Showing posts with label शरियत. Show all posts
Showing posts with label शरियत. Show all posts

जयपुर विस्फोट उत्तरदायी कौन

भारत का एक और सुन्दर व अपेक्षाकृत शांत समझा जाने वाले जयपुर शहर आतंकवादियों का निशाना बना। आज सायंकाल कोई सात बजकर 15 मिनट पर बम विस्फोटों की श्रृंखला आरम्भ हुई और 20 मिनट के अन्दर कुल 8 विस्फोट हुए। इन विस्फोटकों को नयी साइकिलों पर रखा गया था। आरम्भ में तो इस सम्बन्ध में अलग-अलग समाचार आ रहे थे और विभिन्न समाचार चैनलों द्वारा कहा गया कि विस्फोटकों को रिक्शे और होण्डा सिटी कार में भी रखा गया था। बाद में राज्य के गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने विभिन्न टीवी चैनलों को स्पष्ट किया कि विस्फोटक नयी साइकिलों पर ही रखे गये थे। इन विस्फोटों के लिये शहर के व्यस्ततम क्षेत्रों को चुना गया था। परंतु विस्फोटों के सम्बन्ध में चर्चा करते समय एक तथ्य को यथासम्भव दूर रखने का प्रयास विभिन्न टीवी चैनलों ने किया और वह यह कि विस्फोटों का निशाना एक बार फिर हनुमान मन्दिर को बनाया गया और विस्फोट के लिये दिन भी एक बार फिर मंगलवार का चुना गया। इससे पूर्व 2006 मार्च में जब वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मन्दिर संकटमोचन मन्दिर को आतंकवादियों ने निशाना बनाया था तो भी मंगलवार के दिन को चुना गया था। आखिर साम्य का कारण क्या है और इस तथ्य से बचने का प्रयास क्योंकर हो रहा है। मंगलवार के दिन अधिकाँश हिन्दू हनुमान जी को प्रसाद चढाने और उनका प्रसाद लेने मन्दिर में जाते हैं। इस दिन को निशाना बनाकर आतंकवादी कुछ संकेत देना चाहते हैं परंतु हम उस संकेत को समझने के स्थान पर उससे बचने का प्रयास कर रहे हैं।


इसी प्रकार जयपुर में हुए विस्फोट के बाद सरकार और विपक्ष की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया भी अपेक्षित ढंग से ही रही है। एक ओर केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री ने शांति बनाये रखने की अपील करते हुए घटना की निन्दा की है तो विपक्षी दल भाजपा ने वर्तमान केन्द्र सरकार की आतंकवाद के प्रति नरम नीति को इस विस्फोट का उत्तरदायी ठहराया है। कुछ हद तक यह बात ठीक है पर समस्या का मूल इससे भी कहीं अधिक व्यापक है जिसके सम्बन्द्ध में चर्चा करने का साहस भाजपा में भी नहीं है।

भारत का इस्लामी आतंकवाद नामक चीज से पहली बार पाला 1989 में पडा था जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद ने कश्मीर को भारत से स्वतंत्र कराने के अभियान से व्यापक वैश्विक जिहाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया था और वहीं से जिहाद के नाम पर इस्लामी आतंकवाद का आधारभूत संगठन अस्तित्व में आने लगा। 1989 में जब इस्लामी आतंकवाद अपना विस्तार कर रहा था और जिहाद के नाम पर अफगानिस्तान में रूस के विरुद्ध लडने वाले लडाके भारत में कश्मीर को भी इस्लामी राज्य बनाने के संकल्प के साथ कश्मीर में जिहाद आरम्भ कर रहे थे तो भारत में इस समस्या को पूरी तरह दूसरे सन्दर्भ में देखा जा रहा था। इस समस्या को कश्मीर की जनता की बेरोजगारी और कुछ नवयुवकों के भटकाव से जोडकर देखा जा रहा था। अपनी पीठों पर एके 47 लादे अल्लाहो अकबर का नारा लगाने वाले नवयुवक भारत के राजनेताओं को बेरोजगारी और भटकाव का परिणाम दिखाई दे रहे थे। ऐसा नहीं है कि उस समय स्थिति को समझा नहीं जा रहा था परंतु समस्या के वास्तविक स्वरूप से जनता को अनभिज्ञ रखा जा रहा था।

