चर्च के फादरों के चरित्र

विश्व इतिहास देखें तो मुस्लमान के बाद सबसे ज्यादा धर्म के नाम पर अगर किसी ने खुन बहाया है तो ईसाइयत है इसमें कोई शक नही। ईसाइयत हिन्दुस्तान धर्मातरण के द्वारा राष्ट्रान्तरण करने के लिये सिद्धांत प्रेम, शांति तथा सत्य का छद्म का नकाब पहन रखा हैं किंतु संसार का इतिहास गवाह है ईसाइयत के नाम पर कितनी बार खुन की नदियां बहाई गई। धर्मयुद्ध के नाम पर, उसके पहले और उसके बाद शांति स्थापित करने के लिए ईसा के नाम पर कई घोर नृशंस कार्य किये गए।

हिन्दुस्तान में हिन्दु के मानस को पूरी तरह से बदलने के लिए विदेशी ताकतों से सीधा संरक्षण प्राप्त कर ईसाई मिशनरियां हिंदुओं के राष्ट्रातंरण का कार्य कर रही हैं जिससे भारत की भूमि पर हमेशा के लिए यूनियन जैक फहराया जा सके। मिशनरियों ने अनुभव किया कि हिंदुओं के लिए धर्म पर विश्वास से ज्यादा महत्वपूर्ण जीवित रहना है। उन्होंने हिन्दू समाज को दलित वर्ग और सवर्ण हिन्दू में बाँट कर तथा आर्य बाहर से आए हैं व द्रविड़ यहां के मूल निवासी हैं, ऐसा कह कर हिन्दू समाज को बाँटकर हिन्दुओं को ईसाइयत में राष्ट्रातंरण करने के अपने प्रयासों को जारी रखा। उन्होंने हिन्दुओं के बच्चों को मिथ्या इतिहास से परिचित कराने के उद्देश्य से स्कूलों की स्थापना की किंतु इस सबसे भी उन्हें सफलता नहीं मिली, तब उन्होंने बोर्डिंग स्कूल, अनाथालय स्थापित करने शुरू किये व तथाकथित दलित वर्ग एवं जनजातीय समुदायों के, जिन्हें वे यहां का मूल निवासी बतलाते थे, अनपढ़ व गरीब परिवारों से बच्चों को सीधे उन स्कूलों में भरना शुरू किया। इसके पश्चात् मिशनरी बोडिग स्कूलों में ऐसे ईसाई पादरी तैयार किये जो दलित व पिछड़े वगो के बीच धर्मांतरण का कार्य कर सकें। इन सभी प्रयास के तहत आज मिशनरी हिन्दुस्तान के लगभग सभी हिस्सों में राष्ट्रातंरण करवाने में जुटी हुई है। आज ये इतनें निरकुस हो गये हैं कि इनके रास्ते में आने बालों का हत्या तक करने से नही चुकते।
हिन्दुस्तान में पैसे के बल पर इन्सानीयत का पाठ पढा़ने बाले ईसाई चर्च के फादरों के चरित्र पर अगर ध्यान दें तो उजला कपडा़ के अन्दर का सच्च सामने आ जाता है। चर्च के फादरों के द्वारा नावालिक लड़कियों के यौन शोषण का मामला बार बार उठता रहा है इस मामलें में वेटिकन सिटी सिर्फ के पौप जाँन साल में आठ-दस बार माफी तो जरुर मांग लेता है। अभी कुछ दिन पहले अस्ट्रेलिया के दौरे पर गये पौप जॉंन का वहां के नागरिकों के द्वारा किया गया विरोध सिर्फ इस बात पर था कि चर्च धर्म का काम छोड़ कर हर एक अनैतिक कार्य में संलगन था चाहे वो नन का यौन शोषण हो या नाबालिक या बालिक लड़कियों को बहला फुसला कर किया गया यौन शोषण। इस मामलें में जाँन के द्वारा अस्ट्रेलिया में मांफी मांगने के बाद ही पौप जाँन को अस्ट्रेलिया में घुसने दिया गया। ईसाई मिशनरी को चाहिये कि इन्सानीयत का पाठ पढा़ने से पहले हिन्दुस्तानियों से आदमियता का पढ़ पढ ले नही तो बेचारे को पौप जाँन को गला में माफीनामा गला में लटका कर घुमना होगा।
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ईसाई मिशनरी का नंगा नाच का टिप्‍पणी

कल के लेख ईसाई मिशनरी का नंगा नाच का टिप्‍पणी पढे

अनुनाद सिंह जी के अनुसार
मै आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि इसाई मिशनरियाँ केवल प्रलोभन से ही धर्मान्तरण कराती हैं। इसके लिये वे - साम, दान, दण्ड, भेद - सब कुछ अपनाती हैं।

मेरे पड़ोस में एक गणित के प्रवक्ता रहते थे। उनकी पत्नी कैंसर से पीड़ित थीं। यह बात हमारे अस्पताल के 'हेड नर्स' को पता थी। वह केरल की रहने वाली पेन्टाकोस्ट इसाई है। एक दिन वह उनके घर आयी और कमरे में इधर-उधर देखकर बोली - "तुमारे ये बगवान क्या कर रहे हैं? ये हनुमान और दुर्गा से कुछ नहीं होगा। हमारा जेसस तुमको बिल्कुल ठीक कर देगा। ये सब फोटो फ़ेक दो। हम तुमको बड़ौदा में भेज देगा; वहाँ का प्रिष्ट तुमको बिल्कुल ठीक कर देगा।...

आप सोच सकते हैं कि उस नर्स की 'ट्रेनिंग' कितनी अच्छी तरह से हुई होगी।
उसे लोगों को 'रीड' करना कितनी अच्छी तरह पता है? वह अच्छी तरह जानती है कि 'मरता क्या नहीं करता।' 'ट्रबुल्ड वाटर' में मछली पकड़ने में वह पारंगत है।

यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। हर धर्मान्तरित होने वाले के पीछे इसी तरह की कथा मिलेगी।

रंजना जी लिखती हैं
एकदम सही कहा आपने.इसाई देशों की यह दूरगामी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.उन्हें मालूम है कि किसी राष्ट्र को समाप्त करना हो तो सबसे पहला वार उस देश की धर्म और संस्कृति पर करना चाहिए.अकूत धन खर्च कर ये चर्च /मिशनरियां ख़ास मिसन के तहत चुपके से धीरे धीरे एक ऐसी कौम तैयार कर रही है जिसे वे समय आने पर धर्म के नाम पर ललकार कर अपने ही देश (हिन्दुस्तान)के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकें.

Umesh ji
माओवादी हो या नकसली, इन्हे चर्च प्रभावित राष्ट्रो से धनराशी मिल रही है। नेपाल मे माओवादीयो को धन और योजना उपल्ब्ध कराने वाला मुख्य संगठन रिम था, जिसका मुख्यालय अमरीका मे है। भारत मे भी वहीं नक्सली/माओवादी सक्रिय हैं जहां धर्मानंतरण हो रहा है।

संगीता पुरी जी
बहुत दुखद है। धर्म की आड़ में ऐसी गतिविधियां। वास्तव में लोग धर्म की परिभाषा भूल गए हैं।

Deepak Bhanre ji
ताली एक हाथ से नही बजती है . क्या करें यह देश का दुर्भाग्य है की वोट बैंक के खातिर हमेशा बहुसंख्यक को ही दोषी बताया जाता है . मीडिया भी इस पक्ष को अनदेखा करता है.
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ईसाई मिशनरी का नंगा नाच

एक स्वयंसेवी संगठन जस्टिस आन ट्रायल ने अपनी जांच के आधार पर आरोप लगाया है कि उड़ीसा के कंधमाल जिले में साम्प्रदायिक हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों की धर्मपरिवर्तन की गतिविधियां दोषी हैं। जस्टिस आन ट्रायल की जांच समिति के अध्यक्ष और राजस्थान के अतिरिक्त महाधिवक्ता सरदार जी एस गिल ने शुक्रवार को यहां एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि उड़ीसा में धर्मपरिवर्तन रोकने के लिए सन् १९६७ में बनाए गए सख्त कानून के बावजूद ईसाई मिशनरी संस्थाएं प्रलोभन से भोले-भाले आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन करा रही हैं जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है। उन्होंने कहा कि उड़ीसा के हिन्दू नेता स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती ने एक साक्षात्कार में स्वयं कहा था कि मिशनरी तत्व उन पर आठ बार हमला कर चुके हैं। नवें हमले में गत महीने उनकी मौत हो गई। जांच समिति ने हिन्दू नेता पर हुए हमले के लिए माओवादियों को जिम्मेदार ठहराए जाने के बारे में कहा कि ऐसा कोई ठोस कारण नहीं है कि माओवादी स्वामी जी की जान लें। जांच समिति ने कहा कि इस बात की छानबीन होनी चाहिए कि क्या हिन्दू विरोधी ताकतों ने माओवादियों के जरिये इस अपराध को अंजाम दिया। जांच समिति में पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी डोगरा, राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व सदस्य नफीसा हुसैन सामाजिक कार्यकर्ता कैप्टन एमके अंधारे और रामकिशोर पसारी शामिल थे।
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कश्मीर भारत में उठ रहे आज़ादी की मांग,

कश्मीर भारत में उठ रहे आज़ादी की मांग, या पाकिस्तान परस्त रास्त्र्द्रोही इस्लामिक जेहाद ?

कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग और भारत का मुकुट कहा जाता था आज भारत के लिए एक नासूर बन चूका है कारन सिर्फ मुस्लिम जेहाद के तहत कश्मीर को इस्लामिक राज्य बना कर पाकिस्तान के साथ मिलाने की योजना ही है, और आज रस्त्रद्रोही अल्गाव्बदियो ने अपनी आवाज इतनी बुलंद कर ली है की कश्मीर अब भारत के लिए कुछ दिनों का मेहमान ही साबित होने वाला है और यह सब सिर्फ कश्मीर में धारा ३७० लागु कर केंद्र की भूमिका को कमजोर करने और इसके साथ साथ केंद्र सरकार का मुस्लिम प्रेम वोट बैंक की राजनीती और सरकार की नपुंसकता को साबित करने के लिए काफी है यह बात कश्मीर के इतिहास से साबित हो जाता है जब सरदार बल्लव भाई के नेतृतव में भारतीय सेना ने कश्मीर को अपने कब्जे में ले लिया था परन्तु नेहरु ने जनमत संग्रह का फालतू प्रस्ताव लाकर विजयी भारतीय सेना के कदम को रोक दिया जिसका नतीजा पाकिस्तान ने कबाइली और अपनी छद्म सेना से कश्मीर में आक्रमण करवाया और क़ाफ़ी हिस्सा हथिया लिया । और कश्मीर भारत के लिए एक सदा रहने वाली समस्या बन कर रह गयी और पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के लिए नित्य नयी चालें चलने लगा नतीजा भारत की आज़ादी के समय कश्मीर की वादी में लगभग 15 % हिन्दू थे और बाकी मुसल्मान । आतंकवाद शुरु होने के बाद आज कश्मीर में सिर्फ़ 4 % हिन्दू बाकी रह गये हैं, यानि कि वादी में 96 % मुस्लिम बहुमत है । वादी में कश्मीरी पंडितों की पाकिस्तान समर्थित इन्ही रस्त्रद्रोही अलगाव वादियों द्वारा खुले आम हत्याएं की जा रही थी और सरकार मौन रही थी इन हत्याओं और सरकार की नपुंसकता का एक उदाहरण यहाँ दे रहा हूँ सन् १९८९ से १९९० यानि एक वर्ष में ३१९ कश्मीरी पंडितों की हत्या की गयी और इसके बाद के वर्षो में यह एक सिलसिला ही बन गया था और सरकार का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब जम्मू-कश्मीर के वंधामा में दस साल पहले हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के बारे में गृह मंत्रालय को जानकारी नहीं है। मंत्रालय ने कहा है कि विभाग को ऐसी किसी घटना की जानकारी नहीं है, जिसमें बच्चों समेत 24 कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया था। यह घटना जग विदित है मगर सरकार को इसके बारे में मालूम नहीं, सरकार के इसी निक्कम्मा पण के वजह से आज इन रास्त्रद्रोही अलगाववादियों का हिम्मत इतना बढ़ गया है की अब ये कश्मीर को पूर्ण इस्लामिक राज्य मानकर कश्मीर को पाकिस्तान के साथ मिलाने के लिए अब कश्मीर में बहरी राज्यों से आये हिन्दू मजदूरों को बहार निकल रहे हैं स्वतंत्रता दिवस के पवन अवसर पर हिंदुस्तान के रास्त्रघ्व्ज को जलाया गया हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाया जा रहा है और सरकार मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए चुप बैठी है कश्मीर में आर्मी के कैंप पर हमला करके उनको जलाया जा रहा है फिर हम कैसे कह सकते हैं की कश्मीर हमारे अन्दर में है अगर कश्मीर का मुस्लिम हमारे साथ है तो क्यों वह देशद्रोही अलगाववादियों का साथ दे रही है? अगर केंद्र सरकार कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो क्यों नहीं वह वहां के अलगाववादी आतंकवादियों को के खिलाफ एक्शन ले रही है ? क्यों नहीं सरकार विस्थापित कश्मीरी पंडितों को फिर से उनके जमीन को वापस दिला रही है क्यों कश्मीरी पंडितो के हक़ का दमन कर रही है ? क्यों नहीं आज तक हुए कश्मीर में कश्मीरी पंडितो के हत्याकांडो की जाँच करवा रही है ? कश्मीरी भाइयो का साथ देने वाले साम्प्रदायिक और अलगाववादी देशद्रोही सरकार के नज़र में क्यों आज़ादी का नेता बना हुआ है ? अगर इस सवाल का जवाब सरकार के पास नहीं है तो सरकार देश की जनता को धोखा देना छोर दे की कश्मीर हमारा है और अगर सरकार सच में कश्मीर समस्या का समाधान चाहती है तो कश्मीरी पंडितो को इंसाफ दिलाये और अलगाववादी आतंकवादियों को सजा देकर कश्मीर को इन देशद्रोहियों से मुक्त कराये, अंत में एक सवाल सरकार और आपलोगों से क्या हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले अपने रास्त्रध्व्ज तिरंगे को सीने से लगाये मरने वाले साम्प्रदायिक हैं ?क्या हिंदुस्तान मुर्दाबाद का नारा लगा कर अपने रास्त्र ध्वज तिरंगे को जलाने वाला देशद्रोही नहीं और अगर देश द्रोही है तो इसके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं ?

