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मुम्बई में जिहादी आतंकी हमला

मुम्बई में फिर से जोड़दार जिहादी आतंकी आक्रमण हुआ लगभग 100 से ज्यादा आदमीयों को जिहादीयों ने मार गिराया। इस घटना ने पुरे देश के समझदार आदमीयों को शायद झकझोड़ कर रख दिया। लेकिन मेरा कुछ अलग ही चिन्ता है।

मेरा पहला चिन्ता हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्रीयों श्री मनमोहन सिंह जी को लेकर है। अगर कोई आतंकवादी जिन्दा बच गया तो बेचारे प्रधानमंत्री को रात भर निन्द नही आयेगा। 6 महीना के अन्दर जिहादीयों ने लगभग 1000 बेगुनाह आदमीयों को मार गिराया हमारे प्रधानमंत्री को इस का चिन्ता नही है। लेकिन काग्रेस ने कसम खा रखा है कि इस देश से वे जिहादीयों के खिलाफ किसी तरह का कारवाही नही करेंगे काग्रेस आतंकवादी निरोधक कानून नही लागु करेगा चाहे जिहादीयों के द्वारा कितना भी खून बहाया दिया जाये। क्यों कि मुस्लमानों के द्वारा दिये गये वेट बैंक खिसकने का डर है। ये भी सोचने लायक बात है आखिर मुस्लमान यैसी ही राजनितीक पार्टीयों को ही अपना सर्मथन क्यों देतें हैं जो आतंकवाद के खिलाफ नरम भाव रखतें हैं कई मुस्लमानों को हमेंशा से यही चिन्ता रहती है कि हिन्दुस्तान के सभी मुस्लमान आतंकवादी नही है तो फिर मुस्लमानों आमंकवादीयों से का इस तरह का प्रेमभाव क्यों। हम तो प्रधानमंत्री से मांग करते हैं कि संविधान में संसोधन करके महीना में 4दिन निश्चित कियों जायें जिस दिन आतंकवादी देश के किसी भी हिस्से में खुलेआम कत्ले आम मंचा सकते हैं उन्हें किसी तरह का कोई पुलिस के द्वारा रोक-टोक ना किया जाय। क्यों की हमारे देश के नेतो में आंतकियों को रोकने का शक्ति नही है ये अपना सारा शक्ति निर्दोश हिन्दुओं को आंतकवादी सिद्ध करनें में लगा दिये है।

दुसरा चिन्ता कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह जी को लेकर है इस वाटला हाउस में जिहादीयों का सख्या कम था उनका केश लडने के लिये 1-2 वकिल से काम चल जाता लेकिन यहाँ मुम्बई में तो आतंकियों का संख्या ज्यादा कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिह जी को तो इनका केस लड़ने के लिये ज्यादा वकिल का इंतजाम करना होगा। और तो और पैसा भी ज्यादा लगेगा लेकिन मुझे पैसे का चिन्ता नही है नेताओं के पास पैसा का कोई कमी नही रहता है हिन्दुस्तान के नेताओं के चलते तो स्विस बैक इतना फल फुल रहा है। नही तो इस मंदी की मार में स्विस बैंक भी बन्द हो गया होता। जिस तरह से मुम्बई में आतंकी घटना हुआ है आंतकीयों का सख्या लगभग 15 से 20 लगभग होगा अब इतने आंतकवादीयों के लिये वकिल भी ज्यादा चाहिये। कांग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह को एक मुफ्त का सजेशन देता हू अगर वकील कम पड जाये तो वे अपने ही पार्टी के नेताओं का सेवा ले सकतें है आखिर घर बाले कभी तो काम में आने चाहीये।

तीसरा चिन्ता श्री शिवराज पाटील के बारे में हैं रहने दो इनके बारें में सोचना ही बेकार है अभी कही व्यस्त होगें अपना कपडा सिलवाने या धुलवानें में या फिर अपना पुराना पेपड़ खोजने में जिसमें अनका पिछला व्यान छपा था क्यों कि कुछ देर में हिन्दुस्तान के सबसे तेज चैनल के तेज पत्रकार तेजगती से श्री शिवराज पाटील जी का ब्यान लेने आ जायेगा। मेरा मुफ्त का सजेशन तेज चैनलों के बारें में क्यों अपना समय बर्बाद करते हो तेज पत्रकारों श्री शिवराज पाटील जी का पुराना रिकार्डीग निकालो कमप्यूटर के द्वारा उन्हें आठ - दस तरह के नये कपडें पहनाओं और दिखा दो आखिर श्री शिवराज पाटील जी अभी 10-12 दिन पहले तो ब्यान दिये थी आतंकीयों के खिलाफ जब आसाम में धमाका हुआ था। अब इतना जल्दी नया ब्यान लेने का जरुरत क्या है।

चौथा चिन्ता श्री माननीय अमर सिंह जी के बारे में है इस बार उनका पैसा कुछ ज्यादा खर्च होने वाला है। आखिर आतंकवादीयों के सच्चे हित्तैसी इस देश में कोई है तो वे हैं श्री अमर सिंह उन्हे आतंकवादीयों का हमेंशा से ख्याल रहता हैं। आंतकवादीयों के परिवार वालें के लिये उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी में जिलाध्यक्ष का पद रिजर्व रहता है। और अगर सुरक्षाबल के ना-समझी के कारण कोई आंतकी मारा गया तो श्री अमर सिंह जी है उन पुलिस वाले के खैर खबर लेने के तैयार रहतें है और आतंकवादीयों का परिवार वालें को देने के लिये श्री अमर सिंह जी ने का फंड है 10 लाख रुपये। लेकिन इस बार शायद आतंकी मदद फंड का पैसा कुछ घटाना होगा क्यों कि आंकवादीयों का सख्या वाटला हाउस से ज्यादा है अगर मुम्बई में आतंकियों का संख्या 15 से 20 रहा तो सोच सकते है कि अमर सिंह जी का कितना पैसा इस बार खर्च होगा 1 करोड से ज्यादा। मेरा मुफ्त का सजेशन श्री आतंकी रक्षा मंच के सस्थापक श्री अमर सिह जी के लिये माननिय अमर सिंह जी इस बार क्यों न इस बार इन आतकीयों के परिवार वालों को गलत साइन किया हुआ चेक दे दिया जाये। क्यों की चेक तो आपके सामने कोई बैंक में डालेगा नही कुछ दिन बाद डालेगा तब तक हिन्दुस्तान के सभी मुस्लमानों के बीच ये खबर तो पहूच ही जायेगा कि आपने आतंकवादीयों को 10 लाख का सहायता प्रदान किया वैसे भी आपको चेक पर गलत साईन करने का आदत तो है मुस्लमानों का वोट आपके लिये भी पक्का साला देश जाये भाड़ में।

मेरा अंतीम चिन्ता बहुत ही तेज मिडीया वालों के लिये है कम से कम दो दिन तक इन बेचारे क्या करेंगे मुझे समझ नही आ रहा है क्यों कि रात के 9 से 10 बजे का समय तो कम से कम दो दिन के लिये ही सही मुम्बई धमाकों पर घरीयालि आँसु तो बहायेंगे । हिन्दु धर्म गुरु को गरीयाने के लिये दो दिन का झुट्टी मिल गया इन्हें।

पाढ़को आपका भी कोई चिन्ता होगा तो निचे कामेंन्ट में लिख दिजीयें
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सपा और राज का चक्रव्‍यूह

आज देश किस मोड़ पर जा रहा है, आज के नेतागण देश और धर्म को चूस रहे है। महाराष्ट्र में राज ठाकरे देश को तो समाजवादी पार्टी के कुछ नेता देश और धर्म को बॉंट रहे है। आज इन नेताओं की मानसिकता बन गई है कि बन गई है कि इस देश में उसी का राज है। आज इन अर्धमियों के आगे अपना देश और सविंधान नतमस्तक  हो गया है। आखिर ये देश और देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहते है ? 

आज जिस प्रकार महाराष्ट्र में राज ठाकरे द्वारा कुराज किया जा रहा है, वह देश बॉंटने वाला है। आज ये क्षेत्रवाद के नाम पर देश को बॉट रहे है। वह देश की संस्‍कृतिक विरासत के लिये खतरा है। अगर इसी प्रकार क्षेत्रवाद के नाम पर राष्‍ट्र को बॉंटा जायेगा तो देश का बंटाधार तो तय है। भारत को उसकी विविधा के कारण जाना जाता है। पर इस विवि‍धा वाले देश को मराठा और तमिल के नाम पर कुछ क्षेत्रिय नेता आपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे है। ये नेता क्यो भूल जाते है कि जो क्षेत्रवाद की राजनीति करते है। वे भूल जाते है कि वे जिस मराठा मनुष की बात करते है वही के मराठा मानुष भारत के अन्य राज्यों में भी रहते है। अगर उनके हितो को नुकसान पहुँचाया जायेगा तो कैसा लगेगा ? 

आज कल सपा नेताओं को भी चुनाव आते ही मुस्लित हितो का तेजी से ध्‍यान आने लगा है। जिनते आंतकवादी मिल रहे है सपा उन्हे अपना घरजमाई और दमाद बना ले रही है। अमर सिंह की तो हर आंतकवादी से रिस्‍ते दारी निकल रही है। तभी देश की रक्षा करते हुये शहीदो से ज्‍यादा सपा और उसके नेताओं को अपने घर जामईयों की ज्‍यादा याद आ रही है।

यह देश आज आत्‍मघातियों से जूझ रहा है, जो क्षण क्षण देश को तोड़ रहे है। भगवान राजठाकरे को, और अल्लाह मियॉं अमर सिंह को सद्बुद्धि दे की ये देश के बारे कुछ अच्छा सोचे और देश के विकास में सहयोग करें। इसी में सबका भला है। 
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आतंकवादियों को कानूनी मदद चाहिये तैयार है आप

बधाई हो अर्जुन सिंह जी कुछ आतंकवादि और आने बाले हैं जिसका आप कानून के द्वारा बचाव कर सकते हो। दिल्ली में कल सिर्फ एक ही विस्फोट किया गया। और 10-12 आदमी फिर मारे गये। शायद सभी मजदुर थे और सिमी के ब्लाइन्ड सर्पोटर लालू यादव और रामविलास पासवान के गृह राज्य बिहार के रहने वाले थे। मुझे मेरे एक मित्र मुम्बई से फोन करके बताया कि दिल्ली में फिर से विस्फोट हुआ है। जब से मैं सुना टी.वी खोल कर बैठ गया अलग अलग समाचार चैनल पर नजर गडा़ कर देखने लगा कि आज शिवराज पाटिल जी किस तरह का ड्रेस पहन कर आते हैं और देखना चाहता था कि और कितना जगह विस्फोट हुआ है लेकिन भगवान का शुक्र है कि इस बार सिर्फ एक जगह विस्फोट हुआ। धन्यवाद तो सही में सिर्फ भगवान को देना चाहिये जिसके कारण विस्फोट का संख्या कम रहा और आदमी भी कम मरे सरकार तो आतंकवादियों का अभी तक कुछ कर नही सकी । सरकार की तरफ से अभी तक व्यान सुनने को नही मिला। शायद एक धमाका हो इस लिये शिवराज पाटिल जी ने नया कपडा पहन कर कोइ व्यान देना या फिर जरुरी नही समझा होगा क्या एक विस्फोट में व्यान दिया जाय या फिर उनके पास नया कपडा नही होगा जिसको पहन कर मिडीया के सामने आते। वैसे श्री शिवराज पाटिल जी को मिडीया के सामने आने का जरुरत भी नही है क्यों कि उनके द्वरा दिया जाने बाला व्यान लगभग सभी आदमी को याद हो गया होगा। इधर खुश तो श्री अर्जुन सिंह जी भी होगें। पुलिस बाले कुछ आतंकवादियों को जरुर पकरेंगे। और आतंकवादियों को संरक्षण का और कानूनी लडाई लड़ने के जरुरत भी होगा तो आतंकवादियों को कानूनी लडाई लडनें में मानवसंसाधन मंत्रालय किस दिन काम आयेगा आखिर आतंकवादि भी मानव ही होते है और लेकिन मरने बाले क्या होते हैं शायद किसी को पता नही...................................
अब पुलिस बाले क्या करेंगे|पुलिस क्या करेंगे इंस्पेक्टर श्री मोहन चंद्र शर्मा कि तरह अपना जान देकर आतंकवादियों को पकरें या फिर घर में आराम से सोयें। आराम से सोना ज्यादा फायदेंमन्द है। अगर कोई पुलिस आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में मारा गया तो क्या होगा बेचारा गया इस संसार उसका बीबी - बच्चे अनाथ और मुआबजा के लिये सालों सरकारी दफ्तर के चक्कर काटना परेगा वो अलग से। उन्हें ना कोई मुआवजा मिलेगा और ही उनका नाम लेने बाला और तो और पुलिस का कोई मानवाधिकार संघटन भी नही है जो पुलिस बालों के अनाथ भुखे बच्चों को किसी तरह का कोई मदद दिला सकें। अब हमें क्या करना है सोचों।
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काग्रेस आतंकवादियों के नये संरक्षक