1989 के ये बेरोजगार और भटके हुए नवयुवक कब कश्मीर की सीमाओं से बाहर आ गये और शापिंग काम्प्लेक्स और हिन्दुओं के मन्दिरों को निशाना बनाने लगे पता भी नहीं चला। 1990 के दशक में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया कि जिस विषय को हमारे राजनेता और बुद्धिजीवी केवल कश्मीर की सीमाओं तक सीमित मान रहे थे वह कश्मीर की सीमाओं तक सीमित न रह सका और यह जिहाद एक वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर भारत में हिन्दुओं को निशाना बनाने लगा।

इसके कारण में यदि हम जायें तो हमें कुछ कारण दिखाई पडते हैं। फरवरी 1998 को ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में इण्टरनेशनल इस्लामिक फ्रण्ट की ओर से पहली बार यहूदियों और ईसाइयों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान विश्व भर के मुसलमानों से किया गया था। जिहाद के इस आह्वान के बाद विश्व में अल कायदा द्वारा स्वयं और उसके फ्रण्ट में सम्मिलित विभिन्न इस्लामी आतंकवादी संगठनों की ओर से पश्चिमी देशों और यहूदियों को निशाना बनाया जाने लगा। 1998 में जिहाद के इस वैश्विक आह्वान के बाद भारत स्थित इस्लामी अतिवादी संगठनों में इसे लेकर उहापोह की स्थिति रही और लगभग तीन वर्षों तक अर्थात 11 सितम्बर 2001 तक भारत स्थित आतंकवादी संगठन कश्मीर केन्द्रित होने के कारण अमेरिका और ब्रिटेन के विरुद्ध खडे अल कायदा का साथ देना नहीं चाह्ते थे। 11 सितम्बर 2001 के बाद विश्व स्तर पर जिहाद की परिभाषा पूरी तरह बदल गयी और विश्व में स्थानीय आधार पर विभिन्न देशों में अलग इस्लामी राज्य के लिये उग्रवाद के रास्ते पर चल रहे इन संगठनों ने विश्व स्तर पर खिलाफत और शरियत व कुरान आधारित विश्व की संस्थापना का उद्देश्य अपना लिया नये। परिवेश में अल कायदा उन सभी संगठनों को एक छतरी के नीचे लाने में सफल रहा जो विभिन्न देशों में अलग इस्लामी राज्य के लिये संघर्ष कर रहे थे फिर वह फिलीपींस, दक्षिणी थाईलैण्ड, कश्मीर, चेचन्या या विश्व के अन्य भाग हों। इन सभी अलगाववादी उग्रवादी आन्दोलनों ने स्थानीय स्तर पर अलग इस्लामी राज्य की स्थापना के स्थान पर विश्व स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था निर्माण को अपना लक्ष्य बना लिया जो कुरान और शरियत पर आधारित हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये जिहाद को भी व्यापक रूप दिया गया और एक उद्देश्य से कार्य करने वाले विभिन्न संगठन विभिन्न देशों में सक्रिय हो गये।


पिछ्ले 50 से अधिक वर्षों से इस्लामी आतंकवाद की त्रासदी झेल रहे मध्य पूर्व से इस समस्या का गुरुत्व केन्द्र दक्षिण एशिया की ओर आ गया। यदि 2001 के बाद दक्षिण एशिया की ओर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस उप महाद्वीप में इस्लामी आतंकवाद की दशा और दिशा दोनों में व्यापक परिवर्तन आया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में इस्लामी आतंकवादी संगठन सशक्त हुए हैं और इन सभी देशों में कार्यरत इस्लामी संगठन कहीं अधिक कट्टरता से शरियत आधारित विश्व व्यवस्था के निर्माण के लक्ष्य की ओर उद्यत हैं। भारत में सिमी, पाकिस्तान में लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद तथा बांग्लादेश में हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी ऐसे संगठन हैं जो स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि इनका उद्देश्य कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है। ये संगठन अपने देशों की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं और प्रशासन के लिये सिरदर्द बन चुके हैं।