इस आंख की अंधी सरकार से इंसाफ की क्या उम्मीद

इसलिए अपने दर्द का मरहम ढूंढने आपके पास आये हैं हम

वन्देमातरम

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भारत तेरी शामत आयी

भारत तेरी शामत आयी, लश्कर लायी, लश्कर लायी
नंगा-भूखा हिन्दुस्तान जान से प्यारा पाकिस्तान
पाकिस्तान से रिश्ता क्या, लालिल्लाह इललिल्लाह
कश्मीर की मंडी, रावलपिंडी, रावलपिंडी
खूनी लकीर तोड़ दो, आर-पार जोड़ दो
ऐ जबरियो, ऐ जुल्मियों, कश्मीर हमारा छोड़ दो

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी सम्प्रभु देश के अंदर न सिर्फ उसके विरोध में नारे लगें बल्कि उसकें दुश्मन देश को सिर-आंखो पर उठाया जाये? कश्मीर में यही हो रहा है। जो लोग कह रहे हैं कि कश्मीर में हालात ९० दशक में पहुंच गए हैं, वो शायद बड़ी नर्मी बरत रहे हैं। क्योंकि हकीकत यह है कि कश्मीर में १९४७ के बाद से अब तक के सबसे खराब हालात हैं। देशद्रोही ,भारत विरोधी, भावनाएं उफान पर हैं। घाटी में चारों तरफ या तो पाकिस्तान या इस्लामी चिन्हों वाले हरे झंडों का बोलबाला है। अचानक हर मुसलमान की जुबान में भारत के लिए गाली और पाकिस्तान के लिए प्यार उमड़ रहा है।
६१ सालों से लगातार कश्मीर को सहलाए जाने का नतीजा है? १९४७ के बाद से अब तक दिल्ली की केन्द्र सरकार कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाए रखने के लिए और भारत विरोधियों की लल्लो-चप्पो करने के लिए कश्मीर को जो मुंह मांगी आथिक मदद देती रही है, वह ८६ खरब रुपये से भी ज्यादा है। अगर इतने पैसे में बिहार या मध्य प्रदेश का विकास किया गया होता तो ये प्रदेश देश के सबसे संपन्न राज्य बन गए होते। लेकिन कश्मीर में एक वर्ग की मानसिकता कभी नहीं बदलती है और जैसे जुल्फीकार अली भुट्टों कहते थे, घास खा लेंगे लेकिन इस्लामी बम बनाऐगें, उसी तरह इनकी भी सोच है कि भले कितनी ही बदहाली और अमानवीय स्थितियों में रहना पड़े मगर पाकिस्तान के साथ इसलिए जाएंगे क्योंकि पाकिस्तान से इनका रिश्ता लालिल्लाह इल्लिलाह का है। भारत के लिए कश्मीर एक स्थायी नासूर इसलिए बन गया है। अरूंधती राय कहती हैं कि कश्मीर को हिन्दुस्तान से आजादी चाहिए। लेकिन शायद वह इस पूरी तस्वीर को एक ही चश्में से देख रही हैं। हकीकत यह है कि भारत कोई कश्मीर से कम परेशान नही है। हकीकत तो यह है कि कश्मीर हमारे लिए एक स्थायी सिरदर्द बन चुका है। देश के लाखों फौजियों के लिए कश्मीर एक मानसिक संताप बन चुका है। जिस भी फौजी का तबादला कश्मीर किया जाता है, वह मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। क्योंकि कश्मीर समस्या का वह इलाज ही नहीं है जो इलाज भारत सरकार करना चाहती है। वास्तव में कश्मीर अगर इस कदर साल दर साल भारत के लिए नासूर बनता गया है तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण हमारी राजनीति ही है। लाचारी की बात यह है कि दिल्ली से सरकार जो गलतियां १९५० के दशक में कर रही थी, उन्हीं गलतियों को लगातार किए जा रही है। नतीजा यह निकल रहा है कि २ करोड़ की आबादी वाला कश्मीर ११२ करोड़ की आबादी वाले हिन्दुस्तान का सिरदर्द बन गया है। कश्मीर की वजह से हिन्दुस्तान की छवि पूरी दूनिया में धूमिल हो रही है। लेकिन राजनेता हैं कि वह कोई सबक ही नहीं ले रहे। हमारे राजनेता आम हिन्दुस्तानियों में एकता, अखंडता का भाव जगाने या बनाए रखने के संकोच में एक बात हमेशा छिपा जाते हैं कि कश्मीर का भारत में विलय कुछ शतो के साथ हुआ था। कश्मीर हिन्दुस्तान का उसी तरह से प्राकृतिक हिस्सा नहीं है जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार हैं। कश्मीर का भारत में कुछ विशष शतो के साथ विलय हुआ था जिसमें सीमित आजादी की भी शर्त थी। १९४७ के कश्मीर के हिन्दुस्तान में विलय में यह शर्त रखी गई थी कि विदेशी, मुद्रा , रक्षा और कानून की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होगी। बाकी सभी दायित्व और अधिकार राज्य सरकार के पास होंगे। लेकिन उत्तरोत्तर घटनाक्रमों में भारत सरकार आम देशवासी से इस बारे में लगातार संवादहीनता और गोलमोल की स्थिति बनाए रखी। संविधान की जिस धारा -३७० के तहत कश्मीर को विशेषाधिकार दिए गए थे, लगातार कुछ राष्ट्रवादी पार्टियों के लिए वह कानूनी स्थिति लोगों की भावनाएं भड़काने का बहाना बन गयी। हैरत की बात तो यह है कि लंबे समय तक केन्द्र में शासन करने वाली कांग्रेस ने भी हिम्मत और स्पष्टता के साथ देशवासियों को कभी यह नहीं बताया कि धारा -३७० का विशेष दर्जा कश्मीर को क्यों दिया गया है? वह हमेशा इस मुद्दे को लेकर मामला रफा-दफा करने के फेर में ही रही। नतीजा यह है कि ज्यादातर भारतवासियों को कश्मीर की वस्तुस्थिति का पता ही नहीं है। झारखंड और बिहार में अगर कश्मीर को लेकर राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काती हैं तो इसमें सिर्फ लोगों का उन्मादी राष्ट्रप्रेम ही नहीं है बल्कि नेताओं का वह ढुलमुल रवैय्या भी इसके लिए भरपूर रूप से जिम्मेदारी है जिसमें कभी देशवासियों को कश्मीर की राजनैतिक स्थिति को कभी साफ ही नहीं किया।
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यह लडा़ई नही देशभक्ती है।

अखनूर सेक्टर के जोरियान में पुलिस फायरिंग में कम से कम १० लोग घायल हो गये जिनमें एक की हालत गंभीर है। अभी कुछ दिन पहले 35 वर्षीय कुलदीप कुमार डोगरा नामक एक युवक ने देश के लिय जान दिया। जम्मू में अब हालात विस्फोटक हो चुके है। प्रदर्शनकारी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि लौटाने की मांग कर रहे हैं। कल जिले में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में दो युवकों की मौत हो गयी थी। यह आंदोलन आम आदमियों के नेतृत्व में केन्द्र की संप्रग सरकार और राज्य सरकार द्वारा किये गये कायरतापूर्ण और औचित्यहीन समर्पण के विरूद्ध चलाया जा रहा एक राष्ट्रीय आंदोलन है। यह आंदोलन पूरी तरह अलगाववादी शक्तियों द्वारा उठायी गयी दासतापरक मांगों के विरूद्ध है और उन अलगाववादियों के विरूद्ध है जिन्होंने सदैव ही जम्मु-कश्मीर के भारत का अभिन्न अंग होने पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं।

यह लडाई सिर्फ श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड से जुडे़ हुये भूमी का नही है इसके पीछे अलगावदियों की मनसा कश्मीर से हिंदुओं को मार भगाना चाहते हैं कश्मीरी पंडीत कश्मीर को पहले ही निकाल बाहर किया गया है अब बचे हैं जम्मु के हिन्दु उन्हें भी किसी तरह मार भगाया जाय। लेकिन बार बार धोखा खाकर भी हिंदू वर्ग कुछ नहीं समझता। हिन्दुस्तान का हिंदू कश्मीरी मुसलमानों से यह पूछने की ताब नहीं रखता कि जब देश भर में मुस्लिमों के लिए बड़े-बड़े और पक्के हज हाउस बनते रहे है, यहां तक कि हवाई अड्डों पर हज यात्रियों की सुविधा के लिए ‘हज टर्मिनल’ बन रहे है और सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये की हज सब्सिडी दी जा रही है तब अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले हिंदुओं के लिए अपने ही देश में अस्थाई विश्राम-स्थल भी न बनने देना क्या इस्लामी अहंकार, जबर्दस्ती और अलगाववाद का प्रमाण नहीं है?

चूंकि कांग्रेस और बुद्धिजीवी वर्ग के हिंदू यह प्रश्न नहीं पूछते इसलिए कश्मीरी मुसलमान शेष भारत पर धौंस जमाना अपना अधिकार मानते है। वस्तुत: इसमें इस्लामी अहंकारियों से अधिक घातक भूमिका सेकुलर-वामपंथी हिंदुओं की है। कई समाचार चैनलों ने अमरनाथ यात्रियों के विरुद्ध कश्मीरी मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा पर सहानुभूतिपूर्वक दिखाया कि ‘कश्मीर जल रहा है’। मानों मुसलमानों का रोष स्वाभाविक है, जबकि यात्री पड़ाव के लिए दी गई भूमि वापस ले लेने के बाद जम्मू में हुए आंदोलन पर एक चैनल ने कहा कि यह बीजेपी की गुंडागर्दी है। भारत के ऐसे पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नेताओं ने ही अलगावपरस्त और विशेषाधिकार की चाह रखने वाले मुस्लिम नेताओं की भूख बढ़ाई है। इसीलिए कश्मीरी मुसलमानों ने भारत के ऊपर धीरे-धीरे एक औपनिवेशिक धौंस कायम कर ली है। वे उदार हिंदू समाज का शुक्रगुजार होने के बजाय उसी पर अहसान जताने की भंगिमा दिखाते है। पीडीपी ने कांग्रेस के प्रति ठीक यही किया है। इस अहंकारी भंगिमा और विशेषाधिकारी मानसिकता को समझना चाहिए। यही कश्मीरी मुसलमानों की ‘कश्मीरियत’ है। यह मानसिकता शेष भारत अर्थात हिंदुओं का मनमाना शोषण करते हुए भी उल्टे सदैव शिकायती अंदाज रखती है।

सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते चुप्पी साधे हुये है और आम जनता का खून रहा है। लेकिन ध्यान देने वाली बात तो कुछ और ही है जम्मू का इलाका हिन्दु बहुल है और ये बात कश्मीरी मुसलमानों और अलगाववादी को आख की कीड़कीडी बना हुआ है जम्मु में रह रहे हिन्दु की अवाज को उनके हित को मुस्लिम तुष्टिकरण बाले तथाकथीत धर्मनिरपेक्ष दल कब से जम्मु में रह रहे हिन्दुओं की भावना को दबायें रखा है। जम्मु क्षेत्र कश्मीर से ज्यादा बडा़ होने के वाबजुद सिर्फ दो लोकसभा की और विधानसभा की 36 सीटे मिली हैं जबकी कश्मीर को 3 लोकसभा की और 46 विधानसभा की क्षेत्र है। अब समय आ गया है हिन्दुस्तान के हिन्दु या राष्ट्रभक्त धारा 370 हटाने की मांग करना चाहिये।
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अभी और को मारना बाकी है क्या!

अखनूर सेक्टर के जोरियान में पुलिस फायरिंग में कम से कम १० लोग घायल हो गये जिनमें एक की हालत गंभीर है। प्रदर्शनकारी श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को भूमि लौटाने की मांग कर रहे हैं। कल जिले में प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में दो युवकों की मौत हो गयी थी। यह आंदोलन आम आदमियों के नेतृत्व में केन्द्र की संप्रग सरकार और राज्य सरकार द्वारा किये गये कायरतापूर्ण और औचित्यहीन समर्पण के विरूद्ध चलाया जा रहा एक राष्ट्रीय आंदोलन है। यह आंदोलन पूरी तरह अलगाववादी शक्तियों द्वारा उठायी गयी दासतापरक मांगों के विरूद्ध है और उन अलगाववादियों के विरूद्ध है जिन्होंने सदैव ही जम्म-कश्मीर के भारत का अभिन्न अंग होने पर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं।

Chakka Jam on 13th August for Kashmiri Hindus : An appeal

Dear Brothers,
As you all know that Jammu Kashmir State Government has withdrawn the land allocated to Shri Amarnath Shrine Board for temporary construction. This withdrawal is result of usual pressurisation of fundamentalist Muslims of valley, who wants to make ‘Dar Ul Mustafa’. Fundamentalist Muslim leaders of valley have always been biased with Hindu majority areas. Central government is not only soft with separatists but also boosting their morals anyhow.
Muslim Mafia-Police have peed on the dead body of Kuldeep whom they killed in Jammu! That’s the way they abuse every Hindu they kill everyday. They disconnected the electricity of Hindu areas. Hindu kids are starving for milk and food. No food, No Medicines, No electricity, No civic facilities. Today, Jammu Hindus are already on streets, shading their blood. Rest of Hindus are supposed to be Mute? If No, then support Nationwide ‘chakka jam’ movement called by Vishwa Hindu Parishad on 13th August, and make it huge success. Support not only the Hindus of Jammu but also Nationalism.

http://in.youtube.com/watch?v=TfN-rUlM8U8
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सामाजिक सरोकार से युक्त संत अवधेशानन्द गिरि

भारत एक धर्मप्राण देश है और इस देश में सर्वाधिक मान्यता संत परम्परा की है। देश की सनातन कालीन परम्परा में जब भी समाज को किसी भी दिशा में मार्गदर्शन की आवश्यकता हुई है तो उसने संत परम्परा की ओर देखा है और समाज को भी कभी निराश नहीं होना पडा। यूँ तो भारत में संतों के मार्गदर्शन की सम्पन्न परम्परा रही है परंतु आधुनिक समय में यदि किसी संत ने भारत के जनमानस और लोगों की अतीन्द्रियों को गहराई से प्रभावित किया है तो वह रहे हैं स्वामी रामक़ृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द। एक ओर रामकृष्ण परमहंस ने दिग्भ्रमित हो रही और अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना के भाव से व्याप्त होकर ईसाइयत की ओर समाधान देख रही बंगाल की नयी पीढी को अपनी साधना और अनुभूति के बल पर हिन्दू धर्म के साथ बाँध कर रखा और फिर उनकी प्रेरणा से नरेन्द्र का स्वामी विवेकानन्द के रूप में अभ्युदय हुआ जिसने पश्चिम की धरती से वेदांत का उद्घोष किया और सदियों से अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना संजोये भारतवासियों को एक सिंह का शौर्य दिया जिसने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन और पुनर्जागरण की नींव रखी। स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से पूरा भारत तेजस्वी, विचारवान और ऊर्जावान नवयुवकों की उर्वरा भूमि बन गया और इस परम्परा ने भारत को ऐसे निष्ठावान और वीर पुरुष दिये जिन्होंने न केवल भारत को वरन समस्त विश्व को नयी राह दिखाई।

