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श्री राम जन्मभूमि पर मुस्लिम आक्रामण का इतिहास

राम का नाम मत लो राम का नाम लेना पाप हो गया है हो गया जब नागपुर में श्री राजनाथ सिंह ने राम का नाम लिया मैं उसी समय खुश हो गया मेरे कई ब्लागर साथियों को तीन-चार ब्लाग का मैटर मिल गया अब कई दिन तक सभी हाय तौबा मचाने के लिये। ज्यादा ब्लागरों को मिर्ची लगेगी यही सोच कर में चिट्ठाजगत खोल कर बैठ गया और देखने लगा आखिर कितने ब्लागर हैं जिन्हें राम से परहेज या शायद राम से नही भा.ज.पा के मुह से राम शब्द सुनने से परहेज है। वैसे ज्यादा लेखकों को श्री रामजन्ममूमि का इतिहास नही पता है लेकिन अपना आधा-अधुरा ज्ञान (अज्ञान) एवम चर्च के पैसों से चल रहें समाचार चैनल के दुस्प्रभाव के कारण अपनी संस्कृ्ती को मिटाने पर ज्यादा रुची दिखाते हैं।

श्री राम जन्मभूमि पर मुस्लिम आक्रामण का इतिहास

लगभग 7बी शताब्दी से ही हिन्दुस्तान पर मुस्लिम लुटेरों का आक्रमण हिन्दुस्तान पर होने लगा था। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने सिर्फ मन्दिरों के खजाना लुटने में ही अपनी रुची नही दिखाई मन्दिरों को लूटने के बाद मन्दिरों को तोड़ कर उसको मस्जिद का रुप देना उन्हें ज्यादा भाया। अफजल खाँ ने छत्रपति शिवाजी की अराध्यदेवी तुलाजी भवानी का मन्दीर को तोडा़। दिल्ली के कुतुबमीनार के पास पुरातत्व विभाग के लगाये सरकारी बोर्ड पर लिखा है कि 21 जैन मन्दिरों को तोड़ कर उनके मलबे से कुव्वत-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किया गया।

सेनापति मीरबांकी ने बाबर के आदेश पर अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि पर बना विशाल भगवान राम के मन्दिर को तोडा़ था, जिसका उल्लेख वहाँ खडे़ ढाँचे पर लगे पत्थर पर अरबी लिपि में खुदा था। औरंगजेब के आदेश से मथुरा में श्री कृ्ष्ण जन्मभूमि पर बना मन्दिर को तोडा़ गया। मौहम्म्द गौरी के इतिहासकार हसन कि पुस्तकों से पता चलता है कि मौ़. गौरी ने काशी पर हमला कर भगवान विश्वनाथ मन्दिर सहित लगभग हजार मंदिरों को तोडा़ और मुस्लमानों के इवादतगाह का रुप दिया। ऎसे हजारों मन्दिरों को तोड़ने के अवशेष देश भर में फैले पडे़ हैं।

इन आक्रमणों के विरुद्ध हिन्दुस्तानीयों ने हमेशा से संघर्ष किया है जो आज भा.ज.पा. भी कर रहा है। तोडे़ गये मन्दिरों के बारबार पुननिर्माण कराया है, और अपने अपमान का बदला लिया है। सिन्ध के राजा की पुत्रियों ने आक्रमणकारी के देश में जाकर अपमान का बदला लिया है, आक्रमणकारी सेनापति मौ. बिन कासिम को उसी के राजा से मृ्त्युदण्ड दिलाया। छत्रपति शिवाजी ने अफजल खाँ का पेट फाड़कर समाज के सम्मान की रक्षा की। हिन्दु समाज ने बाबा विश्वनाथ का मन्दिर पुन: बनवाया लेकिन जैनपुर के मुस्लिम बादशाह ने तोड़ दिया जिसका निर्माण राजा टोडर मल के द्वारा किया गया जिसे पुन: औरंगजेब के हुक्म पर उसे फिर से तोड़ दिया गया। मथुरा के जिस स्थान पर औरंगजेब ने ईदगाह बनवाया उस स्थान को मराठों ने जीत लिया परन्तु मराठा अंग्रेज से पराजीत हो गये जिसके कारण श्री कृ्ष्णजन्मभूमि उद्धार का कार्य वही रुक गया।

