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आंतकवादीयों से कोई उसका धर्म तो पुछ लो।

आतंकवादीयों का धर्म सिर्फ आंतक फैलाना है आखिर किसने बताया कि आतंकवादीयों सिर्फ आंतक फैलाना है क्या नाम है उस आंतकवादी का उस आतकवादी के बारे में हम सभी को पता होना चाहिये। शायद कोई नही है यह सिर्फ भर्म फैलाया जा रहा है कि आंतकवादी का धर्म सिर्फ आतंक फैलाना है। सबसे बडी़ बात है कि हमारे देश के रहनूमा इस देश से आतंकवाद का खात्मा करना ही नही चाहते हैं। हमेशा हर आतंकवादी घटना के बाद हमारे प्रधानमंत्री का रटा - रटाया ब्यान आता है पाकिस्तान का हाथ हैं तो अगर पाकिस्तान का हाथ है तो हमें हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहने चाहिये। निर्दोश नागरिकों को तड़प-तड़प के मरने देना चाहिये क्या करना चाहिये अगर पाकिस्तान का हाथ है तो। पाकिस्तान के पास परमाणु बम है तो क्या हमारे पास छुरछुरी है। क्या पाकिस्तान अमेरीका जैसा महाशक्ती है जिसके भिख से हमार देश पल रहा है। अखिर क्या कारण है पाकिस्तान जैसे अदना सा देश से हमारे नेता डर कर बैठे हैं। पाकिस्तानियों से तो लड़ने के लिये हमें आर्मी का जरुरत भी नही पडे़गा सिर्फ बिहार में रहने बाले बेरोजगार अपना डंडा ले कर चले गये तो सभी पाकिस्तानीयों की घीघ्घी बंध जायेगा। लेकिन क्या कारण है कि हमारे प्रधानमंत्री पाकिस्तान को सिर्फ एक बन्दर घुरकी तक मारने के नाम से पसीना छुटता है। क्या हमारे देश के नेता इसका कारण बतायेंगे। कारण सिर्फ एक है हिन्दुस्तान में रहने वाले पाकिस्तान सर्मथक कही नाराज ना हो जाये उसका वोट पाने के लिये हम आतकवाद से लड़ने नही चाहतें हैं। बस नित्य नये वहाने बना कर अगला आतंकवादीयों के घटना का इन्तजार करते हैं और फिर से वही बेतुकी ब्यानवाजी का सिलसीला सुरु हो जाता है। हर आतंकवादी घटना के बाद रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, काम्यूनिष्ट जैसे सिमी सर्मथक नेताओं के भी अन्दर देशभक्ती का ज्वार फूटने लगता है।
हम सभी जानते हैं कि हिन्दुस्ताने में कौन है जो आतंक फैला रहा है और उसका कारण भी क्या है सभी जानते हैं। आखिर क्या कारण है कि सिर्फ हिन्दूओं कि ओर से आवाज आती है कि निरोधक कानून लगाया जायें। यहां तक कि कुछ राजनितीक पार्टीयाँ सिर्फ इस लिये निरोधक कानून इस देश में नही लागा रहा है कि हिन्दुस्तान में रह रहें आतंकवादीयों के खिलाफ सोफ्ट पालिसी रखने वाले उस पार्टी को वोट नही देगा। मुम्बई में जो कुछ हुआ सारा देश देखा और तो और अब आगे जो कुछ नही होगा उसे भी हम देखेंगे । आज आतंक की लडाई में हिन्दुस्तान का नम्बर 0 है शुन्य यह राष्टृ आतंक की लडाई में नपुंस्क है। अगर हिन्दुस्तान आतंकवादियों से लडना चाहता है तो सबसे पहले कार्यवाही वैसे तत्वों से लड़ना होगा जो आतंकवादियों के साथ मेल-जोल रखतें है। क्या किसी ने सोचा है कि आखिर पाकिस्तानीयों को मुम्बई के रास्तो का पता कैसे चला उन्हें कैसे पता चला कि ताज होटल कहां है। ताज होटल का गेट किधर है आखिर किस ओर से ताज होटल में घुसा जाता है। किसने बताया मुम्बई के रास्तो का आखिर किसने बताया ये सब। कुछ समाचार चैनल वालों के अनुसार कुछ आंतकवादी नरीमन प्वांट के एक घर में पिछले छ: महीना से रह रहा है। आखिर कैसे एक आतंकवादी हमारी अपनी ही धरती में रह कर छ: महीना से इस देश को बर्बाद करनें का शाजिश रचता रहा है और हामारे किसी खुफिया एंजेसी को पता नही चला। हिन्दुस्तान ही एक यैसा देश है जहाँ 9 तरह के खुफिया एंजेसी काम करती है और सबसे ज्यादा आतंकी हमला भी हिन्दुस्तान में ही होता है। नेता इस बारें में कुछ करने धरने वाले नही है हर आतंकवादी हमले के बाद उनके पास रटा - रटाया एक ब्यान है आतंकवादी हमले में पाकिस्तान का हाथ है। मुम्बई में आतंकी हमले के सिर्फ 2 घंटे बाद समाचार चैनल में ये खबर आने लगा कि सरकार की तरफ से ब्यान आया है कि इस घटना में पाकिस्तान का हाथ हैं क्या सरकार के खोजी मंत्री ये बतायेंगे की आखिर हिन्दुस्तान का कौन सा खुफिया एंजेसी है जो कि सिर्फ दो घंटा में पता लगा लिया कि आतंकी हमला में पाकिस्तान का हाथ है और अगर खुफिया एंजेसी इतना तेज है तो फिर 26 आतंकी समुन्द्र के रास्ते हमारे देश में घुस गये किसी नेता और खुफिया एंजेसी को क्यों नही पता चला। अरे जब अपना सिक्का अगर खोटा हो तो दुसरे को गाली देने से कोई फायदा नही। क्या सही में हम लडना चाहते है आतंकवाद से। मैं एक प्रतिष्ठीत समाचार पढ़ रहा था उसमें लगभग सब जगह सिर्फ मुम्बई आतंकवाद और आतंकवादीयों का चर्चा नजर आया लेकिन कही भी नही लिखा था कि ये आतंकवादी मुस्लमान है लेकिन एक जगह बाक्स बना कर उसे अच्छी तरह हाइलाइट करके उसमें लिखा था कि 20-22 साल के युवक जिसके एक हाथ में ए.के.47 था और दुसरे हाथ में कलावा (पुजा में हिन्दुओं के द्वारा बाधें जाने वाला रक्षा शुत्र) जिसके कारण ये आतंकवादी हिन्दु आतंकवादी है। सोच सकते हो आज आंतकवादीयों क पहूँच कहा तक हो गया है।

