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पाकिस्तान का हालत (सिर्फ व्यस्कों के लिये)

सिर्फ व्यस्कों के लिये 18 साल से कम उम्र के पाठक कृप्या इसे ना देखें

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पाकिस्तान से शान्ति वार्ता या शस्त्र वार्ता

26/11/2008 की घटना के 1 महीना से ज्यादा गुजर गया है। 10 आतंकवादी सिर्फ मुम्बई को ही नही सारे देश को 60 घंटो से ज्यादा के लिये बन्धक बना कर रख लिया था (100 होते तो क्या होता) ताज होटल, नरीमन हाउस, ओबेराय, व छत्रपती शिवाजी स्टेशन सहीत 10-12 जगह हमला किया, ताबड़तोड़ फायरिंग, बम विस्फोट 200 के करीब आदमी मारे गये, जिसमें कई विदेशी भी थे, 300 से ज्यादा घायल, 3 अफसर समेत 14 पुलिस वाले व 2 एन.एस.जी. कमाण्डो शहीद। 9 आतंकी मारे गये और 1 को गिरफ्तार करके फिक्स-डीपोजीट (कभी जहाज का अपहरण होने पर आतंकी हो दे कर जहाज छुराया जा सके, अफजल को भी इसी तरह रखा गया है) में डाल दिया गया। इतना सब होने के बाद नतिजा क्या निकला वही हमेशा कि तरह ढाक के तीन पात। वही आरोप प्रत्योप, वही मिडीया का आतंक से लड़ने का संकल्प, मोमबत्ती जला कर हम एक हैं हम आतंकवाद से नही डरते जैसे तकियानुसी बातें, सुरक्षा ऎजेन्सी और खुफिया ऎजेन्सी पर देषारोपण, सरकार का वही घीसा पिटा व्यान : हम आतंकवाद से नही डरेंगे , हम आतंकवाद का भर्त्तसना करते हैं, आतंकीयों को मुहतोड़ जबाब दिया जायेगा, ये पाकिस्तान का कायराणा हरक्कत है ये, हम पाकिस्तान को नही छोडे़गे , जरुरत परने पर पाकिस्तान में घुस कर आतंकवादी को मारेंगे, इत्यादी-इत्यादी ( ये सब बातें मुझे याद हो गया है)। निन्दा प्रस्ताव, मरेने वालों के लिये शोक संदेश और 20 आतंकियों का वही पुराना लिस्ट जो हिन्दुस्तान 10-12 साल से लिये घुम रहा है।

लेकिन क्या सरकार ने अपना आतंकवाद के सफाया के रवैया में थोडा भी बदलाव लाया है। अफजल अभी तक फिक्सडीपोजीट मे बन्द है। अब एक और एक और आतंकी हाथ लग गया कसाव उसके साथ क्या होगा। उपर से 20 आतंकी का सूची सोचो क्या होगा अगर पाकिस्तान ने ये सभी 20 आतंकी को भारत को सौप दिया तो। हिन्दुस्तान की सरकार इन्हें फाँसी लगा नही सकता है क्यों कि एक समुदाय भड़क जायेगा और इन्हें वोट देना बन्द कर देगा जिससे शायद 10-12 सिट इन्हें कम मिलेगा। क्या होगा अगर ये 20 आतंकि भारत आ गये तो इनका हमारे देश के सरकार उनका क्या करेगा (इस पार आप अपना विचार दें)। अबू सलेम की तरह एक नया राजनीतिक पार्टी बना कर चुनाव के मैदान में ताल ठोकते नजर आयेंगें या फिर किसी राजनितीक दल के जा घुसेंगे और हमारे कर्णधार बन जायेंगे। हो सकता या किसी विशेष समूदाय के होने के कारण राष्टृपति तक बन जाये।