आज जिहादवाद एक खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है जहाँ विश्व के अनेक कट्टर इस्लामी आतंकवादी संगठन केन्द्रीय रूप से न सही तो भी वैचारिक आधार पर अल कायदा से अवश्य जुड गये हैं और ये सभी संगठन अपनी स्थानीय इकाइयों के सहारे आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। वास्तव में मूल समस्या यही है कि जिसे कानून व्यवस्था की समस्या माना जा रहा है वह सभ्यता और बर्बरता का संघर्ष है। ये बर्बर शक्तियाँ यदि पूरी तरह इस्लामी शक्तियाँ नहीं हैं तो भी इस्लाम धर्म से प्रेरणा ग्रहण कर रही हैं और इस्लामी धर्मगुरु और बुद्धिजीवी इस सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि वे इस इस्लामवादी आन्दोलन के साथ है या नहीं जो विश्व व्यवस्था बदलने के लिये हिंसा का सहारा ले रहा है।

वैसे तो पिछ्ले कुछ महीनों पहले उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध इस्लामी मदरसा दारूल-उलूम-देवबन्द ने एक बडा सम्मेलन आयोजित कर इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद से इस्लाम को असम्पृक्त करने का प्रयास किया परंतु उस सम्मेलन में कुछ प्रश्नों को अनछुआ ही रहने दिया कि कुरान और शरियत के आधार पर विश्व व्यवस्था के निर्माण को लेकर उन लोगों का दृष्टिकोण क्या है? भारत में सक्रिय उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को लेकर उनका दृष्टिकोण क्या है जिनका उद्देश्य कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है और इसके लिये वे हिंसा का सहारा ले रहे हैं और ऐसे संगठन में सर्वप्रथम नाम सिमी का आता है। इसके साथ ही ऐसे सम्मेलनों की नीयत पर बडा सवाल तब खडा हुआ जब इस सम्म्मेलन में सुरक्षा एजेंसियों और सरकार को निशाना बनाते हुए कहा गया कि आतंकवाद के नाम पर मदरसों और बेगुनाह मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे प्रस्तावों से स्पष्ट है कि पहले से ही मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त सरकारों और राजनीतिक दलों के ऊपर इस बात के लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डालना कि वे समस्या के पीछे के मूल तत्वों पर विचार न करें और प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव डालें कि वे आतंकवाद को देश में सहयोग देने वाले तत्वों को खुली छूट दें। निश्चित रूप से इस्लामी धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों की यह रणनीति सफल रही है और मार्च माह में सिमी के अनेक बडे आतंकवादियों की गिरफ्तारी और मध्यप्रदेश के एक गाँव में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर होने के खुलासे के बाद कुछ ही महीनों में जयपुर में हुआ विस्फोट प्रमाणित करता है कि देश में सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव है और इसी का परिणाम है कि इस विस्फोट का कोई सुराग खुफिया एजेंसियों के पास भी नहीं था।

जयपुर में विस्फोट होने के बाद केन्द्र और राज्य सरकारें खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों को दोष दे रही हैं इससे स्पष्ट है कि साँप गुजरने के बाद लाठी पीटने का खिसियाहट भरा खेल खेला जा रहा है। जब खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव बना कर उनका मनोबल कमजोर किया जा रहा है तो क्या अपेक्षा की जानी चाहिये कि ऐसी घटनाओं पर वे रोक लगा सकेंगे। 2001 में देश में सिमी पर प्रतिबन्ध लगाया गया था और उसके बाद इस संगठन का विस्तार देश के अनेक राज्यों में हुआ है। यह तथ्य इस बात तो पुष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि यह प्रतिबन्ध बिलकुल अप्रभावी है। प्रतिबन्ध के बाद भी इस संगठन का फलना फूलना और पिछ्ले दो वर्षों मे प्रायः सभी बडी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना इस बात को प्रमाणित करता है कि सरकारें इस्लामी आतंकवाद के इस्लामी स्वरूप के कारण इससे निपटने में हिचक रही हैं और इस समस्या के मूल में स्थित विचारधारा के बारे में देश में कोई बहस न होने से इस्लामी धर्मगुरु और बुद्धिजीवी लोगों का ध्यान हटाने में सफल हो रहे हैं जिसका सीधा लाभ ये इस्लामी संगठन अपने संगठन और प्रसार के लिये उठा रहे हैं।