मुझे हिन्दुस्तान के पुलिस, आर्मी और खुफिया एंजेसी पर किसी तरह का कोई शक नही है उन्हें 1 सप्ताह के लिये गृह मंत्रालय के अन्दर से हटा दिया जाये ये जाबांज सिर्फ जमीन पर रहने वाले आतंकियों को ही नही अगर किसी के गर्भ के अन्दर भी छिपा होगा तो ये उसे ये पाठ पढा़ देगे इसमें किसी भी हिन्दुस्तानीयों को शक नही है। लेकिन क्या किया जाय हमने अपने आस्तिन में ही सांप पाल कर रखे हैं और हमारे रहनुमा उस सांप को दुध पीला कर तैयार कर रहें हैं जो मैका मिलने पर हमें ही काटने को तैयार हैं। हर आतंकी घटना के बाद हमारे प्रधानमंत्री जी का ब्यान आता है हम आतंकवादी से लडेंगे आज तक प्रधानमंत्री जी ने कभी नही बताया कि कब लडेंगे और कितने मासूम के खुन बहने के बाद लड़गे। आतंक से लडाई का शुभ मुहुर्त आखिर कब आयेगा। प्रधानमंत्री के अनुसार हमारा कानून इन आतंकीयों से लडने के लिये सक्षम है। हमारे प्रधानमंत्री के मुह से मिठा मिठा बातें तो निकलेगा ही क्यों की खुद तो सुरक्षा के लिये हिन्दुस्तान के सबसे काबिल कंमाण्डो के साथ घुमतें है सोनिया गाँधी और उनके बच्चों के लिये तो सुरक्षा के सभी उपाये किये गये चाहे उसके लिये कानून का ही संसोधन क्यों ना करना परे। उन सबके लिये तो कानून सख्त है लेकिन हम मासूम के लिये आतंकवाद रोकने के लिये कौन सा कानून है अगर हमारा कानून इतना सक्ष्म है तो फिर हर 10 वे दिन ये आतंकी घटना क्यों क्या प्रधानमंत्री बतायेंगे। अगर इनमें सक्षम कानून बनाने का ताकत नही है तो फिर गद्दी छोड़ क्यों नही देते।