हमारे नेतागण कह रहें है हमारे पास आतंकी के खिलाफ सबूत है कि आतंकि पाकिस्तानी है पक्के सबूत हैं तो फिर आखिर हिन्दुस्तान किस शुभ मुहुर्त का इन्तजार कर रहा है पाकिस्तान पर कार्यवाही करने का। क्या 30-40 और बम विस्फोट और हो जायेगा तब हिन्दुस्तान सोचेंगा कि पाकिस्तान पर कार्यवाही करना है या नही। आखिर क्यों हम हमेशा की तरह इस बार भी अमेरिका का मुँह देख रहें है कि अमेरिका हमें हूक्म दे तो हिन्दुस्तान पाकिस्तान पर हमला करे या फिर सहिष्णुता व अहिंसा के नाम पर शान्ति की वार्ता दुबारा सुरु किया जाय, दोस्ती के नाम पर बस, रेल, प्लेन, बस का आवागमन किया जाय। कार्यवाही के नाम पर अमेरिका का मुँह देखें। हिन्दुस्तान की जगह अगर अमेरिका रहता तो अमेरिका क्या करता क्या अमेरिका। क्या अमेरिका आतंकवाद के खात्मे के नाम पर पर इराक पर हमला नही लिया क्या अफगानिस्तान में आतंकवादीयों को खदेड़-खदेड़ कर नही मारा। एक प्रश्न उठता है क्या ये यह अहिंसा है या कायरता, सहिष्णुता है या हिनभावना या फिर अपने स्वाभिमान का मौत। अगर यैसा नही तो फिर हिन्दुस्तान किस रास्ता पर चल रहा है। क्यों सारे सबूत होने के बावजूद हिन्दुस्तान पाकिस्तान पर कार्यवाही करने से क्यों कतरा रहा है? आज क्यों हिन्दुस्तान अपने स्वाभीमान की रक्षा के लिये अमेरिका जैसा व्यापारी देश का तलवा चाट रहा है क्या कारण है कि हमारे यहाँ के नेता सुटकेस में सबूत का पुलिन्दा बान्ध कर सारे विश्व का परिकर्मा कर रहा है। हमारे नेता क्यों नही वोट प्रेम को छोड़ अफजल को फाँसी पर लटका रहें हैं, लादेन के हमशक्ल को लेकर घुमने बाले नेताओं को देशद्रोह के मामले में जेल में क्यों नही डाला जा रहा है उन्हें पुरस्कार स्वरुप मंत्री पद क्यों दिया जा रहा है। क्यों नही तुष्टीकरण की नीति को छोड़ कर हिन्दुस्तान में पल रहे पाकिस्तान के ऎजेन्ट को किसी चौक चौराहे पर खरा करके गोली मारा जा रहा है। क्यों नही पाकिस्तान के साथ सभी संबन्ध को खत्म किया जा रहा है क्यों शान्ति वार्ता की जगह पाकिस्तान को शस्त्र वार्ता का न्योता नही भेजा जा रहा है। क्यों हमारे देश के कर्णधार राम व कृ्ष्ण के धर्म का पालन करते हूये पाकिस्तान में पल-बढ रहे आतंकि ठिकानों के खत्म करके अपने राजकीय धर्म का पालन क्यों नही कर पा रहें हैं।
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पाकिस्तान को मिटाओं नही तो पाकिस्तान हमें मिटा देगा

दो दिन पहले जैसे टी.वी. खोला समाचार चैनल का ब्रेकीग न्यूज सुनने को मिला कि नोयडा में यु.पी पोलिस और ए.टी.स. ने मिल कर दो आतंकी को ढेर कर दिया खबर मेरे लिये तो चौंकाने वाला था क्यों कि मैं भी नोयडा में रहता हू। लेकिन कुछ नेता के लिये ये खबर खुशखबरी लेकर आया है। जो सेक्यूलरिज्म का ढोंग करके वोट बैंक के लिये किसी भी हद तक जा सकते हैं। जिन्हें इन दो मारे गयें आतंकवादियों के नाम पर राजनीति करने का मौका मिलेगा और आतंकवादियों को देशभक्त सिद्ध करके एक समुदाय को खुश करने का कोशिश करेंगे जिससे उस समुदाय का वोट उन्हें मिले। आखिर कब तक ये देश इन नेताओं के घिनौना नाटक को देख और सुन कर चुप बैठेगा।