पिछ्ले सात- आठ वर्षों में इस्लामी आतंकवादियों ने एक से एक दुस्साहसिक घटनाओं को अंजाम दिया है परंतु उसका प्रतिरोध या उनकी पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये। 1999-2000 में इस्लामी आतंकवादियों ने कुछ खूँखार आतंकवादियों को छुडाने के उद्देश्य से भारत के एक विमान का अपहरण किया और भारत सरकार को इन आतंकवादियों के आगे झुकने को विवश होना पडा। आज इस घटना के आठ वर्षों बाद भी सरकार ने कुछ नहीं सीखा है और 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण के लिये मृत्युदण्ड प्राप्त आतंकवादी मोहम्मद अफजल को क्षमादान के प्रयासों के तहत जेल में सुरक्षित रखा है। सरकार के ऐसे निर्णय न केवल आतंकवादियों के मनोबल को बढाते हैं वरन उनके समक्ष भारत को एक आतंकवाद समर्थक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करते है जो अपनी गलतियों से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं करता।

भारत में अनेक प्रमुख पत्रकार और बुध्दिजीवी इस बात के लिये भारत की प्रशंसा करते नहीं थकते कि इस देश में आतंकवाद की समस्या को पश्चिम से भिन्न स्वरूप में लिया गया है और उसके प्रति दृष्टिकोण भी पश्चिम से भिन्न है। उनका संकेत इस बात की ओर रहता है कि जहाँ पश्चिम में आतंकवाद के बाद इस्लाम धर्म और मुसलमानों के प्रति एक विशेष प्रकार का भाव व्याप्त हुआ है उससे भारत बिलकुल मुक्त है। यह स्थिति कुछ मात्रा में प्रशंसनीय हो सकती है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पश्चिम की सरकार और वहाँ के समाज ने जिस प्रकार इस समस्या को गम्भीरता से लिया है और उस पर चिंतन आरम्भ किया है उसी का परिणाम है कि अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, एक-एक बडे आक्रमण का सामना करने के उपरांत अनेक वर्षों से किसी भी आक्रमण को रोकने में सफल रहे हैं। इसके विपरीत भारत में औसतन प्रत्येक तीसरे चौथे माह बडा आतंकवादी आक्रमण होता है जिसमें 20 से 25 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। आज हमें इस बारे में गम्भीरता से विचार करना होगा कि पश्चिम का इस सम्बन्ध में आत्मरक्षा की सतर्कता अच्छी है या हमारी आक्रमण सहन करने की उदारता। अब वह समय आ गया है कि इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी विचारधारा, इसके सहयोगियों और इसका पोषण करने वालों के सम्बन्ध में हम खुलकर विचार करें। वास्तव में यह एक युद्ध की घोषणा है और अब हमें अपने शत्रुओं को पहचान लेना चाहिये।
read more...

फतवा और आतंकवाद साथ- साथ

पिछ्ले दिनों जब उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी संस्था दारूल उलूम देवबन्द ने आतंकवाद की भर्त्सना करने जैसा दिखने वाला एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उसमें आतंकवाद और इस्लाम के मध्य परस्पर किसी भी सम्बन्ध से इंकार करते हुए भी अनेक ऐसी बातें कहीं जो इन मौलवियों या इस्लामी धर्मगुरुओं की नीयत पर प्रश्न खडा करने के लिये पर्याप्त था। इन बातों में सबसे प्रमुख बात यह थी कि आतंकवाद के नाम पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना रही हैं और उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है। इसी क्रम में इस सम्मेलन में कहा गया कि मदरसों को भी नाहक परेशान किया जा रहा है। इस उलेमा सम्मेलन की काफी चर्चा हुई और अनेक लोगों ने इसे अत्यंत सकारात्मक पहल घोषित किया। भारतीय जनता पार्टी के नेता और एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में वरिष्ठ स्तम्भकार ने तो इस सम्मेलन को नरमपंथी इस्लाम के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम की सन्ज्ञा तक दे डाली तो वहीं कुछ अन्य लेखकों ने इस मामले पर काफी सधी टिप्पणी की।

इस विषय पर लोकमंच में प्रकाशित किये गये आलेख में उलेमा सम्मेलन को लेकर कुछ प्रश्न खडे किये गये थे और इस सम्मेलन के प्रस्तावों और इसमें हुई चर्चा के आधार पर आशंका प्रकट की गयी थी कि ऐसे प्रयास एक सोची समझी रणनीति का अंग हैं जिसका प्रमुख उद्देश्य समाज में इस्लामवाद के प्रतिरोध की शक्ति को कुन्द करना है और इस पूरी बहस में आतंकवाद की प्रेरणास्रोत विचारधारा पर चर्चा होने से रोकना है। यह विषय इस समय फिर से लाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।