आतंकवादीयों से अब हम आम जनता को ही लडना होगा क्यों कि ये देश भी हमारा है इस देश पर मुसीबत आतें ही विदेशी तो अपने बाल बच्चे के साथ इटली चले जायेंगे। हम कहाँ जायेंगे। चुनाव नजदीक है वोट डालने जरुर जाये वोट डालने से पहले आँख बन्द करके एक बार उन चित्तकार करते हुये चेहरा को जरुर देख ले जिसका अपना इस आंतकी घटना में मारा गया है फिर अपना वोट डाले।
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देश हित्त के लिय अब जग जाओ

आज सेकुलर नेता गला फाड़ कर चिल्लये जा रहें हैं बजरंग दल और विश्व हिन्दु परिषद पर पाबन्दी लगे। कारण सिर्फ और सिर्फ एक है मुस्लिम तुष्टीकरण और कोई कारण नही है। सिमी के उपर बैन लगा है। आतंकवादि संस्था इन्डियन मुजाहिदीन को बैन किया गया है। बस अब चुनाव आ गया है अब जयचन्दी नेता को अपने भाई बन्धु के सामने मुहँ दिखाना है बेचारे जयचन्दी नेता क्या मुहँ लेकर जामा मस्जिद से फतवा जारी करवायेगे, हिन्दुस्तान के मस्जिद आजादी के पहले से देशविरोधी गतिवीधी में लगा है और आज भी है। जामा मस्जिद के मैलाना समय समय पर यह ऎहसास दिलवा देता है यह कह कर हम आईएसआई के ऎजेन्ट है। किसी पकरे गये आतंकवादि के घर पर जाकर हिन्दुस्तान के पुलिस और आतंक के सर्मथन में भाषण देकर आता है। और उपर के कहता है किसी में हिम्मत है तो पकर के दिखाये। लेकिन जयचन्दी नेता को अगर चिन्ता है तो सिर्फ वोट का। देश जाये भाड़ में जयचन्दी नेता वोट लिये जितना निचे गिर सकते है गिर जायेगा अपना फेका थुक तक चाटने को तैयार रहता है।

84 साल के हिन्दु साधु लक्ष्मणा नन्द सरस्वति को बेरहमी से मार डाला गया इसमें कोई सक नही की इसमें चर्च का हाथ है। चर्च के पादरी इस बात को मानते है लेकिन जयचन्दी नेता इस बात को मानने को तैयार नही है कि लक्ष्मणा नन्द को पादरीयों ने मरवाया है। लेकिन किसी जयचन्दी नेता में इतना हिम्मत नही था कि खुल कर कह सके कि बुढे़ धर्म गुरु को मारना अपराध है।

लक्ष्मणा नन्द सरस्वति को मरने कि खुशी में चर्च ने विजय उत्सव मनाया जगह जगह हवा में गोली चला कर खुशी मनाया गया। मिशनरी के 2500 स्कूल इस खुशी में सामिल हो गये और 1 दिन के लिये स्कूल बन्द रखा। स्कूल में पढ़ने बाले लाखो हिन्दु छात्र को भी इस खुशी में सामिल किया गया। किसी हिन्दु के द्वारा इसका विरोध किया गया। जब सिर्फ कंधमाल के हिन्दु द्वारा स्वामी जी के हत्या का विरोध किया गया तो इटली, फ्रास, अमेरिका तक को फटने लगा हिन्दुस्तान में रह रहे अपने ऎजेन्टों के द्वारा चिल्लम पो मचाना सुरु किया लेकिन स्वामी लक्ष्मणा नन्द सरस्वति के हत्या के विरोध में कितना स्कूल बन्द किया गया। कितने ऎसे नेता हैं जो विरोध किये। आखिर कारण क्या है। हम संगठित नही है हम में एकता नही है जिसके कारण जाने अनजाने में जयचन्दीयों का हम मदद कर रहें है। देश हित्त के लिय अब जग जाओ
* जयचन्द - पृ्थ्विराज चैहान का भाई जिसके दगाबाजी कारण पृथ्विराज चैहान लडा़ई में हारा और कैद में रह कर अपना जान दिया
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आतंकवादीयों को दमाद क्यों नही बना लेते