ये हिन्दुस्तान हैं जहा लादेन का डुपलीकेट को लेकर चुनाव प्रचार में घूमें और उनकी इस देश विरोधी हरकत के लिये यहा कोई अँगुली तक उठाने वाला कोई नही । 26/11 कि घटना हो गई हमारे नेतागण सिर्फ गीदर भभकी देते रह गये तब तक पाकिस्तान ने नोयडा में दो और आतंकी भेज दिये।आखिर हिन्दुस्तान ने क्या कर लिया पाकिस्तान का, पाकिस्तान के नेताओं को हमारे हिन्दुस्तान के नेताओं का गिदर भभकी वाला औकाद पता था इस लिये पहले दिन से पाकिस्तान ने कह दिया पाकिस्तान किसी आतंकवादी को नही सौंपेगा हिन्दुस्तान को जो करना है कर ले। हिन्दुस्तान आज से नही लगभग 10-12 साल हिन्दुस्तान से मोस्ट वान्टेड अपराधी का एक लिस्ट बना कर जेब में रख कर घुम रहा है और पाकिस्तान का पैर पुज कर निहोरा कर रहा है कि दे दो हमारे मोस्ट वान्टेड अपराधी को दे दो जबकि पाकिस्तान हमेंशा से हिन्दुस्तान को लतीयाते रहा है। हमारा देश और यहा के नेता पाकिस्तान का एक बाल भी बांका नही कर पायें। हमारे देश का नींव ही कमजोर है। ये देश स्वार्थी, लोभी, अपराधियों, दलालों, अनाडींयों के हाथ का खिलौना बना गया है।

आज तक कई बार हिन्दुस्तान के पाकिस्तान का तलवा चाटा । लियाकत अली से मेल मिलाप करके अपने मंत्रीमण्डलीय साथियों को त्याग पत्र देने को बाध्य करते रहेंगे, फिरोज खाँ नून को बेरुवाडी़ सौंपते नहीं शर्मांयेगे, अयूब खाँ से हाथ मिलाने ताशकन्द जा पहूचेंगे, भुट्टो को शिमला की सैर करायें और अपने सौनिकों की विजय को उनके हाथ में दे कर अपना पीठ ठोंकेगें, जियाउल्ल हक के तलवा चाटने के लिये क्रिकेट मैच देखने के लिये बुलायें। हजरतबल आतंकियों को बिरयानी खिलाकर अपना चार बीघा नामक क्षेत्र 999 साल के लिये शत्रू को दे दिये। जन्मजात शत्रु से हाथ मिलाने के लिये बस ले कर पाकिस्तान गयें। कारगील और संसद पर हमला करने बाले मुशरफ को अपने गोद में बीठा कर आगरा घुमाये। जिन्ना को सेकूलर होने का प्रमाण पत्र देने का ठिका हम पाले। बेनजीर और जरदारी को शान में कशीदे का पाठ करें। नतीजा ढाक के तीन पात हिन्दुस्तान जितना पाकिस्तान का तलवा चाटता है पाकिस्तान उतना ही हिन्दुस्तान को लतीयाता है।

हमें ये बात याद करके रखना चाहिये कि पाकिस्तान हमारा अपना कभी नही था और ना होगा चाहे हिन्दुस्तान के नेता कितना भी तलवा चाट ले पाकिस्तान हमारा दोस्त नही बन सकता है, जिसने कसम खा रखा है हिन्दुस्तान को बरबाद करने का आखिर उस देश के साथ हम क्यों दोस्ती का हाथ मिलायें आखिर कब तक हमारे नेता चम्मचागीरी नीति ला पालन करतें रहेंगें। हमारें नेता कभी बस से, कभी प्लेन से तो कभी रेल पाकिस्तान गये क्या मिला हिन्दुस्तान को धोखा, बम ब्लास्ट कारगील युध्द, पाकिस्तान से इससे ज्यादा उम्मीद भी नही कि जा सकती है। हिन्दुस्तान को चहीये बस, रेल, प्लेन सब भुल कर सिर्फ एक बार टैंक पर चठ कर पाकिस्तान चले जायें पाकिस्तानीयों को छीपने के लिये एक नया बाप को खोजना पडे़गा । हमें यें बात गाठ बाध कर रख लेना चाहियें कि अगर पाकिस्तान को हम नही मिटाये तो पाकिस्तान हमें मिटा देगा।
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हिन्दुस्ताने के नेता और अमेरिका के नेता