काग्रेस गलियारे में एक नया तमाशा देखने को मिल रहा है । बटला हाउस इलाके में 19 सितंबर को आतंकवादियों से मुठभेड़ हुआ था । फैशन मैन श्री शिवराज पाटिल जी ने दुख: से या बेमन में ही सही लेकिनी आतंकवादियोंको सबक सिखाने की बात कह दिये जैसा कि वो करना नही चाहतें है। (कपडा बदलने से फुर्सत मिले तभी तो करेंगे)। लेकिन हमारी तरह मुर्ख जनता को मुह दिखाना है और अभी लगता है एक-दो बार और चुनाव लडना है इस लिये कभी-कभी आतंकवादियों के विरुद्ध बोल देतें है। आतंकवादियों के खिलाफ बोलना या आतकवादिंयो के खिलाफ किसी तरह का कारवाही करना कांग्रेस धर्म के खिलाफ है। इस लिये आतंकवादियों के बचाब में एक मंत्रालय और दो मंत्री बीच में कुद गये। मुस्लिम मानव संसाधन मत्री श्री अर्जुन सिंह जी का मंत्रालय और खुद श्री अर्जुन सिह जी आतंकवादियों के
बचाब में जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीर उल हसन के साथ ताल ठोकते हुये मैदान में कुद गये।


आज हिन्दुस्तान की स्थिती इस कदर खराब हो चुका है कि आतंकवाद से लोहा लेने बाले पुलिस के लिये सरकार के पास पैसा नही और सहानुभूति के दो शब्द नही है और आतंकवाद को सहायता और सर्मथन देने बालों की होड़ लगी हुइ है। जब १९ सितम्बर को दिल्ली के ओखला स्थीत बाटला हाउस में पुलिस तथा राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड आतंकवादियों के छुपने के एक ठिकाने पर छापा मार कर दो आतंकवादियों को मार गिराया और सैफ़ नामक एक आतंकवादी को जीवित गिरफ्तार कर लिया गया जबकि दो आतंकवादी भागने में सफल हो गये थे। शुक्रवार के दिन हई इस मुठभेड़ में स्थानीय मुस्लिम बाहुल्य आबादी में कुछ लोग ऐसे भी थे जो इस मुठभेड़ को फ़र्जी तथा मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने वाली मुठभेड़ बताने की कोशिशें कर रहे थे जबकि अनेकों मुसलमान व आम दर्शक ऐसे भी थे जिन्होंने इस मुठभेड़ को अपनी आंखों से देखा।
काग्रेस सरकार पहले से आतंकवाद को रोकने का मद्दा दिखाई नही देता था। तर्क वितर्क से द्वारा आतंकवाद निरोधक कानून को हटाया गया और कोई नया कानून नही बनाना आतंकवाद का मौन सर्मथन था। लेकिन काग्रेस सरकार के दो मंत्री अब खुल कर आतंकवाद के सर्मथन में आ गये। और काग्रेस के और किसी नेता और मंत्री द्वारा इस बात का विरोध ना करना भी आतंकवाद का ही सर्मथन माना जायेगा।

अब सरकार को ये बताना होगा कि आतंकवाद के सर्मथन में तो सरकार खडी़ है जो गिरफ्तार किये गये आतंकवादियों का कानूनी सहायता प्रदान करेगी। लेकिन गिरफ्तार किये गये आतंकवादियों के खिलाफ क्या गृहमंत्रालय ईमान्दारी से कानूनी लडा़इ लडे़गा शायद नही। काग्रेस के द्वारा उठाये गये हर एक देश विरोधी गतीविधी आज इस देशा के लिये नासुर बन बैठा है चाहे वो काश्मिर का मामला हो, आतंकवाद तुस्टिकरण, बाग्लादेशी घुसपैठी का मामला। काग्रेस सरकार किसी भी तरह सत्ता में जोंक की तरह चिपकी रहती है और जोंक की ही तरह जिसमें चिपकता है उसी का खुन भी चुसता है काग्रेस का भी यही हाल सत्ता के लिये काग्रेस कीसी भी हद्द तक नीचे गिर सकता है। लेकिन आम जनता चुनाव के वक्त काग्रेस से एक एक बात का हिसाब जानना चाहेगी कि दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के परिवार को देने के लिये सरकार के पास पैसा नही लेकिन आतंकवादियों को संरक्षण और
बढावा देने के लिये सरकार के पास कहा से इतना पैसा आ जाता है।
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जयपुर विस्फोट उत्तरदायी कौन

भारत का एक और सुन्दर व अपेक्षाकृत शांत समझा जाने वाले जयपुर शहर आतंकवादियों का निशाना बना। आज सायंकाल कोई सात बजकर 15 मिनट पर बम विस्फोटों की श्रृंखला आरम्भ हुई और 20 मिनट के अन्दर कुल 8 विस्फोट हुए। इन विस्फोटकों को नयी साइकिलों पर रखा गया था। आरम्भ में तो इस सम्बन्ध में अलग-अलग समाचार आ रहे थे और विभिन्न समाचार चैनलों द्वारा कहा गया कि विस्फोटकों को रिक्शे और होण्डा सिटी कार में भी रखा गया था। बाद में राज्य के गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने विभिन्न टीवी चैनलों को स्पष्ट किया कि विस्फोटक नयी साइकिलों पर ही रखे गये थे। इन विस्फोटों के लिये शहर के व्यस्ततम क्षेत्रों को चुना गया था। परंतु विस्फोटों के सम्बन्ध में चर्चा करते समय एक तथ्य को यथासम्भव दूर रखने का प्रयास विभिन्न टीवी चैनलों ने किया और वह यह कि विस्फोटों का निशाना एक बार फिर हनुमान मन्दिर को बनाया गया और विस्फोट के लिये दिन भी एक बार फिर मंगलवार का चुना गया। इससे पूर्व 2006 मार्च में जब वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मन्दिर संकटमोचन मन्दिर को आतंकवादियों ने निशाना बनाया था तो भी मंगलवार के दिन को चुना गया था। आखिर साम्य का कारण क्या है और इस तथ्य से बचने का प्रयास क्योंकर हो रहा है। मंगलवार के दिन अधिकाँश हिन्दू हनुमान जी को प्रसाद चढाने और उनका प्रसाद लेने मन्दिर में जाते हैं। इस दिन को निशाना बनाकर आतंकवादी कुछ संकेत देना चाहते हैं परंतु हम उस संकेत को समझने के स्थान पर उससे बचने का प्रयास कर रहे हैं।


इसी प्रकार जयपुर में हुए विस्फोट के बाद सरकार और विपक्ष की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया भी अपेक्षित ढंग से ही रही है। एक ओर केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री ने शांति बनाये रखने की अपील करते हुए घटना की निन्दा की है तो विपक्षी दल भाजपा ने वर्तमान केन्द्र सरकार की आतंकवाद के प्रति नरम नीति को इस विस्फोट का उत्तरदायी ठहराया है। कुछ हद तक यह बात ठीक है पर समस्या का मूल इससे भी कहीं अधिक व्यापक है जिसके सम्बन्द्ध में चर्चा करने का साहस भाजपा में भी नहीं है।

भारत का इस्लामी आतंकवाद नामक चीज से पहली बार पाला 1989 में पडा था जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद ने कश्मीर को भारत से स्वतंत्र कराने के अभियान से व्यापक वैश्विक जिहाद का स्वरूप ग्रहण कर लिया था और वहीं से जिहाद के नाम पर इस्लामी आतंकवाद का आधारभूत संगठन अस्तित्व में आने लगा। 1989 में जब इस्लामी आतंकवाद अपना विस्तार कर रहा था और जिहाद के नाम पर अफगानिस्तान में रूस के विरुद्ध लडने वाले लडाके भारत में कश्मीर को भी इस्लामी राज्य बनाने के संकल्प के साथ कश्मीर में जिहाद आरम्भ कर रहे थे तो भारत में इस समस्या को पूरी तरह दूसरे सन्दर्भ में देखा जा रहा था। इस समस्या को कश्मीर की जनता की बेरोजगारी और कुछ नवयुवकों के भटकाव से जोडकर देखा जा रहा था। अपनी पीठों पर एके 47 लादे अल्लाहो अकबर का नारा लगाने वाले नवयुवक भारत के राजनेताओं को बेरोजगारी और भटकाव का परिणाम दिखाई दे रहे थे। ऐसा नहीं है कि उस समय स्थिति को समझा नहीं जा रहा था परंतु समस्या के वास्तविक स्वरूप से जनता को अनभिज्ञ रखा जा रहा था।

1989 के ये बेरोजगार और भटके हुए नवयुवक कब कश्मीर की सीमाओं से बाहर आ गये और शापिंग काम्प्लेक्स और हिन्दुओं के मन्दिरों को निशाना बनाने लगे पता भी नहीं चला। 1990 के दशक में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया कि जिस विषय को हमारे राजनेता और बुद्धिजीवी केवल कश्मीर की सीमाओं तक सीमित मान रहे थे वह कश्मीर की सीमाओं तक सीमित न रह सका और यह जिहाद एक वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर भारत में हिन्दुओं को निशाना बनाने लगा।

इसके कारण में यदि हम जायें तो हमें कुछ कारण दिखाई पडते हैं। फरवरी 1998 को ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में इण्टरनेशनल इस्लामिक फ्रण्ट की ओर से पहली बार यहूदियों और ईसाइयों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान विश्व भर के मुसलमानों से किया गया था। जिहाद के इस आह्वान के बाद विश्व में अल कायदा द्वारा स्वयं और उसके फ्रण्ट में सम्मिलित विभिन्न इस्लामी आतंकवादी संगठनों की ओर से पश्चिमी देशों और यहूदियों को निशाना बनाया जाने लगा। 1998 में जिहाद के इस वैश्विक आह्वान के बाद भारत स्थित इस्लामी अतिवादी संगठनों में इसे लेकर उहापोह की स्थिति रही और लगभग तीन वर्षों तक अर्थात 11 सितम्बर 2001 तक भारत स्थित आतंकवादी संगठन कश्मीर केन्द्रित होने के कारण अमेरिका और ब्रिटेन के विरुद्ध खडे अल कायदा का साथ देना नहीं चाह्ते थे। 11 सितम्बर 2001 के बाद विश्व स्तर पर जिहाद की परिभाषा पूरी तरह बदल गयी और विश्व में स्थानीय आधार पर विभिन्न देशों में अलग इस्लामी राज्य के लिये उग्रवाद के रास्ते पर चल रहे इन संगठनों ने विश्व स्तर पर खिलाफत और शरियत व कुरान आधारित विश्व की संस्थापना का उद्देश्य अपना लिया नये। परिवेश में अल कायदा उन सभी संगठनों को एक छतरी के नीचे लाने में सफल रहा जो विभिन्न देशों में अलग इस्लामी राज्य के लिये संघर्ष कर रहे थे फिर वह फिलीपींस, दक्षिणी थाईलैण्ड, कश्मीर, चेचन्या या विश्व के अन्य भाग हों। इन सभी अलगाववादी उग्रवादी आन्दोलनों ने स्थानीय स्तर पर अलग इस्लामी राज्य की स्थापना के स्थान पर विश्व स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था निर्माण को अपना लक्ष्य बना लिया जो कुरान और शरियत पर आधारित हो। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये जिहाद को भी व्यापक रूप दिया गया और एक उद्देश्य से कार्य करने वाले विभिन्न संगठन विभिन्न देशों में सक्रिय हो गये।