बेंगलूर के बाद अहमदाबाद भी सीरियल बम धमाकों से दहल उठा हिन्दुस्तान। 24 घंटे में दुसरा हमला । देश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। कुत्ता को घुमाने और ई-मेल कहा से आया बस यही तक खबर आती है। फिर मुआवजा देने का दौर चलता है अगर हिन्दु मरा है तो 1 लाख और मुस्लमान मरा है तो 5 से 10 लाख तक का मुआवजा मिलता है। सरकार के किसी मंत्री घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।

आखीर कब रुकेगा आतंकवादियों का हमला। हिन्दुस्तान में आतंकवाद को सदैव वोट बैंक और मुस्लिम तुस्टीकरण की राजनीति से जोड्कर देखा जाता है और इसी का परिणाम है कि पहले 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार के मुसलमानों के दबाव में आकर टाडा कानून वापस ले लिया और उसके बाद 2004 में सरकार में आते ही एक बार फिर कांग्रेस ने पोटा कानून वापस ले लिया। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। यहा तक कह दिया कि अफजल को फांसी देने पर इस देश में दंगा भरक सकता है कांग्रेसी आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी दमाद बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है। क्या एक आतंकवादी को फांसी देने से दंगा भरक सकता है तो इसमें हमे कहने से कोई गुरेज नही है कि दंगाई का राष्टृभक्ति कभी भी हिन्दुस्तान के साथ नही है और इसमें भी कांग्रेसी ही दोषी है जब देश आजाद हूआ था तभी कांग्रेसी जन यैसे देशद्रेही को गले लगा-लगा कर इस देश में रहने के लिये रोक रहे थे जो आज हमारे लिये नासूर बन गये हैं।
हिन्दुस्तान यैसा देश है जहा आतंकवादि सरकारी नैकरी करते हैं सरकार उन्हें पैसा भी देती है और आतंकवाद फैलाने के सहायता। "भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।" गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। क्या यही है आतंकवादियों से लड़ने क माद्दा, शायद नही।

आज भारत में एक भी ऐसा कानून नहीं है जो आतंकवाद की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए और आतंकवादियों के विशेष चरित्र को देखते हुए उन्हें तत्काल और प्रभावी प्रकार से दण्डित करने के लिये प्रयोग में आ सके। आज सभी राजनीतिक दलों के नेता केवल भाजपा को छोड्कर इस बात पर सहमत दिखते हैं कि सामान्य आपराधिक कानूनों के सहारे आतंकवाद से निपटा जा सकता है। हमारे सामने एक नवीनतम उदाहरण है कि किस प्रकार टाडा के विशेष न्यायालय में मुकदमा होते हुए भी मुम्बई बम काण्ड के अपराधियों को सजा मिलने में कुल 15 वर्ष लग गये और सजा मिलने के बाद भी एक के बाद एक आतंकवादियों जमानत पर छूटते जा रहे हैं। आखिर जब हमारी न्याय व्यवस्था जटिल तकनीकी खामियों का शिकार हो गयी है जो आतंकवादियों को बच निकलने का रास्ता देती है तो फिर कडे और ऐसे कानूनों के आवश्यकता और भी तीव्र हो जाती है जो तत्काल जमानत या फिर आतंकवाद के मामले में जमानत के व्यवस्था को ही समाप्त कर दे। यह कोई नयी बात नहीं है। पश्चिम के अनेक देशों ने ऐसे कठोर कानून बना रखे हैं और इसके परिणामस्वरूप वे अपने यहाँ आतंकवादी घटनायें रोकने में सफल भी रहे हैं। परंतु भारत के सम्बन्ध में हम ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते। अगर हिन्दुस्तान की सरकार आतंकवादियों से लड़ नही सकती है तो उसे अपना दमाद बना ले लफडा खत्म हो जायेगा। हम मुर्ख जनता जात-पात उँच-नीच के नाम पर दुबारा नपुसंको के हाथ में इस देश की बागडोर दे देंगे।
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सिमी का फैलता जाल