मुम्बई में इस्लामिक आतंकवाद के बाद के घटनाकम्र पर अगर हम नजर डालें तो हमें क्या नजर आता है। क्या कुछ नया नजर आया । मुझे एक बात नया इस बार नजर आया कि इस इस्लामिक आतंकी घटना के बाद काग्रेस का कलह सतह पर आ गया काग्रेंसी नेता का देश की जगह कुर्सी प्रेम साफ झलक गया। बेचारे शिवराज पाटिल को कुर्सी पर से उठा कर पटक दिया गया। जैसे कि आज तक जितने आतंकी घटना हुआ उसका नैतिक जिम्मेदारी सिर्फ शिवराज पाटिल ही हैं और कोई नही। हमें याद है सिर्फ शिवराज पाटिल ही नही काग्रेंस के हर एक नेता ताल ठोक कर पोटा जैसा कानून हिन्दुस्तान में लागु नही करने का कसम खाते थें। उन सभी नेताओं को काग्रेंस बाहर का रास्ता नही दिखाया निकाला गया तो सिर्फ शिवराज पाटिल को। काग्रेंस के सहयोगी दल जो सरकार में काग्रेंस के साथ में गलवहिया डाले घुमतें हैं जिन्होंने तो खुल कर आतंकवाद का सर्मथन किया लालु प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, काग्रेंस के खुद सबसे बडें नेता अर्जुन सिंह, काम्यूनिष्ट के नेतागण , इन सबके तरफ काग्रेंस ने देखा तक नही, बेचारे शिवराज पाटिल को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जिससें हम जनता समझें काग्रेंस आतंकवादीयों के खिलाफ भयानक कदम उठा रहा है। शिवराज पाटिल को निकाल बाहर करने के बाद अब हिन्दुस्तान में कभी किसी तरह की कोई आतंकी घटना होगा ही नही जैसे शिवराज पाटिल को निकाल कर हिन्दुस्तान में पोटा लगा दिया गया है। शिवराज पाटिल के बाहर निकालने का सिर्फ एक कारण है चार राज्यों में चुनाव है काग्रेस को वहा भी जाकर सभी को मूँह दिखाना है इस लिये शिवराज पाटिल को धन्यवाद कह दिया गया और जो असली समस्या है उसे अनदेखा कर दिया गया। काग्रेंस ने फिर से आतंकवादीयों के खिलाफ ठुलमुल नीति अपनाई और किसी तरह का कोई कठोर कानून कागज के पन्नों और मीटिंग से बाहर निकल कर नही आया। हमें अपने देश के नेताओं को और अमेरिका के नेताओं का मिलान करना चाहियें इस आतंकि घटना में अमेरिका के कुछ नागरीक भी मारे गयें हैं सिर्फ इस बात पर अमेरिका ने पाकिस्तान में अपने विदेश मंत्री को भेज कर वहा के प्रधानमंत्री का गिरेवान तक पकर लिया और कह दिया या तो तुम आतंकवादीयों के खिलाफ कठोर कदम उठाओ नही तो अमेंरिका खुद पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिरायेगा। इस पुरी घटना कम्र में हिन्दुस्तान के नेताओं का कुर्सी प्रेम और अमेंरिकी नेताओं का देशप्रेम साफ झलक रहा है। हमारे देश में 1970 से अभी तक पुरे देश में 4100 आतंकि हमला हो चुका है। लेकिन अभी तक एक बार भी ठोस कदम नही उठाया गया। लेकिन अमेरीका में सिर्फ एक आतंकी घटना के कारण उसनें कई देशों मे घुस कर उसने आतंकियों के खात्मा करने का कसम खा लिया।

आतंक से बार-बार लहू-लुहान होने के बाद भी हम अपने तथाकथित विदेशनीतिक सिद्धांतों के पाखंड से चिपके रहते हैं। यह हमारी राजनीति ही नहीं अफसरशाही और कूटनीति का भी किस्सा है। अगर हम वास्तव में आंतक से लड़ने के लिए कटिबद्ध हैं। अगर दहशतगर्दी के विरूद्ध निर्णायक मुकाबला करना चाहते हैं तो हमें दोस्तों और दुश्मनों का अब वक्त आ गया है कि चुनाव साफ-साफ करना होगा। अपने दम पर किसी से मुकाबला करना गौरव की बात होती है लेकिन जब बार-बार हम मुकाबला करने के नाम पर सिर्फ चोटे ही खा रहे हों तो ऐसे में अकेले मुकाबले का पाखंड नहीं करना चाहिए। यह साबित करने की जरूरत है कि भारत आज दुनिया में आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित है हालांकि हाल के सालों में अमेरिका दहशतगर्दी का सबसे बड़ा हमला झेला है। ९/११ के रूप में। लेकिन तथ्य यह भी है कि अमेरिका ने इस हमले के बाद से आंतकवादियों की कमर तोड़ कर रख दी है। नौ व ग्यारह के बाद अमेरिका में बडी तो छोड़िए आतंक की छोटी वारदात भी नहीं हुई।
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कोई इन्हें बचाओ