पिछ्ले 50 से अधिक वर्षों से इस्लामी आतंकवाद की त्रासदी झेल रहे मध्य पूर्व से इस समस्या का गुरुत्व केन्द्र दक्षिण एशिया की ओर आ गया। यदि 2001 के बाद दक्षिण एशिया की ओर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि इस उप महाद्वीप में इस्लामी आतंकवाद की दशा और दिशा दोनों में व्यापक परिवर्तन आया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत में इस्लामी आतंकवादी संगठन सशक्त हुए हैं और इन सभी देशों में कार्यरत इस्लामी संगठन कहीं अधिक कट्टरता से शरियत आधारित विश्व व्यवस्था के निर्माण के लक्ष्य की ओर उद्यत हैं। भारत में सिमी, पाकिस्तान में लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद तथा बांग्लादेश में हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी ऐसे संगठन हैं जो स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि इनका उद्देश्य कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है। ये संगठन अपने देशों की व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं और प्रशासन के लिये सिरदर्द बन चुके हैं।

आज जिहादवाद एक खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है जहाँ विश्व के अनेक कट्टर इस्लामी आतंकवादी संगठन केन्द्रीय रूप से न सही तो भी वैचारिक आधार पर अल कायदा से अवश्य जुड गये हैं और ये सभी संगठन अपनी स्थानीय इकाइयों के सहारे आतंकवाद की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। वास्तव में मूल समस्या यही है कि जिसे कानून व्यवस्था की समस्या माना जा रहा है वह सभ्यता और बर्बरता का संघर्ष है। ये बर्बर शक्तियाँ यदि पूरी तरह इस्लामी शक्तियाँ नहीं हैं तो भी इस्लाम धर्म से प्रेरणा ग्रहण कर रही हैं और इस्लामी धर्मगुरु और बुद्धिजीवी इस सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि वे इस इस्लामवादी आन्दोलन के साथ है या नहीं जो विश्व व्यवस्था बदलने के लिये हिंसा का सहारा ले रहा है।

वैसे तो पिछ्ले कुछ महीनों पहले उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध इस्लामी मदरसा दारूल-उलूम-देवबन्द ने एक बडा सम्मेलन आयोजित कर इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद से इस्लाम को असम्पृक्त करने का प्रयास किया परंतु उस सम्मेलन में कुछ प्रश्नों को अनछुआ ही रहने दिया कि कुरान और शरियत के आधार पर विश्व व्यवस्था के निर्माण को लेकर उन लोगों का दृष्टिकोण क्या है? भारत में सक्रिय उन इस्लामी आतंकवादी संगठनों को लेकर उनका दृष्टिकोण क्या है जिनका उद्देश्य कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है और इसके लिये वे हिंसा का सहारा ले रहे हैं और ऐसे संगठन में सर्वप्रथम नाम सिमी का आता है। इसके साथ ही ऐसे सम्मेलनों की नीयत पर बडा सवाल तब खडा हुआ जब इस सम्म्मेलन में सुरक्षा एजेंसियों और सरकार को निशाना बनाते हुए कहा गया कि आतंकवाद के नाम पर मदरसों और बेगुनाह मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे प्रस्तावों से स्पष्ट है कि पहले से ही मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त सरकारों और राजनीतिक दलों के ऊपर इस बात के लिये मनोवैज्ञानिक दबाव डालना कि वे समस्या के पीछे के मूल तत्वों पर विचार न करें और प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव डालें कि वे आतंकवाद को देश में सहयोग देने वाले तत्वों को खुली छूट दें। निश्चित रूप से इस्लामी धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों की यह रणनीति सफल रही है और मार्च माह में सिमी के अनेक बडे आतंकवादियों की गिरफ्तारी और मध्यप्रदेश के एक गाँव में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर होने के खुलासे के बाद कुछ ही महीनों में जयपुर में हुआ विस्फोट प्रमाणित करता है कि देश में सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव है और इसी का परिणाम है कि इस विस्फोट का कोई सुराग खुफिया एजेंसियों के पास भी नहीं था।

जयपुर में विस्फोट होने के बाद केन्द्र और राज्य सरकारें खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों को दोष दे रही हैं इससे स्पष्ट है कि साँप गुजरने के बाद लाठी पीटने का खिसियाहट भरा खेल खेला जा रहा है। जब खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव बना कर उनका मनोबल कमजोर किया जा रहा है तो क्या अपेक्षा की जानी चाहिये कि ऐसी घटनाओं पर वे रोक लगा सकेंगे। 2001 में देश में सिमी पर प्रतिबन्ध लगाया गया था और उसके बाद इस संगठन का विस्तार देश के अनेक राज्यों में हुआ है। यह तथ्य इस बात तो पुष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि यह प्रतिबन्ध बिलकुल अप्रभावी है। प्रतिबन्ध के बाद भी इस संगठन का फलना फूलना और पिछ्ले दो वर्षों मे प्रायः सभी बडी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देना इस बात को प्रमाणित करता है कि सरकारें इस्लामी आतंकवाद के इस्लामी स्वरूप के कारण इससे निपटने में हिचक रही हैं और इस समस्या के मूल में स्थित विचारधारा के बारे में देश में कोई बहस न होने से इस्लामी धर्मगुरु और बुद्धिजीवी लोगों का ध्यान हटाने में सफल हो रहे हैं जिसका सीधा लाभ ये इस्लामी संगठन अपने संगठन और प्रसार के लिये उठा रहे हैं।


पिछ्ले सात- आठ वर्षों में इस्लामी आतंकवादियों ने एक से एक दुस्साहसिक घटनाओं को अंजाम दिया है परंतु उसका प्रतिरोध या उनकी पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये। 1999-2000 में इस्लामी आतंकवादियों ने कुछ खूँखार आतंकवादियों को छुडाने के उद्देश्य से भारत के एक विमान का अपहरण किया और भारत सरकार को इन आतंकवादियों के आगे झुकने को विवश होना पडा। आज इस घटना के आठ वर्षों बाद भी सरकार ने कुछ नहीं सीखा है और 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण के लिये मृत्युदण्ड प्राप्त आतंकवादी मोहम्मद अफजल को क्षमादान के प्रयासों के तहत जेल में सुरक्षित रखा है। सरकार के ऐसे निर्णय न केवल आतंकवादियों के मनोबल को बढाते हैं वरन उनके समक्ष भारत को एक आतंकवाद समर्थक राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करते है जो अपनी गलतियों से कोई शिक्षा ग्रहण नहीं करता।

भारत में अनेक प्रमुख पत्रकार और बुध्दिजीवी इस बात के लिये भारत की प्रशंसा करते नहीं थकते कि इस देश में आतंकवाद की समस्या को पश्चिम से भिन्न स्वरूप में लिया गया है और उसके प्रति दृष्टिकोण भी पश्चिम से भिन्न है। उनका संकेत इस बात की ओर रहता है कि जहाँ पश्चिम में आतंकवाद के बाद इस्लाम धर्म और मुसलमानों के प्रति एक विशेष प्रकार का भाव व्याप्त हुआ है उससे भारत बिलकुल मुक्त है। यह स्थिति कुछ मात्रा में प्रशंसनीय हो सकती है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पश्चिम की सरकार और वहाँ के समाज ने जिस प्रकार इस समस्या को गम्भीरता से लिया है और उस पर चिंतन आरम्भ किया है उसी का परिणाम है कि अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, एक-एक बडे आक्रमण का सामना करने के उपरांत अनेक वर्षों से किसी भी आक्रमण को रोकने में सफल रहे हैं। इसके विपरीत भारत में औसतन प्रत्येक तीसरे चौथे माह बडा आतंकवादी आक्रमण होता है जिसमें 20 से 25 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। आज हमें इस बारे में गम्भीरता से विचार करना होगा कि पश्चिम का इस सम्बन्ध में आत्मरक्षा की सतर्कता अच्छी है या हमारी आक्रमण सहन करने की उदारता। अब वह समय आ गया है कि इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी विचारधारा, इसके सहयोगियों और इसका पोषण करने वालों के सम्बन्ध में हम खुलकर विचार करें। वास्तव में यह एक युद्ध की घोषणा है और अब हमें अपने शत्रुओं को पहचान लेना चाहिये।
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सिमी का फैलता जाल

सिमी का फैलता जाल

प्रतिबन्धित इस्लामी संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया या संक्षिप्त रूप में जिसे सिमी के नाम से जाना जाता है अब खुफिया एजेंसियों के लिये काफी बडा सिरदर्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार सिमी ऐसा पहला आतंकवादी संगठन है जिसने देश के अन्दर बडे पैमाने पर देशी आतंकवादियों का नेटवर्क खडा कर लिया है और इन खुफिया एजेंसियों का यह भी मानना है कि यह देश में कार्यरत अनेक मुस्लिम चरमपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम ही नहीं कर रहा है वरन उनके साथ मिलकर नेटवर्क को और अधिक व्यापक बना रहा है। यह खुलासा मार्च के महीने में इन्दौर से पकडे गये सिमी के 13 सदस्यों में से एक अमील परवेज के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान हुआ। परवेज ने बताया कि सिमी हैदराबाद स्थित चरमपंथी इस्लामी संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत के साथ के साथ काफी निकट से सम्बद्ध है और इसके साथ मिलकर काम कर रहा है।पूछ्ताछ के दौरान इस रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि इस्लामी संगठन मिलकर काम कर रहे हैं और इनका विशेषकर सिमी का व्यापक नेटवर्क देश भर में स्थापित हो चुका है। पुलिस से पूछ्ताछ के दौरान अमील परवेज ने बताया कि दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने उसे मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिये बुलाया था। इसके बाद पुलिस इस कोण पर भी जाँच कर रही है कि सिमी के देश भर में ऐसे कितने इस्लामी संगठनों के साथ सम्बन्ध हैं। पुलिस की इस बात को स्वीकार कर रही है कि यह तो एक शुरूआत भर है और ऐसे कितने ही रहस्य अभी आगे खुलने शेष हैं।
इससे पूर्व भी हैदराबाद में दर्सगाह की गतिविधियों के बारे में और इसके उग्र स्वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला था जब गुजरात के पूर्व मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या के आरोपी मौलाना नसीरुद्दीन को पुलिस ने पकडा तो दर्सगाह के सदस्यों ने पुलिस पर पथराव कर उसे पुलिस की पकड से छुडाने का प्रयास किया और जबरन पुलिस की गाडी से उसे ले जाने का प्रयास करने लगे। इस घटना के उपरांत पुलिस ने जब भीड को तितर बितर करने के लिये गोली चलाई तो दर्सगाह का कार्यकर्ता मुजाहिद सलीम इस्लाही गोलीबारी में मारा गया।.