आज भारत पुनर्जागरण की उस परम्परा से विमुख हो गया है और सर्वत्र निराशा का वातावरण सा छाता जा रहा है। जहाँ भी देखो निराशा, टूटन और अविश्वास है ऐसे में अवतारवादी मान्यता का यह देश एक बार फिर ईश्वर के अवतरण की प्रतीक्षा कर रहा है लेकिन क्या स्वामी विवेकानन्द ने यही पराक्रम और पुरुषार्थ बताया था। निश्चित रूप से नहीं उन्होंने हिन्दू धर्म की उस विलक्षण और उदात्त परम्परा का बोध कराया था जो नर के नारायण बनने की प्रक्रिया में विश्वास करती है। जो कहती है कि इस शरीर में वही परमात्मा वास करता है जो सृष्टि का संचालक भी है। आज इसी उदात्त परम्परा का ध्यान रखते हुए हमें अपने बीच में ही उन प्रेरणा पुरुषों को ढूँढना होगा जो देश के इस निराशा, व्याकुलता और पराजित की सी मानसिकता के धुन्ध को छाँट कर समाज को नयी दिशा दे सकें। क्या देश में संतों की इस विशाल परम्परा में ऐसा कोई संत नहीं दिखता जो सामाजिक सरोकार से जुडा हो, जिसकी दृष्टि इतनी व्यापक हो कि हिन्दू धर्म को वैश्विक परिदृश्य में देख सके और भारत ही नहीं वरन समस्त विश्व की समस्या का समाधान सुझा सके। इस लेखक ने अपनी अल्पबुद्धि के आधार पर ऐसे संत को ढूँढ निकाला है।
अभी पिछ्ले दिनों गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हरिद्वार में जूना अखाडा के आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। यह मुलाकात कुछ संयोग पर आधारित थी और उस दिन के बाद अनेक अवसरों पर काफी लम्बे अंतराल बिताने का अवसर उनके साथ प्राप्त हुआ। हरिद्वार में अपने आश्रम में उन्होंने गुरू पूर्णिमा के इस अवसर पर इजरायल के भारत के उप राजदूत और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई को भी आमंत्रित किया था। यह पहला उदाहरण है जो उनकी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करता है। इजरायल के उच्चायुक्त को बुलाने के पीछे उनका उद्देश्य उस संकल्प को आगे बढाना था जो उन्होंने इस वर्ष के आरम्भ में इजरायल की यात्रा में प्रथम हिन्दू-यहूदी सम्मिलन के अवसर पर लिया था। इजरायल की निर्मिति के साठ वर्षों के उपलक्ष्य में इस देश ने एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया था और उस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व स्वामी जी ने किया था। इस सम्मेलन में भाग लेने के बाद स्वामी जी को इजरायल के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ है और इसी का परिणाम है कि वे अनेक ऐतिहासिक समानताओं की पृष्ठभूमि में भारत और इजरायल की रणनीतिक और सांस्क़ृतिक मित्रता के लिये सामाजिक स्तर पर दोनों देशों में व्यापक समझ विकसित करना चाहते हैं। इसी पहल के पहले चरण के रूप में उन्होंने अपने श्रृद्धालुओं के मध्य इजरायल के उच्चायुक्त को बोलने का अवसर दिया और ऐसा पहला अवसर था जब सामान्य भारतवासियों के मध्य इजरायल के किसी प्रतिनिधि ने अपने देश की भावनायें प्रकट की। देखने में या सुनने में यह सामान्य घटना भले ही लगे परंतु इस विचार के पीछे के विचार को समझने की आवश्यकता है।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि में अनेक सम्भावनायें दिखती हैं और ऐसी सम्भावनाओं के पीछे कुछ ठोस कारण भी हैं। पिछले कुछ दिनों में स्वामी जी को काफी निकट से देखने का और उन्हें परखने का अवसर भी मिला। देश के एक प्रसिद्ध अखाडे के प्रमुख होते हुए भी उनकी सोच सामान्य कर्मकाण्ड, पीठ को बढाने या फिर शिष्य़ परम्परा के विकसित होने में ही सारी ऊर्जा लगा देने के बजाय उनका ध्यान समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्य़ाण के लिये ही अधिक रहता है। अनेक अवसरों पर उनसे बात करने और कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर उनसे चर्चा का अवसर मिला और इस अवसर में अनेक ऐसी बातें पता लगीं जो संत के एक सामाजिक सरोकार के पक्ष को प्रस्तुत करती है।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि का जो सर्वाधिक योगदान समाज को है उसकी कथा झाबुआ से आरम्भ होती है। मध्य प्रदेश का एक अत्यंत पिछडा क्षेत्र जिसमें पानी का इतना अभाव है कि लोग छ्ह महीनों के लिये यह क्षेत्र छोडकर चले जाते है और अपने पीछे अपने मवेशियों को निस्सहाय छोड जाते हैं। स्वामी जी को इस क्षेत्र की इस समस्या के बारे में पाँच वर्ष पहले पता चला और उसी समय उन्होंने यहाँ एक प्रकल्प आरम्भ किया कि किस प्रकार यहाँ जलाभाव की स्थिति से निबटा जाये और इसके लिये बडे पैमाने पर शोध और अनुसन्धान हुए और पिछले पांच वर्षों में इस क्षेत्र की काया बदल गयी और अब यह क्षेत्र सोच भी नहीं सकता कि कभी यहाँ जल का अभाव था। लेकिन स्वामी जी का संकल्प इससे भी आगे है। इस क्षेत्र में शिक्षा और स्वालम्बन के प्रयास भी हो रहे हैं। अब इस संकल्प की चरम परिणति यह है कि इस क्षेत्र के लोग आदर्श व्यक्ति बन सकें और प्रत्येक दृष्टि से आत्मनिर्भर हों। इस क्षेत्र में किये गये प्रयासों का परिणाम है कि अब इस क्षेत्र में आक्रामक गति से हो रहा धर्मांतरण भी रुक गया है क्योंकि इस क्षेत्र में आस्था और श्रृद्धा जगाने के लिये लोगों के घरों में शिवलिंग की स्थापना की गयी और अनेक अद्भुत यज्ञ कराये गये।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि में अधिक सम्भावनायें इस कारण दिखती हैं कि उन्होंने विश्व के समक्ष और भारत के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों को सही सन्दर्भ में लिया है। उनकी दृष्टि में विश्व में एक प्रवृत्ति तेजी से बढ रही है और वह है भण्डारण की प्रवृत्ति या अधिक से अधिक अपने अधिकार में वस्तुओं को ले लेने की प्रवृत्ति। लेकिन इसके लिये कुछ महाशक्तियों को दोष देने या प्रवचन तक सीमित रहने के स्थान पर उन्होंने इसका एक समाधान भी खोजा है। यह समाधान उनके स्वप्निल प्रकल्प अवधेशानन्द फाउण्डॆशन में है। कुल 130 एकड की परिधि का प्रस्तावित यह प्रकल्प वास्तव में अपने सांस्कृतिक बीजों के संरक्षण का महासंकल्प है। इस फाउण्डॆशन के द्वारा भारत की बहुआयामी संस्कृति का वास्तविक दर्शन हो सकेगा। विशुद्ध सांस्क़ृतिक परिवेश में, प्रकृति की छाँव में पर्यावरण के प्रदूषण से रहित विचार, अन्न और संस्कार प्राप्त शिशु जब युवक युवती बन कर यहाँ से निकलेंगे तो वे भारत की संस्कृति के ऐसे प्रचारक होंगे जो अपने-अपने क्षेत्रों में एक बहुमूल्य रत्न होंगे। यह फाउण्डेशन यहाँ निर्मित होने वाले बच्चों को इस बात के लिये प्रेरित करेगा कि वे अपनी संस्कृति के मूल्यों, भाषा, भूषा, भोजन के संरक्षण के साथ ही विश्व की परिस्थितियों, भाषा और संस्कृतियों से भी पूरी तरह भिज्ञ हों। निश्चय ही यह संकल्प हमें स्वामी विवेकानन्द के संकल्प की याद दिलाता है जिन्होंने निष्ठावान, चरित्रवान और संस्कृतिनिष्ठ युवकों के निर्माण को सभी समस्याओं का समाधान बताया था।

यहाँ तक कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने भी देश की समस्याओं की ओर देखा तो उन्हें चरित्र निर्माण में ही राष्ट्र निर्माण का समाधान दिखा। स्वामी अवधेशानन्द गिरि का यह संकल्प और यह प्रयास उन्हें सामान्य प्रवचन या समस्त बुराइयों के लिये पश्चिम की संस्कृति को दोष देते रहने के दायरे से बाहर लाकर व्यापक दायरे में लाता है जहाँ से वे राष्ट्र के भविष्य़ को भी सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे है। स्वामी अवधेशानन्द गिरि के इस विशाल संकल्प की तुलना वर्तमान समय में किसी संकल्प से की जा सकती है तो वह स्वामी रामदेव के पतंजलि योगपीठ है। जिस प्रकार स्वामी रामदेव ने महर्षि पतंजलि की परम्परा को आगे बढाकर भारत की लुप्तप्राय हो रही चिकित्सा पद्धति और योग परम्परा को नवजीवन प्रदान कर भारत की प्राचीन संस्कृति का सातत्य प्रवाहमान किया ठीक उसी प्रकार स्वामी अवधेशानन्द गिरि भारत के संस्कारों और मूल्यों का बीज सुरक्षित रखने का गुरुतर कार्य करने जा रहे हैं। संकल्पों की इस समानता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि शायद यही महापुरुष सामाजिक सरोकार से जुडे वे संत हैं जो न केवल भारत वरन समस्त विश्व को नयी दिशा देने जा रहे हैं।

स्वामी अवधेशानन्द गिरि एक व्यावहारिक संत हैं जो परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना जानते हैं और जटिल कर्मकाण्डों और आनुष्ठानिक संत होने के बाद भी विदेशों में अपनी लोकप्रियता अपनी गरिमा के साथ बनाये रख सके हैं। विदेश के अनेक देशों का दौरा वे इस विचार के साथ कर रहे हैं कि विदेश में बसे हिन्दुओं को सन्देश दे सकें कि उन्हें भारत को पितृऋण भी चुकाना है केवल डालर का निवेश करने से अपनी मातृभूमि के प्रति उनका कर्तव्य समाप्त नहीं हो जाता उन्हें इससे भी अधिक कुछ करने की आवश्यकता है। यह भी एक दैवीय योग है कि जब स्वामी विवेकानन्द ने पश्चिम की धरती से वेदांत का उद्घोष किया था तो उस समय भी भारत घोर निराशा के वातावरण में था और विश्व संकीर्ण साम्प्रदायिक तनाव की दहलीज पर था और आज भी देश और विश्व में कमोवेश वही स्थिति है। धर्म के नाम पर खून की नदियाँ बह रही हैं और क्रूरता, बर्बरता तथा पाशविकता को धर्म का दायित्व बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में विश्व को आध्यात्म रूपी ताजा हवा का झोंका चाहिये।


स्वामी अवधेशानन्द गिरि अपने संकल्पों , विचारों और प्रयासों से एक सुखद भविष्य का दर्शन कराते हुए दिखते हैं साथ ही उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति उनकी उद्विग्नता उन्हें अनेक समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है।
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कोई इन्हें बचाओ

हिन्दुस्तान में मुस्लमानों को हर तरह कि सुख सुविधा सरकार के द्वारा दिया जा रहा है यहा तक कि मुस्लिम आतकवादियों भी सरकार फाँसी पर लटकाने से गुरेज कर रही है। आतंकवाद कि पाढ़शाला मदरसा को दिल खोल कर सरकारी सुविधा मील रहा है जिसका नतीजा है कि हिन्दुस्तान में आये दिन कही न कही बम विस्फोट या फिर दंगा फसाद होते रहता है लेकिन इसके ठीक उलट पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की हालत चिंता का विषय है और सरकार इस ओर से आँख बन्द कर रखा है।

पाकिस्तान के हिंदुऒं ने अपने समुदाय के खिलाफ जानमाल को लक्ष्य बनाकर हो रही घटनाऒं के प्रति चिंता जताई है। गौरतलब है कि देश में हिंदुऒं के धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

अल्पसंख्यक हिंदु समुदाय की पाकिस्तान हिंदू परिषद् (पीएचसी) के प्रतिनिधिमंडल ने चिंता जताई है कि सिंध प्रांत में हिंदुऒं को लगातार लूट और डकैती का निशाना बनाया जा रहा है। उनके खिलाफ इस तरह की घटनाऒं में वृद्धि हो रही है। परिषद ने मांग की है कि इस्लामाबाद की संघीय सरकार इन घटनाऒं को रोकने के तुरंत कोई कदम उठाए और देश में अल्पसंख्यक समुदाय की रक्षा करे।

जाकोकाबाद में हाल ही में हुई लूट की घटना के विरोध प्रदर्शन में कराची में बड़ी संख्या में हिंदुऒं ने भाग लिया। जाकोकाबाद में कुछ हथियारबंद लोगों ने मंदिर में घुस कर करीब ३५० हिंदू महिलाऒं से लाखों रूपये की नगदी तथा जेवरात लूट लिए थे। सिंघ के पूर्व सांसद डा. रमेश लाल ने पुलिस और अन्य कानूनी एजेंसियों पर आरोप लगाया है कि वह नागरिकों खासतौर पर अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में नाकाम रही हैं।

पीएचसी के सचिव हरी मोटवानी ने डेली टाइम्स अखबार को बताया कि डाकुऒं ने करीब सात करोड़ की लूट की है और जाकोकाबाद की हाल ही की घटना के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोग खासतौर पर महिलाएं धार्मिक स्थानों पर जाने में डरने लगे हैं। मोटवानी ने कहा कि इसलिए हम मांग करते हैं कि सरकार डकैतों को तुरंत गिरफ्तार करे और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्र्चित करे। उन्होंने कहा कि यह घटना दिन के समय हुई है बावजूद इसके पुलिस इसे रोक नहीं पाई।

पीएचसी के अध्यक्ष राजा असेरमल मांगलानी ने कहा कि सिंध के उत्तरी जिलों में हिंदुऒं के साथ लूट और अपहरण की घटनाएं हो रही हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में डर और असुरक्षा की भावना घर कर गई है। सरकार को चाहिए कि वह लोगों में व्याप्त इस इस डर की भावना को दूर करे।
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आतंकवादीयों को दमाद क्यों नही बना लेते

बेंगलूर के बाद अहमदाबाद भी सीरियल बम धमाकों से दहल उठा हिन्दुस्तान। 24 घंटे में दुसरा हमला । देश में जब कभी कोई आतंकवादी हमला होता है, तो हमले के लिए जिम्मेदार लोगों या उनके संगठनों अथवा हमलावरों को पनाह देने वाले मुल्क या मुल्कों के नाम रेडिमेड तरीके से सामने आ जाते हैं। आतंकवादियों को कायर, पीठ में छुरा घोंपने वाले या बेगुनाहों का हत्यारा कहकर केंद्र और राज्य सरकारें तयशुदा प्रतिक्रिया व्यक्त कर देती हैं। हमारे नेता भी ऊंची आवाज में चीखकर कहते हैं कि आतंकवाद के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। कुत्ता को घुमाने और ई-मेल कहा से आया बस यही तक खबर आती है। फिर मुआवजा देने का दौर चलता है अगर हिन्दु मरा है तो 1 लाख और मुस्लमान मरा है तो 5 से 10 लाख तक का मुआवजा मिलता है। सरकार के किसी मंत्री घटनास्थल के दौरे के साथ ही सभी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाया करती हैं और यह श्रंखला आतंकवादियों की अगली करतूत होने पर फिर शुरू हो जाती है, यही सिलसिला चलता रहता है। लोगों ने अब यह भी कहना शुरू कर दिया है कि बढ़-चढ़कर किए गए ऐसे दावों में कोई दम नहीं होता। कुछ लोगों ने मुझसे यहां तक कहा कि अखबारों में छपे ऐसे सियासी बयानों को हम पढ़ते तक नहीं।

आखीर कब रुकेगा आतंकवादियों का हमला। हिन्दुस्तान में आतंकवाद को सदैव वोट बैंक और मुस्लिम तुस्टीकरण की राजनीति से जोड्कर देखा जाता है और इसी का परिणाम है कि पहले 1991 में नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार के मुसलमानों के दबाव में आकर टाडा कानून वापस ले लिया और उसके बाद 2004 में सरकार में आते ही एक बार फिर कांग्रेस ने पोटा कानून वापस ले लिया। उच्चतम न्यायालय ने जब संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को फांसी दिए जाने का आदेश दिया था तो तमाम 'सेकुलरवादी दलों' का राष्ट्रविरोधी चेहरा भी सामने आ गया था। जम्मू-कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद सहित पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती उसके बचाव में आ खड़ी हुई थीं। यहा तक कह दिया कि अफजल को फांसी देने पर इस देश में दंगा भरक सकता है कांग्रेसी आजाद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर फांसी की सजा नहीं दिए जाने की अपील की थी। अलगाववादी संगठनों के नेतृत्व में घाटी में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया गया। इन सबका ही परिणाम है कि आज भी अफजल सरकारी दमाद बना हुआ है और सेकुलर संप्रग सरकार फांसी की सजा माफ करने की जुगत में लगी है। क्या एक आतंकवादी को फांसी देने से दंगा भरक सकता है तो इसमें हमे कहने से कोई गुरेज नही है कि दंगाई का राष्टृभक्ति कभी भी हिन्दुस्तान के साथ नही है और इसमें भी कांग्रेसी ही दोषी है जब देश आजाद हूआ था तभी कांग्रेसी जन यैसे देशद्रेही को गले लगा-लगा कर इस देश में रहने के लिये रोक रहे थे जो आज हमारे लिये नासूर बन गये हैं।
हिन्दुस्तान यैसा देश है जहा आतंकवादि सरकारी नैकरी करते हैं सरकार उन्हें पैसा भी देती है और आतंकवाद फैलाने के सहायता। "भारत बहुत बुरा देश है और हम भारत से घृणा करते है। हम भारत को नष्ट करना चाहते है और अल्लाह के फजल से हम ऐसा करेगे। अल्लाह हमारे साथ है और हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगे।" गिलानी के ताजा बयान के बाद भी यदि सेकुलर खेमा गिलानी और अफजल जैसे देशद्रोहियों की वकालत करता है तो उनकी राष्ट्र निष्ठा पर संदेह स्वाभाविक है। गिलानी दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी और फारसी पढ़ाता है। उसके नियुक्ति पत्रों की जांच होनी चाहिए और यदि उसने अपनी नागरिकता भारतीय बताई है तो उसे अविलंब बर्खास्त कर देना चाहिए। क्या यही है आतंकवादियों से लड़ने क माद्दा, शायद नही।