सिमी का फैलता जाल

प्रतिबन्धित इस्लामी संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आफ इण्डिया या संक्षिप्त रूप में जिसे सिमी के नाम से जाना जाता है अब खुफिया एजेंसियों के लिये काफी बडा सिरदर्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार सिमी ऐसा पहला आतंकवादी संगठन है जिसने देश के अन्दर बडे पैमाने पर देशी आतंकवादियों का नेटवर्क खडा कर लिया है और इन खुफिया एजेंसियों का यह भी मानना है कि यह देश में कार्यरत अनेक मुस्लिम चरमपंथी संगठनों के साथ मिलकर काम ही नहीं कर रहा है वरन उनके साथ मिलकर नेटवर्क को और अधिक व्यापक बना रहा है। यह खुलासा मार्च के महीने में इन्दौर से पकडे गये सिमी के 13 सदस्यों में से एक अमील परवेज के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान हुआ। परवेज ने बताया कि सिमी हैदराबाद स्थित चरमपंथी इस्लामी संगठन दर्सगाह जिहादो शहादत के साथ के साथ काफी निकट से सम्बद्ध है और इसके साथ मिलकर काम कर रहा है।पूछ्ताछ के दौरान इस रहस्योद्घाटन से स्पष्ट हो गया है कि इस्लामी संगठन मिलकर काम कर रहे हैं और इनका विशेषकर सिमी का व्यापक नेटवर्क देश भर में स्थापित हो चुका है। पुलिस से पूछ्ताछ के दौरान अमील परवेज ने बताया कि दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने उसे मार्शल आर्ट की शिक्षा देने के लिये बुलाया था। इसके बाद पुलिस इस कोण पर भी जाँच कर रही है कि सिमी के देश भर में ऐसे कितने इस्लामी संगठनों के साथ सम्बन्ध हैं। पुलिस की इस बात को स्वीकार कर रही है कि यह तो एक शुरूआत भर है और ऐसे कितने ही रहस्य अभी आगे खुलने शेष हैं।
इससे पूर्व भी हैदराबाद में दर्सगाह की गतिविधियों के बारे में और इसके उग्र स्वरूप के बारे में पहली बार तब पता चला था जब गुजरात के पूर्व मंत्री हरेन पाण्ड्या की हत्या के आरोपी मौलाना नसीरुद्दीन को पुलिस ने पकडा तो दर्सगाह के सदस्यों ने पुलिस पर पथराव कर उसे पुलिस की पकड से छुडाने का प्रयास किया और जबरन पुलिस की गाडी से उसे ले जाने का प्रयास करने लगे। इस घटना के उपरांत पुलिस ने जब भीड को तितर बितर करने के लिये गोली चलाई तो दर्सगाह का कार्यकर्ता मुजाहिद सलीम इस्लाही गोलीबारी में मारा गया।.

