी का असीम सुख भोगने के बाद भी इन कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने पाकिस्तानी आतंकियों का साथ लेकर अमरनाथ यात्रियों पर हमले करके अपनी गहरी बेशर्मी का प्रदर्शन किया है । इसे अच्छा ही कहेंगे कि मुस्लिमों और उसके तुष्टिकारकों दोनों का बदनुमा चेहरा एक साथ देश के सामने उजागर हो गया। जम्मू कश्मीर के मुख्य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने पी.डी.पी. द्वारा समर्थन वापस लेने की घोषणा के बाद जहां राज्य की विस्फोटक होती स्थिति को सुधारने की दृष्टि से अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा व सुविधा का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया वहीं अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अधिकार केवल पूजा तक ही सीमित कर दिया।
read more...

गंगासागर की घटना से उभरे कुछ प्रश्न

दिनाँक 12 जून को पश्चिम बंगाल के सुदूर क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जो सामान्य लोगों के लिये सामान्य नहीं थी पर उस राज्य के लिये सामान्य से भी सामान्य थी। हिन्दू संहति नामक एक हिन्दू संगठन द्वारा “वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया और उस कार्यशाला पर कोई 6,000 की मुस्लिम भीड ने आक्रमण कर दिया और इस कार्यशाला में शामिल सभी 180 लोगों पर पत्थर और गैस सिलिंडर फेंके। इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए और यहाँ तक कि जो 10 पुलिसवाले कार्यशाला में फँसे लोगों को बचाने आये उनकी जान के भी लाले पड गये। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह भीड प्रायोजित थी और कुछ स्थानीय कम्युनिष्ट कैडर द्वारा संचालित थी। लोगों का कहना है कि एक स्थानीय कम्युनिष्ट नेता जो अभी हाल में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में पराजित हो गये हैं उन्होंने इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया और स्थानीय मुसलमानों को भडकाने और एकत्र करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

आसपास के लोगों का कहना है कि मामला ऐसे आरम्भ हुआ कि कार्यशाला में भाग लेने आये प्रतिभागी गंगासागर से स्नान करके कार्यशाला आटो से लौट रहे थे और उत्साह में नारे लगा रहे थे। आटो चलाने वाला मुस्लिम समुदाय से था और उसे भारतमाता की जय, वन्देमातरम जैसे नारों पर आपत्ति हुई और उसने आटो में बैठे लोगों से नारा लगाने को मना किया साथ ही यह भी धमकी दी कि, “ तुम लोग ऐसे नहीं मानोगे तुम्हारा कुछ करना पडेगा” इतना कहकर वह स्थानीय मस्जिद में गया और कोई दस लोगों की फौज लेकर कार्यशाला स्थल वस्त्र व्यापारी समिति धर्मशाला में ले आया। इन लोगों ने कार्यशाला में जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों में टकराव हुआ और यह हूजूम चला गया। कुछ ही समय के उपरांत हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय और कम्युनिष्ट कैडर मिलाकर एकत्र हो गया और कार्यशाला को घेर लिया तथा पत्थर और जलता गैस सिलिंडर कार्यशाला के अन्दर फेंकना आरम्भ कर दिया। कार्यशाला और भीड के बीच कुछ घण्टों तक युद्ध का सा वातावरण रहा और कार्यशाला में अन्धकार था जबकि भीड प्रकाश में थी। भीड अल्लाहो अकबर का नारा माइक से लगा रही थी। कार्यशाला के प्रतिरोध के चलते भीड को कई बार पीछे की ओर भागना पडा। इस संघर्ष के कुछ देर चलते रहने के बाद दस पुलिसकर्मी आये और उनके भी जान के लाले पड गये। पुलिस टीम का प्रमुख तो प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बंगाली में कह रहा था कि, “ बचेंगे भी कि नहीं” ।
घटनाक्रम किस प्रकार समाप्त हुआ किसी को पता नहीं। पुलिस के हस्तक्षेप से या स्वतः भीड संघर्ष से थक गयी यह स्पष्ट नहीं है। परंतु बाद में पुलिस से एकतरफा कार्रवाई की और भीड को साक्षी बनाकर हिन्दू संहति के प्रमुख तपन घोष पर अनेक धाराओं के अंतर्गत मुकदमा लगा दिया और गैर जमानती धाराओं में जेल भेज दिया। जिस प्रकार पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की उससे इस पूरे मामले के पीछे राजनीतिक मंशा और नीयत स्पष्ट है।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मूलभूत प्रश्न उभरते हैं। जिनका उत्तर हमें स्वयं ढूँढना होगा। एक तो यह घटना मीडिया पर बडा प्रश्न खडा करती है और दूसरा देश में हिन्दुत्व के विरोध में संगठित हो रही शक्तियों पर। गंगासागर जैसे हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल पर इतना विशाल साम्प्रदायिक आक्रमण हुआ और तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया संवेदनशून्य बना रहा है। आखिर क्यों? इसके पीछे दो कारण लगते हैं। एक तो पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्टों के खूनी इतिहास को देखते हुए यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी क्योंकि इसमें कोई मृत्यु नहीं हुई थी। दूसरा इस विषय को उठाने का अर्थ था कि किसी न किसी स्तर पर इस पूरे मामले की समीक्षा भी करनी पड्ती और इस समीक्षा में पश्चिम बंगाल में उभर रहे हिन्दुत्व का संज्ञान भी लेना पडता जिसके लिये भारत का मीडिया तैयार नहीं है। तो क्या माना जाये कि मीडिया अब यथास्थितिवादी हो गया है और वामपंथ का सैद्धांतिक विरोध करने को तैयार नहीं है। या फिर यह माना जाये कि देश में अब उस स्तर की पत्रकारिता नहीं रही जो किसी परिवर्तन की आहट को पहचान सके। यही भूल भारत की पत्रकारिता ने 2002 में गोधरा के मामले को लेकर भी की थी और सेकुलरिज्म के चक्कर में जनता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को भाँप न सकी थी। देश में हिन्दू- मुस्लिम समस्या बहुत बडा सच है और इससे मुँह फेरकर इसका समाधान नहीं हो सकता। शुतुरमुर्ग के रेत में सिर धँसाने से रेत का तूफान नहीं रूकता और न ही कबूतर के आंख बन्द कर लेने से बिल्ली भाग जाती है। आज भारत का मीडिया अनेक जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर पलायनवादी रूख अपना रहा है। इसका सीधा प्रभाव हमें मीडिया के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के रूप में देखने को मिल रहा है। गंगासागर में हुई इस घटना का उल्लेख किसी भी समाचारपत्र ने नहीं किया परंतु अनेक व्यक्तिगत ब्लाग और आपसी ईमेल के आदान प्रदान से यह सूचना समस्त विश्व में फैल गयी और लोगों ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय प्रशासन को हिन्दू संहति के नेता तपन घोष की कुशल क्षेम के लिये सम्पर्क करना आरम्भ कर दिया। परंतु यह विषय भी अंग्रेजी ब्लागिंग तक ही सीमित रहा और इस भाषा में जहाँ यह विषय छाया रहा वहीं हिन्दी ब्लागिंग में इसके विषय में कुछ भी नहीं लिखा गया। हिन्दी ब्लागिंग में अब भी काफी प्रयास किये जाने की आवश्यकता और मीडिया का विकल्प बनने के लिये तो और भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी ब्लागिंग जगत ने तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की उपेक्षा के बाद भी गंगासागर में आक्रमण के विषय को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया उससे यह बात तो साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया अनुत्तरदायित्व और पलायनवादी रूख से उत्पन्न हो रही शून्यता को भरने के लिये ब्लागिंग पत्रकारिता की विधा के रूप में विकसित हो सकती है और इसके सम्भावनायें भी हैं।