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त ने भी स्वीकार किया कि वे इस संगठन के बारे में जानते हैं और सम्भव है कि सिमी के कुछ पूर्व सदस्य इस संगठन से सम्बद्ध हों। दर्सगाह के सम्बन्ध में उसकी वेबसाइट www.djsindia.org से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसकी वेबसाइट के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम युवकों को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना और इस हेतु उन्हें प्रशिक्षण देना जो कि सशस्त्र भी हो सकता है। इस संगठन के अनुसार उसका प्रमुख उद्देश्य हिजाब के सिद्धांत को सख्ती से लागू कराना, शरियत, मस्जिद और कुरान की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करना, इस्लामी सुधार के लिये मार्ग प्रशस्त करना और अंत में इसके उद्देश्य में कहा गया है कि अल्लाह और इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना। लेकिन जिस बात ने खुफिया एजेंसियों को इस संगठन के सम्बन्ध में सर्वाधिक सतर्क किया है वह है इसके प्रशिक्षण की एक व्यवस्था जिसके अंतर्गत हैदराबाद के बाहरी क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट लोगों को छांटकर प्रशिक्षण दिया जाता है। परवेज ने पुलिस को बताया कि उसने 2007 में दो प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया था और इन शिविरों में अनेक कठिन प्रशिक्षण दिये गये जिनमें चाकू छूरी चलाने से लेकर पेट्रोल बम बनाने तक का प्रशिक्षण था। इस वेबसाइट ने एक किशोर का चित्र भी लगा रखा था जिसके हाथ में एक पट्टिका थी जिस पर लिखा था “ कुरान हमारा संविधान है और मैं उसका सिपाही” परंतु कुछ समाचार पत्रों में इसके बारे में समाचार प्रकाशित होने के बाद फिलहाल इस चित्र को वहाँ से हटा दिया गया है।

पुलिस से पूछ्ताछ में जब सिमी और दर्सगाह के परस्पर सम्बन्धों की बात निकली तो दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने सिमी के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्धों से तो इंकार किया और कहा कि उनके संगठन के अन्य किसी संगठन से सम्बन्ध नहीं है परंतु यह माना कि देश भर में उनके 10-12 केन्द्र हैं और कौन कहाँ प्रशिक्षण प्राप्त करता है इसका रिकार्ड रखना सम्भव नहीं है। परवेज ने पूछ्ताछ में बताया कि प्रशिक्षण के दौरान शिविर के प्रभारी सफदर और कमरुद्दीन ने उसे बताया था कि यह आरम्भिक प्रशिक्षण है और इसके बाद जो लोग छांटे जायेंगे उन्हें पुनः प्रशिक्षित किया जायेगा। .
परवेज की पूछ्ताछ में सिमी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस्लामी संगठनों से सम्पर्क की बात सामने आयी है 1997 में अलीगढ में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिमी के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही ने की थी और उस सम्मेलन में परवेज के साथ 20 वर्षीय फिलीस्तीनी मूल के हमास नामक फिलीस्तीनी आतंकवादी संगठन के सदस्य शेख सियाम ने भी भाग लिया था। परवेज ने पूछ्ताछ के दौरान यह भी स्पष्ट किया है कि 2001 में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लग जाने के बाद भी किस प्रकार यह सक्रिय रहा और अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा। परवेज के अनुसार काफी सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सफदर नागौरी और नोमन बद्र ने इस संगठन को नये सिरे से खडा किया। परवेज के अनुसार नगौरी ने उससे कहा कि वह प्रतिबन्ध हटवाने का पूरा प्रयत्न करेगा और इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देगा।

पिछ्ले महीने मध्य प्रदेश में इन्दौर में पकडे गये सिमी के सदस्यों ने देश के समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं। 2001 में प्रतिबन्ध लगने के बाद भी यह संगठन कभी निष्क्रिय नहीं हुआ और पिछ्ले दो तीन वर्षों में देश में हुई बडी आतंकवादी घटनाओं में इसका हाथ रहा है या इसी संगठन ने उन्हें अंजाम दिया है। इस संगठन की सक्रियता के मूल कारण पर जब हम विचार करते हैं तो हमें कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से दिखायी पडते हैं एक तो हमारे राजनीतिक दलों द्वारा इस्लामी आतंकवाद के मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखना और दूसरा इस्लामी धार्मिक नेतृत्व या बुध्दिजीवियों द्वारा आतंकवाद को हतोत्साहित करने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को प्रोत्साहित कर सरकार, राज्य, प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को कटघरे में खडा कर इस्लामी प्रतिरोध की शक्तियों को कुण्ठित करना।

2001 में जब तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने सिमी पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया तो उस समय विपक्ष की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने इसकी आलोचना की और उनका साथ उनके ही दल की सदस्या अम्बिका सोनी ने दिया। फिर जब सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली यू.पी.ए की सरकार केन्द्र में बनी तो इस सरकार ने भी सिमी पर प्रतिबन्ध को जारी रखा। यह उदाहरण संकेत करता है कि आतंकवाद जैसे मह्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बन पायी है और इसे भी राजनीतिक मोल तोल के हिसाब से देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के इस रवैये का सीधा असर सुरक्षा एजेंसियों पर पड्ता है जो तमाम जानकारियों और प्रमाणों के बाद भी आरोपियों पर कार्रवायी करने में हिचकती हैं या उन्हें कार्रवायी धीरे धीरे करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों ही दशाओं में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वालों का मनोबल बढता है और वे अवसर पाकर अपनी ताकत और अपना नेटवर्क बढा लेते हैं।

प्रतिबन्ध के बाद भी सिमी का इस मात्रा में सक्रिय रहना और ताकतवर रहना एक और मह्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख ऊपर भी किया गया है कि इस्लामी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीविओं की भूमिका इस सम्बन्ध में सन्दिग्ध है। अभी कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित प्रमुख इस्लामी संस्थान दारूल- उलूम – देवबन्द ने आतंकवाद के सम्बन्ध में एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उस सम्मेलन के द्वारा इस्लाम और आतंकवाद के मध्य किसी भी सम्बन्ध से इन्कार किया तो भी जैसे प्रस्ताव वहाँ पारित हुए उनमें राज्य, प्रशासन, पुलिस को ही निशाना बनाया गया और पूरे प्रस्ताव में सिमी जैसे संगठनों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोला गया। पिछ्ले लेख में भी लोकमंच में इस बात को उठाया गया था कि एक ओर तो आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सिमी का नेटवर्क फैलता जा रहा है। यहाँ तक कि सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि सिमी का नेटवर्क दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के अनेक प्रांतों में फैल चुका है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि ऐसे संगठनों को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव है। सरकार जिसका नेतृत्व राजनीतिक दल कर रहे है उनमें ऐसे तत्वों को रोकने की शक्ति नहीं है क्योंकि उनके लिये मुस्लिम वोट अधिक महत्व रखते हैं और इस्लामी धर्मगुरूओं या बुद्धिजीवियों में इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे तत्वों को रोकने की इच्छा नहीं है क्योंकि यदि उनमें ऐसी इच्छा होती तो वे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को सशक्त बनाकर या खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को निशाने पर लेकर इस्लामी आतंकवादियों को बचने का रास्ता नहीं प्रदान करते।

देश भर में सिमी के फैलते जाल ने हमारे समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं जिनके प्रकाश में इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यह समस्या एक विचारधारा से जुडी है और उस विचारधारा की तह तक जाना होगा। इस समस्या को बेरोजगारी या अल्पसंख्यकों के देश की मुख्यधारा से अलग थलग रहने जैसे सतही निष्कर्षों से बाहर निकल कर पूरी समग्रता में लेने की आवश्यकता है। उन तथ्यों का पता लगाने की आवश्यकता है कि इस्लामी धर्मगुरु और बुध्दिजीवी आखिर क्योंकर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों के विरुद्ध मुखर होकर उन्हें इस्लाम विरोधी घोषित नहीं करते।
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फतवा और आतंकवाद साथ- साथ

पिछ्ले दिनों जब उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी संस्था दारूल उलूम देवबन्द ने आतंकवाद की भर्त्सना करने जैसा दिखने वाला एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उसमें आतंकवाद और इस्लाम के मध्य परस्पर किसी भी सम्बन्ध से इंकार करते हुए भी अनेक ऐसी बातें कहीं जो इन मौलवियों या इस्लामी धर्मगुरुओं की नीयत पर प्रश्न खडा करने के लिये पर्याप्त था। इन बातों में सबसे प्रमुख बात यह थी कि आतंकवाद के नाम पर सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ निर्दोष मुसलमानों को निशाना बना रही हैं और उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है। इसी क्रम में इस सम्मेलन में कहा गया कि मदरसों को भी नाहक परेशान किया जा रहा है। इस उलेमा सम्मेलन की काफी चर्चा हुई और अनेक लोगों ने इसे अत्यंत सकारात्मक पहल घोषित किया। भारतीय जनता पार्टी के नेता और एक प्रमुख हिन्दी दैनिक में वरिष्ठ स्तम्भकार ने तो इस सम्मेलन को नरमपंथी इस्लाम के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम की सन्ज्ञा तक दे डाली तो वहीं कुछ अन्य लेखकों ने इस मामले पर काफी सधी टिप्पणी की।

इस विषय पर लोकमंच में प्रकाशित किये गये आलेख में उलेमा सम्मेलन को लेकर कुछ प्रश्न खडे किये गये थे और इस सम्मेलन के प्रस्तावों और इसमें हुई चर्चा के आधार पर आशंका प्रकट की गयी थी कि ऐसे प्रयास एक सोची समझी रणनीति का अंग हैं जिसका प्रमुख उद्देश्य समाज में इस्लामवाद के प्रतिरोध की शक्ति को कुन्द करना है और इस पूरी बहस में आतंकवाद की प्रेरणास्रोत विचारधारा पर चर्चा होने से रोकना है। यह विषय इस समय फिर से लाने के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।

मार्च महीने से लेकर इस अप्रैल महीने तक भारत में अनेक इस्लामी आतंकवादी नेटवर्क या आतंकवादी गिरफ्तार किये गये हैं। इसमें सबसे उल्लेखनीय गिरफ्तारी सिमी के सदस्यों की है। मार्च के महीने में इन्दौर में सिमी के कुछ सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद एक के बाद एक राज खुलते गये और अंततोगत्वा मध्य प्रदेश के एक क्षेत्र चोरल में सिमी के आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर का भी पता चला और यह भी पता लगा कि यहाँ छोटे बच्चों को भी सशस्त्र प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था और उन बच्चों को शिविर में देखभाल के लिये महिलाओं का एक बल शाहीन बल के नाम से गठित गिया गया था। सिमी के पकडे गये सदस्यों में इस संगठन का मुखिया सफदर नागौरी भी शामिल है जिसका 11 जुलाई को मुम्बई के ट्रेन धमाकों के सिलसिले में मुम्बई के सिमी को जेल से पत्र लिखने का मामला भी काफी चर्चा में आया और इससे इन धमाकों में सिमी के लिप्त होने की पुष्टि भी हो गयी। मध्य प्रदेश से ही पकडे गये सिमी के सद्स्यों से पता चला कि हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए धमाकों के तार भी सिमी से जुडे हैं।

पिछ्ले वर्ष कर्नाटक में आतंकवादी प्रशिक्षण होने का समाचार एक चौंकाने वाली घटना थी और अब मध्य प्रदेश में ऐसे शिविर के मिलने से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि भारत में आतंकवाद का आधारभूत ढाँचा अब निर्णायक स्थिति में पहुँच गया है और इस सम्स्या पर समग्रता से विचार करने की आवश्यकता है। समग्रता से तात्पर्य है कि इस समस्या के पीछे के विचारधारागत स्रोत को पहचानने की आवश्यकता है। क्या इस सम्बन्ध में सार्थक प्रयास हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश इसका उत्तर नकारात्मक है। ऐसा इसलिये है कि भारत में बहुत कम संख्या में लोग ऐसे हैं जो इस समस्या को कानून व्यवस्था से परे कहीं अधिक व्यापक सन्दर्भ में देखना चाह्ते हैं। यह बात सत्य है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद को पूरी तरह इस्लाम धर्म से नहीं जोडा जा सकता परंतु यह भी सत्य है कि इसके पीछे की प्रेरणास्रोत विचारधारा पूरी तरह इस्लाम से प्रेरणा ग्रहण करती है और इसका उद्देश्य भले ही विश्व में शक्ति के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना और विश्व का संचालन शरियत या इस्लामी कानून के आधार पर सुनिश्चित करना हो इस राजनीतिक इस्लाम की अवधारणा से इस्लामी धर्म के विद्वान और धर्मगुरु भी असहमत नहीं दिखते। यही विषय सर्वाधिक चिंता का कारण है और इसी कारण अंतर्धार्मिक बह्सों या आडम्बरी फतवों से इस समस्या का समाधान सम्भव नहीं है।