हैदराबाद के पुलिस आयुक्त ने भी स्वीकार किया कि वे इस संगठन के बारे में जानते हैं और सम्भव है कि सिमी के कुछ पूर्व सदस्य इस संगठन से सम्बद्ध हों। दर्सगाह के सम्बन्ध में उसकी वेबसाइट www.djsindia.org से जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसकी वेबसाइट के अनुसार इस संगठन का उद्देश्य मुस्लिम युवकों को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाना और इस हेतु उन्हें प्रशिक्षण देना जो कि सशस्त्र भी हो सकता है। इस संगठन के अनुसार उसका प्रमुख उद्देश्य हिजाब के सिद्धांत को सख्ती से लागू कराना, शरियत, मस्जिद और कुरान की पवित्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना, स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करना, इस्लामी सुधार के लिये मार्ग प्रशस्त करना और अंत में इसके उद्देश्य में कहा गया है कि अल्लाह और इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करना। लेकिन जिस बात ने खुफिया एजेंसियों को इस संगठन के सम्बन्ध में सर्वाधिक सतर्क किया है वह है इसके प्रशिक्षण की एक व्यवस्था जिसके अंतर्गत हैदराबाद के बाहरी क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट लोगों को छांटकर प्रशिक्षण दिया जाता है। परवेज ने पुलिस को बताया कि उसने 2007 में दो प्रशिक्षण शिविरों में भाग लिया था और इन शिविरों में अनेक कठिन प्रशिक्षण दिये गये जिनमें चाकू छूरी चलाने से लेकर पेट्रोल बम बनाने तक का प्रशिक्षण था। इस वेबसाइट ने एक किशोर का चित्र भी लगा रखा था जिसके हाथ में एक पट्टिका थी जिस पर लिखा था “ कुरान हमारा संविधान है और मैं उसका सिपाही” परंतु कुछ समाचार पत्रों में इसके बारे में समाचार प्रकाशित होने के बाद फिलहाल इस चित्र को वहाँ से हटा दिया गया है।

पुलिस से पूछ्ताछ में जब सिमी और दर्सगाह के परस्पर सम्बन्धों की बात निकली तो दर्सगाह के अध्यक्ष शेख महबूब अली ने सिमी के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्धों से तो इंकार किया और कहा कि उनके संगठन के अन्य किसी संगठन से सम्बन्ध नहीं है परंतु यह माना कि देश भर में उनके 10-12 केन्द्र हैं और कौन कहाँ प्रशिक्षण प्राप्त करता है इसका रिकार्ड रखना सम्भव नहीं है। परवेज ने पूछ्ताछ में बताया कि प्रशिक्षण के दौरान शिविर के प्रभारी सफदर और कमरुद्दीन ने उसे बताया था कि यह आरम्भिक प्रशिक्षण है और इसके बाद जो लोग छांटे जायेंगे उन्हें पुनः प्रशिक्षित किया जायेगा। .
परवेज की पूछ्ताछ में सिमी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस्लामी संगठनों से सम्पर्क की बात सामने आयी है 1997 में अलीगढ में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी अध्यक्षता सिमी के तत्कालीन अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही ने की थी और उस सम्मेलन में परवेज के साथ 20 वर्षीय फिलीस्तीनी मूल के हमास नामक फिलीस्तीनी आतंकवादी संगठन के सदस्य शेख सियाम ने भी भाग लिया था। परवेज ने पूछ्ताछ के दौरान यह भी स्पष्ट किया है कि 2001 में इस संगठन पर प्रतिबन्ध लग जाने के बाद भी किस प्रकार यह सक्रिय रहा और अपनी गतिविधियाँ चलाता रहा। परवेज के अनुसार काफी सदस्यों की गिरफ्तारी के बाद सफदर नागौरी और नोमन बद्र ने इस संगठन को नये सिरे से खडा किया। परवेज के अनुसार नगौरी ने उससे कहा कि वह प्रतिबन्ध हटवाने का पूरा प्रयत्न करेगा और इस आन्दोलन को समाप्त नहीं होने देगा।

पिछ्ले महीने मध्य प्रदेश में इन्दौर में पकडे गये सिमी के सदस्यों ने देश के समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं। 2001 में प्रतिबन्ध लगने के बाद भी यह संगठन कभी निष्क्रिय नहीं हुआ और पिछ्ले दो तीन वर्षों में देश में हुई बडी आतंकवादी घटनाओं में इसका हाथ रहा है या इसी संगठन ने उन्हें अंजाम दिया है। इस संगठन की सक्रियता के मूल कारण पर जब हम विचार करते हैं तो हमें कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से दिखायी पडते हैं एक तो हमारे राजनीतिक दलों द्वारा इस्लामी आतंकवाद के मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति से जोड्कर देखना और दूसरा इस्लामी धार्मिक नेतृत्व या बुध्दिजीवियों द्वारा आतंकवाद को हतोत्साहित करने के स्थान पर मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को प्रोत्साहित कर सरकार, राज्य, प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों को कटघरे में खडा कर इस्लामी प्रतिरोध की शक्तियों को कुण्ठित करना।