आज भारत में एक भी ऐसा कानून नहीं है जो आतंकवाद की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए और आतंकवादियों के विशेष चरित्र को देखते हुए उन्हें तत्काल और प्रभावी प्रकार से दण्डित करने के लिये प्रयोग में आ सके। आज सभी राजनीतिक दलों के नेता केवल भाजपा को छोड्कर इस बात पर सहमत दिखते हैं कि सामान्य आपराधिक कानूनों के सहारे आतंकवाद से निपटा जा सकता है। हमारे सामने एक नवीनतम उदाहरण है कि किस प्रकार टाडा के विशेष न्यायालय में मुकदमा होते हुए भी मुम्बई बम काण्ड के अपराधियों को सजा मिलने में कुल 15 वर्ष लग गये और सजा मिलने के बाद भी एक के बाद एक आतंकवादियों जमानत पर छूटते जा रहे हैं। आखिर जब हमारी न्याय व्यवस्था जटिल तकनीकी खामियों का शिकार हो गयी है जो आतंकवादियों को बच निकलने का रास्ता देती है तो फिर कडे और ऐसे कानूनों के आवश्यकता और भी तीव्र हो जाती है जो तत्काल जमानत या फिर आतंकवाद के मामले में जमानत के व्यवस्था को ही समाप्त कर दे। यह कोई नयी बात नहीं है। पश्चिम के अनेक देशों ने ऐसे कठोर कानून बना रखे हैं और इसके परिणामस्वरूप वे अपने यहाँ आतंकवादी घटनायें रोकने में सफल भी रहे हैं। परंतु भारत के सम्बन्ध में हम ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते। अगर हिन्दुस्तान की सरकार आतंकवादियों से लड़ नही सकती है तो उसे अपना दमाद बना ले लफडा खत्म हो जायेगा। हम मुर्ख जनता जात-पात उँच-नीच के नाम पर दुबारा नपुसंको के हाथ में इस देश की बागडोर दे देंगे।
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सरकार का एक और झुठ

रामसेतु मसला एक बार फिर केंद्र मे आ गया है। केंद्र सरकार पहले राम और उसके अस्तित्व को नकारते-नकारते आखिरकार यह स्वीकार करने लगी है कि राम पौराणिक काल में थे। कंब रामायण का सहारा लेकर सरकार यह बताने में लगी थी कि भगवान राम स्वयं इस पुल को तोड़ दिया था, केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, ' रामसेतु के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है। भगवान राम ने लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद रामसेतु को ध्वस्त कर दिया था।' जो कि सरकार द्वारा झूठ प्रचारित कर रही है कि राम ने लौटते हुए सेतु को तोड़ दिया था। रामायण के मुताबिक राम लंका से वायुमार्ग से लौटे थे, यह बात हिन्दुस्तान का बच्चा बच्चा जानता है सो वह पुल कैसे तुड़वा सकते थे। वाल्मीकि रामायण के अलावा कालिदास ने 'रघुवंश' के तेरहवें सर्ग में राम के आकाश मार्ग से लौटने का वर्णन किया है। इस सर्ग में राम द्वारा सीता को रामसेतु के बारे में बताने का वर्णन है। इसलिए यह कहना गलत है कि राम ने लंका से लौटते हुए सेतु तोड़ दिया था। कालिदास सरीखे कवि को गलत मानकर कम्ब रामायण जैसे अविश्वसनीय स्त्रोत पर कैसे विश्वास कर किया जा सकता है? यह सर्वविदित है कि वाल्मिकी रामायण तक में इस तरह के प्रमाण नहीं दिए गए हैं। इसका मतलब साफ है कि सरकार इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए हर वह कदम उठाना चाहती है, जिससे इस विवादास्पद मुद्दे पर कहीं से कोई शोर नहीं सुनाए पड़े। सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट पर बनी १९ सदस्यीय समिति में से १८ ने इस प्रोजेक्ट के लिए दूसरे मार्ग अपनाने की सलाह दी थी। केवल एक ने यह सुझाव दिया है कि मार्ग छह का इस्तेमाल किया जाए। मार्ग छह के अपनाने से सेतु का तोड़ा जाना जरूरी हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह सलाह दी है कि वह मार्ग चार को अपनाए, जिससे यह पौराणिक तथ्य और विरासत को बचाया जा सके और करोड़ों लोगों के धार्मिक आस्था की रक्षा की जा सके।
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भारत की संसद भ्रष्ट नेता का अड्डा

न्यूक्लीयर डील पर विश्वास मत हासिल करने की कवायद और उस पर हुए ड्रॉमे ने देश को काफी कुछ बता दिया है। संसद में सरकार ने विश्वास मत तो हासिल कर लिया, लेकिन इस हासिल में बहुतों ने बहुत कुछ खोया है। भारतीय संसद जिस तरह से शर्मसार हुई, उसका उल्लेख बार-बार होगा। जब भी संसद की चर्चा होगी इस बात का उदाहरण दिया जाएगा कि संसद की गरिमा को कैसे धूमिल किया गया। यह उन नेताओं द्वारा किया जिसकी जमीर में हया का वास नहीं है। जिसने भारतीय राजनीति और लोकतंत्र का बाजार में बदल दिया है। सरे आम जहां खरीद-फरोख्त की जा रही है। उन लाखों-करोड़ों जनता जिसने उन नेताओं को चुनकर अपने प्रतिनिधित्व के रूप में संसद की नुमाइंदगी करने के लिए भेजा आज वह बेचे और खरीदे जा रहे हैं। यह भारत के संसदीय इतिहास में सचमुच एक इतिहास बना गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही संख्या बल पर विश्वास मत हासिल कर लिया, लेकिन नैतिकता के चश्मे से देखे तो यह उनके लिए दागदार वाला दिन रहा। मनमोहन सिंह की अपनी छवि भले ही एक साफ सुथरे नेता की रही हो, लेकिन अपने को संसद में जीता देखने के लिए जिस नेता का दामन पकड़े हुए थे वो दागदार हैं। इससे पहले १९९३ में नरसिंहा राव की सरकार ने अपनी सरकार बचाने के लिए उसी शिबू सोरेने का सहारा लिया था, जिसके लिए मनमोहन सिंह भी बेकरार दिखें। आखिर परमाणु डील इतना महत्वपूर्ण हो गया कि उन्होंने भारतीय संसद की गरिमा, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र का ताक पर रखकर ऐसे समझौते किए जो उनके लिए तो नहीं, लेकिन देश में टीस पैदा करेंगे। आज भारतीय राजनीति अपने सफर में सबसे नीचे वाले पायदान पर खड़ी नजर आ रही है। अब तक जो ढंके छुपे होता आ रहा था, वह अब बिल्कुल खुला हुआ हमारे समक्ष है। जनता ये जानती थी कि नेता भ्रष्ट होते हैं, लेकिन वे यह भी कहेंगे कि नेता बिकाऊ होते हैं। और इस बात का सारा दारोमदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जाता है। उन्होंने भारतीय राजनीति में यह बात साफ तौर पर जाहिर कर दी कि संख्या बल का जुटाना हो तो जोड़-तोड़ की राजनीति के साथ करोड़ों की डील भी करनी पड़ती है। एक स्वच्छ नेता जिस पर यह जिम्मेदारी बनती है कि वह राजनीति से गंदगी को साफ कर राजनीति को आम आदमी के बीच पॉपुलर बनाए बजाय उसके उन्होंने इसकी गरिमा को मटियामेट कर दिया। सरकार भले ही अपना पीठ थपथपा रही हो, लेकिन अंदर से उसे भी पता है कि इस संख्या बल जुटाने के लिए उसे कितने रहस्यों पर पर्दा डालना पड़ा है। इस जीत को यूपीए चुनाव में भुनाने की कोशिश करेगी, लेकिन वह जनता को इस बात का जवाब कैसे देगी कि संख्या बल उन्होंने कैसे और किस तरह से जुटाए। देश की जनता ने संसद का पूरा हाल अपनी आंखों से देखा है और वह इतनी आसानी से भूलने वाली नहीं। अगर जनता भूलती है तो यह संसद के अंदर जो कुछ भी हुआ उससे बढ़कर शर्मनाक होगा। लोकसभा में मंगलवार को सांसद राहुल गांधी के भाषण में निरन्तर व्यवधान पर अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा कि भारत की संसद अपने –अधोबिंदु— पर पहुंच गई है। इसके बावजूद विश्वासमत प्रस्ताव के पक्ष- विपक्ष में दबाव और प्रलोभनों के आरोपों के बाद जिस तरह सदन में नोटों की गड्डियों का प्रदर्शन हुआ, उसे तो –पतन की पराकाष्ठा— ही कहा जाएगा। दरअसल सरकार का बनना और गिरना यदि जनादेश, नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित विशुद्ध लोकतांत्रिक प्रक्रिया हो, तो ऐसी नौबत ही नहीं आए। इसके विपरीत आज तो निजी स्वार्थों, आपसी सौदेबाजी और विचारधारा के विरुद्ध भी गठबंधन हो रहे हैं। ऐसी हालत में ये गठजोड़ कब टूट जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। यही चार साल पुरानी मनमोहन सरकार के साथ हुआ और वामपंथी दल उसे मझधार में डुबोने के लिए अपने धुर विरोधियों भाजपा और उसके सहयोगी दलों से जा मिले। आश्चर्य की बात यह है कि वामपंथी दलों ने तो गत ८ जुलाई को समर्थन- वापसी की घोषणा कर दी थी, फिर सांसदों को घूस देने का –भंडाफोड़— विश्वास मत प्रस्ताव पर मतदान के ही दिन क्यों हुआ?
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सरकार को हलाल नहीं होने देगा ये दलाल

परमाणु करार पर देश में घमासान मचा हुआ है। देश में जो वातावरण तैयार हो रहा है वो साठ साला लोकतंत्र के मुंह पर कालिख पोतने का प्रयास मात्र है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश को गिरवी रखने की एक डील पर डील हो रही है। अभी तक बडे पूंजीपति पर्दे के पीछे से सरकार से सम्फ किया करते थे और लाभ कमाते थे। लेकिन अब खुल्लमखुल्ला ये धनपशु न केवल अपने व्यावसायिक हित साध रहे हैं बल्कि देश की राजनीति की दिशा और दशा भी तय कर रहे हैं। तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया भी इन व्यावसायिक घरानों और सरकार के प्रवक्ता की भूमिका अदा कर रहा है। सरकार रहे या जाये लेकिन इस बहाने देश के राजनीति के चरित्र पर बहस करने का एक अवसर देश की जनता को नसीब हुआ है ।
एक समाचार पत्र की सुर्खी थी कि ‘सरकार को हलाल नहीं होने देगा ये दलाल’। बहुत तथ्यपरक और विचारणीय सुर्खी थी यह। इसे सिर्फ एक सुर्खी मात्र कहकर खारिज नहीं किया जा सकता बल्कि यह एक चिन्तन का अवसर है कि देश की राजनीति किधर जा रही है। क्या इसका जवाब यह है कि-’’यह दलाल सरकार को हराम कर देगा?‘‘
बार-बार बहस की जा रही है कि डील देशहित में है। सरकार और सपा का दावा सही माना जा सकता है। लेकिन सपा से एक प्रश्न तो पूछा जा सकता है कि अगर यह डील इतनी ही देशभक्तिपूर्ण थी तो उस समय जब जॉर्ज बुश भारत आये थे तब विरोध प्रदर्शन में सपा क्यों शरीक हुई?
सरकार से भी तो प्रश्न पूछा जा सकता है कि जब वामपंथी दलों ने सेफगार्ड और १२३ करार का मसौदा मॉगा तो सरकार ने कहा था कि यह गोपनीय दस्तावेज हैं और तीसरे पक्ष को नहीं बताये जा सकते हैं। सरकार अगर सच बोल रही थी तो महत्वपूर्ण सवाल है कि अमर सिंह और मुलायम सिंह ने बयान दिया कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति ए०पी०जे० अब्दुल कलाम और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम० के० नारयणन ने डील का मसौदा बताया और आश्वस्त किया कि डील देशहित में हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि जो दस्तावेज सरकार को समर्थन दे रहे दलों को गोपनीय बताकर नहीं बताये गये वो बाहरी व्यक्ति अमर सिंह और मुलायम सिंह को क्यों दिखा दिये गये?
क्या कलाम और नारायणन को यह दस्तावेज इसलिये मालूम थे कि वो राष्ट्रपति रह चुके थे और राष्टीय सुरक्षा सलाहकार हैं? तब तो यह देश की सुरक्षा के लिये गम्भीर खतरा है, चकि कलाम कों तो देश के पूर्व राष्ट्रपति होने के नाते और नारायनन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होने के नाते बहुत से गम्भीर राज मालूम होंगे और क्या यह दोनों किसी सरकार को बचाने के लिये किसी को देश के राज बता देंगे?
सरकार से यह भी पूछा जा सकता है कि जब बुश ४ नवम्बर को रिटायर हो रहे हैं और व्हाइट हाउस स्पष्ट कह चुका है कि डील को अमरीकी संसद से मंजूरी मिलने की कोई गारन्टी नहीं है। तथा आई ए ई ए के प्रवक्ता ने स्पष्ट कहा है कि उनकी तरफ से ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी कि डील का खुलासा नहीं किया जाये तब वो कौन सा कारण था कि डील देश से छुपाई गई? मनमोहन सरकार को बुश से किया वायदा याद है लेकिन देश की जनता से किया एक भी वायदा याद नहीं हैं।
सरकार ने डील पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिये एक विज्ञापन जारी किया जिसमें वैज्ञानिक अनिल काकेादकर केबयान को दोहराया गया है कि देश की ऊर्जा जरुरतों के साथ अगर समझौता किया गया तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। बेहतर होता काकोदकर इतिहास पढाने से बचकर विज्ञान में कोई नया आविष्कार करते।
अब मुलायम सिंह और अमर सिंह कह रहे हैं कि अगर डील न हुई तो भाजपा आ जायेगी। यह गजब का तर्क है। यही समाजवादी नेता पहले कह रहे थे कि सोनिया आ गईं तो देश को विदेशी हाथों बेच देंगी। अब समझ में नहीं आता है कि इनका कौन सा बयान सही है? अमर सिंह जी कह रहे हैं कि मायावती उनके सॉसदों को धन देकर तोड रही हैं। गजब मायावती ने अमर सिंह का हुनर सीख लिया? लोगों को आश्चर्य है कि सपा ने यू टर्न ले लिया है। लेकिन यह झूठा सच है। मुलायम सिंह तो नरसिंहाराव की सरकार भी बचा चुके हैं। फिर यू टर्न कैसा ?करार हो या ना हो, सरकार रहे या जाये लेकिन एक नई बात हो रही है, अब भारतीयता का पाठ सोनिया पढायेंगी, देशभक्ति का पाठ मनमोहन सिंह पढायेंगे, इतिहास अनिल काकोदकर पढायेंगे, धर्मनिरपेक्षता का पाठ अमर सिंह पढायेंगे, मुलायम सिंह राजनीतिक सदाचार पढायेंगे और वेश्याऍ सतीत्व का पाठ पढायेंगी ? क्या देश की राजनीति इसी मुहान पर आ पहॅची है ?
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राजनैतिक दलों का सच हुआ उजागर