अभी कुछ दिनों पूर्व मुझे किसी मित्र ने मुम्बई स्थित इस्लामिक रिसर्च फाउण्डेशन और उसके प्रमुख डा. जाकिर नाइक के सम्बन्ध में बताया। उनके सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा से जब इण्टरनेट पर ढूँढा तो मुझे कुछ विषयों पर घोर आश्चर्य हुआ और उनके कुछ विचार इतने असहिण्णु दिखे कि उनमें और इस्लामवादी आतंकवादियों के एजेण्डे में विशेष अंतर नहीं दिखा। वीडियो की प्रसिद्ध साइट यू-ट्यूब पर डा. जाकिर नाइक का एक वीडियो है जो प्रसिद्ध इस्लामी चैनल Q TV के प्रश्नोत्तर पर आधारित है इस वीडियो में डा जाकिर नाइक स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस्लाम को छोडकर शेष सभी धर्म गलत हैं और वे गलत सीख देते हैं इसी कारण इस्लामी देशों में गैर मुस्लिम धर्मों का प्रचार या उनके उपासना स्थल बनाने की आज्ञा नहीं दी जा सकती।

इस सम्बन्ध में तर्क के लिये उन्होंने एक उदाहरण दिया है जो अत्यंत रोचक है उनके अनुसार यदि किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य के पास तीन व्यक्ति गणित का अध्यापक बनने आयें और प्रधानाचार्य उससे प्रश्न पूछे कि दो और दो कितने होते हैं और उनमें से एक का उत्तर हो चार, दूसरा कहे पाँच और तीसरा कहे छह तो प्रधानाचार्य उसी को अध्यापक नियुक्त करेगा जो उत्तर में दो और दो चार कहेगा न कि पाँच और छ्ह कहने वाले को। नाइक के अनुसार शेष दो को लगता है कि दो और दो पाँच और छह होता है पर प्रधानाचार्य को पता है कि यह गलत है इसलिये वह गलत शिक्षा अपने छात्रों को नहीं लेने देगा। जाकिर नाइक के अनुसार यही फार्मूला धर्म के मामले में भी है। गैर इस्लामी धर्मों को लगता है कि उनकी शिक्षायें ठीक हैं परंतु इस्लाम के अनुयायी जानते हैं कि वे गलत हैं और यदि किसी का दीन( धर्म) सही है तो वह सिर्फ इस्लाम है। यही कारण है कि इस्लामी देशों में अपने धर्म का प्रचार करने या उपासना स्थल बनाने की छूट गैर मुसलमानों को नहीं है।


डा. जाकिर नाइक को इन दिनों अंतरधार्मिक विमर्श के सम्बन्ध में और तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन का विशेषज्ञ माना जाता है जो इसी विषय पर विश्व के अनेक देशों में व्याख्यान देते हैं। ऐसे व्यक्ति के विचार यदि इतने असहिण्णु हैं जो इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत से परिपूर्ण है उससे इस बात कि अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है कि वह ऐसे प्रयासों से विश्व में सहिण्णुता की स्थिति निर्माण करने में सहायक हो सकेगा।

इन्हीं महोदय ने मुम्बई में ही एक हिन्दू और इस्लाम के मध्य समानताओं के विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया जिसका पूरा वीडियो यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। इस पूरे व्याख्यान में केवल एक बार कुछ मिनटों के लिये आर्य समाज के तीन विद्वानों को वैदिक ऋचाओं के पाठ के लिये मंच पर स्थान दिया गया और उसके उपरांत दोनों धर्मों की समानता पर डा जाकिर नाइक का एकपक्षीय भाषण होता रहा परंतु उनके भाषण का लब्बोलुआब यही रहा कि यदि हिन्दू इस्लाम की भाँति अल्लाह को सर्वोच्च ईश्वर स्वीकार करे तो ही दोनों धर्मों में सद्भाव सम्भव है। यह सन्दर्भ इसलिये मह्त्वपूर्ण है कि इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी यही तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य गलत दीन का पालन कर रहे लोगों को अल्लाह के सही रास्ते पर लाना है। यही तर्क यदि इस्लाम के जानकार और विद्वान भी देते हैं कि इस्लाम के अतिरिक्त शेष धर्म अन्धकारमय हैं तो चिंता होती है कि इन दोनों की सोच में अंतर नहीं है अंतर है तो केवल उद्देश्य प्राप्त करने के तरीके में। एक इतना असहिण्णु है कि उसकी बात न मानने वाले को मौत के घाट उतार देता है और दूसरा यह कह कर लानत भेजता है कि तुम गलत रास्ते पर हो और सही रास्ता हमारा है।

विश्व के अनेक देशों में और विशेषकर यूरोप में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के तथाकथित प्रतीकों पर भी चर्चा का दौर आरम्भ हो गया है और इस विषय को लेकर इस्लाम में कुछ बेचैनी भी अनुभव की जा रही है तो भी भारत में यह विषय अब भी बह्स की परिधि से बाहर है और पिछ्ले महीने देश की राजधानी में बुद्धिजीवियों के मध्य एक घटना घटित हुई जिस पर विशेष संज्ञान नहीं लिया गया परंतु यह घटना हमारी लेख की इस विषयवस्तु को पुष्ट ही करती है कि जब भी आतंकवाद के नाम पर वामपंथियों या इस्लामवादियों द्वारा कोई बहस आयोजित की जाती है तो वह पूरे विषय के मूल स्रोत पर चर्चा करने के स्थान पर इस विषय पर केन्द्रित हो जाती है कि किस प्रकार मुसलमानों का उत्पीडन आतंकवाद को प्रेरित करता है। आज समस्त विश्व में मुस्लिम उत्पीडन की एक मिथ्या अवधारणा को सृजित किया गया है और इसके इर्द-गिर्द इस्लामी आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराया जा रहा है।

पिछ्ले महीने 2 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी स्थित उर्दू प्रेस क्लब में आतंकवाद और फासिज्म: एक ही सिक्के के दो पहलू विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी और इसमें प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्त्री और लेखिका अरुन्धती राय, संसद पर आक्रमण के दोषी रहे और फिर साक्ष्यों के अभाव में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बरी किये गये गिलानी, प्रसिद्ध टी वी पत्रकार मनोज रघुवंशी सहित अनेक मुस्लिम वक्ता भी थे। उस कार्यक्रम में भाग लेने गये विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता सुरेन्द्र जैन ने आँखो देखा हाल बताया कि अरुन्धती राय और गिलानी ने भारत सरकार को जमकर कोसा और निष्कर्ष निकाला कि भारत में कानून व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं है और घोर अराजकता का माहौल है।

पत्रकार मनोज रघुवंशी ने मुस्लिम उत्पीडन के नाम पर इस्लामी आतंकवाद तो न्यायसंगत ठहराने की प्रवृत्ति की आलोचना की तो पूरे सभाकक्ष में शोर मचने लगा। इसके बाद हसनैन नामक एक वक्ता बोलने के लिये उठे और उन्होंने श्री राम और सीता पर अभद्र टिप्पणियाँ की और श्री राम को युद्ध प्रेमी सिद्ध कर दिया। इनके बाद जब विश्व हिन्दू परिषद के नेता सुरेन्द्र जैन बोलने आये तो उन्होंने श्री राम पर की गयी टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि इसी प्रकार की टिप्पणियाँ आपके पैगम्बर पर की जायें तो आपको कैसा लगेगा। इसके बाद तो सभाकक्ष में जम कर बवाल हो गया और मंच पर तथा दर्शकों में से लोगों ने वक्ता को घेर लिया और हाथापाई की नौबत आ गयी। किसी ने वक्ता को धमकाते हुए कहा कि 6 दिसम्बर से अब तक 10 हिन्दुओं को मार चुका हूँ और 11वाँ नम्बर तेरा है। मंच पर 13 से 15 लोगों ने वक्ता को घेर लिया और काफी देर बाद पुलिस आयी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता को सुरक्षित निकाल ले जा पाई।

इस घटना के भी निहितार्थ हैं। इस्लाम के धर्मगुरु या विद्वान जब व्याख्यान देते हैं तो इस अजीब तर्क पर जोर देते हैं कि इस्लाम का आकलन उसके धर्मग्रंथों के आधार पर किया जाना चाहिये न कि उसके अनुयायियों के आधार पर क्योंकि अनुयायी प्रायः धर्म को सही नहीं समझते और उनका आचरण धर्म के विपरीत होता है। इस धारणा को अंग्रेजी में Apologetic कहते हैं इसके लिये हिन्दी में कोई समानान्तर शब्द नहीं है परंतु ये वही लोग हैं जो अपने तर्कों के आधार पर इस्लामी आतंकवाद को इस्लाम से अस्पृक्त भी करते हैं और आतंकवाद को मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा के आधार पर न्यायसंगत भी ठहराते हैं। यह प्रवृत्ति कितनी खतरनाक है इसका पता उपर्युक्त उदाहरण से बखूबी चलता है कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले मुसलमान भी दूसरे धर्मों के महापुरुषों का सम्मान नहीं करते और उनपर टिप्पणी करना अपना लोकतांत्रिक अधिकार मानते हैं और वही अधिकार जब उनके शीर्ष पुरुषों के सम्बन्ध में प्रयोग किया जाता है तो इसे ईशनिन्दा मानकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। यह अवधारणा किस ओर संकेत करती है और ऐसे लोग इस्लामी आतंकवाद की आग बुझाने में कितने सक्षम होंगे इसका निष्कर्ष पाठक ही निकालें श्रेयस्कर होगा।

आजकी सबसे बडी आवश्यकता इस्लामी आतंकवाद को व्यापक सन्दर्भ में समझने और उसके पीछे की मूल प्रेरणा को पहचानने की है। क्योंकि यह कानून और व्यवस्था का प्रश्न नहीं है इसके पीछे एक सोच है और जब तक उस सोच पर प्रहार नहीं होगा तब तक आतंकवाद से मुक्ति प्राप्त कर लेने से भी इस्लामी सर्वोच्चता और शरियत लागू करने की सोच से प्रेरित इस्लामवाद पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती क्योंकि इस्लामवादी केवल आतंकवादी नहीं हैं वे भी हैं जो इसी उद्देश्य को शांतिपूर्ण तरीके से प्राप्त करना चाह्ते हैं। ऐसे तत्वों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है।
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इस्लाम में बेचैनी ?