मार्च महीने से लेकर इस अप्रैल महीने तक भारत में अनेक इस्लामी आतंकवादी नेटवर्क या आतंकवादी गिरफ्तार किये गये हैं। इसमें सबसे उल्लेखनीय गिरफ्तारी सिमी के सदस्यों की है। मार्च के महीने में इन्दौर में सिमी के कुछ सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद एक के बाद एक राज खुलते गये और अंततोगत्वा मध्य प्रदेश के एक क्षेत्र चोरल में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर का भी पता चला और यह भी पता लगा कि यहाँ छोटे बच्चों को भी सशस्त्र प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और उन बच्चों को शिविर में देखभाल के लिये महिलाओं का एक बल शाहीन बल के नाम से गठित गिया गया था। सिमी के पकडे गये सदस्यों में इस संगठन का मुखिया सफदर नागौरी भी शामिल है जिसका 11 जुलाई को मुम्बई के ट्रेन धमाकों के सिलसिले में मुम्बई के सिमी को जेल से पत्र लिखने का मामला भी काफी चर्चा में आया और इससे इन धमाकों में सिमी के लिप्त होने की पुष्टि भी हो गयी। मध्य प्रदेश से ही पकडे गये सिमी के सद्स्यों से पता चला कि हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के तार भी सिमी से जुडे हैं।

पिछ्ले वर्ष कर्नाटक में आतंकवादी प्रशिक्षण होने का समाचार एक चौंकाने वाली घटना थी और अब मध्य प्रदेश में ऐसे शिविर के मिलने से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि भारत में आतंकवाद का आधारभूत ढाँचा अब निर्णायक स्थिति में पहुँच गया है और इस सम्स्या पर समग्रता से विचार करने की आवश्यकता है। समग्रता से तात्पर्य है कि इस समस्या के पीछे के विचारधारागत स्रोत को पहचानने की आवश्यकता है। क्या इस सम्बन्ध में सार्थक प्रयास हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश इसका उत्तर नकारात्मक है। ऐसा इसलिये है कि भारत में बहुत कम संख्या में लोग ऐसे हैं जो इस समस्या को कानून व्यवस्था से परे कहीं अधिक व्यापक सन्दर्भ में देखना चाह्ते हैं। यह बात सत्य है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद को पूरी तरह इस्लाम धर्म से नहीं जोडा जा सकता परंतु यह भी सत्य है कि इसके पीछे की प्रेरणास्रोत विचारधारा पूरी तरह इस्लाम से प्रेरणा ग्रहण करती है और इसका उद्देश्य भले ही विश्व में शक्ति के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना और विश्व का संचालन शरियत या इस्लामी कानून के आधार पर सुनिश्चित करना हो इस राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा से इस्लामी धर्म के विद्वान और धर्मगुरु भी असहमत नहीं दिखते। यही विषय सर्वाधिक चिंता का कारण है और इसी कारण अंतर्धार्मिक बह्सों या आडम्बरी फतवों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है।

अभी कुछ दिनों पूर्व मुझे किसी मित्र ने मुम्बई स्थित इस्लामिक रिसर्च फाउण्डेशन और उसके प्रमुख डा. जाकिर नाइक के सम्बन्ध में बताया। उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा से जब इण्टरनेट पर ढूँढा तो मुझे कुछ विषयों पर घोर आश्चर्य हुआ और उनके कुछ विचार इतने असहिण्णु दिखे कि उनमें और इस्लामवादी आतंकवादियों के एजेण्डे में विशेष अंतर नहीं दिखा। वीडियो की प्रसिद्ध साइट यू-ट्यूब पर डा. जाकिर नाइक का एक वीडियो है जो प्रसिद्ध इस्लामी चैनल Q TV के प्रश्नोत्तर पर आधारित है इस वीडियो में डा जाकिर नाइक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस्लाम को छोडकर शेष सभी धर्म गलत हैं और वे गलत सीख देते हैं इसी कारण इस्लामी देशों में गैर मुस्लिम धर्मों का प्रचार या उनके उपासना स्थल बनाने की आज्ञा नहीं दी जा सकती।