रामसेतु का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है जहां कांग्रेसी के पुरातत्वविदों ने भगवान राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाकर हिन्दू भावनाओं को चोट पहुंचाई है। अभी इस प्रकरण पर अंतिम सुनवाई होनी बाकी ही थी कि एक बार फिर अमरनाथ यात्रा से जुड़े प्रसंग न केवल हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं वरन् वर्तमान सत्ताधीश अलगाववादियों के समक्ष आत्मसमर्पण को भी उजागर कर रहे हैं। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा ४९.८८ एकड़ की जमीन आवंटित करने के निर्णय पर जम्मू कश्मीर के मुस्लिम नेताओं ने जिस तरह की अलगाववादी स्थितियां बनायी और जहर भरे वक्तव्य दिये उससे उनकी असलियत पूरे राष्ट्र के समक्ष आ गयी, जम्मू कश्मीर में सत्ता सुख भोग रही पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का छद्म पंथनिरपेक्षता का मुखौटा भी उतर गया है। इस्लाम की दुहाई देने वाली आल इंडिया हुर्रियत कांफे्रस व उसके सहयोगी दलों ने जिस प्रकार पूरी श्रीनगर घाटी व जम्मू में अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड को भूमि आवंटन के विरोध में जोरदार हिंसक प्रदर्शन किया उसमें पाकिस्तान समर्थक नारे लगवाए, पाकिस्तान झण्डे फहराए, सी.आर.पी.एफ. वे सेना के जवानों पर हमले किए उससे यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि ये सभी राष्ट्रविरोधी आतंकवाद समर्थक हैं। आश्चर्य है कि कांग्रेस ने इनके समक्ष आत्मसमर्ण किया हुआ है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में भारत सरकार जहां अल्पसंख्यकों के विकास व उनकी धार्मिक सुरक्षा के नाम पर उनके धामिक क्रिया-कलापों को पूर्ण कराने के लिए बिजली, पानी, सड़क, आवास, खाने-पीने, चिकित्सा जैसी सुविधाओं की पूर्ति करवाने के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं व हज यात्रा पर जाने वाले हजियों के साथ अपने दो-दो मंत्रियो तक को उनके साथ भेजती है। इतनी सारी सुविधाओं व सब्सिडी का असीम सुख भोगने के बाद भी इन कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने पाकिस्तानी आतंकियों का साथ लेकर अमरनाथ यात्रियों पर हमले करके अपनी गहरी बेशर्मी का प्रदर्शन किया है । इसे अच्छा ही कहेंगे कि मुस्लिमों और उसके तुष्टिकारकों दोनों का बदनुमा चेहरा एक साथ देश के सामने उजागर हो गया। जम्मू कश्मीर के मुख्य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने पी.डी.पी. द्वारा समर्थन वापस लेने की घोषणा के बाद जहां राज्य की विस्फोटक होती स्थिति को सुधारने की दृष्टि से अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा व सुविधा का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया वहीं अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अधिकार केवल पूजा तक ही सीमित कर दिया।
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कश्मीर में हिंदू विरोधी मानसिकता

कश्मीरी मुस्लिम नेता कश्मीरी हिंदुओं को मार भगाने संबंधी अपना पाप छिपाने तथा शेष भारत के हिंदुओं को बरगलाने के लिए कश्मीरियत का हवाला देते है, लेकिन असंख्य बार धोखा खाकर भी हिंदू वर्ग कुछ नहीं समझता। अभी-अभी मुफ्ती मुहम्मद सईद और महबूबा मुफ्ती ने जिस तरह जम्मू-कश्मीर सरकार को गिराया वह कश्मीरियत की असलियत का नवीनतम उदाहरण है। प्रांत में तीसरे-चौथे स्थान की हस्ती होकर भी मुफ्ती और उनकी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने तीन वर्ष तक मुख्यमंत्री पद रखा। विधानसभा चुनाव में पीडीपी को 13 सीटे और तीसरा स्थान मिला था, जबकि पहले स्थान पर रही कांग्रेस को 20 सीटे मिली थीं, फिर भी कांग्रेस ने पीडीपी को पहला अवसर दे दिया। कांग्रेस ने आधी-आधी अवधि के लिए दोनों पार्टियों का मुख्यमंत्री बनाने का फार्मूला माना था। जब आधी अवधि पूरी हुई तब पहले तो मुफ्ती ने समझौते का पालन करने के बजाय मुख्यमंत्री बने रहने के लिए तरह-तरह की तिकड़में कीं। अंतत: जब कांग्रेस ने अपनी बारी में अपना मुख्यमंत्री बनाना तय किया तो मुफ्ती ने 'नाराज न होने' का बयान दिया। तभी से वह किसी न किसी बहाने सरकार से हटने या उसे गिराने का मौका ढूंढ रहे थे। अमरनाथ यात्रा के यात्रियों के लिए विश्राम-स्थल बनाने के लिए भूमि देने से उन्हें बहाना मिल गया। इसीलिए उस निर्णय को वापस ले लेने के बाद भी मुफ्ती और उनकी बेटी ने सरकार गिरा दी। भारत का हिंदू कश्मीरी मुसलमानों से यह पूछने की ताब नहीं रखता कि जब देश भर में मुस्लिमों के लिए बड़े-बड़े और पक्के हज हाउस बनते रहे है, यहां तक कि हवाई अड्डों पर हज यात्रियों की सुविधा के लिए 'हज टर्मिनल' बन रहे है और सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये की हज सब्सिडी दी जा रही है तब अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले हिंदुओं के लिए अपने ही देश में अस्थाई विश्राम-स्थल भी न बनने देना क्या इस्लामी अहंकार, जबर्दस्ती और अलगाववाद का प्रमाण नहीं है?

चूंकि कांग्रेस और बुद्धिजीवी वर्ग के हिंदू यह प्रश्न नहीं पूछते इसलिए कश्मीरी मुसलमान शेष भारत पर धौंस जमाना अपना अधिकार मानते है। वस्तुत: इसमें इस्लामी अहंकारियों से अधिक घातक भूमिका सेकुलर-वामपंथी हिंदुओं की है। कई समाचार चैनलों ने अमरनाथ यात्रियों के विरुद्ध कश्मीरी मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा पर सहानुभूतिपूर्वक दिखाया कि 'कश्मीर जल रहा है'। मानों मुसलमानों का रोष स्वाभाविक है, जबकि यात्री पड़ाव के लिए दी गई भूमि वापस ले लेने के बाद जम्मू में हुए आंदोलन पर एक चैनल ने कहा कि यह बीजेपी की गुंडागर्दी है। भारत के ऐसे पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नेताओं ने ही अलगावपरस्त और विशेषाधिकार की चाह रखने वाले मुस्लिम नेताओं की भूख बढ़ाई है। इसीलिए कश्मीरी मुसलमानों ने भारत के ऊपर धीरे-धीरे एक औपनिवेशिक धौंस कायम कर ली है। वे उदार हिंदू समाज का शुक्रगुजार होने के बजाय उसी पर अहसान जताने की भंगिमा दिखाते है। पीडीपी ने कांग्रेस के प्रति ठीक यही किया है। इस अहंकारी भंगिमा और विशेषाधिकारी मानसिकता को समझना चाहिए। यही कश्मीरी मुसलमानों की 'कश्मीरियत' है। यह मानसिकता शेष भारत अर्थात हिंदुओं का मनमाना शोषण करते हुए भी उल्टे सदैव शिकायती अंदाज रखती है। जो अंदाज छह वर्षो से मुफ्ती और महबूबा ने दिखाया वही फारुख अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर का भी था। वाजपेयी सरकार में मंत्री रहते हुए भी उनकी पार्टी ने लोकसभा में वाजपेयी सरकार के विश्वास मत के पक्ष में वोट नहीं दिया था। वह मंत्री पद का सुख भी ले रहे थे और उस पद को देने वाले के विरोध का अंदाज भी रखते थे। जैसे अभी मुफ्ती ने कांग्रेस का दोहन किया उसी तरह जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के रूप में फारुक अब्दुल्ला ने भाजपा का दोहन किया। पूरे पांच वर्ष वह प्रधानमंत्री वाजपेयी से मनमानी इच्छाएं पूरी कराते रहे। जम्मू और लद्दाख क्षेत्र कश्मीरी मुसलमानों की अहमन्यता और शोषण का शिकार रहा है।

जम्मू और लद्दाख भारत का पूर्ण अंग बनकर रहना चाहते है। इन क्षेत्रों को स्वायत्त क्षेत्र या केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग लंबे समय से स्वयं भाजपा करती रही। फिर भी केंद्र में छह साल शासन में रहकर भी उसने फारुक अब्दुल्ला को खुश रखने के लिए जम्मू और लद्दाख की पूरी उपेक्षा कर दी। यहां तक कि पिछले विधानसभा चुनाव में फारुक अब्दुल्ला को जिताने की खातिर भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में गंभीरता से चुनाव ही नहीं लड़ा। बावजूद इसके जैसे ही लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन पराजित हुआ, फारुख ने उससे तुरंत पल्ला झाड़ लिया। इस मानसिकता को समझे बिना कश्मीरी मुसलमानों को समझना असंभव है। वाजपेयी सरकार के दौरान एक तरफ फारुख अब्दुल्ला ने तरह-तरह की योजनाओं के लिए केंद्र से भरपूर सहायता ली, जबकि उसी बीच जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य की 'और अधिक स्वायत्तता' के लिए प्रस्ताव पारित कराया। एक तरह से यह वाजपेयी के साथ विश्वासघात जैसा ही था। यदि वह प्रस्ताव लागू हो तो जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री होगा। साथ ही वे तमाम चीजें होंगी जो उसे लगभग एक स्वतंत्र देश बना देंगी,मगर उसके सारे तामझाम, ठाट-बाट, सुरक्षा से लेकर विकास तक का पूरा खर्चा शेष भारत को उठाते रहना होगा। इस तरह कश्मीरी मुसलमान एक ओर भारत से अलग भी रहना चाहते है और दूसरी तरफ इसी भारत के गृहमंत्री, उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति और मौका मिले तो प्रधानमंत्री भी होना चाहते है। मुफ्ती मुहम्मद सईद, फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला तथा अन्य कश्मीरी मुस्लिम नेताओं के तमाम राजनीतिक लटके-झटके केवल एक भाव दर्शाते है कि वे भारत से खुश नहीं है। यही कश्मीरियत की असलियत है। कश्मीरी मुस्लिम नेतै, चाहे वे किसी भी राजनीतिक धारा के हों, शेष भारतवासियों को बिना कुछ दिए उनसे सिर्फ लेते रहना चाहते है। इस मनोविज्ञान को समझना और इसका इलाज करना बहुत जरूरी है, अन्यथा विस्थापित कश्मीरी हिंदू लेखिका क्षमा कौल के अनुसार पूरे भारत का हश्र कश्मीर जैसा हो जाएगा।
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भारत के इस्लामीकरण का खतरा

अभी कुछ दिनों पूर्व जब मैंने अपने एक मित्र और नवसृजित राजनीतिक आन्दोलन युवादल के राष्ट्रीय संयोजक विनय कुमार सिंह के साथ पश्चिम बंगाल की यात्रा की तो भारत पर मँडरा रहे एक बडे खतरे से सामना हुआ और यह खतरा है भारत के इस्लामीकरण का खतरा। पश्चिम बंगाल की हमारी यात्रा का प्रयोजन हिन्दू संहति के नेता तपन घोष सहित उन 15 लोगों से मिलना था जिन्हें 12 जून को हिन्दू संहति की कार्यशाला पर हुए मुस्लिम आक्रमण के बाद हिरासत में ले लिया गया था। तपन घोष को गंगासागर और कोलकाता के मध्य डायमण्ड हार्बर नामक स्थान पर जेल में रखा गया था। हम अपने मित्र के साथ 23 जून को कोलकाता पहुँचे और दोपहर में पहुँचने के कारण उस दिन तपन घोष से मिलने का कार्यक्रम नहीं बन सका और हमें अगली सुबह की प्रतीक्षा करनी पडी। अगले दिन प्रातः काल ही हमने सियालदह से लोकल ट्रेन पकडी और डायमण्ड हार्बर के लिये रवाना हो गये। कोई दो घण्टे की यात्रा के उपरांत हम अपने गंतव्य पर पहुँचे और जेल में तपन घोष सहित सभी लोगों से भेंट हुई जिन्हें अपने ऊपर हुए आक्रमण के बाद भी जेल में बन्द कर दिया गया था। जेल में हुई भेंट से पूर्व जो सज्जन हमें तपन घोष से मिलाने ले गये थे उन्होंने बताया कि हिन्दुओं का विषय उठाने के कारण उन्हें भी जेल में महीने भर के लिये बन्द कर दिया गया था परंतु उन्होंने जेल के अन्दर की जो कथा सुनाई उससे न केवल आश्चर्य हुआ वरन हमें सोचने को विवश होना पडा कि भारत के इस्लामीकरण का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।

भारत के इस्लामीकरण की सम्भावना व्यक्त करने के पीछे दो कारण हैं जो स्थानीय तथ्यों पर आधारित हैं। एक तथ्य तो यह कि 12 जून को जो आक्रमण हिन्दू संहति की कार्यशाला पर हुआ उसमें अग्रणी भूमिका निभाने वाले व्यक्ति का नाम इस्माइल शेख है जिसका गंगासागर क्षेत्र में दबदबा है और यही व्यक्ति आस पास के क्षेत्रों में जल की आपूर्ति कर करोडों रूपये बनाता है पर बदले में इसकी शह पर गंगासागर से सटे क्षेत्रों में खुलेआम गोमांस की बिक्री होती है। एक ओर जहाँ देश के अन्य तीर्थ स्थलों में गोमांस की बिक्री निषिद्ध है वहीं यह क्षेत्र इसका अपवाद है क्योंकि पूरे गंगासागर में मस्जिदों का जाल है और इस्माइल शेख की दादागीरी है। रही सही कसर कम्युनिष्ट सरकार ने पूरी कर दी है और यहाँ तीर्थ कर लगता है। गंगासागर में प्रवेश करने के बाद आंखों के सामने मुगलकालीन दृश्य उपस्थित हो जाता है और ऐसा प्रतीत होता है मानों इस्लामी क्षेत्र में हिन्दू अपने लिये तीर्थ की भीख माँग रहा है।

इससे पूर्व जब लोकमंच पर इस घटना के सम्बन्ध में लिखा गया था तो आशंका व्यक्त की गयी थी कि यह पहला अवसर है जब पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्ट और इस्लामवादियों ने मिलकर किसी हिन्दू तीर्थ पर आक्रमण किया है। पश्चिम बंगाल की यात्रा के बाद यह आशंका पूरी तरह सत्य सिद्ध हुई जब कोलकाता से गंगासागर तक पड्ने वाले क्षेत्रों की भूजनांकिकीय स्थिति के बारे में लोगों ने बताया। कुछ क्षेत्र और जिले तो ऐसे हैं जहाँ दस वर्षों में जनसंख्या की वृध्दि की दर 200 प्रतिशत रही है। कभी कभार कुछ जिलाधिकारियों या आईएएस अधिकारियों ने अपनी ओर से अपने क्षेत्र की जनसंख्या का हिसाब कर लिया और जिन लोगों ने इस विषय़ में अधिक रुचि दिखाई उनका स्थानांतरण कर दिया गया। फिर भी भगोने के एक चावल से पूरे चावल का अनुमान हो जाता है और उस अनुमान के आधार पर कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में इस समय जनसंख्या का अनुपात पूरी तरह बिगड गया है और इसका सीधा असर इस्लामवादियों की आक्रामकता में देखा जा सकता है।