हिन्दुस्तान में मुस्लमानों को हर तरह कि सुख सुविधा सरकार के द्वारा दिया जा रहा है यहा तक कि मुस्लिम आतकवादियों भी सरकार फाँसी पर लटकाने से गुरेज कर रही है। आतंकवाद कि पाढ़शाला मदरसा को दिल खोल कर सरकारी सुविधा मील रहा है जिसका नतीजा है कि हिन्दुस्तान में आये दिन कही न कही बम विस्फोट या फिर दंगा फसाद होते रहता है लेकिन इसके ठीक उलट पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की हालत चिंता का विषय है और सरकार इस ओर से आँख बन्द कर रखा है।

पाकिस्तान के हिंदुऒं ने अपने समुदाय के खिलाफ जानमाल को लक्ष्य बनाकर हो रही घटनाऒं के प्रति चिंता जताई है। गौरतलब है कि देश में हिंदुऒं के धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

अल्पसंख्यक हिंदु समुदाय की पाकिस्तान हिंदू परिषद् (पीएचसी) के प्रतिनिधिमंडल ने चिंता जताई है कि सिंध प्रांत में हिंदुऒं को लगातार लूट और डकैती का निशाना बनाया जा रहा है। उनके खिलाफ इस तरह की घटनाऒं में वृद्धि हो रही है। परिषद ने मांग की है कि इस्लामाबाद की संघीय सरकार इन घटनाऒं को रोकने के तुरंत कोई कदम उठाए और देश में अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करे।

जाकोकाबाद में हाल ही में हुई लूट की घटना के विरोध प्रदर्शन में कराची में बड़ी संख्या में हिंदुऒं ने भाग लिया। जाकोकाबाद में कुछ हथियारबंद लोगों ने मंदिर में घुस कर करीब ३५० हिंदू महिलाऒं से लाखों रूपये की नगदी तथा जेवरात लूट लिए थे। सिंघ के पूर्व सांसद डा. रमेश लाल ने पुलिस और अन्य कानूनी एजेंसियों पर आरोप लगाया है कि वह नागरिकों खासतौर पर अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम रही हैं।

पीएचसी के सचिव हरी मोटवानी ने डेली टाइम्स अखबार को बताया कि डाकुऒं ने करीब सात करोड़ की लूट की है और जाकोकाबाद की हाल ही की घटना के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोग खासतौर पर महिलाएं धार्मिक स्थानों पर जाने में डरने लगे हैं। मोटवानी ने कहा कि इसलिए हम मांग करते हैं कि सरकार डकैतों को तुरंत गिरफ्तार करे और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्र्चित करे। उन्होंने कहा कि यह घटना दिन के समय हुई है बावजूद इसके पुलिस इसे रोक नहीं पाई।

पीएचसी के अध्यक्ष राजा असेरमल मांगलानी ने कहा कि सिंध के उत्तरी जिलों में हिंदुऒं के साथ लूट और अपहरण की घटनाएं हो रही हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में डर और असुरक्षा की भावना घर कर गई है। सरकार को चाहिए कि वह लोगों में व्याप्त इस इस डर की भावना को दूर करे।
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सरबजीत एक मोहरा तो नहीं

पाकिस्तान की जेल में पिछ्ले 18 वर्षों से बन्द भारतीय मूल के व्यक्ति सरबजीत को जब पहली बार पाकिस्तान सरकार की ओर से फांसी देने की बात की गयी तभी ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह किसी गहरी साजिश का आरम्भ है। फिर जिस प्रकार से सरबजीत की फांसी टाली जाती रही और पाकिस्तान के एक पूर्व मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी ने मानवता के नाम पर इस विषय में रूचि दिखाई उससे यह विषय अधिक उलझता ही प्रतीत हुआ।