इस सम्बन्ध में तर्क के लिये उन्होंने एक उदाहरण दिया है जो अत्यंत रोचक है उनके अनुसार यदि किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य के पास तीन व्यक्ति गणित का अध्यापक बनने आयें और प्रधानाचार्य उससे प्रश्न पूछे कि दो और दो कितने होते हैं और उनमें से एक का उत्तर हो चार, दूसरा कहे पाँच और तीसरा कहे छह तो प्रधानाचार्य उसी को अध्यापक नियुक्त करेगा जो उत्तर में दो और दो चार कहेगा न कि पाँच और छ्ह कहने वाले को। नाइक के अनुसार शेष दो को लगता है कि दो और दो पाँच और छह होता है पर प्रधानाचार्य को पता है कि यह गलत है इसलिये वह गलत शिक्षा अपने छात्रों को नहीं लेने देगा। जाकिर नाइक के अनुसार यही फार्मूला धर्म के मामले में भी है। गैर इस्लामी धर्मों को लगता है कि उनकी शिक्षायें ठीक हैं परंतु इस्लाम के अनुयायी जानते हैं कि वे गलत हैं और यदि किसी का दीन( धर्म) सही है तो वह सिर्फ इस्लाम है। यही कारण है कि इस्लामी देशों में अपने धर्म का प्रचार करने या उपासना स्थल बनाने की छूट गैर मुसलमानों को नहीं है।


डा. जाकिर नाइक को इन दिनों अंतरधार्मिक विमर्श के सम्बन्ध में और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन का विशेषज्ञ माना जाता है जो इसी विषय पर विश्व के अनेक देशों में व्याख्यान देते हैं। ऐसे व्यक्ति के विचार यदि इतने असहिण्णु हैं जो इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत से परिपूर्ण है उससे इस बात कि अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है कि वह ऐसे प्रयासों से विश्व में सहिण्णुता की स्थिति निर्माण करने में सहायक हो सकेगा।

इन्हीं महोदय ने मुम्बई में ही एक हिन्दू और इस्लाम के मध्य समानताओं के विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया जिसका पूरा वीडियो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। इस पूरे व्याख्यान में केवल एक बार कुछ मिनटों के लिये आर्य समाज के तीन विद्वानों को वैदिक ऋचाओं के पाठ के लिये मंच पर स्थान दिया गया और उसके उपरांत दोनों धर्मों की समानता पर डा जाकिर नाइक का एकपक्षीय भाषण होता रहा परंतु उनके भाषण का लब्बोलुआब यही रहा कि यदि हिन्दू इस्लाम की भाँति अल्लाह को सर्वोच्च ईश्वर स्वीकार करे तो ही दोनों धर्मों में सद्भाव सम्भव है। यह सन्दर्भ इसलिये मह्त्वपूर्ण है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी यही तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य गलत दीन का पालन कर रहे लोगों को अल्लाह के सही रास्ते पर लाना है। यही तर्क यदि इस्लाम के जानकार और विद्वान भी देते हैं कि इस्लाम के अतिरिक्त शेष धर्म अन्धकारमय हैं तो चिंता होती है कि इन दोनों की सोच में अंतर नहीं है अंतर है तो केवल उद्देश्य प्राप्त करने के तरीके में। एक इतना असहिण्णु है कि उसकी बात न मानने वाले को मौत के घाट उतार देता है और दूसरा यह कह कर लानत भेजता है कि तुम गलत रास्ते पर हो और सही रास्ता हमारा है।

विश्व के अनेक देशों में और विशेषकर यूरोप में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के तथाकथित प्रतीकों पर भी चर्चा का दौर आरम्भ हो गया है और इस विषय को लेकर इस्लाम में कुछ बेचैनी भी अनुभव की जा रही है तो भी भारत में यह विषय अब भी बह्स की परिधि से बाहर है और पिछ्ले महीने देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों के मध्य एक घटना घटित हुई जिस पर विशेष संज्ञान नहीं लिया गया परंतु यह घटना हमारी लेख की इस विषयवस्तु को पुष्ट ही करती है कि जब भी आतंकवाद के नाम पर वामपंथियों या इस्लामवादियों द्वारा कोई बहस आयोजित की जाती है तो वह पूरे विषय के मूल स्रोत पर चर्चा करने के स्थान पर इस विषय पर केन्द्रित हो जाती है कि किस प्रकार मुसलमानों का उत्पीडन आतंकवाद को प्रेरित करता है। आज समस्त विश्व में मुस्लिम उत्पीडन की एक मिथ्या अवधारणा को सृजित किया गया है और इसके इर्द-गिर्द इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है।