लोकमंच ने अपने पिछले कुछ लेखों में उल्लेख किया है कि किस प्रकार पश्चिम और इस्लाम आपस में टकराव की मुद्रा में आ गये हैं। इस्लामी और पश्चिम जगत में घट रही घटनायें इसी प्रवृत्ति की ओर बार बार संकेत कर रही हैं। पिछ्ले महीने दो विशेष घटनायें घटित हुईं जो इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्धों में और तनाव उत्पन्न कर सकती हैं और इनमें से एक घटना तो निश्चय ही ऐसी है जो दीर्घगामी स्तर पर प्रभाव डाल सकती है।

22 मार्च को ईसाइयों के मह्त्वपूर्ण पर्व ईस्टर के दिन वेटिकन में रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वश्रेष्ठ धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट ने मिस्र मूल के मुसलमान और पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे मगदी आलम को पूरे विधिविधान से ईसाइत में दीक्षित कर लिया। मगदी आलम पिछ्ले काफी वर्षों से इटली में निवास कर रहे थे और इस विषय पर भी मतभेद था कि मगदी आलम क्या आस्थावान मुसलमान थे या नहीं। यह विषय सर्वप्रथम 2007 में चर्चा में आया था जब लन्दन के मेयर द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में मध्य पूर्व के प्रसिद्ध विद्वान और इस्लामी विषयों के जानकार डा. डैनियल पाइप्स ने इस्लामवाद से लडाई के लिये सभ्यतागत लोगों के मध्य सहयोग की आवश्यकता जताते हुए उन्होंने मगदी आलम को एक इस्लाम धर्मानुयायी बताया जो नरमपंथी हैं और उनका सहयोग लेने की बात कही। इस बात पर एक और इस्लामी विद्वान तारिक रमादान ने आपत्ति जताते हुए डा. डैनियल पाइप्स पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि मगदी आलम एक ईसाई हैं। डा. डैनियल पाइप्स ने इसका खण्डन किया और प्रमाणित किया कि मगदी आलम एक मुसलमान हैं। यह सन्दर्भ यहाँ इसलिये महत्वपूर्ण है कि इस्लामी विषयों पर नजर रखने वाले लोगों के मध्य यह खासी चर्चा का विषय बना था। यह भ्रम इसलिये भी बना क्योंकि मगदी आलम का मध्य का नाम क्रिस्टोफर है। परंतु जब 22 मार्च को पोप ने विधिवत ढंग से मगदी आलम का धर्मांतरण कराया तो इस विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया कि मगदी आलम एक मुसलमान थे।

यह विषय अत्यंत मह्त्व का इसलिये है कि इतने बडे पैमाने पर एक वैश्विक मह्त्व वाले दिन एक महत्वपूर्ण मुसलमान का धर्मांतरण करा कर कैथोलिक चर्च ने क्या सन्देश देने का प्रयास किया है। विशेषकर इन समाचारों के मध्य कि विश्व में कैथोलिक जनसंख्या अब मुसलमानों के बाद दूसरे स्थान पर आ गयी है। यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कुल ईसाई अब भी मुसलमानों से अधिक हैं केवल कैथोलिक सम्प्रदाय दूसरे स्थान पर आ गया है।

मगदी आलम ने धर्मांतरण के उपरांत तत्काल एक बयान दिया और अपने पुराने धर्म पर टिप्पणी करते हुए कहा कि समस्त विश्व में जो कुछ भी आतंकवाद इस्लाम के नाम पर चल रहा है उसके लिये इस्लाम धर्म भी उत्तरदायी है। इस घटना के अपने निहितार्थ हैं। अर्थात कैथोलिक सम्प्रदाय अपनी संख्या की पूर्ति के लिये उन मुसलमानों को अपने शिविर में लाने से परहेज नहीं करेगा जो इस्लाम धर्म बदलना चाहेंगे। इससे इस्लाम और कैथोलिक चर्च में टकराव सुनिश्चित है। क्योंकि अभी तक चर्च खुलेआम मुसलमानों का धर्मांतरण करने से परहेज करता था और अंतर्धार्मिक बह्स के लिये इस्लाम से बातचीत के लिये अधिक उत्सुक दिख रहा था। परंतु अब इस नये घटनाक्रम से स्पष्ट है कि चर्च इस्लाम के विषय पर अधिक आक्रामक रणनीति अपनाने की फिराक में है जिसमें धर्मांतरण का जवाब धर्मांतरण से देने की नीति अपनाई गयी है।

इस्लामी विश्व में किसी मुसलमान को अपना धर्म छोडने की आज्ञा नहीं है और ऐसा करने पर उसके लिये मृत्युदण्ड का विधान है। मगदी आलम के धर्मांतरण से भी ऐसे ही प्रश्न उठने वाले हैं क्योंकि मगदी आलम एक इस्लामी राज्य का मूलनिवासी है। तो क्या यह माना जाये कि यह धर्मांतरण एक विशेष राजनीतिक सन्देश है जो इस्लाम धर्म के उन तमाम अनुयायियों को एक सन्देश है जो इस्लाम में बेचैनी अनुभव कर रहे हैं परंतु धर्मांतरण के कडे नियमों के चलते धर्म बदलने के बारे में नहीं सोच पाते। यह इस्लाम की दृष्टि से एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि इससे पूर्व जितने भी मुसलमानों ने इस्लाम की आलोचना की थी उन्होंने धर्म परिवर्तन के विकल्प पर विचार नहीं किया था चाहे वह सलमान रश्दी हों, तस्लीमा नसरीन हों या फिर सोमालिया मूल की अयान हिरसी अली हों। इन लोगों ने यूरोप के देशों में या अन्य देशों में शरण तो ले ली परंतु धर्म नहीं छोडा।

इसके पीछे मुख्य रूप से दो प्रमुख कारण थे एक तो ये लोग इस्लाम धर्म छोडने को लेकर इस्लाम में मृत्युदण्ड की व्यवस्था से चिंतित थे और अपने जीवन पर और अधिक संकट नहीं लाना चाह्ते थे और दूसरा कारण यह कि सामान्य रूप से पश्चिम और विशेष रूप से कैथोलिक चर्च इस्लाम के साथ प्रत्यक्ष रूप से टकराव मोल नहीं लेना चाह्ता था। तो प्रश्न यह उठता है कि अब परिस्थितियों में ऐसा क्या परिवर्तन आ गया है कि चर्च इस्लाम के मह्त्वपूर्ण व्यक्ति का धर्मांतरण करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहा है जबकि कैथोलिक चर्च के साथ इस्लाम की ओर से अंतर्धार्मिक बातचीत में लगे प्रतिनिधि भी मानते हैं कि मगदी आलम के ईसाई बनने से से दोनों के मध्य सद्भाव के प्रयास को झटका लगेगा और दोनों पक्षों के सम्बन्धों में तनाव आ सकता है।

कैथोलिक चर्च के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। कैथोलिक चर्च पिछ्ले कुछ वर्षों से इस्लामी जगत के मध्य यह विषय उठाता रहा है कि यदि ईसाई बहुल देशों में इस्लाम धर्म के अनुयायियों को हर प्रकार की धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त है और उन्हें प्रार्थना करने या मस्जिद बनाने की स्वतंत्रता है तो फिर मुस्लिम बहुल देशों में भी ईसाई धर्म के अनुयायियों को यही स्वतंत्रता मिलनी चाहिये और समानता के इस सिद्धांत पर जोर पोप जान पाल के समय से ही देना आरम्भ कर दिया गया था जब वैटिकन के विदेश मंत्री स्तर के जीन लुइस तौरोन ने पहली बार 2003 में स्पष्ट रूप से कहा था कि मुस्लिम बहुल देशों में ईसाइयों के साथ द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा व्यवहार हो रहा है। पोप बेनेडिक्ट के समय में इस सिद्धांत पर अधिक आग्रह किया जाने लगा। इसी का परिणाम था कि अनेक अरब देशों में चर्च बनाने के प्रस्तावों पर चर्चा होने लगी यह बात और है कि इसका स्थानीय कट्टरपंथी मौलवियों ने कडा विरोध किया और ऐसे प्रस्तावों का प्रतिफल अभी तक सामने नहीं आया है परंतु ऐसे प्रस्तावों पर चर्चा कैथोलिक चर्च के कठोर रूख की ओर संकेत अवश्य देता है तो क्या माना जाये कि चर्च अब अधिक मुखर होकर इस्लाम और ईसाइत के मध्य समानता के सिद्धांत को अपनाना चाह्ता है।

इसके अतिरिक एक और घटनाक्रम है जो पश्चिम के कठोर रूख की ओर संकेत करता है वह है हालैण्ड के सांसद और नेशनल फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट वाइल्डर्स द्वारा कुरान पर एक फिल्म का निर्माण और उसका प्रदर्शन। इस फिल्म के सम्बन्ध में पिछ्ले अनेक महीनों से चर्चा थी और इसके निर्माण से पूर्व ही इस पर काफी विवाद हो रहा था। हालाँकि इस फिल्म में सनसनीखेज या विवादित कुछ भी नहीं है फिर भी तमाम विवादों के बीच इस कानून निर्माता ने जिस प्रकार फिल्म के निर्माण फिर इसके प्रसारण में अपनी सक्रियता दिखाई है वह यूरोप की इस्लाम के प्रति बदलती मानसिकता का परिचय देता है।

मगदी आलम के धर्मांतरण और वाइल्डर्स की फिल्म के निर्माण और प्रसारण में जो अत्यंत उल्लेखनीय बात रही वह यह कि दोनों ही घटनाओं पर कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं हुई जिसकी आशंका जतायी जा रही थी। प्रतिक्रिया नहीं होने से ऐसी घटनाओं को करने या अपने धर्म और मूल्यों के प्रति अधिक आग्रह की प्रवृत्ति पश्चिम में और बढेगी और इससे इस्लाम में बेचैनी और अधिक बढेगी।
इस्लाम में बेचैनी की कुछ मह्त्वपूर्ण घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जिस पर विश्व की मीडिया का ध्यान बिल्कुल नहीं गया। इसी वर्ष यूरोप के कुछ समाचार पत्रों में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून पुनः प्रकाशित होने पर इस्लामी विश्व में एक दूसरे प्रकार का चिंतन आरम्भ हुआ। फरवरी के अंत में एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए यमन के प्रधानमंत्री अली मोहम्मद मुजावर ने प्रस्ताव किया कि विश्व स्तर पर ऐसे कानून का निर्माण होना चाहिये जो किसी भी धर्म के अपमान को आपराधिक कृत्य घोषित करे और धर्मों के समान सम्मान की भावना पर जोर दे। उन्होंने पश्चिम से अनुरोध किया कि वे इस्लाम की भावनाओं का सम्मान करें अन्यथा अस्थिरता ही बढेगी।

इसी प्रकार का प्रस्ताव सऊदी अरब सलाहकार समिति ने सऊदी सरकार को दिया तथा विदेश मंत्रालय से आग्रह किया कि वह अन्य अरब देशों, मुस्लिम देशों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर ऐसे प्रस्ताव पर विचार करें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी सन्धि की जाये कि प्रत्येक धर्म के प्रतीकों, पैगम्बरों का सम्मान करते हुए सभी धर्मों के सम्मान को बल प्रदान किया जाये। सऊदी अरब सलाहकार समिति या मजलिसे अश शुरा की ओर से यह प्रस्ताव मोहम्मद अल कुवाहेश ने यूरोप और अमेरिका में पैगम्बर के कार्टूनों के प्रकाशन की प्रतिक्रिया में रखे थे। परंतु यह प्रस्ताव समिति ने 77 के मुकाबले 33 मतों से निरस्त कर दिया। इस प्रस्ताव को निरस्त करने के पीछे प्रमुख कारण यह बताया गया कि सभी धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करने की अंतरराष्ट्रीय सन्धि का अर्थ होगा शेष धर्मों के प्रतीकों का सम्मान करना जो कि मुसलमानों के लिये सम्भव नहीं है। दूसरा कारण यह बताया गया कि इससे इस्लामी देशों में गैर मुसलमानों को अपने उपासना केन्द्र स्थापित करने की अनुमति मिल जायेगी।

इस घटनाक्रम के अपने निहितार्थ हैं। एक तो यह घटनाक्रम बताता है कि चतुर्दिक इस्लाम पर हो रहे हमलों से इस्लामी धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक नेतृत्व बेचैन है और इसके लिये रास्ता निकालने का प्रयास कर रहा है और वहीं दूसरी ओर समस्त विश्व में इस्लाम की अनेक प्रवृत्तियों को लेकर मंथन आरम्भ हो गया है और इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद या फिर शरियत लागू करने की इस्लामी मतानुयायियों की इच्छा के आगे विश्व झुकने के स्थान पर अधिक आग्रह पूर्वक इसका प्रतिरोध करने की तैयारी कर रहा है। इस सम्बन्ध में यूरोप ने पहल की है और इस्लाम को कठोरतापूर्वक सन्देश देने का प्रयास किया है कि वह अपने इस्लामीकरण के लिये तैयार नहीं है इसके स्थान पर वह अपनी संस्कृति और मूल्यों के प्रति अधिक सजग हो रहा है।