सरबजीत के परिवार को जिस प्रकार पाकिस्तान की सरकार ने पहले वीजा देने में आनाकानी की और फिर कुछ देर के लिये सरबजीत को मिलने की अनुमति दी वह भी इस विषय को चर्चा में लाने में काफी सफल रहा। पहली बार जब सरबजीत को फांसी की तिथि निर्धारित हो गयी तो कुछ हल्कों में खुसफुसाहट होने लगी कि इस मामले में पाकिस्तान सरकार मोलतोल के विचार में है और भारत सरकार की ओर से सफाई आई कि सरबजीत के बदले में किसी पाकिस्तानी कैदी को नहीं छोडा जायेगा। ऐसा ही बयान सरबजीत की पुत्री की ओर से भी आया और उसने स्पष्ट कहा कि वह कभी नहीं चाहेगी कि उसके पिता के बदले किसी आतंकवादी को छोडा जाये।

आज उन परिस्थितियों में कुछ अंतर आ गया है। पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत की फांसी पर अगला निर्णय आने तक रोक लगा दी है। अब ऐसी आशा की जा रही है कि सरबजीत को संभवतः पाकिस्तान सरकार रिहा कर देगी। यह सम्भावना काफी हर्ष की बात है परंतु जिस प्रकार पाकिस्तान से वापस आने के बाद सरबजीत की बहन दलजीत कौर ने कहा है कि भारत सरकार को पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाते हुए संसद पर आक्रमण के दोषी मोहम्मद अफजल को भी रिहा कर देना चाहिये। सरबजीत की बहन ने पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठन के किसी व्यक्ति को भी उद्धृत किया है कि “ जो दूसरों को झुकाना चाहते हैं उन्हें स्वयं भी झुकना पडता है”। संकेत स्पष्ट है कि भारत सरकार से अपेक्षा की जा रही है कि वह मोहम्मद अफजल को रिहा कर दे।


पाकिस्तान की ओर से जिस प्रकार बिना किसी भूमिका के सरबजीत को पहले फांसी घोषित करना और फिर पाकिस्तान के ही एक पूर्व मंत्री का इस मामले में हस्तक्षेप करना और उनके हस्तक्षेप से सरबजीत की फांसी को टालते जाना किसी मैच फिक्सिंग की तरह लग रहा था।


वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा जिन परिस्थितियों में सरबजीत को फांसी देने का निर्णय किया गया था उस समय पर ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह समय वह था जब पाकिस्तान में मुशर्रफ़ विरोधी दल चुनाव जीत चुके थे और मुशर्रफ़ के सामने अपने अस्तित्व का संकट था। जनसम्पर्क और मीडिया में चर्चा में रहकर अपने विरोधियों को चित करने की कुशलता मुशर्रफ़ से अधिक किसी में नहीं है। हाशिये पर जा रहे मुशर्रफ ने एक दाँव फिर खेला और पाकिस्तान में अपने ऊपर अमेरिका परस्त होने और मुजाहिदीनों के प्रति कडा रूख अपनाने के आरोपों को हटाने के लिये मुशर्रफ़ ने सरबजीत को अपना मोहरा बनाया है।

यह बात और स्पष्ट रूप से समझने के लिये हमें पाकिस्तान में अमेरिका के समर्थन से चल रही आतंकवाद के विरुद्ध लडाई को भी निकट से देखना होगा। वास्तव में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने अपने देश में पश्चिमोत्तर प्रांत और वजीरिस्तान में स्थानीय कबायलियों द्वारा सेना के विरुद्ध चल रही लडाई को जीतने के नाम पर फूट डालो और राज करो की नीति पर काम किया है और आतंकवादियों को नस्ल के आधार पर बांट दिया है। आज पाकिस्तान की सेना वजीरिस्तान और पश्चिमोत्तर प्रांत में पश्तून आतंकवादियों से दोस्ती कर रही है और उसके निशाने पर केवल अरब नस्ल के अल कायदा के लडाके हैं। यही कारण है कि 2007 में पाकिस्तान सरकार ने वजीरिस्तान में कबायलियों से समझौता कर लिया था कि सरकार न तो उन पर खुफिया आधार पर नजर रखेगी और न ही सेना उन पर कोई कार्रवाई करेगी लेकिन इसके बदले में ये लडाके सेना पर आक्रमण नहीं करेंगे। ऐसा समझौता करने के पीछे पाकिस्तान की सोच यह थी कि सेना के पश्तून सैनिक कभी भी पश्तून विद्रोहियों को नहीं मारेंगे और यदि पंजाबी सैनिकों को इस मोर्चे पर लगाया जाता है तो सेना में पंजाबी और पश्तूनी लाबी में तनाव और टकराव बढ सकता था। इसी कारण पाकिस्तान ने रणनीति अपनाई कि अरब नस्ल के आतंकवादियों को निशाना बनाया जाये जिससे अमेरिका भी प्रसन्न रहे और देश में रह रहे विद्रोहियों से सेना को युद्ध न करना पडे।