पिछ्ले महीने 2 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी स्थित उर्दू प्रेस क्लब में आतंकवाद और फासिज्म: एक ही सिक्के के दो पहलू विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी और इसमें प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्त्री और लेखिका अरुन्धती राय, संसद पर आक्रमण के दोषी रहे और फिर साक्ष्यों के अभाव में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किये गये गिलानी, प्रसिद्ध टी वी पत्रकार मनोज रघुवंशी सहित अनेक मुस्लिम वक्ता भी थे। उस कार्यक्रम में भाग लेने गये विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता सुरेन्द्र जैन ने आँखो देखा हाल बताया कि अरुन्धती राय और गिलानी ने भारत सरकार को जमकर कोसा और निष्कर्ष निकाला कि भारत में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं है और घोर अराजकता का माहौल है।

पत्रकार मनोज रघुवंशी ने मुस्लिम उत्पीडन के नाम पर इस्लामी आतंकवाद तो न्यायसंगत ठहराने की प्रवृत्ति की आलोचना की तो पूरे सभाकक्ष में शोर मचने लगा। इसके बाद हसनैन नामक एक वक्ता बोलने के लिये उठे और उन्होंने श्री राम और सीता पर अभद्र टिप्पणियाँ की और श्री राम को युद्ध प्रेमी सिद्ध कर दिया। इनके बाद जब विश्व हिन्दू परिषद के नेता सुरेन्द्र जैन बोलने आये तो उन्होंने श्री राम पर की गयी टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि इसी प्रकार की टिप्पणियाँ आपके पैगम्बर पर की जायें तो आपको कैसा लगेगा। इसके बाद तो सभाकक्ष में जम कर बवाल हो गया और मंच पर तथा दर्शकों में से लोगों ने वक्ता को घेर लिया और हाथापाई की नौबत आ गयी। किसी ने वक्ता को धमकाते हुए कहा कि 6 दिसम्बर से अब तक 10 हिन्दुओं को मार चुका हूँ और 11वाँ नम्बर तेरा है। मंच पर 13 से 15 लोगों ने वक्ता को घेर लिया और काफी देर बाद पुलिस आयी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता को सुरक्षित निकाल ले जा पाई।

इस घटना के भी निहितार्थ हैं। इस्लाम के धर्मगुरु या विद्वान जब व्याख्यान देते हैं तो इस अजीब तर्क पर जोर देते हैं कि इस्लाम का आकलन उसके धर्मग्रंथों के आधार पर किया जाना चाहिये न कि उसके अनुयायियों के आधार पर क्योंकि अनुयायी प्रायः धर्म को सही नहीं समझते और उनका आचरण धर्म के विपरीत होता है। इस धारणा को अंग्रेजी में Apologetic कहते हैं इसके लिये हिन्दी में कोई समानान्तर शब्द नहीं है परंतु ये वही लोग हैं जो अपने तर्कों के आधार पर इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से अस्पृक्त भी करते हैं और आतंकवाद को मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के आधार पर न्यायसंगत भी ठहराते हैं। यह प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है इसका पता उपर्युक्त उदाहरण से बखूबी चलता है कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले मुसलमान भी दूसरे धर्मों के महापुरुषों का सम्मान नहीं करते और उनपर टिप्पणी करना अपना लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं और वही अधिकार जब उनके शीर्ष पुरुषों के सम्बन्ध में प्रयोग किया जाता है तो इसे ईशनिन्दा मानकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। यह अवधारणा किस ओर संकेत करती है और ऐसे लोग इस्लामी आतंकवाद की आग बुझाने में कितने सक्षम होंगे इसका निष्कर्ष पाठक ही निकालें श्रेयस्कर होगा।

आजकी सबसे बडी आवश्यकता इस्लामी आतंकवाद को व्यापक सन्दर्भ में समझने और उसके पीछे की मूल प्रेरणा को पहचानने की है। क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है इसके पीछे एक सोच है और जब तक उस सोच पर प्रहार नहीं होगा तब तक आतंकवाद से मुक्ति प्राप्त कर लेने से भी इस्लामी सर्वोच्चता और शरियत लागू करने की सोच से प्रेरित इस्लामवाद पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती क्योंकि इस्लामवादी केवल आतंकवादी नहीं हैं वे भी हैं जो इसी उद्देश्य को शांतिपूर्ण तरीके से प्राप्त करना चाह्ते हैं। ऐसे तत्वों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है।
read more...