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केरल मा‌र्क्सवादी गुंडों में शिकार हुये निर्दोष जनता

केरल में 2001 से अभी तक मा‌र्क्सवादी गुंडों में शिकार हुये निर्दोष जनता|

1. Thayakandi Prasanth - Panoor- 2 Jan 01

2. Rajesh Konkachi - 4 Mar 01

3.T Aswinikumar, Poyiloor - 22 Feb 02

4. M Surendran,Poyiloor - 22 Feb 02

5. CK Sujesh - Melur - 2 Mar 02

6. P Sunil - Melur - 2 Mar 02

7. Uthaman Chavassery - mattanor- 2002

8. Ammu Amma Thillankeri - iritti- 2002

9. Shaji paduvilayi - Koothuparamba- 17 Nov 03

10.T Aswinikumar,punnad - Iritti- 10 Mar 05

11.Sooraj mozhappilangad- Thalasery-7 Jul 05

12. E Preman, moozhikkara- Thalasery- 5 Nov 05

13. Adv. Valsaraj - Panoor- 5th Mar 07

14. Pramod mooriyad -Koothuparamba-16 Oct 07

15. Biju kodunganoor- Trivandrum- 1 Dec 06

16.G Chandran vallikunnam-Chengannur-20 Apr 07

17.N Sunilkumar kilimanur-Attingal-9 May 06

18.Unnimenon punnayoorkulam-Guruvayur-

19.Damodaran ambalathara- Kanhangad-23 June 03

20.Udayan kottapara- Kanhangad-22 Oct 2000

21.Jayachandran ajanoor- Kanhangad- Aug 03

22.Ravendran-Tirur-20 Jan 07

23.Laxman -Tirur- 16 Feb 07

24.T Kunjumon Marad- Kozhikode-3 Jan 02

25.T Shimjith Marad - Kozhikode -3 Jan 02

26.AP Dasan Marad- Kozhikode -2 May 03

27.P Gopalan Marad- Kozhikode -2May 03

28 A Krishnan Marad- Kozhikode -2May 03

29.C Madhavan Marad- Kozhikode -2 May 03

30. C Chandran Marad- Kozhikode -2 May 03

31.T Santhosh Marad- Kozhikode -2 May 03

32.T preji Marad- Kozhikode -2 May 03

33.T Pushaparaj-Marad- Kozhikode -2 May 03

34.Vinod vallikunnam-Chengannur-23 Dec 07

35. Sujith-Engandiyur, Triprayar 17.12.06

36. Shaju- Alur, Chalakudi, 12. 02.2007

37.Nikhil- Thalasery-6 Mar 08

38.Sathyan-Koothuparamba-6 Mar 08

39.Mahesh-Chittariparamba-6 Mar 08

40.Suresh Babu-Kodiyeri-7 Mar 08

41.KV Surendran-Illathuthazham-7 Mar 08

42. Vinod Kumar -Chengannur-23 Dec '07

43. Shaju - Alur, Chalakkudi. 12.02.07

44. Sujith- Engandiyur, Triprayar.17.12.06
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कन्नूर कम्युनिस्ट पार्टी का घिनौना चेहरा