गंगासागर में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष या जिहादी आक्रमण से एक और गम्भीर प्रश्न उभर कर सामने आया है और वह है इस्लामवादी-वामपंथी मिलन का। गंगासागर की घटना के आसपास ही समाचारपत्रों में समाचार आया था कि केरल राज्य में माओवादियों और इस्लामवादियों ने बैठक कर यह निर्णय लिया है कि वे तथाकथित “ राज्य आतंकवाद”, “ साम्राज्यवाद” और हिन्दूवादी शक्तियो” के विरुद्ध एकजुट होकर लडेंगे। गंगासागर में हिन्दू कार्यशाला पर हुआ मुस्लिम- कम्युनिष्ट आक्रमण इस गठजोड का नवीनतम उदाहरण है। गंगासागर पर आक्रमण के अपने निहितार्थ हैं। यह तो निश्चित है कि इतनी बडी भीड बिना योजना के एकत्र नहीं की जा सकती और यदि यह स्वतः स्फूर्त भीड थी तो और भी खतरनाक संकेत है कि हिन्दू तीर्थ पर आयोजित किसी हिन्दू कार्यशाला पर आक्रमण की खुन्नस काफी समय से रही होगी। जो भी हो दोनों ही स्थितियों में यह एक खतरे की ओर संकेत कर रहा है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है किसी भी समुदाय या संगठन को देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार विमर्श का अधिकार है और यदि इस अधिकार को आतंकित कर दबाने का प्रयास होगा और राजसत्ता उसका समर्थन करेगी तो स्थिति कितनी भयावह होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। गोधरा के सम्बन्ध में ऐसी स्थिति का सामना हम पहले कर भी चुके हैं फिर भी कुछ सीखना नहीं चाहते। आज देश के सामने इस्लामी आतंकवाद अपने भयावह स्वरूप में हमारे समक्ष है अब यदि उसका रणनीतिक सहयोग देश के एक और खतरे माओवाद और कम्युनिज्म के नवीनतम संस्करण से हो जाता है तो उसका प्रतिकार तो करना ही होगा। यदि प्रशासन और सरकार या देश का बुद्धिजीवी समाज या फिर मीडिया जगत इस रणनीतिक सम्बन्ध की गम्भीरता को समझता नहीं तो इसकी प्रतिरोधक शक्तियों का सहयोग सभी को मिलकर करना चाहिये। अच्छा हो कि गंगासागर से उभरे प्रश्नों का ईमानदार समाधान करने का प्रयास हम करें।
read more...