भा.ज.पा द्वारा लिया गया श्री राम जन्मभूमि मुक्ति का संकल्प कोई पहला नही है इस से पहले 72 बार जन्मभूमि के लिये लडा़ई हो चूका है। बाबर और हुमायूँ के काल में ही 10 बार सघर्ष हुये जिनमें रानी जयराजकुमारी और स्वामी महेश्वरानन्द जी महराज की भुमिका प्रमुख रहा था। औरंगजेब के राज्य में श्री रामजन्म भूमि के लिये 30 लडा़ईया लडी़ गई। गुरु गोविन्द सिंह जी महराज ने मन्दिर की मुक्ति के लिये निहंगों की सेना अयोध्या भेजी था। अवध के नवाब के राजकाल में हिन्दुओं ने 5 बार धावा बोला कर श्री राम जन्मभूमि को मुस्लमानों के आजाद कराने का कोशीश किया। 1857 के समय हिन्दुओं के विजय के बाद मुस्लमानों ने श्री रामजन्मभूमी को हिन्दुओं को सौपने का निर्णय लिया था लेकिन अंग्रेजों के द्वारा समझौता लागू नहीं होने दिया गया और श्री रामचरण दास जी को इमली के पेड़ से लटका कर मार दिया गया।

1947 में भारत अंग्रेज की गुलामी से मुक्त हो गया। अंग्रेज गुलामी के सभी प्रतीक चिन्हों को हटाया जाने लगा। इसी क्रम में सरदार बल्लभ भाई पटेल के दृढ़ निश्चय के कारण सोमनाथ का मन्दिर का जनता के द्वारा किया गया चँदा ( जबकि जामा मस्जिद का खर्चा सरकार ने वहन किया लेकिन गाँधी जी ने सोमनाथ मन्दिर के पैसा देने से साफ शब्दों में मना कर दिया था) के द्वारा पुन:निर्माण किया गया और हिन्दुस्तान के प्रथम राष्टृपती श्री राजेन्द्र प्रसाद जी उस समारोह में मौजुद थे। लेकिन हिन्दुस्तान की बदकिस्मती ने हमेशा की तरह यहाँ भी साथ नही छोडा़ और सरदार बल्लभ भाई पटेल इस दुनिया से कूच कर गये।

इसके पश्चात कांग्रेस व कांग्रेस से टुट कर बने राजनीतिक दलों ने मुस्लिम गुलामी के चिन्हों को हटाकर राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक चिन्हों की प्रतिष्ठा का विचार छोड़ कर सिर्फ वोट के मिले मुस्लिम आक्रमणकारियों को महीमा मण्डन किया जाने लगा। एवमं राष्टृभक्तों एवम मुस्लमानों से लड़ने वाले को देशद्रोही, आतंकवादी इत्यादी नामों से पुकारा जाने लगा। मिडीया एवम शिक्षा जगत पर कब्जा करके पाठयपुस्तकों में भी राष्टृभक्तों के खिलाफ जहर उगल कर हमारी मान्सिकता को दुषित करने का प्रयास किया गया जिसमें कई हद तक ये सफल भी हुये जिसके कारण आज 6 दिसम्बर को हिन्दु नेताओं के पिछ्छलग्गू कंलक दिवस मनाते हैं, गोधरा में हिन्दुओं के जला कर मारने की घटना को हिन्दु का षडयन्त्र, राम सेतु को तोड़ने की घटना को भा.ज.पा. का चुनावी स्टंट अमरनाथ जमीन में हिन्दु के साथ किये गये धोखा को वोट बैंक की राजनीति के रुप में दिखाया जाने लगा। ये हमारे मानिष्क दिवालीयापन है कि हम अपने दिमाग से सोचने की बजाय चर्च के पैसे सो चल रहे मिडीया के सुर में सुर मिलाते नजर आतें है। तथा अपने बुद्धी विवेक को ताक पर रख कर अपने समाज देश पर लगें कलंक को धोने की जगह नेताओं के सुर में सुर मिला कर इस देश को कमजोर करने में लगें हुयें है।
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