मुस्लिम घुसपैठियों की जनसंख्या से जहाँ एक ओर इस राज्य के इस्लामीकरण का खतरा उत्पन्न हो गया है वहीं कम से 1 करोड हिन्दू इस राज्य में ऐसा है जिसे देश या राज्य के नागरिक का दर्जा नहीं मिला है, एक ओर जहाँ बीते दशकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का स्वागत इस राज्य में राजनीतिक दलों ने दोनों हाथों में हार लेकर किया है वहीं 1971 के बाद से बांग्लादेश से आयए हिन्दुओं का नाम भी मतदाता सूची में नहीं है और यदि उन्हें नागरिक का दर्जा दिया भी गया है तो पिता का नाम हटा दिया गया है। इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए एक बंगाल के हिन्दू ने कहा कि हमें तो सरकार ने “हरामी” बना दिया और बिना बाप का कर दिया। लेकिन इस ओर किसी भी राजनीतिक दल का ध्यान नहीं जाता। यही नहीं तो एक बडा खतरा यह भी है कि मुस्लिम घुसपैठी न केवल मतदाता सूची में अंकित हैं, या उनके पास राशन कार्ड है उन्होंने अपना नाम भी हिन्दू कर लिया है और सामान्य बांग्लाभाषियों के साथ घुलमिल गये हैं। यह इस्लामी आतंकवादियों और इस्लामवादियों के सबसे निकट हैं जो कभी भी राज्य की सुरक्षा और धार्मिक सौहार्द के लिये खतरा बन सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि इस असहिष्णुता का असर देखने को नहीं मिल रहा है। जेल में एक माह बिता चुके एक हिन्दू नेता ने बताया कि डायमण्ड हार्बर जेल में 7 नं. की कोठरी ऐसी है जिसमें केवल मुसलमान कैदी हैं और उन्होंने अपनी कोठरी के एक भाग को कम्बल से ढँक रखा है और उसे “ कम्बल मस्जिद” का नाम दे दिया है। इस क्षेत्र के आसपास के स्नानागार और शौचालय में काफिरों को जाने की अनुमति नहीं है तो यही नहीं हिन्दुओं को ये लोग इस कदर परेशान करते हैं कि उन्हें शौचालय में अपने धर्म के विपरीत दाहिने हाथ का प्रयोग करने पर विवश करते हैं। मुस्लिम कैदियों की एकता और जेल के बाहर उनकी संख्या देखकर जेल प्रशासन भी उनकी बात मानने और उन्हें मनमानी करने देने के सिवा कोई और चारा नहीं देखता।

पश्चिम बंगाल में जिन दिनों हम यात्रा पर थे उन्हीं दिनों जम्मू कश्मीर में अमरनाथ यात्रा को लेकर चल रहे विवाद के बारे में भी सुना। जेल में तपन घोष से मिलने के बाद जब हम किसी घर में भोजन कर रहे थे तो टेलीविजन पर अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने के मामले पर चल रहे विरोध प्रदर्शन पर कश्मीर घाटी के पूर्व आतंकवादी और जेकेएलएफ के प्रमुख यासीन मलिक का बयान आ रहा था कि अमरनाथ यात्रा का प्रबन्धन पिछले अनेक वर्षों से मुस्लिम हाथों में है और इसकी रायल्टी से कितने ही मुस्लिम युवकों को रोजगार मिलता है। कितना भोंडा तर्क है यह कि हिन्दू तीर्थ यात्रा का प्रबन्धन मुस्लिम हाथों में हो क्या ये मुसलमान अजमेर शरीफ का प्रबन्धन, वक़्फ बोर्ड का प्रबन्धन, हज का प्रबन्धन हिन्दू हाथों में देंगे तो फिर अमरनाथ यात्रा का प्रबन्धन मुस्लिम हाथों में क्यों क्योंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल है और मुस्लिम कभी सद्भाव से रहना जानता ही नहीं।

अमरनाथ यात्रा को लेकर जो विवाद श्राइन बोर्ड को राज्यपाल द्वारा दी गयी जमीन से उठा था उसकी जडें काफी पुरानी हैं। 2005 में भी जब तत्कालीन राज्यपाल ने अमरनात यात्रा की अवधि बढाकर 15 दिन से दो माह कर दी थी तो भी तत्कालीन पीडीपी मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इसका विरोध कर इस प्रस्ताव को वापस यह कहकर किया था कि प्रदूषण होगा और सुरक्षा बलों को यात्रा में लगाना पडेगा जिससे कानून व्यवस्था पर असर होगा। बाद में सहयोगी कांग्रेस के दबाव के चलते मुफ्ती को झुकना पडा था और यात्रा की अवधि बढ गयी थी। इसी प्रकार मुख्यमंत्री रहते हुए मुफ्ती ने राज्यपाल एस.के.सिन्हा के कई निर्णयों पर नाराजगी जतायी थी। मुफ्ती ने कुछ महीने पूर्व जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा चलाने का भी सुझाव दिया था तो पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती तो खुलेआम पाकिस्तान की भाषा बोलती हैं। ऐसे में अमरनाथ यात्रा को लेकर हुआ विवाद तो बहाना है असली निशाना तो कश्मीर का इस्लामीकरण है। कश्मीर का इस्लामीकरण पूरी तरह हो भी चुका है कि वहाँ की सरकार ने घुट्ने टेक दिये और इस्लामी शक्तियों की बात मान ली। परंतु कश्मीर में हुए इस विरोध और सरकार को झुका लेने के इस्लामी शक्तियों के अभियान के अपने निहितार्थ है और ऐसे ही प्रयास स्थानीय विषयों को लेकर प्रत्येक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में होंगे। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र अब अगले निशाने पर होंगे जब वहाँ से एक और पाकिस्तान की माँग उठेगी। इससे पूर्व कि भारत के इस्लामीकरण का मार्ग प्रशस्त हो और देश धार्मिक आधार पर कई टुकडों में विभाजित हो जाये हमें अपनी कुम्भकर्णी निद्रा त्याग कर इस्लाम के खतरे को पहचान लेना चाहिये जो अब हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
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गंगासागर की घटना से उभरे कुछ प्रश्न

दिनाँक 12 जून को पश्चिम बंगाल के सुदूर क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटी जो सामान्य लोगों के लिये सामान्य नहीं थी पर उस राज्य के लिये सामान्य से भी सामान्य थी। हिन्दू संहति नामक एक हिन्दू संगठन द्वारा “वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिवेश” विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया और उस कार्यशाला पर कोई 6,000 की मुस्लिम भीड ने आक्रमण कर दिया और इस कार्यशाला में शामिल सभी 180 लोगों पर पत्थर और गैस सिलिंडर फेंके। इस घटना में अनेक लोग घायल भी हुए और यहाँ तक कि जो 10 पुलिसवाले कार्यशाला में फँसे लोगों को बचाने आये उनकी जान के भी लाले पड गये। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह भीड प्रायोजित थी और कुछ स्थानीय कम्युनिष्ट कैडर द्वारा संचालित थी। लोगों का कहना है कि एक स्थानीय कम्युनिष्ट नेता जो अभी हाल में सम्पन्न हुए पंचायत चुनावों में पराजित हो गये हैं उन्होंने इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया और स्थानीय मुसलमानों को भडकाने और एकत्र करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

आसपास के लोगों का कहना है कि मामला ऐसे आरम्भ हुआ कि कार्यशाला में भाग लेने आये प्रतिभागी गंगासागर से स्नान करके कार्यशाला आटो से लौट रहे थे और उत्साह में नारे लगा रहे थे। आटो चलाने वाला मुस्लिम समुदाय से था और उसे भारतमाता की जय, वन्देमातरम जैसे नारों पर आपत्ति हुई और उसने आटो में बैठे लोगों से नारा लगाने को मना किया साथ ही यह भी धमकी दी कि, “ तुम लोग ऐसे नहीं मानोगे तुम्हारा कुछ करना पडेगा” इतना कहकर वह स्थानीय मस्जिद में गया और कोई दस लोगों की फौज लेकर कार्यशाला स्थल वस्त्र व्यापारी समिति धर्मशाला में ले आया। इन लोगों ने कार्यशाला में जबरन प्रवेश करने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों में टकराव हुआ और यह हूजूम चला गया। कुछ ही समय के उपरांत हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय और कम्युनिष्ट कैडर मिलाकर एकत्र हो गया और कार्यशाला को घेर लिया तथा पत्थर और जलता गैस सिलिंडर कार्यशाला के अन्दर फेंकना आरम्भ कर दिया। कार्यशाला और भीड के बीच कुछ घण्टों तक युद्ध का सा वातावरण रहा और कार्यशाला में अन्धकार था जबकि भीड प्रकाश में थी। भीड अल्लाहो अकबर का नारा माइक से लगा रही थी। कार्यशाला के प्रतिरोध के चलते भीड को कई बार पीछे की ओर भागना पडा। इस संघर्ष के कुछ देर चलते रहने के बाद दस पुलिसकर्मी आये और उनके भी जान के लाले पड गये। पुलिस टीम का प्रमुख तो प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बंगाली में कह रहा था कि, “ बचेंगे भी कि नहीं” ।
घटनाक्रम किस प्रकार समाप्त हुआ किसी को पता नहीं। पुलिस के हस्तक्षेप से या स्वतः भीड संघर्ष से थक गयी यह स्पष्ट नहीं है। परंतु बाद में पुलिस से एकतरफा कार्रवाई की और भीड को साक्षी बनाकर हिन्दू संहति के प्रमुख तपन घोष पर अनेक धाराओं के अंतर्गत मुकदमा लगा दिया और गैर जमानती धाराओं में जेल भेज दिया। जिस प्रकार पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की उससे इस पूरे मामले के पीछे राजनीतिक मंशा और नीयत स्पष्ट है।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ मूलभूत प्रश्न उभरते हैं। जिनका उत्तर हमें स्वयं ढूँढना होगा। एक तो यह घटना मीडिया पर बडा प्रश्न खडा करती है और दूसरा देश में हिन्दुत्व के विरोध में संगठित हो रही शक्तियों पर। गंगासागर जैसे हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल पर इतना विशाल साम्प्रदायिक आक्रमण हुआ और तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया संवेदनशून्य बना रहा है। आखिर क्यों? इसके पीछे दो कारण लगते हैं। एक तो पश्चिम बंगाल में कम्युनिष्टों के खूनी इतिहास को देखते हुए यह कोई महत्वपूर्ण घटना नहीं थी क्योंकि इसमें कोई मृत्यु नहीं हुई थी। दूसरा इस विषय को उठाने का अर्थ था कि किसी न किसी स्तर पर इस पूरे मामले की समीक्षा भी करनी पड्ती और इस समीक्षा में पश्चिम बंगाल में उभर रहे हिन्दुत्व का संज्ञान भी लेना पडता जिसके लिये भारत का मीडिया तैयार नहीं है। तो क्या माना जाये कि मीडिया अब यथास्थितिवादी हो गया है और वामपंथ का सैद्धांतिक विरोध करने को तैयार नहीं है। या फिर यह माना जाये कि देश में अब उस स्तर की पत्रकारिता नहीं रही जो किसी परिवर्तन की आहट को पहचान सके। यही भूल भारत की पत्रकारिता ने 2002 में गोधरा के मामले को लेकर भी की थी और सेकुलरिज्म के चक्कर में जनता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को भाँप न सकी थी। देश में हिन्दू- मुस्लिम समस्या बहुत बडा सच है और इससे मुँह फेरकर इसका समाधान नहीं हो सकता। शुतुरमुर्ग के रेत में सिर धँसाने से रेत का तूफान नहीं रूकता और न ही कबूतर के आंख बन्द कर लेने से बिल्ली भाग जाती है। आज भारत का मीडिया अनेक जटिल राष्ट्रीय मुद्दों पर पलायनवादी रूख अपना रहा है। इसका सीधा प्रभाव हमें मीडिया के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के रूप में देखने को मिल रहा है। गंगासागर में हुई इस घटना का उल्लेख किसी भी समाचारपत्र ने नहीं किया परंतु अनेक व्यक्तिगत ब्लाग और आपसी ईमेल के आदान प्रदान से यह सूचना समस्त विश्व में फैल गयी और लोगों ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय प्रशासन को हिन्दू संहति के नेता तपन घोष की कुशल क्षेम के लिये सम्पर्क करना आरम्भ कर दिया। परंतु यह विषय भी अंग्रेजी ब्लागिंग तक ही सीमित रहा और इस भाषा में जहाँ यह विषय छाया रहा वहीं हिन्दी ब्लागिंग में इसके विषय में कुछ भी नहीं लिखा गया। हिन्दी ब्लागिंग में अब भी काफी प्रयास किये जाने की आवश्यकता और मीडिया का विकल्प बनने के लिये तो और भी व्यापक सुधार की आवश्यकता है। लेकिन जिस प्रकार अंग्रेजी ब्लागिंग जगत ने तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया की उपेक्षा के बाद भी गंगासागर में आक्रमण के विषय को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया उससे यह बात तो साफ है कि मुख्यधारा के मीडिया अनुत्तरदायित्व और पलायनवादी रूख से उत्पन्न हो रही शून्यता को भरने के लिये ब्लागिंग पत्रकारिता की विधा के रूप में विकसित हो सकती है और इसके सम्भावनायें भी हैं।

गंगासागर में हिन्दू मुस्लिम संघर्ष या जिहादी आक्रमण से एक और गम्भीर प्रश्न उभर कर सामने आया है और वह है इस्लामवादी-वामपंथी मिलन का। गंगासागर की घटना के आसपास ही समाचारपत्रों में समाचार आया था कि केरल राज्य में माओवादियों और इस्लामवादियों ने बैठक कर यह निर्णय लिया है कि वे तथाकथित “ राज्य आतंकवाद”, “ साम्राज्यवाद” और हिन्दूवादी शक्तियो” के विरुद्ध एकजुट होकर लडेंगे। गंगासागर में हिन्दू कार्यशाला पर हुआ मुस्लिम- कम्युनिष्ट आक्रमण इस गठजोड का नवीनतम उदाहरण है। गंगासागर पर आक्रमण के अपने निहितार्थ हैं। यह तो निश्चित है कि इतनी बडी भीड बिना योजना के एकत्र नहीं की जा सकती और यदि यह स्वतः स्फूर्त भीड थी तो और भी खतरनाक संकेत है कि हिन्दू तीर्थ पर आयोजित किसी हिन्दू कार्यशाला पर आक्रमण की खुन्नस काफी समय से रही होगी। जो भी हो दोनों ही स्थितियों में यह एक खतरे की ओर संकेत कर रहा है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है किसी भी समुदाय या संगठन को देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार विमर्श का अधिकार है और यदि इस अधिकार को आतंकित कर दबाने का प्रयास होगा और राजसत्ता उसका समर्थन करेगी तो स्थिति कितनी भयावह होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। गोधरा के सम्बन्ध में ऐसी स्थिति का सामना हम पहले कर भी चुके हैं फिर भी कुछ सीखना नहीं चाहते। आज देश के सामने इस्लामी आतंकवाद अपने भयावह स्वरूप में हमारे समक्ष है अब यदि उसका रणनीतिक सहयोग देश के एक और खतरे माओवाद और कम्युनिज्म के नवीनतम संस्करण से हो जाता है तो उसका प्रतिकार तो करना ही होगा। यदि प्रशासन और सरकार या देश का बुद्धिजीवी समाज या फिर मीडिया जगत इस रणनीतिक सम्बन्ध की गम्भीरता को समझता नहीं तो इसकी प्रतिरोधक शक्तियों का सहयोग सभी को मिलकर करना चाहिये। अच्छा हो कि गंगासागर से उभरे प्रश्नों का ईमानदार समाधान करने का प्रयास हम करें।
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FRIENDS OF HINDU SAMHATI
Registered in: New York, USA. Contact:
hindusamhati@gmail.com


June 13, 2008


The Friends of Hindu Samhati, USA unequivocally condemns today's gruesome attack on the Hindu Samhati training camp at Ganga Sagar (West Bengal) by a murderous mob of local Muslims, at least 6000-7000 strong, starting Thursday (June 12, 2008).