केरल का कन्नूर जिला मा‌र्क्सवाद हिंसा से सुलग रहा है। कन्नूर भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना स्थली है, जिसे मा‌र्क्सवादी गर्व से 'भारत का लेनिनग्राद' कहते है। कन्नूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य 1943 में प्रारंभ हुआ और तब से ही माकपा का दुर्ग माने जाने वाले इस क्षेत्र में हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ताओं पर माकपाई हिंसा जारी है। संघ की बढ़ती साख से घबराए मा‌र्क्सवादियों ने 1969 में एक संघ कार्यकर्ता की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी थी। 1994 में पेशे से शिक्षक और संघ के कार्यकर्ता 35 वर्षीय जयकृष्णन को कन्नूर के एक स्कूल में विद्यार्थियों से भरी कक्षा में काट कर मार डाला गया था। वे छात्र शायद ही उम्र भर उस वीभत्स कांड को भूल पाएंगे। पिछले चालीस सालों में 250 से अधिक लोग माकपाई हिंसा में मारे गए है। सैकड़ों जीवन भर के लिए विकलांग कर दिए गए। बर्बरता ऐसी कि मृतकों या घायलों के चित्र मात्र देख आत्मा सिहर उठे।
कन्नूर से त्रिशूर और कोट्टयम से तिरुअनंतपुरम तक संघ, भारतीय जनता पार्टी, विहिप, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ आदि हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता मा‌र्क्सवादी गुंडों के निशाने पर है। इसके विरोध में जब हाल में माकपा के दिल्ली स्थित मुख्यालय पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए भाजपा कार्यकर्ता एकत्रित हुए तो उन पर मुख्यालय के अंदर से पथराव किया गया। बर्बर हिंसा के बल पर अपना वर्चस्व कायम करने के अभ्यस्त मा‌र्क्सवादी कन्नूर हिंसा पर खेद प्रकट करने की जगह संसद में भी सीनाजोरी कर रहे है। संसद में हंगामा खड़ा कर वे कन्नूर की हिंसा को छिपाने की कोशिश में लगे है। उनका यह पैंतरा नया नहीं है। अभी कुछ समय पूर्व ही पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में सरकार समíथत जिस तरह मा‌र्क्सवादी कामरेडों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा की गई थी उसे भी देश और मीडिया की नजरों से छिपाने की पूरी कोशिश की गई थी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने तब इस हिंसा की कड़ी आलोचना करते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। केरल के हिंसाग्रस्त कन्नूर जिले की असली तस्वीर क्या है, यह केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. कुमार की टिप्पणी से स्पष्ट है। उन्होंने कहा है, '''सरकार और पुलिस के समर्थन से की गई यह हिंसा दिल दहलाने वाली है।''' उन्होंने पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा, ''पुलिस का नया चेहरा देखने को मिला, वह एक पार्टी विशेष के नौकर की तरह काम कर रही है..हिंसा रोकने का एकमात्र विकल्प कन्नूर को केंद्रीय सुरक्षा बलों के हवाले करना है।'' व्यवस्थातंत्र पर मा‌र्क्सवादी कार्यकर्ताओं के शिकंजे का यह अपवाद नहीं है।
सत्तार के दशक में पश्चिम बंगाल की कांग्रेस-कम्युनिस्टों की मिली-जुली सरकार में शामिल मा‌र्क्सवादियों ने अपनी कार्यसूची और भूमि सुधार कानूनों को लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर राज्यवार हिंसा का दौर चलाया था। प्रशासन और पुलिस का राजनीतिकरण करने के कारण 1977 में मा‌र्क्सवादियों को अपना वर्चस्व कायम करने में बड़ी मदद मिली। इस मा‌र्क्सवादी हिंसा के विरोध में तब कांग्रेसी मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे थे। यह स्थापित सत्य है कि जो भी व्यक्ति या संगठन मा‌र्क्सवादी विचारों से सहमत नहीं होते उन्हे मा‌र्क्सवादी सहन नहीं कर पाते। दिल्ली में माकपा का एक चेहरा है तो पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में अलग। नंदीग्राम की हिंसा बताती है कि अपने विरोधियों से निपटने के लिए मा‌र्क्सवादी किस हद तक जा सकते है।
साठ के दशक से पूर्व और उसके बाद सत्ता हथियाने के लिए कम्युनिस्टों ने हिंसा का किस तरह सहारा लिया, यह सर्वविदित है। तीस के दशक में छिटपुट हिंसा की घटनाओं के साथ ये देश भर में आंदोलन खड़ा करने में क्षणिक रूप से सफल हुए थे, किंतु कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक पार्टी बनी रही और मजदूर संघों में राष्ट्रवादी ताकतों का वर्चस्व रहा। 40 के दशक में कम्युनिस्टों को सुनहरा अवसर मिला। ब्रितानियों के खिलाफ राष्ट्रवाद के उफान के दमन पर वे ब्रितानियों के संग हो लिए। बड़े पैमाने पर राष्ट्रवादी नेता जेल में कैद थे। इससे कम्युनिस्टों को भारतीय राजनीति, खासकर मजदूर संघों में सेंधमारी करने का उपयुक्त अवसर मिला। 1964 में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ वैचारिक प्रश्नों पर हुए वाद-विवाद में पी. सुंदरय्या, एके गोपालन, हरिकिशन सिंह सुरजीत आदि कम्युनिस्ट नेताओं ने लिखा था, ''हमारे देश में शांति के पथ को अपरिहार्य बताना अपने आप को और दूसरों को धोखा देना है।'' 1964 का यह दस्तावेज, जो माओ की हिंसक क्रांति पर आधारित था, वास्तव में अंतत: सीपीआई के उद्भव का आधार बना।
तब से लेकर आज तक मा‌र्क्सवाद का यह घटक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आने के बावजूद लगातार अपनी गतिविधियों से यह प्रमाणित करता रहा है कि विरोधी स्वर को दबाने के लिए वह हिंसा के किसी भी स्तर तक उतर सकता है। हिंसा और दमन का विरोध करने वाले केरल के केआर गौरी और पश्चिम बंगाल के मोहित सेन जैसे कामरेडों को इसीलिए धक्के मार निकाल बाहर किया गया था। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कम्युनिस्टों का जो प्रभाव है वह उनकी हिंसा की राजनीति के बल पर ही स्थापित हुआ है। कन्नूर मा‌र्क्सवादियों के वर्चस्व वाले उत्तारी मालाबार का मुख्यालय है। नंदीग्रामवासियों की तरह मालाबार के लोग भी अब मा‌र्क्सवाद के विरोध में मुखर हो उठे है। कथित मा‌र्क्सवादी शहीदों के नाम पर जनता से धन उगाही, आतंकवाद को समर्थन, छिटपुट व्यापार से लेकर भवन निर्माण तक में मा‌र्क्सवादी पार्टी की तानाशाही, नागरिकों से आय के हिस्से से पार्टी के लिए चंदे की वसूली, रोजगार में माकपा कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता जैसे दमन व शोषण के अनगिनत कार्यो के खिलाफ मालाबार की जनता अब उठ खड़ी हुई है। मा‌र्क्सवादी विचारधारा के खिलाफ आम आदमी का यह विद्रोह मा‌र्क्सवादियों के लिए असहनीय है। वस्तुत: राष्ट्रवादी विचारधारा से कोसों की दूरी होने के कारण भारतीय जनमानस में मा‌र्क्सवाद अपनी पैठ नहीं बना पाया है। इसीलिए मा‌र्क्सवादी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए हिंसा का सहारा लेते है। उन्हे पता है कि वर्ग-संघर्ष की दुकानदारी भारत में नहीं चल सकती।
साम्यवाद दुनिया भर से सिमटता जा रहा है। ऐसे में मा‌र्क्सवादियों को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा राष्ट्रवादी ताकतों से लगता है। आश्चर्य नहीं कि भाजपा और संघ परिवार मा‌र्क्सवादियों के निशाने पर रहते है। यह सही है कि हिंसा के बदले हिंसा भारतीय परंपरा की पहचान नहीं है, किंतु अनवरत हिंसा का प्रतिकार क्या हो सकता है? हिंसा? अंततोगत्वा सभ्य समाज को ही भारत की बहुलतावादी परंपरा की रक्षा के लिए मा‌र्क्सवादियों की हिंसा के खिलाफ गोलबंद होना होगा। कन्नूर की ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं मा‌र्क्सवादी विचारधारा में कोई अपवाद नहीं है। कम्युनिस्टों को हिंसा के माध्यम से अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के दमन और प्रताड़ित करने का विश्वव्यापी अनुभव है। सोवियत संघ से लेकर, कम्युनिस्ट चीन, कंबोडिया, क्यूबा में करोड़ों निर्दोषों की हत्या कम्युनिस्टों के रक्तरंजित इतिहास में दर्ज है। यदि कन्नूर में फैली इस हिंसा को समाप्त नहीं किया गया तो यह कालांतर में दावानल बन सकता है।
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तिब्बत और फिलीस्तीन