इसी नीति के सन्दर्भ में यदि मुशर्रफ की उस शतरंज की चाल को समझने का प्रयास किया जाये जिसमें सरबजीत को एक मोहरा बनाया गया है तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। आज यदि पाकिस्तान सरबजीत के बदले जैशे मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद अफजल को छुडाने में सफल हो जाता है तो इसका श्रेय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को जायेगा और देश के कट्टरपंथियों के बीच वे अपनी छवि सुधार सकेंगे। परवेज मुशर्रफ राजनीति के एक मंजे हुए खिलाडी हैं और उन्हें पता है कि दो ध्रुवों पर टिकी यह सरकार अधिक दिनों तक नहीं चल सकेगी और ऐसे में उनका दाँव मुल्ला मिलिट्री गठबन्धन पर ही निर्भर करेगा। इस दाँव के सफल होने के लिये जरूरी है कि वे सेना को खुश रखें और सेना की खुशी इसी में है कि पाकिस्तान में भारत विरोधी जिहादी गुट सशक्त और सक्रिय रहें। जिस प्रकार पाकिस्तान ने 2000 में कन्धार विमान के अपहरण में सक्रिय भूमिका निभाकर मसूद अजहर को छुड्वाया था जिसने बाद में जैशे मोहम्मद की स्थापना की और उसी संगठन ने 13 दिसम्बर 2001 को भारत की संसद पर आक्रमण किया और उसी आक्रमण में दोषी सिद्ध किये गये आतंकवादी को पाकिस्तान एक बार फिर पिछ्ले दरवाजे से रिहा कराना चाहता है।


सरबजीत की बहन द्वारा मोहम्मद अफजल की रिहाई के लिये भारत सरकार से की जा रही सिफारिश से स्पष्ट है कि पाकिस्तान में अधिकारियों ने दलजीत कौर को ऐसे किसी फार्मूले के बारे में कोई संकेत अवश्य दिया है। अब देखना यह है कि भारत सरकार इसे किस रूप में लेती है। वैसे भारत सरकार मोहम्मद अफजल की फांसी को ठण्डॆ बस्ते में डालकर अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुकी है।


पाकिस्तान के इस नये दाँव से एक प्रश्न यह भी उठता है कि पाकिस्तान में नयी सरकार आने के बाद क्या भारत विरोधी आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता। जिस प्रकार इसी लेख में ऊपर कहा गया है कि पाकिस्तान अब आतंकवादियों को नस्ल और देशी विदेशी आधार पर देख रहा है। इस कारण नयी सरकार ने अपने देश के आतंकवादियों या पश्चिमोत्तर और वजीरिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों से बातचीत करने का निर्णय लिया है। इसका सीधा परिणाम आतंकवादी संगठनों को पुनः शक्तिशाली होने के रूप में सामने आयेगा। 2007 में कबायली क्षेत्रों में आतंकवादियों से पाकिस्तान सरकार के किये गये समझौते का परिणाम यह हुआ कि यहाँ अल कायदा के शीर्ष नेतृत्व को शरण दी गयी जिसने अपने संगठन को नये सिरे से संगठित कर लिया है और नयी पीढी का नेतृत्व भी तैयार कर लिया है जिसके सहारे आने वाले वर्षों में वह पूरी दुनिया में तबाही मचाने में सक्षम हैं।


पाकिस्तान भले ही आतंकवादियों को नस्ल या भौगोलिक सीमाओं में बाँधकर अपना पराया बताये परंतु उनका उद्देश्य सामान्य है और वह है कुरान और शरियत आधारित विश्व व्यवस्था की स्थापना। भारत के लिये ये संकेत किसी भी प्रकार शुभ नहीं है और जो लोग पाकिस्तान में नयी सरकार की स्थापना पर नये लोकतांत्रिक पाकिस्तान के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं उन्हें कल्पना लोक से वापस आकर वास्तविक लोक में जीना चाहिये जहाँ पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद अब भी भारत के लिये सबसे बडी चुनौती है।
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