जहाँ यूरोप और चर्च ने अपना आग्रह दिखाकर राजनीतिक और सांस्कृतिक सन्देश दिया है वहीं इस्लाम मतावलम्बी बेचैनी अनुभव कर रहे हैं और अनेक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं कि इस्लाम की छवि को सुधारा जा सके। इस क्रम में भारत में बडे बडे मुस्लिम सम्मेलन आयोजित कर आतंकवाद की निन्दा की जा रही है परंतु ये प्रयास छवि सुधारने की कवायदें मात्र हैं क्योंकि आज तक इस्लामी धर्मगुरुओं ने उन मुद्दों को स्पर्श करने का प्रयास कभी नहीं किया जो वास्तव में समस्त विश्व के गैर मुसलमानों के लिये आशंका और चिंता के कारण हैं।

आज समस्त विश्व में जो वातावरण बन रहा है वह कतई उत्साहजनक नहीं है और संकेत यही मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में टकराव का यह वातावरण और भी तनावपूर्ण ही होने वाला है। विशेषकर कैथोलिक चर्च और यूरोप की भावभंगिमा से तो यही संकेत मिलता है कि इस्लाम और पश्चिम तथा कैथोलिक चर्च के मध्य सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं और विश्व की शेष सभ्यतायें भी शीघ्र ही इसका अनुसरण करने लगें और इस्लाम के प्रति सशंकित हो जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
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तिब्बत और फिलीस्तीन

इन दिनों तिब्बत चर्चा में है। वैसे तो इसके पीछे जो कारण है उसे लेकर तो तिब्बती भी प्रसन्न नहीं होंगे पर दशकों उपरांत ऐसा अवसर जरूर आया है जब तिब्बत का विषय एकदम से वैश्विक मह्त्व का हो गया। हम यहाँ इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाह्ते कि तिब्बत के इस विषय के मह्त्वपूर्ण होने के पीछे प्रमुख कारण क्या है वरन हम एक समानता की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाह्ते हैं जो न केवल रोचक है वरन उसके गम्भीर राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। साथ ही यह विषय कहीं न कहीं जाकर उन नारों से भी जुड्ता है जिसे विभिन्न संगठन या राजनीतिक दल समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार गला फाड्-फाड् कर लगाते हैं। ऐसा ही एक नारा मानवाधिकार का है जो विश्व भर के वामपंथियों का सबसे प्रिय विषय है। यह वामपंथियों के हाथ में वह छडी है जिससे वे जब चाहे जिसे चाहे मारते रह्ते हैं। इस नारे रूपी छडी का सर्वाधिक उपयोग इन वामपंथियों ने सबसे अधिक इजरायल या फिर हिन्दूवादी शक्तियों के लिये किया है। परंतु तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर उनका जो भी रूख है वह उनके बौद्धिक आडम्बर को अनावृत करने के लिये पर्याप्त है।

तिब्बत में चीन का दमन इन छद्म बुद्धिजीवियों को मानवाधिकार का हनन नहीं चीन का आंतरिक मामला लगता है तो फिर यह सिद्धांत इजरायल पर लागू क्यों नहीं होता। या फिर गोधरा की प्रतिक्रिया में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर जब विभिन्न वामपंथी संगठन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के विभिन्न मंचों पर बदनाम कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दखल देने की मांग कर रहे थे तो इनका आंतरिक मामले का सिद्धांत कहाँ चला गया था। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने का प्रयास हम अपने लेख में कर रहे हैं।

तिब्बत और फिलीस्तीन में किस मामले में समानता है तो वो यह कि फिलीस्तीन भी दावा करता है कि वह अपनी स्वाधीनता की लडाई लड रहा है। लेकिन क्या तिब्बत को विश्व मंच पर वह स्थान कभी मिल सका या उसकी आवाज कभी सुनी गयी। आखिर क्यों नहीं। ऐसा क्यों हुआ जबकि तिब्बत वास्तव में 14,000 पुराना एक राष्ट्र है जिसकी अपनी संस्कृति और अपना धर्म है। जब कि इस मुकाबले फिलीस्तीन की तुलना करें तो वह इन सन्दर्भों में कभी राष्ट्र नहीं रहा। वह बीसवीं शताब्दी के लम्बे समय तक इजरायल का ही हिस्सा था और फिलीस्तीनियों को फिलीस्तीनी यहूदी कहा जाता था। फिलीस्तीनियों का इस्लाम से पृथक ऐसा कोई धर्म भी नहीं था जैसा कि तिब्बत के मामले में है। फिर भी समस्त विश्व में फिलीस्तीन की छवि एक ऐसे देश के निवासियों के रूप में है जिन्हें अपने देश से निकाल दिया गया है और उनके देश पर आक्रांता इजरायल ने कब्जा कर रखा है। इस सहानुभुति का कारण क्या है। इसके कुछ कारण मोटे तौर पर ये नजर आते हैं-

फिलीस्तीन ने अपनी लडाई के लिये आतंकवाद का सहारा लिया जबकि तिब्बती शांति के उपासक हैं और सहिष्णु धर्म बौद्ध के अनुयायी हैं।

फिलीस्तीन ने स्वयं को इजरायल से पीडित देश के रूप में प्रस्तुत किया जिसके आधार पर उसे विश्व में ध्रुवीकरण करने में सफलता मिली। फिलीस्तीन को विश्व के प्रायः सभी देशों का समर्थन प्राप्त हो गया क्योंकि यह विषय मुसलमानों से जुडा है और विश्व के सभी देश मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनी विदेश नीति का अंग मानते हैं। इसके विपरीत तिब्बत मुस्लिम देश नहीं है इस कारण उसके प्रति सहानुभुति दिखाना किसी की मजबूरी या फैशन नहीं है।

फिलीस्तीन को उन मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त है जिनके पास तेल की दौलत है और इसके आधार पर वे विश्व् में धाक जमाते हैं और अपने प्रमुख सम्मेलनों में फिलीस्तीन के विषय को इस्लामी उम्मा के स्वाभिमान के साथ जोड्कर इस्लामी जनमानस की भावनाओं को उद्दीप्त करते हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत तिब्बत का सहयोग करने को कोई तैयार नहीं है। ले देकर भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार और उनके धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दे रखी है तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाने से कतराती है।

फिलीस्तीन के विषय को अधिक प्रमुखता मिलने का एक बडा कारण विश्व बिरादरी की सबसे बडी कानून निर्माता संस्था सन्युक्त राष्ट्र संघ है। समस्त विश्व में इजरायल की अलोकप्रियता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानों कर्मकाण्ड ही बना लिया है कि प्रत्येक बैठक या सत्र में फिलीस्तीन के लिये इजरायल की निन्दा करता हुआ एक प्रस्ताव अवश्य होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस रूख से फिलीस्तीन को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो जाती है जबकि तिब्बत को पीडित करने वाला देश स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य है इस कारण शायद ही कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत में चीनी अत्याचार पर चर्चा हुई हो।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में इस अंतर का एक प्रमुख कारण समाचार साधन हैं। विश्व भर के टी वी चैनलों पर ऐसे चित्र और समाचार आते हैं जो फिलीस्तीन को इजरायल द्वारा उत्पीडित देश के रूप में चित्रित करते हैं। फिलीस्तीन के अनेक हिस्सों से समाचार और टी वी छवि आती रह्ती है जिसके आधार पर लोग अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। इसके विपरीत तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में विश्व को उतना ही पता लग पाता है जितना चीन विश्व को बताना चाह्ता है। वैसे यह अजीब विडम्बना है कि जिस देश को वामपंथी रक्त पिपासु सिद्ध करना चाह्ते हैं उसके यहां कम से कम मीडिया पर सेंसर तो नहीं है।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में अंतर का एक प्रमुख कारण यह भी है कि तिब्बत पर अधिकार करने वाला देश स्वयं वामपंथी या कम्युनिस्ट है जबकि इसके विपरीत फिलीस्तीन का मुद्दा विश्व के समस्त वामपंथियों के लिये प्रमुख विचारधारागत मुद्दा है जो उन्हें आपस में जोड्कर रखता है। विश्व के किसी भी कोने में कोई वामपंथी क्यों न हो उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की पहचान इसी से होती है कि फिलीस्तीन और इजरायल मसले पर उसका रूख क्या है।
आखिर वह कौन सा कारण है जो कम्युनिस्टों और वामपंथियों को फिलीस्तीन के निकट लाता है और इतना निकट लाता है कि वे यासर अराफात के इंतिफादा या आत्मघाती हमलों में भी कोई बुराई नहीं देखते। उन्हें तो इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी अपने सहयोगी लगते हैं। ऐसा क्यों?

इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जब शीत युद्ध् आरम्भ हुआ तो साम्यवादियों या वामपंथियों को लगता था कि अब पूँजीवाद ध्वस्त हो जायेगा और पूँजीवाद के अंतर्गत पूँजी पर नियंत्रण की भावना के चलते कर्मचारी और मजदूर असंतुष्ट होंगे और समस्त विश्व में सर्वहारा संग़ठित होकर एक क्रांति को जन्म देगा और रूस का माडल एक स्थाई व्यवस्था बन जायेगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं। पूँजीवाद की व्यवस्था के रह्ते हुए भी कर्मचारियों की जेबें भरती रहीं और मजदूर भी सर्वहारा क्रांति से दूर ही रहे। 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के उपरांत साम्यवाद का आर्थिक दर्शन समाप्त हो गया और उसके अस्तित्व का एकमात्र दर्शन रह गया अमेरिका का विरोध। अपने दर्शन के बूते जब साम्यवादियों में अमेरिका को नष्ट करने की कूबत न रही तो उन्हें इस्लामवादियों में नया साथी दिखाई पडा। इसी कारण उन्होंने 2000 के उपरांत अपने सभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इजरायल फिलीस्तीन को अपना सबसे बडा मुद्दा बताते हुए फिलीस्तीन के प्रति अपनी सहानुभुति रखी।

यह कोई संयोग नहीं है कि विश्व के अनेक शीर्ष वामपंथियों ने 11 सितबर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण की प्रशंसा तक की है और उसे अमेरिका की नीतियों का परिणाम बताया है।
ऐसा नहीं है कि वामपंथी केवल अमेरिका की निन्दा करते है वही तत्व भारत में इस्लामवादी हिंसा का प्रकारांतर से समर्थन करते हैं और हिन्दूवादी संगठनों पर आरोप लगाते हैं। ये नक्सली हिंसा को प्रश्रय देते हैं और भारत के पडोस में नेपाल में नक्सल और इस्लामवादी गठजोड का एक बडा खतरा इन्होंने खडा ही कर दिया है।

इन समानताओं से यही निष्कर्ष निकलते हैं कि वामपथियों की मानवाधिकार को लेकर ईमानदार नीयत नहीं है और उनके लिये ये केवल नारे हैं जिनका उपयोग वे अवसरवादिता से करते हैं तथा साथ ही वे अब विश्व में अपना वर्चस्व हिंसावादियों के साथ मिलकर बढायेंगे। इस्लामवाद और वामपंथ का यह गठबन्धन आने वाले दिनों में विश्व के लिये नयी चुनौती बनने वाला है।
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राजनीतिक इस्लाम का बढता दायरा

इन दिनों समस्त विश्व में जिस इस्लामवादी खतरे का सामना सर्वत्र किया जा रहा है उसके पीछे मूल प्रेरणा इस्लाम की राजनीतिक इच्छा ही है। समस्त विश्व में मुसलमानों के मध्य इस बात को लेकर सहमति है कि उनके व्यक्तिगगत कानून में कोई दखल ना दिया जाये और विश्व के अधिकांश या सभी भाग पर शरियत का शासन हो। इस विषय में इस्लामवादी आतंकवादियों और विभिन्न इस्लामी राजनीतिक या सामाजिक संगठनों में विशेष अंतर नहीं है। इसी क्रम में पिछ्ले दिनों कुछ घटनायें घटित हुईं जो वैसे तो घटित अलग-अलग हिस्सों में हुईं परंतु उनका सम्बन्ध राजनीतिक इस्लाम से ही था। सेनेगल की राजधानी डकार में इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज की बैठक हुई और उसमें दो मह्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये जिनका आने वाले दिनों में समस्त विश्व पर गहरा प्रभाव पडने वाला है। इन दो निर्णयों के अनुसार