इन दिनों तिब्बत चर्चा में है। वैसे तो इसके पीछे जो कारण है उसे लेकर तो तिब्बती भी प्रसन्न नहीं होंगे पर दशकों उपरांत ऐसा अवसर जरूर आया है जब तिब्बत का विषय एकदम से वैश्विक मह्त्व का हो गया। हम यहाँ इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाह्ते कि तिब्बत के इस विषय के मह्त्वपूर्ण होने के पीछे प्रमुख कारण क्या है वरन हम एक समानता की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाह्ते हैं जो न केवल रोचक है वरन उसके गम्भीर राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। साथ ही यह विषय कहीं न कहीं जाकर उन नारों से भी जुड्ता है जिसे विभिन्न संगठन या राजनीतिक दल समय-समय पर अपनी सुविधा के अनुसार गला फाड्-फाड् कर लगाते हैं। ऐसा ही एक नारा मानवाधिकार का है जो विश्व भर के वामपंथियों का सबसे प्रिय विषय है। यह वामपंथियों के हाथ में वह छडी है जिससे वे जब चाहे जिसे चाहे मारते रह्ते हैं। इस नारे रूपी छडी का सर्वाधिक उपयोग इन वामपंथियों ने सबसे अधिक इजरायल या फिर हिन्दूवादी शक्तियों के लिये किया है। परंतु तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसे लेकर उनका जो भी रूख है वह उनके बौद्धिक आडम्बर को अनावृत करने के लिये पर्याप्त है।