2001 में जब तत्कालीन एन.डी.ए सरकार ने सिमी पर पहली बार प्रतिबन्ध लगाया तो उस समय विपक्ष की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने इसकी आलोचना की और उनका साथ उनके ही दल की सदस्या अम्बिका सोनी ने दिया। फिर जब सोनिया गाँधी की अध्यक्षता वाली यू.पी.ए की सरकार केन्द्र में बनी तो इस सरकार ने भी सिमी पर प्रतिबन्ध को जारी रखा। यह उदाहरण संकेत करता है कि आतंकवाद जैसे मह्त्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं बन पायी है और इसे भी राजनीतिक मोल तोल के हिसाब से देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के इस रवैये का सीधा असर सुरक्षा एजेंसियों पर पड्ता है जो तमाम जानकारियों और प्रमाणों के बाद भी आरोपियों पर कार्रवायी करने में हिचकती हैं या उन्हें कार्रवायी धीरे धीरे करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों ही दशाओं में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद करने वालों का मनोबल बढता है और वे अवसर पाकर अपनी ताकत और अपना नेटवर्क बढा लेते हैं।

प्रतिबन्ध के बाद भी सिमी का इस मात्रा में सक्रिय रहना और ताकतवर रहना एक और मह्त्वपूर्ण तथ्य की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख ऊपर भी किया गया है कि इस्लामी धर्मगुरूओं और बुद्धिजीविओं की भूमिका इस सम्बन्ध में सन्दिग्ध है। अभी कुछ महीने पहले जब उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित प्रमुख इस्लामी संस्थान दारूल- उलूम – देवबन्द ने आतंकवाद के सम्बन्ध में एक बडा सम्मेलन आयोजित किया और उस सम्मेलन के द्वारा इस्लाम और आतंकवाद के मध्य किसी भी सम्बन्ध से इन्कार किया तो भी जैसे प्रस्ताव वहाँ पारित हुए उनमें राज्य, प्रशासन, पुलिस को ही निशाना बनाया गया और पूरे प्रस्ताव में सिमी जैसे संगठनों के बारे में एक भी शब्द नहीं बोला गया। पिछ्ले लेख में भी लोकमंच में इस बात को उठाया गया था कि एक ओर तो आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर सिमी का नेटवर्क फैलता जा रहा है। यहाँ तक कि सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि सिमी का नेटवर्क दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के अनेक प्रांतों में फैल चुका है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि ऐसे संगठनों को रोकने की इच्छा शक्ति का अभाव है। सरकार जिसका नेतृत्व राजनीतिक दल कर रहे है उनमें ऐसे तत्वों को रोकने की शक्ति नहीं है क्योंकि उनके लिये मुस्लिम वोट अधिक महत्व रखते हैं और इस्लामी धर्मगुरूओं या बुद्धिजीवियों में इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रहे तत्वों को रोकने की इच्छा नहीं है क्योंकि यदि उनमें ऐसी इच्छा होती तो वे मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा को सशक्त बनाकर या खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को निशाने पर लेकर इस्लामी आतंकवादियों को बचने का रास्ता नहीं प्रदान करते।

देश भर में सिमी के फैलते जाल ने हमारे समक्ष अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं जिनके प्रकाश में इस्लामी आतंकवाद के सम्बन्ध में नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। यह समस्या एक विचारधारा से जुडी है और उस विचारधारा की तह तक जाना होगा। इस समस्या को बेरोजगारी या अल्पसंख्यकों के देश की मुख्यधारा से अलग थलग रहने जैसे सतही निष्कर्षों से बाहर निकल कर पूरी समग्रता में लेने की आवश्यकता है। उन तथ्यों का पता लगाने की आवश्यकता है कि इस्लामी धर्मगुरु और बुध्दिजीवी आखिर क्योंकर इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों के विरुद्ध मुखर होकर उन्हें इस्लाम विरोधी घोषित नहीं करते।
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