इस्लामी देशों के संगठन ने प्रस्ताव पारित किया कि समस्त विश्व में विशेषकर पश्चिम में इस्लामोफोब की बढती प्रव्रत्ति के विरुद्ध अभियान चलाया जायेगा और इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित किये जाने पर उसके विरुद्ध कानूनी लडाई लडी जायेगी। इस प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के प्रतीकों को अपमानित करने या पैगम्बर को अपमानित करने के किसी भी प्रयास का डट कर मुकाबला किया जायेगा और कानूनी विकल्पों को भी अपनाया जायेगा।

दूसरे निर्णय के अनुसार मुस्लिम मतावलम्बियों को चेतावनी दी गयी कि वे शरियत के पालन के प्रति और जागरूक हों इस क्रम में सऊदी अरब के विदेशमंत्री ने अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए घोषणा की कि उनका देश आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कन्ट्रीज के गरीब देशों को एक अरब यू.एस. डालर की सहायता देगा परंतु बदले में उन्हें अपने यहाँ शरियत के अनुसार शासन-प्रशासन सुनिश्चित करना होगा।

ये दोनों ही निर्णय दूरगामी प्रभाव छोडने वाले हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों में पश्चिम ने अनेक सन्दर्भों में इस्लाम को चुनौती दी है और विशेष रूप से डेनमार्क की एक पत्रिका में पैगम्बर को लेकर कार्टून छपने के उपरांत पश्चिम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इस्लाम के विशेषाधिकार को लेकर व्यापक बहस आरम्भ हो गयी। पिछ्ले वर्ष कैथोलिक चर्च के धार्मिक गुरु पोप द्वारा इस्लाम के सम्बन्ध में की गयी कथित टिप्पणी के बाद इस बहस ने फिर जोर पकडा। इस बार इस्लामी सम्मेलन में इस्लाम के प्रतीकों पर आक्रमण की बात को प्रमुख रूप से रेखांकित किये जाने के पीछे प्रमुख कारण यही माना जा रहा है कि इस्लाम पश्चिम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार कर अपने अन्दर कोई परिवर्तन लाने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में यह विषय इस्लाम और पश्चिम के मध्य टकराव का प्रमुख कारण बनने वाला है। पश्चिम को इस बात पर आपत्ति है कि जब उनके यहाँ सभी धर्मों पर मीमांसा और आलोचना की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है तो इस सिद्धांत की परिधि से इस्लाम बाहर क्यों है या उसे विशेषाधिकार क्यों प्राप्त है। इस्लामी देशों ने इस विषय पर अपना रूख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी विशेषाधिकार की स्थिति को कायम रखना चाह्ते हैं। उधर पश्चिम में इस्लाम के विशेषाधिकार को ध्वस्त करने के अनेक प्रयास हो रहे हैं। हालैण्ड की संसद के एक सदस्य और आप्रवास विरोधी राजनीतिक दल फ्रीडम पार्टी के प्रमुख गीर्ट वाइल्डर्स ने कुरान पर अपने विचारों को लेकर एक फिल्म तक बन डाली है जो 28 मार्च को प्रदर्शित होने वाली है। पश्चिम की इस मानसिकता के बाद इस्लामी देशों के सबसे बडे संगठन द्वारा जिस प्रकार का अडियल रवैया अपनाया गया है उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि इस्लामी मतावलम्बी किसी भी नये परिवर्तन के किये तैयार नहीं हैं। इससे तो एक ही बात स्पष्ट होती है कि आने वाले दिनों में पश्चिम और इस्लाम का टकराव बढने ही वाला है।

इस सम्मेलन के दूसरे प्रस्ताव से भी राजनीतिक इस्लाम को प्रश्रय ही प्रोत्साहन मिलने वाला है। इस प्रस्ताव के अनुसार इस्लामी संगठन के उन सदस्य देशों को आर्थिक सहायता देते समय जो गरीब हैं यह शर्त लगायी जायेगी वे अपने शासन और प्रशासन में शरियत का पालन सुनिश्चित करें। इस शर्त से उन मुस्लिम देशों में धार्मिक कट्टरता बढ सकती है जिनमें विकास का सूचकांक काफी नीचे है और राजनीतिक इस्लाम और कट्टरपंथी इस्लाम में अधिक अंतर नहीं है। इन देशों के पिछ्डेपन का लाभ उन संगठनों को मिल सकता है जिन्होंने शरियत का पालन सुनिश्चित करने के लिये आतंकवाद और हिंसा का सहारा ले रखा है। इस्लामी देशों के इस सम्मेलन में शरियत पर जोर देकर राजनीतिक इस्लाम को प्रश्रय दे कर इस्लामी कट्टरता को नया आयाम ही दिया गया है। इस निर्णय के उपरांत यह फैसला कर पाना कठिन हो गया है कि इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद और इस्लामी राजनीति के इस संकल्प में अंतर क्या है। विशेषकर तब जबकि दोनों का उद्देश्य शरियत के आधार पर ही विश्व का संचालन करना और उसे प्रोत्साहित करना ही है। इस्लाम के विशेषाधिकार को कायम रखना और शरियत के अनुसार शासन और प्रशासन चलाने के लिये मुस्लिम देशों को प्रेरित करना मुस्लिम देशों की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ वे परिवर्तन के लिये तैयार नहीं दिखते और इस्लामी सर्वोच्चता के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं।

इसके अतिरिक्त दो और घटनायें पिछ्ले दिनों घटित हुईं जो इस्लाम को लेकर चल रही
पूरी बह्स को और तीखा बनाती हैं तथा इस्लामी बुद्धिजीवी और धार्मिक नेता इस्लामी आतंकवाद से असहमति रखते हुए भी उसके उद्देश्यों से सहमत प्रतीत होते दिखते हैं। इन दो घटनाओं में एक का केन्द्र उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ रहा जहाँ आतंकवाद विरोधी आन्दोलन के बैनर तले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के कुछ प्रमुख सदस्यों ने निर्णय लिया कि वे प्रदेश के किसी भी जिले में बार काउंसिल के उस निर्णय का खुलकर विरोध करेंगे जिसमें वकील उन लोगों के मुकदमे लडने से इंकार कर देंगे जो किसी आतंकवादी घटना के आरोप में गिरफ्तार किये जाते हैं। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के इस फैसले के बाद वकीलों के संगठन बार काउंसिल में धर्म के आधार पर विभाजन हो गया है और इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि आतंकवादी घटनाओं के नाम पर निर्दोष मुसलमान युवकों को पकडा जा रहा है और उन्हें कानूनी सहायता मुसलमान वकील दिलायेंगे। ज्ञातव्य हो कि पिछ्ले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में अनेक आतंकवादी घटनायें घटित हुईं जिनमे अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि पर आक्रमण, वाराणसी स्थित संकटमोचन मन्दिर पर आक्रमण प्रमुख हैं। इन आतंकवादी घटनाओं में जो आतंकवादी गिरफ्तार हुए उनका मुकदमा लडने से स्थानीय बार काउंसिल ने इंकार कर दिया। इसी के विरोध में न्यायिक प्रक्रिया को आतंकित करने के लिये पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश में अनेक न्यायालयों में एक साथ बम विस्फोट हुए और आतंकवादी संगठनों ने इसके कारण के रूप में आतंकवादियों का मुकदमा लडने से वकीलों के इंकार को बताया।

अब जिस प्रकार मुस्लिम वकील आतंकवादियों को निर्दोष बताकर सरकार और पुलिस बल पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं उससे उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है और यहाँ भी इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद और इस्लामी आन्दोलन के मध्य उद्देश्यों की समानता दिख रही है। इस निर्णय का व्यापक असर होने वाला है और विशेष रूप से तो यह कि जब समस्त विश्व इस्लामी बुद्धिजीवियों से आतंकवाद की इस लडाई में रचनात्मक सहयोग की आशा करता है तो उनका नयी-नयी रणनीति अपनाकर प्रकारांतर से सही इस्लाम के नाम पर चल रहे अभियान को हतोत्साहित करने के स्थान उसे बल प्रदान करने के लिये तोथे तर्कों का सहारा लेना इस आशंका को पुष्ट करता है कि इस्लामी आतंकवाद कोई भटका हुआ अभियान नहीं है।

इसी बीच एक और प्रव्रत्ति ने जोर पकडा है जिसकी आकस्मिक बढोत्तरी से देश की खुफिया एजेंसियों के माथे पर भी बल आ गया है। जिस प्रकार पिछ्ले दिनों उत्तर प्रदेश में सहारनपुर स्थित दारूल-उलूम्-देवबन्द ने देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों और उलेमाओं को आमंत्रित कर इस्लाम के साथ आतंकवाद के सहयोग को नकारने का प्रयास किया उसने भी अनेक प्रश्न खडे किये। क्योंकि इस सम्मेलन में भी ऊपर से तो आतंकवाद के साथ इस्लाम को जोडने की प्रव्रत्ति की आलोचना की गयी परंतु जो विषय उठाये गये और मुस्लिम समाज की जिन चिंताओं को व्यक्त किया गया उनसे उन्हीं बिन्दुओं को समर्थन मिला जो इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंकवाद के हैं। दारूल उलूम देवबन्द के सम्मेलन के उपरांत इसी प्रकार के और सम्मेलन देश के अनेक हिस्सों में आयोजित करने की योजना बन रही है। आतंकवाद विरोध में मुस्लिम संगठनों की इस अचानक पहल की पहेली देश की खुफिया एजेंसियाँ सुलझाने में जुट गयी हैं। एजेंसियाँ केवल यह जानना चाहती हैं कि यह मुस्लिम संगठनों की स्वतःस्फूर्त प्रेरणा है या फिर इसके लिये बाहर से धन आ रहा है। यदि इसके लिये बाहर से धन आ रहा है या फिर यह कोई सोची समझी रणनीति है तो इससे पीछे के मंतव्य को समझना आवश्यक होगा। कहीं यह जन सम्पर्क का अच्छा प्रयास तो नहीं है ताकि इस्लाम के सम्बन्ध में बन रही धारणा को तो ठीक किया जाये परंतु आतंकवाद की पूरी बह्स और उसके स्वरूप पर सार्थक चर्चा न की जाये जैसा कि देवबन्द के सम्मेलन में हुआ भी। तो क्या माना जाये कि खतरा और भी बडा है या सुनियोजित है।

आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिक कंट्रीज ने जहाँ अपने प्रस्तावों से संकेत दिया है कि इस्लामिक उम्मा आने वाले दिनों में अधिक सक्रिय और कट्टर भूमिका के लिये तैयार हो रहा है तो ऐसे में भारत में घटित होने वाली कुछ घटनायें भी उसी संकेत की ओर जाती दिखती हैं। समस्त मुस्लिम विश्व में हो रहे घटनाक्रम एक ही संकेत दे रहे हैं कि इस्लाम में शेष विश्व के साथ चलने के बजाय उसे इस्लाम के रास्ते पर लाने का अभियान चलाया जा रहा है। वास्तव में इस्लामी राजनीति के अनेक जानकारों का मानना है कि इस्लामी आतंकवाद और कुछ नहीं बल्कि फासिस्ट और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित अधिनायकवादी आन्दोलन है जो अपने काल्पनिक विश्व को शेष विश्व पर थोपना चाह्ता है परंतु नये घटनाक्रम से तो ऐसा लगता है कि समस्त इस्लामी जगत इस काल्पनिक दुनिया को स्थापित करना चाह्ता है और उनमें यह भावना घर कर गयी है कि वर्तमान विश्व के सिद्धांतों को स्वीकार करने के स्थान पर कुरान और शरियत के आधार पर विश्व को नया स्वरूप दिया जाये। यही वह बिन्दु है जो राजनीतिक इस्लाम को इस्लामी आतंकवाद के साथ सहानुभूति रखने को विवश करता है क्योंकि दोनों का एक ही उद्देश्य है और वह है खिलाफत की स्थापना और समस्त विश्व के शासन प्रशासन का संचालन शरियत के आधार पर करना।
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