तिब्बत में चीन का दमन इन छद्म बुद्धिजीवियों को मानवाधिकार का हनन नहीं चीन का आंतरिक मामला लगता है तो फिर यह सिद्धांत इजरायल पर लागू क्यों नहीं होता। या फिर गोधरा की प्रतिक्रिया में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों को लेकर जब विभिन्न वामपंथी संगठन गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के विभिन्न मंचों पर बदनाम कर रहे थे और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दखल देने की मांग कर रहे थे तो इनका आंतरिक मामले का सिद्धांत कहाँ चला गया था। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने का प्रयास हम अपने लेख में कर रहे हैं।

तिब्बत और फिलीस्तीन में किस मामले में समानता है तो वो यह कि फिलीस्तीन भी दावा करता है कि वह अपनी स्वाधीनता की लडाई लड रहा है। लेकिन क्या तिब्बत को विश्व मंच पर वह स्थान कभी मिल सका या उसकी आवाज कभी सुनी गयी। आखिर क्यों नहीं। ऐसा क्यों हुआ जबकि तिब्बत वास्तव में 14,000 पुराना एक राष्ट्र है जिसकी अपनी संस्कृति और अपना धर्म है। जब कि इस मुकाबले फिलीस्तीन की तुलना करें तो वह इन सन्दर्भों में कभी राष्ट्र नहीं रहा। वह बीसवीं शताब्दी के लम्बे समय तक इजरायल का ही हिस्सा था और फिलीस्तीनियों को फिलीस्तीनी यहूदी कहा जाता था। फिलीस्तीनियों का इस्लाम से पृथक ऐसा कोई धर्म भी नहीं था जैसा कि तिब्बत के मामले में है। फिर भी समस्त विश्व में फिलीस्तीन की छवि एक ऐसे देश के निवासियों के रूप में है जिन्हें अपने देश से निकाल दिया गया है और उनके देश पर आक्रांता इजरायल ने कब्जा कर रखा है। इस सहानुभुति का कारण क्या है। इसके कुछ कारण मोटे तौर पर ये नजर आते हैं-

फिलीस्तीन ने अपनी लडाई के लिये आतंकवाद का सहारा लिया जबकि तिब्बती शांति के उपासक हैं और सहिष्णु धर्म बौद्ध के अनुयायी हैं।

फिलीस्तीन ने स्वयं को इजरायल से पीडित देश के रूप में प्रस्तुत किया जिसके आधार पर उसे विश्व में ध्रुवीकरण करने में सफलता मिली। फिलीस्तीन को विश्व के प्रायः सभी देशों का समर्थन प्राप्त हो गया क्योंकि यह विषय मुसलमानों से जुडा है और विश्व के सभी देश मुस्लिम तुष्टीकरण को अपनी विदेश नीति का अंग मानते हैं। इसके विपरीत तिब्बत मुस्लिम देश नहीं है इस कारण उसके प्रति सहानुभुति दिखाना किसी की मजबूरी या फैशन नहीं है।

फिलीस्तीन को उन मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त है जिनके पास तेल की दौलत है और इसके आधार पर वे विश्व् में धाक जमाते हैं और अपने प्रमुख सम्मेलनों में फिलीस्तीन के विषय को इस्लामी उम्मा के स्वाभिमान के साथ जोड्कर इस्लामी जनमानस की भावनाओं को उद्दीप्त करते हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत तिब्बत का सहयोग करने को कोई तैयार नहीं है। ले देकर भारत ने तिब्बत की निर्वासित सरकार और उनके धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दे रखी है तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाने से कतराती है।