Ganga Sagar is a very reknowned Hindu Tirtha Kshetra (Place of Pilgrimage) where the sacred Ganga River has a confluence with the Bay of Bengal. Ganga Sagar is located on the western edge of the Sunderban Delta on Sagar Island. At the edge of Sagar town - adjacent to the beach - is the ancient temple dedicated to Kapil Muni, the sage responsible for initiating the chain of events that ultimately resulted in Mother Ganga descending to the earth from heaven and giving mankind an opportunity to wash away its sins in her pure water. The earliest mention of this sacred place is found in the Mahabharata where a learned sage explains to Bhishma the significance of taking a dip at the confluence of Ganga Sagar. Millions of Hindu pilgrims visit this holy place all year round to take a dip in the ho,y Ganges, particularly during the Kumbha Mela and Makara Sankranti festivities.

Since this morning (Thursday, 12 June, 2008), Hindu Samhati had started conducting a training camp and workshop on the current socio-political scenario to 180 men, women and children in the peaceful and serene surroundings of Ganga Sagar.


Sri Tapan Kumar Ghosh, the National Convenor of Hindu Samhati is conducting the main sessions of this camp. Other eminent people and local notables are also present. Everything went on smoothly until this evening, when suddenly the camp building was surrounded by a murderous mob of about 6000-7000 local Muslims bent on mayhem. The Muslim attackers were well-prepared and have been throwing gas cylinders and petrol bombs (molotov cocktails) and kept on attacking incessantly for a few hours, to incinerate the whole camp. The entire camp building has been reduced to ashes. All 180 of our camp attendees (a large number of them women and children) and 15 policemen are trapped inside this burning camp along with our dear leader Sri Tapan Kumar Ghosh.

Already 14-15 attendees of the camp have been injured in the carnage, and at least 7 of them are in very critical condition and are not expected to survive. The names of the critically wounded include: Subodh Kundu, Bivas Mondal, Gopinath Biswas, Prasenjit Sardar and Gautam Halder, apart from 2 others that could not be identified because of serious facial burn injuries
.

the camp, the rampaging Muslim mob has attacked and seriously damaged some nearby houses of the local Hindus. They have also seriously damaged and set fire to an adjoining Kali temple and a 'Yatri Nivas' (Travellers' Lodge) run by the Vishwa Hindu Parishad. The fireball attacks have slightly abated but the vicious threats and stone pelting continues – all attuned to the collective chants of both 'naara-e-takbir, allahu akbar' (allah is the Greatest) and 'inquilab zindabad' (Long Live the Revolution).

Sagar island at the Ganga Sagar – the confluence of the Ganga and the Bay of BNine camp attendees are still missing and may have been kidnapped by the Muslim mob. Their names are:
Gautam Mondal, Kartick Biswas, Ram Shil, Palash Roy, Gopal Dolui, Piyush Senapati, Ashok Das, Shankar Nandi and Subhash Roy. We are very apprehensive about their well being.
The local police-station (Thana) has unfortunately sent in a small posse of 15 policemen who are totally inadequate for resisting such a huge Jehadi mob armed to the teeth. The police could not control the mob of Muslims even after firing several rounds.
As of Friday morning (June 13, 2008), as per the recent information received by us, the assault by the Muslim mob at Hindu Samhati campsite in Gangasagar is still on, although the intensity has abated a little bit. Some more police force has reached the trouble spot, though the large force required to subdue a mob of this size and temperament is nowhere in sight. A recent update by phone from the camp is that along with the 14-15 attendees who were injured, 2 policemen have also been seriously injured due to the assault by the Muslim mob. Scores of other attendees to the camp has sustained minor injuries in this most cowardly assault including the National Convener of Hindu Samhati, Sri Tapan Kumar Ghosh. Thankfully his injuries are not serious.
Apart from throwing petrol bombs to incinerate the camp building, the Muslim mob also tried to breach the wall by exploding cooking gas cylinders against it. Failing to break into engal – is one of the holiest pilgrimages of India, where millions of Hindus from all over India and the world gather during the 'Makar Sankranti' (Winter Solstice) for the 'Punya Snan' (Holy Bath) every year. If a peaceful Hindu gathering can be assaulted with such viciousness and impunity in one of the most sacred Hindu sites of pilgrimage, one shudders to think what lies in store for the Hindus of West Bengal a few years hence.

In a travesty of justice, instead of arresting the attackers, the Police in West Bengal have slapped a non-bailable arrest warrant against Sri Tapan Kumar Ghosh and 15 Hindu Samhati activists. The concocted charges against them are listed as being: "Incitement and Instigation for Rioting" and "Disruption of Communal Harmony".

As per the latest news received from the ground, Sri Tapan Kumar Ghosh and 15 Hindu Samhati activists have been framed and arrested for inciting communal disharmony by Kakdwip Thana (Police Station) in West Bengal.


1) The Friends of Hindu Samhati, USA strongly protests this outrageous attack on a peaceful, indoor religious function that was held behind closed doors. There was no provocation for this vicious assault nor was any outdoor procession held at the location. It is pitiable that the police could not provide security to its peace loving citizens and is instead insisting on closing the camp down.

2) We strongly urge the police and the local administration to arrest all the perpetrators of this heinous crime immediately and provide security to continue the camp at a nearby, alternate location.

3) We deeply deplore the travesty of justice in West Bengal and appeal to the police and the local administration to remove the framed charges and release Sri Tapan Kumar Ghosh and 15 Hindu Samhati activists immediately.

4) We request all friends and readers in India and abroad to call up the Indian administration to inquire about this incident. At least, they will know that people still care about justice and peace in India. The Numbers
to Call are:
a) District Magistrate, South 24 ParganasPhone: 033-24793713Email: dm-ali@wb.nic.in
b) Mr. Praveen Kumar
District Superintendent of Police, South 24 Parganas, West Bengal
Mobile Phone: 91-98300-23142

c) Ganga Sagar Police-Station/Thana
Officer in Charge
Phone: 91-3210-240-205

d) Mr. Tomal Das
Officer in Charge
Kakdwip Thana (Police Station)Mobile Phone: 98305-99612
e) Sub-Divisional Police Officer--Senior to Officer in ChargePhone: 94349-66000
5) Finally, please show your solidarity with the beleaguered Hindus of West Bengal, and spread the news of this heinous outrage among your friends, co-workers and family.



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बराक ओबामा की उम्मीदवारी

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो चुकी है और यह तय हो गया है कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट की ओर से क्रमशः प्रत्याशी कौन होगा। रिपब्लिकन की ओर से जान मैक्केन का नाम काफी पहले ही घोषित हो गया था और डेमोक्रेट में काँटे की टक्कर चल रही थी कि बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के बीच कौन बाजी मार ले जाता है। अंततोगत्वा अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के बराक ओबामा को डेमोक्रेट प्रत्याशी बनने में सफलता प्राप्त हुई। बराक ओबामा के प्रत्याशी बनने की सम्भावनाओं के मध्य ही अनेक कथायें सामने आ रही थीं। अब जबकि बराक ओबामा अमेरिका में अश्वेत होकर भी देश के सर्वोच्च पद के लिये चुनाव लड्ने जा रहे हैं तो इस रूझान के अनेक अंतरराष्ट्रीय मायने भी हैं। एक ओर इसे अमेरिका में ऐंग्लो सेक्शन समुदाय के वर्चस्व के समापन का आरम्भ तक भी मान कर चला जा रहा है तो वहीं इसे लेकर विश्व में अमेरिका पूँजीवादी प्रभुत्व के लिये भी एक चुनौती मानकर चला जा रहा है। भारत के लोगों की अमेरिका की राजनीति में प्रत्यक्ष कोई भूमिका नहीं है परंतु इस बार भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर जिज्ञासा काफी प्रबल है।

जब अमेरिका में दो प्रमुख दलों की ओर से प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया चल रही थी उसी समय से भारत में बराक ओबामा को लेकर काफी उत्साह का वातावरण था। अब जबकि यह निश्चित हो गया है कि ओबामा नवम्बर के चुनाव में रिपब्लिकन जान मैक्केन को टक्कर देंगे तो ओबामा के सम्बन्ध में दंतकथाओं का सिलसिला तेज हो गया है।

भारत मूल रूप से एक भावुक देश है और यहाँ के लोग कुछ सूचनाओं की गहराई में गये बिना सामने वाले के साथ स्वयं को भावना के स्तर पर जोड लेते हैं। ऐसा ही भारत में कुछ वर्गों के साथ ओबामा के सम्बन्ध में हो रहा है। भारत के समाचार पत्रों में जब यह समाचार आया कि ओबामा ने अपने पूरे अभियान में कुछ प्रतीक अपने साथ रखे और उसमें हनुमान जी का लाकेट भी था तो इसे भावुकता के साथ लिया गया। लेकिन क्या यह उचित है कि अमेरिका जैसे देश के राष्ट्रपति के चुनाव की समीक्षा अपने राष्ट्रीय हितों और अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में करने के स्थान पर भावुकता के आधार पर की जाये। वैसे जहाँ तक ओबामा के अपने साथ हनुमान जी के लाकेट को रखने का प्रश्न है तो उन्होंने इसे अमेरिका की प्रसिद्ध पाप गायिका मैडोना के साथ रख रखा था। इस विषय पर जब मैंने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों से प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि इस विषय को भावना से जोडना कतई उचित नहीं होगा क्योंकि इसे ओबामा का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव नहीं वरन पश्चिम में एंटीक पीस रखने के शौक से जोड्कर देखना चाहिये।

इसी प्रकार भारत के समाचार पत्रों में इस आशय के समाचार भी प्रकाशित हुए कि ओबामा के पूरे अभियान में महात्मा गान्धी उनके प्रेरणास्रोत रहे। यहाँ भी यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि पश्चिम में गान्धीजी को मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मण्डॆला जैसे अश्वेत उद्धारकों के साथ रंगभेद के विरुद्ध उनके अभियान के लिये खडा किया जाता है और इसके पीछे भी ओबामा के भारत के प्रति लगाव की भावना देखना जल्दबाजी होगी।

बराक ओबामा के प्रति एक भारतवासी का दृष्टिकोण क्या होना चाहिये। मेरी दृष्टि में विशुद्ध व्यावहारिक कि ओबामा के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से विश्व राजनीति किस दिशा में जायेगी और भारत का इस पर क्या प्रभाव होगा। इस कसौटी पर कसते समय एक ही विचार ध्यान में आता है कि अमेरिका इस समय युद्ध की स्थिति में है उस युद्ध के साथ चाहे अनचाहे सभी देशों का हित जुड गया है और भारत का हित तो विशेष रूप से। यह युद्ध है इस्लामवाद के विरुद्ध युद्ध।

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आक्रमण के बाद अमेरिका ने इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी रास्ता अपनाने वाली शक्तियों को अपने निशाने पर लिया और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध को लेकर अमेरिका की नीति उचित रही अनुचित यह तो अलग चर्चा का विषय है पर इस युद्ध को लेकर आज विश्व में ऐसी स्थिति निर्मित हो चुकी है कि इस युद्ध में कोई भी तटस्थ नहीं रह सकता।

विशेषकर भारत अपनी विशेष परिस्थितियों के कारण तो बिलकुल भी तटस्थ नहीं रह सकता। इसलिये इस पृष्ठभूमि में बराक ओबामा का विश्लेषण करने की आवश्यकता है। बराक ओबामा ने विदेश नीति के सम्बन्ध में जो बातें कही हैं उनमें एक तो यह कि वे इराक से अमेरिकी सेनाओं को तत्काल वापस बुला लेंगे और दूसरा वे ईरान के राष्ट्रपति के साथ आमने सामने बैठकर बात करेंगे। इन दोनों ही बयानों से स्पष्ट है कि बुश की आक्रामक विदेश नीति को बदलना चाहते हैं। परंतु इन दोनों ही स्थितियों में कोई भी एकपक्षीय कदम घातक होगा। यदि आज इराक को इस स्थिति में छोड्कर अमेरिका चला जाता है तो वहाँ का प्रशासन किसी भी प्रकार इराक को सम्भाल पाने की स्थिति में नहीं होगा और पाकिस्तान और अफगानिस्तान की भाँति इराक भी अल कायदा और तालिबान का नया अड्डा बन जायेगा जो कि पाकिस्तान के कबायली क्षेत्रों में पहले से ही पुनः संगठित हो चुके अल कायदा को नया जीवन प्रदान करने जैसा होगा।


इसी प्रकार एक बडा प्रश्न ईरान का है जिस पर किसी का ध्यान अभी नहीं जा रहा है। जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने बार बार इजरायल को विश्व के मानचित्र से मिटाने या इसे समाप्त करने की बात दुहराई है वह अब लफ्फाजी के स्तर से आगे जाकर माथे पर चिंता की लकीरें डालने लगी है। जिन लोगों को अभी अहमदीनेजाद के बयानों का निहितार्थ समझ में नहीं आता उन्हें पूरे इस्लामवादी आन्दोलन का स्वरूप समझना चाहिये। इस्लामवादी आन्दोलन की मूल प्रेरणा और इस्लामवादी आतंकवाद का पूरा ताना बाना इजरायल- फिलीस्तीनी संघर्ष और मुस्लिम भूमि पर पश्चिमी देशों द्वारा थोपा गये यहूदी देश की अवधारणा के इर्द गिर्द बुना गया है। अहमदीनेजाद जो कि स्वयं एक कट्टरपंथी इस्लामवादी की श्रेणी में आते हैं और शिया परम्परा के अनुसार बारहवें पैगम्बर या महदी के अवतरण में विश्वास करते हुए स्वयं में कुछ चमत्कारिक शक्तियों का अंश देखकर एक विशिष्ट चिंतन पर चलते हैं इजरायल के विरुद्ध अपने बयानों के निहितार्थ समझने को विवश करते हैं।


अहमदीनेजाद ने पिछ्ले वर्ष अमेरिका के राष्ट्रपति को और फिर जर्मनी की चांसलर को एक खुला पत्र लिखकर अपने उद्देश्य स्पष्ट कर दिये थे कि वे अमेरिका विरोधी और पश्चिम विरोधी धरातल पर विश्व की अनेक शक्तियों को एकत्र करना चाहते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर द्वारा यहूदियों के व्यापक जनसन्हार को एक कपोलकल्पित और गलत इतिहास की संज्ञा देने के लिये ईरान में राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने इतिहासकारों का एक सम्मेलन बुलाया जो इतिहास के इस तथ्य को सत्य नहीं मानते। अहमदीनेजाद का मानना है कि इस कपोलकल्पित ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहूदियों ने पश्चिम को बन्धक बना रखा है और उसी का हवाला देकर विशेषाधिकार प्राप्त किये हैं। ईरान के राष्ट्रपति के ये प्रयास उनके इस्लामवादी आन्दोलन के नेता बनने की उनकी महत्वाकांक्षाओं की ओर संकेत तो करते ही हैं विश्व स्तर पर वामपंथ और इस्लामवाद के गठजोड की कडी बनते भी दिखते हैं। ऐसी परिस्थिति में बराक ओबामा का फिलीस्तीन के प्रति नरम रूख अपनाना विश्व स्तर पर इस्लामवाद प्रतिरोधी शक्तियों को कमजोर करेगा।


