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अभी और को मारना बाकी है क्या!

अखनूर सेक्टर के जोरियान में पुलिस फायरिंग में कम से कम १० लोग घायल हो गये जिनमें एक की हालत गंभीर है। प्रदर्शनकारी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि लौटाने की मांग कर रहे हैं। कल जिले में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में दो युवकों की मौत हो गयी थी। यह आंदोलन आम आदमियों के नेतृत्व में केन्द्र की संप्रग सरकार और राज्य सरकार द्वारा किये गये कायरतापूर्ण और औचित्यहीन समर्पण के विरूद्ध चलाया जा रहा एक राष्ट्रीय आंदोलन है। यह आंदोलन पूरी तरह अलगाववादी शक्तियों द्वारा उठायी गयी दासतापरक मांगों के विरूद्ध है और उन अलगाववादियों के विरूद्ध है जिन्होंने सदैव ही जम्म-कश्मीर के भारत का अभिन्न अंग होने पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं।

Chakka Jam on 13th August for Kashmiri Hindus : An appeal

Dear Brothers,
As you all know that Jammu Kashmir State Government has withdrawn the land allocated to Shri Amarnath Shrine Board for temporary construction. This withdrawal is result of usual pressurisation of fundamentalist Muslims of valley, who wants to make ‘Dar Ul Mustafa’. Fundamentalist Muslim leaders of valley have always been biased with Hindu majority areas. Central government is not only soft with separatists but also boosting their morals anyhow.
Muslim Mafia-Police have peed on the dead body of Kuldeep whom they killed in Jammu! That’s the way they abuse every Hindu they kill everyday. They disconnected the electricity of Hindu areas. Hindu kids are starving for milk and food. No food, No Medicines, No electricity, No civic facilities. Today, Jammu Hindus are already on streets, shading their blood. Rest of Hindus are supposed to be Mute? If No, then support Nationwide ‘chakka jam’ movement called by Vishwa Hindu Parishad on 13th August, and make it huge success. Support not only the Hindus of Jammu but also Nationalism.

http://in.youtube.com/watch?v=TfN-rUlM8U8
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कांग्रेस का देशभक्त चेहरा

कांग्रेस के सहयोगी और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद तथा संसद पर हमले के षड्यंत्र के दोषी एसआर गिलानी का भारत विरोधी रवैया क्या रेखांकित करता है? विडंबना यह है कि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति के बावजूद तथाकथित सेकुलर खेमा और देशभक्त काग्रेस ऐसी अलगाववादी मानसिकता का समर्थन करता है। क्यों? पिछले दिनों जम्मू के रियासी जिले के महोर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय और पाकिस्तानी मुद्राओं का चलन मान्य कर देने की सिफारिश की। इससे पूर्व पिछले साल जम्मू-कश्मीर सरकार के वित्तमंत्री तारीक हमीद कर्रा (पीडीपी नेता) ने प्रदेश के लिए अलग मुद्रा बनाने की बात उठाई थी। सईद का तर्क है कि जिस तरह यूरोपीय संघ के देशों में व्यापार आदि के लिए एक ही मुद्रा का चलन है उसी तरह घाटी में भी पाकिस्तानी मुद्रा का चलन हो ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार के साथ आपसी रिश्ते भी बढ़ें। मुफ्ती मोहम्मद सईद के कुतर्को को आगे बढ़ाते हुए पीडीपी के महासचिव निजामुद्दीन भट्ट ने कहा है कि कश्मीर के स्थाई निदान के लिए पीडीपी का जो स्व-शासन का फार्मूला है, दो मुद्राओं के चलन की बात उसी फार्मूले का आर्थिक पहलू है।

यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए सईद यह भूल गए कि संघ के सभी सदस्य देशों में एक-दूसरे की मुद्रा आपसी रजामंदी से चलती है और यह व्यवस्था किसी एक राज्य या देश के लिए नहीं है। कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा का चलना जम्मू-कश्मीर पर भारत के दावे को कमजोर करेगा। मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं है। कुछ समय पूर्व उनकी पुत्री और पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को भारत आने की छूट देने की मांग की थी। स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद समय-समय पर घाटी से भारतीय फौज हटाने की मांग भी करते रहे हैं-अर्थात घाटी में आतंकवादियों का स्वागत और सेना का विरोध। कभी सेना हटाने तो कभी सीमाओं को खोल देने की वकालत करने वाले सईद पिछले साठ सालों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग क्यों नहीं करते? पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की बात क्यों नहीं उठाते? क्या पीडीपी कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती? क्या दो मुद्राओं के चलन की बात 'दो प्रधान, दो विधान, दो निशान' की अलगाववादी मानसिकता का अंग नहीं है?

यदि मुफ्ती मोहम्मद सईद अपने बयान को अलगाववादी मानसिकता का पोषक नहीं मानते तो उनकी भारतीयता संदिग्ध है। देश का एक बड़ा जनमानस मुफ्ती मोहम्मद सईद को कश्मीरी आतंकवाद का जन्मदाता मानता है। केंद्रीय गृहमंत्री रहते हुए मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री रूबिया का अपहरण और रिहाई के बदले बर्बर आतंकवादियों को छोड़ा जाना इस आशंका के पुख्ता आधार है। संसद पर हमले के आरोप में जब गिलानी को गिरफ्तार किया गया था तब सेकुलर बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग उनके समर्थन में आ खड़ा हुआ था। जांच एजेंसियों और न्यायपालिका पर कीचड़ उछाला गया और गिलानी की राष्ट्रभक्ति के कसीदे काढ़े गए, किंतु पिछले दिनों बरेली की एक संस्था 'पैगामे अमन' द्वारा आयोजित एक सेमिनार में गिलानी ने जो कहा उससे प्रत्येक राष्ट्रभक्त मुसलमान को भी पीड़ा हुई होगी और इसलिए आयोजकों को गिलानी के विचारों से अंतत: असहमति व्यक्त करनी पड़ी। गिलानी ने कहा था, ''मैं भारतीय नहीं हूं। न ही भारत से मेरा कोई ताल्लुक है। मैं कश्मीरी हूं और कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। कश्मीर में जो लोग लड़ रहे है वे आतंकवादी नहीं है। कश्मीर के लोगों की नजर में वे जननायक है।''
गिलानी ने आतंकवादियों की तुलना भगत सिंह से कर डाली। आगे उन्होंने भारत की न्याय व्यवस्था को कोसते हुए आरोप लगाया कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई प्रमाण नहीं होने के बावजूद न्यायपालिका केवल जनभावनाओं को ध्यान में रखकर उसे फांसी पर लटकाना चाहती है। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। यहा तक कह दिया कि अफजल को फांसी देने पर इस देश में दंगा भरक सकता है। कांग्रेसी आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी मेहमान बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है।

संसद पर हमला करने आए आतंकवादियों की कार में लगे गृह मंत्रालय के जाली स्टीकर पर यह वाक्यांश लिखा मिला थे-''भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।'' गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। ऐसे देश द्रोही बतौर अध्यापक नवयुवकों को नफरत और अलगाववाद के सिवा और क्या शिक्षा दे पाएंगे? जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन वाली सरकार है। विधानसभा चुनाव निकट आते देख पीडीपी का पाकिस्तान प्रेम और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देना आश्चर्यजनक नहीं है। अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयान की निंदा करने से कतराती कांग्रेस भी वस्तुत: चुनाव को देखते हुए अलगाववादी ताकतों को नाराज नहीं करना चाहती। आखिरकार धारा 370 कांग्रेस की ही तो देन है। पीडीपी का उद्देश्य वस्तुत: 'स्थायी निवासी विधेयक' जैसे कानूनों से धारा 370 की और अधिक किलेबंदी कर जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से हमेशा के लिए अलग कर देना है।

कांग्रेस अपना पक्ष साफ करे और बताये आखिर कांग्रेस इस देश को तोड़ना चाहता क्यों है।
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