फिलीस्तीन के विषय को अधिक प्रमुखता मिलने का एक बडा कारण विश्व बिरादरी की सबसे बडी कानून निर्माता संस्था सन्युक्त राष्ट्र संघ है। समस्त विश्व में इजरायल की अलोकप्रियता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानों कर्मकाण्ड ही बना लिया है कि प्रत्येक बैठक या सत्र में फिलीस्तीन के लिये इजरायल की निन्दा करता हुआ एक प्रस्ताव अवश्य होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस रूख से फिलीस्तीन को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो जाती है जबकि तिब्बत को पीडित करने वाला देश स्वयं संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थाई सदस्य है इस कारण शायद ही कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत में चीनी अत्याचार पर चर्चा हुई हो।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में इस अंतर का एक प्रमुख कारण समाचार साधन हैं। विश्व भर के टी वी चैनलों पर ऐसे चित्र और समाचार आते हैं जो फिलीस्तीन को इजरायल द्वारा उत्पीडित देश के रूप में चित्रित करते हैं। फिलीस्तीन के अनेक हिस्सों से समाचार और टी वी छवि आती रह्ती है जिसके आधार पर लोग अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। इसके विपरीत तिब्बत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में विश्व को उतना ही पता लग पाता है जितना चीन विश्व को बताना चाह्ता है। वैसे यह अजीब विडम्बना है कि जिस देश को वामपंथी रक्त पिपासु सिद्ध करना चाह्ते हैं उसके यहां कम से कम मीडिया पर सेंसर तो नहीं है।

फिलीस्तीन और तिब्बत की स्थिति में अंतर का एक प्रमुख कारण यह भी है कि तिब्बत पर अधिकार करने वाला देश स्वयं वामपंथी या कम्युनिस्ट है जबकि इसके विपरीत फिलीस्तीन का मुद्दा विश्व के समस्त वामपंथियों के लिये प्रमुख विचारधारागत मुद्दा है जो उन्हें आपस में जोड्कर रखता है। विश्व के किसी भी कोने में कोई वामपंथी क्यों न हो उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता की पहचान इसी से होती है कि फिलीस्तीन और इजरायल मसले पर उसका रूख क्या है।
आखिर वह कौन सा कारण है जो कम्युनिस्टों और वामपंथियों को फिलीस्तीन के निकट लाता है और इतना निकट लाता है कि वे यासर अराफात के इंतिफादा या आत्मघाती हमलों में भी कोई बुराई नहीं देखते। उन्हें तो इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वाले भी अपने सहयोगी लगते हैं। ऐसा क्यों?

इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत जब शीत युद्ध् आरम्भ हुआ तो साम्यवादियों या वामपंथियों को लगता था कि अब पूँजीवाद ध्वस्त हो जायेगा और पूँजीवाद के अंतर्गत पूँजी पर नियंत्रण की भावना के चलते कर्मचारी और मजदूर असंतुष्ट होंगे और समस्त विश्व में सर्वहारा संग़ठित होकर एक क्रांति को जन्म देगा और रूस का माडल एक स्थाई व्यवस्था बन जायेगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं। पूँजीवाद की व्यवस्था के रह्ते हुए भी कर्मचारियों की जेबें भरती रहीं और मजदूर भी सर्वहारा क्रांति से दूर ही रहे। 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के उपरांत साम्यवाद का आर्थिक दर्शन समाप्त हो गया और उसके अस्तित्व का एकमात्र दर्शन रह गया अमेरिका का विरोध। अपने दर्शन के बूते जब साम्यवादियों में अमेरिका को नष्ट करने की कूबत न रही तो उन्हें इस्लामवादियों में नया साथी दिखाई पडा। इसी कारण उन्होंने 2000 के उपरांत अपने सभी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इजरायल फिलीस्तीन को अपना सबसे बडा मुद्दा बताते हुए फिलीस्तीन के प्रति अपनी सहानुभुति रखी।

यह कोई संयोग नहीं है कि विश्व के अनेक शीर्ष वामपंथियों ने 11 सितबर 2001 को अमेरिका पर हुए आक्रमण की प्रशंसा तक की है और उसे अमेरिका की नीतियों का परिणाम बताया है।
ऐसा नहीं है कि वामपंथी केवल अमेरिका की निन्दा करते है वही तत्व भारत में इस्लामवादी हिंसा का प्रकारांतर से समर्थन करते हैं और हिन्दूवादी संगठनों पर आरोप लगाते हैं। ये नक्सली हिंसा को प्रश्रय देते हैं और भारत के पडोस में नेपाल में नक्सल और इस्लामवादी गठजोड का एक बडा खतरा इन्होंने खडा ही कर दिया है।

इन समानताओं से यही निष्कर्ष निकलते हैं कि वामपथियों की मानवाधिकार को लेकर ईमानदार नीयत नहीं है और उनके लिये ये केवल नारे हैं जिनका उपयोग वे अवसरवादिता से करते हैं तथा साथ ही वे अब विश्व में अपना वर्चस्व हिंसावादियों के साथ मिलकर बढायेंगे। इस्लामवाद और वामपंथ का यह गठबन्धन आने वाले दिनों में विश्व के लिये नयी चुनौती बनने वाला है।
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