इसके अतिरिक्त कुछ और भी कारण है जिन्हें लेकर बराक ओबामा की उम्मीदवारी प्रश्न खडा करती है। बराक ओबामा निश्चित रूप से एक अच्छे वक्ता, लोकप्रिय नेता हैं पर एक प्रशासक के रूप में उनकी क्षमताओं पर सन्देह है। अनेक अवसरों पर बराक ओबामा ने दबाव में आकर अपनी स्थिति बदल दी या उस पर सफाई दे डाली। जैसे अमेरिका के जिस अश्वेत चर्च से वे जुडे थे उस शिकागो के ट्रिनीटी यूनाइटेड चर्च आफ क्राइस्ट के पास्टर जेर्मियाह राइट जूनियर के 11 सितम्बर 2001 के अमेरिका पर आक्रमण सम्बन्धी बयान कि यह अमेरिका के कर्मों का फल है, के बाद ओबामा ने वह चर्च छोड दिया। इसी प्रकार अमेरिका के यहूदियों के समक्ष भावुक भाषण देकर जब उन्होंने जेरुसलम को अविभाजित इजरायल की राजधानी रखने का वादा किया तो फिलीस्तीनी अथारिटी के मोहम्मद अब्बास की आपत्ति के बाद ओबामा यहूदियों के समक्ष कही गयी अपनी बात से मुकर गये। यह ओबामा के कमजोर होने का प्रमाण है।

बराक ओबामा के सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने भारत के साथ अमेरिका के परमाणु समझौते के सम्बन्ध में सीनेट में जो संसोधन का प्रस्ताव रखा था उसके अनुसार भारत को कोई भी विशेषाधिकार न दिया जाये और भारत को 123 समझौते की परिधि में लाने के लिये उससे सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिये कहा जाये। अब यदि बराक ओबामा का प्रशासन कार्यभार सम्भालता है तो भारत के ऊपर सीटीबीटी पर हस्ताक्षर और विशेष सहूलियतों का दौर समाप्त हो जायेगा। इसी के साथ कश्मीर के विषय में भी ओबामा की राय जो है उससे पाकिस्तानी प्रोपेगैण्डा के आधार पर कश्मीर विश्व के विभिन्न कूट्नीतिक मंचों पर फिर से प्रमुख विषय बन सकता है क्योंकि बराक ओबामा की राय में अल-कायदा के विरुद्ध पाकिस्तान का सहयोग प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि पाकिस्तान का ध्यान कश्मीर के मामले में न बँटे। ओबामा के इस रूख से कश्मीर में आतंकवादी संगठनों को नया जीवन मिल सकता है और वैश्विक जिहाद को नया आयाम। आज इस विषय पर बहुत ध्यान पूर्वक सोचने की आवश्यकता है कि बराक ओबामा जहाँ एक ओर अमेरिका में आप्रवासियों के लिये सम्भावनायें जगाते हैं वहीं उनका अति वामपंथी और इस्लामवाद के प्रति अपेक्षाकृत नरम होना विश्व के वर्तमान परिदृश्य के लिये नकारात्मक विकास है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अन्ध अमेरिका विरोध के नाम पर कहीं उन शक्तियों के प्रति सहानुभूति न दिखाने लगें जो हमारी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिये गम्भीर खतरा हैं। आर्थिक नीतियों के आधार पर या वैश्व्वीकरण के नाम पर अमेरिका विरोध के नाम पर वामपंथी-इस्लामवादी धुरी का अंग बनने से भी हमें अपने आप को रोकना होगा।
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आतंकवाद विरोधी मुस्लिम पहल के निहितार्थ

31 मई दिन शनिवार, दिल्ली के रामलीला मैदान पर प्रमुख इस्लामी संगठनों की पहल पर एक आतंकवाद विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन एक बार फिर सहारनपुर स्थित प्रसिद्ध मदरसा दारूल उलूम देवबन्द की पहल पर आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में मुख्य रूप से दारूल उलूम देवबन्द, जमायत उलेमा ए हिन्द, जमायत इस्लामी, नदवातुल उलेमा लखनऊ और मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में देश भर के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधित्व का दावा किया गया। दारूल उलूम देवबन्द के मुख्य मुफ्ती हबीबुर्रहमान द्वारा तथाकथित फतवे पर हस्ताक्षर किये गये जिसके प्रति सभी उपस्थित लोगों ने सहमति व्यक्त की और इस फतवे के अनुसार किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण हिंसा की निन्दा की गयी और जेहाद को रचनात्मक और आतंकवाद को विध्वंसात्मक घोषित किया गया। आयोजकों के दावे के अनुसार इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से तीन लाख लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में आने वालों में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग शामिल थे।


इससे पूर्व सहारनपुर स्थित प्रमुख इस्लामी शिक्षा केन्द्र और तालिबान के प्रमुख सदस्यों मुला उमर और जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर के प्रेरणास्रोत रहे दारूल उलूम देवबन्द ने 25 फरवरी को भी देश भर के विभिन्न मुस्लिम पंथों के उलेमाओं को आमंत्रित कर आतंकवाद के विरुद्ध फतवा जारी किया था। उस पहल को अनेक लोगों ने ऐतिहासिक पहल घोषित किया था और एक बार फिर रामलीला मैदान पर हुई आतंकवाद विरोधी सभा को एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है। परंतु जिस प्रकार फरवरी माह में हुए उलेमा सम्मेलन के निष्कर्षों पर देश में आम सहमति नहीं थी कि ऐसी पहल का इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैला रहे लोगों पर क्या प्रभाव होगा उसी प्रकार का प्रश्न एक बार फिर आतंकवाद विरोधी सम्मेलन से भी उभरता है।


इस सम्मेलन में फतवे की भाषा और वक्ताओं का सुर पूरी तरह उलेमा सम्मेलन की याद दिलाता है। सम्मेलन में पूरा जोर इस बात पर था कि किस प्रकार यह सिद्ध किया जाये कि इस्लाम और पैगम्बर की शिक्षायें आतंकवाद को प्रेरित नहीं करती और इस्लाम एक शांतिपूर्ण धर्म है। इसके साथ एक बार फिर जेहाद को इस्लाम का अभिन्न अंग घोषित करते हुए उसे आतंकवाद से पृथक किया गया। इसमें ऐसा नया क्या है जिसको लेकर इस सम्मेलन या फतवे को ऐतिहासिक पहल घोषित किया जा रहा है। जब से इस्लामी आतंकवाद का स्वरूप वैश्विक हुआ है तब से इस्लामी बुध्दिजीवी और धर्मगुरु इस्लाम को शांतिपूर्ण धर्म बता रहे हैं और जेहाद को एक शांतिपूर्ण आन्तरिक सुधार की प्रक्रिया घोषित कर रहे हैं परंतु उनके कहे का कोई प्रभाव उन आतंकवादी संगठनों पर नहीं हो रहा है जो जेहाद और इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में लिप्त हैं। वास्तव में एक बार फिर इस सम्मेलन ने हमारे समक्ष एक बडा प्रश्न खडा कर दिया है कि क्या इस्लामी संगठन, धर्मगुरु या फिर बुद्धिजीवी इस्लामी आतंकवाद का समाधान ढूँढने के प्रति वाकई गम्भीर हैं। उनके प्रयासों की गहराई से छानबीन की जाये तो ऐसा नहीं लगता।


वास्तव में इस्लामी आतंकवाद को एक सामान्य आपराधिक घटना के रूप में जो भी सिद्ध करने का प्रयास करता है वह इसे प्रोत्साहन देता है। इस्लामी आतंकवाद एक वृहद इस्लामवादी आन्दोलन का एक रणनीति है और इस आन्दोलन का उद्देश्य राजनीतिक इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करना है। समस्त समस्याओं का समाधान इस्लाम और कुरान में है, विश्व की सभी विचारधारायें असफल सिद्ध हो चुकी हैं और इस्लाम ही सही रास्ता दिखा सकता है, पश्चिम आधारित विश्व व्यवस्था अनैतिकता फैला रही है और उसके मूल स्रोत में अमेरिका है इसलिये अमेरिका का किसी भी स्तर पर विरोध न्यायसंगत है, इस्लामी आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं है यह समस्त विश्व में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार का परिणाम है, आज मीडिया इस्लाम को बदनाम कर रहा है, फिलीस्तीन में मुसलमानों के न्याय हुआ होता तो और इजरायल का साथ अमेरिका ने नहीं दिया होता तो इस्लामी आतंकवाद नहीं पनपता। ऐसे कुछ तर्क राजनीतिक इस्लाम के हैं जो इस्लामवादी आन्दोलन का प्रमुख वैचारिक अधिष्ठान है और इन्हीं तर्कों के आधार पर इस्लाम की सर्वोच्चता विश्व पर स्थापित करने का प्रयास हो रहा है। क्या किसी भी इस्लामी संगठन ने इन तर्कों या उद्देश्यों से अपनी असहमति जताई है। इसका स्पष्ट उत्तर है कि नहीं।


31 मई को रामलीला मैदान में जो तथाकथित आतंकवाद विरोधी रैली हुई उसमें भी जिस प्रकार के तेवर में बात की गयी वह यही संकेत कर रहा था कि इस रैली में मुस्लिम उत्पीडन की काल्पनिक अवधारणा को ही प्रोत्साहित किया गया और अमेरिका के विरोध में जब भी वक्ताओं ने कुछ बोला तो खूब तालियाँ बजीं। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि अमेरिका शैतान है या नहीं यहाँ प्रश्न यह है कि एक ओर आतंकवाद को इस्लाम से पृथक कर और फिर इस्लामी आतंकवाद के मूल में छिपी अवधारणा को बल देकर इस्लामी संगठन किस प्रकार आतंकवाद से लड्ना चाहते हैं। किसी तर्क का सहारा लेकर यदि आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराये जाने का प्रयास हो तो फिर आतंकवाद की निन्दा करना एक ढोंग नहीं तो और क्या है। आज बडा प्रश्न जो हमारे समक्ष है वह राजनीतिक इस्लाम की महत्वाकांक्षा और इस्लामवादी आन्दोलन है जो इस्लाम में ही सभी समस्याओं का समाधान देखता है। वर्तमान समय में अंतरधार्मिक बहसों में भाग लेने वाले और ऐसी बहसें आयोजित कराने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आतंकवाद के सम्बन्ध में ऐसी अस्पष्ट भाषा का प्रयोग करते हैं कि उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है। ऐसे ही एक मुस्लिम विद्वान हैं डा. जाकिर नाईक उनके कुछ उद्गार सुनकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ यू ट्यूब के वीडियो प्रस्तुत हैं। जिन्हें देखकर कोई भी सोचने पर विवश हो सकता है कि मुस्लिम बुध्दिजीवी किस प्रकार इस्लामवादी आन्दोलन का अंग हैं और अंतर है तो केवल रणनीति का है। http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI

http://www.youtube.com/watch?v=KAdwy5IJzj4&feature=related

http://www.youtube.com/watch?v=_MtddCCuaC8&feature=related

http://www.youtube.com/watch?v=ZMAZR8YIhxI&feature=related

31 मई के सम्मेलन के सन्दर्भ में जाकिर नाइक का उल्लेख करना इसलिये आवश्यक हुआ कि आज उन्हें एक नरमपंथी और उदारवादी मुसलमान माना जा रहा है जो बहस में विश्वास करता है परंतु उनके भाव स्पष्ट करते हैं कि आज आतंकवाद की समस्या को एक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जा रहा है और इसके लिये मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा का सृजन किया जा रहा है। मुस्लिम उत्पीडन की इस अवधारणा का भी वैश्वीकरण हो गया है। एक ओर जहाँ इजरायल और फिलीस्तीन का विवाद समस्त विश्व के इस्लामवादियों के लिये आतंकवाद को न्यायसंगत ठहराने का सबसे बडा हथियार बन गया है वहीं स्थानीय स्तर पर भी मुस्लिम उत्पीडन की अवधारणा रची जाती है और इसका शिकार बनाया जाता है देश के पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियों को।


रामलीला मैदान में जो भी पहल की गयी उसकी ईमानदारी पर सवाल उठने इसलिये भी स्वाभाविक हैं कि इस सम्मेलन या रैली में एक बार भी इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले वैश्विक और भारत स्थित संगठनों के बारे में इन मुस्लिम धर्मगुरुओं ने अपनी कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की। इन तथाकथित शांतिप्रेमियों ने एक बार भी सिमी, इण्डियन मुजाहिदीन, लश्कर, जैश का न तो उल्लेख किया और न ही उनकी निन्दा की या उनके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट की। वैसे आज तक ओसामा बिन लादेन के उत्कर्ष के बाद से विश्व के किसी भी इस्लामी संगठन ने उसके सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की और अमेरिका पर किये गये उसके आक्रमण को मुस्लिम उत्पीडन की प्रतिक्रिया या फिर आतंकवादी अमेरिका पर आक्रमण कह कर न्यायसंगत ही ठहराया। सम्मेलन में जयपुर में आतंकवादी आक्रमण में मारे गये लोगों की सहानुभूति में भी कुछ नहीं बोला गया और पूरा समय इसी में बीता कि इस्लाम को आतंकवाद से कैसे असम्पृक्त रखा जाये। ऐसे में एक बडा प्रश्न हमारे समक्ष यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध इस युद्ध में हम इन इस्लामी संगठनों की पहल को लेकर कितना आश्वस्त हों कि इससे सब कुछ रूक जायेगा। क्योंकि समस्या के मूल पर प्रहार नहीं हो रहा है।


25 फरवरी को दारूल उलूम देवबन्द ने उलेमा सम्मेलन किया और एक माह के उपरांत ही मध्य प्रदेश में सिमी के सदस्य पुलिस की गिरफ्त में आये और मई की 13 दिनाँक को जयपुर में आतंकवादी आक्रमण हो गया। जुलाई 2006 को मुम्बई में स्थानीय रेल व्यवस्था पर हुए आक्रमण के बाद अब तक 9 श्रृखलाबद्ध सुनियोजित विस्फोट हो चुके हैं और इन सभी विस्फोटों में भारत के मुस्लिम संगठनों और सदस्यों की भूमिका रही है। इससे स्पष्ट है भारत में मुसलमान वैश्विक जेहादी नेटवर्क से जुड गया है और वह मुस्लिम उत्पीडन की वैश्विक और स्थानीय अवधारणा से प्रभावित हो रहा है। जब तक इस्लामी संगठन इस अवधारणा के सम्बन्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते और आतंकवाद के स्थान पर आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध फतवा नहीं जारी करते उनकी पहल लोगों को गुमराह करने के अलावा और किसी भी श्रेणी में नहीं आती।


इस्लामी आतंकवाद आज इस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ से उससे लड्ने के लिये एक समन्वित प्रतिरोध की आवश्यकता है और ऐसी पहल जो पूरे मन से न की गयी हो या जिसमें ईमानदारी का अभाव हो उससे ऐसी प्रतिरोधक शक्ति कमजोर ही होती है जिसका विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। हमारे देश की छद्म धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी-उदारवादी लाबी ऐसे प्रयासों को महिमामण्डित कर प्रस्तुत करती है ताकि इस्लामी आतंकवाद के मूल स्रोत, विचारधारा और प्रेरणा पर बह्स न हो सके। ऐसे प्रयासों के मध्य हमें अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है और साथ ही इस पूरी समस्या को एक समग्र स्वरूप में व्यापक इस्लामवादी आन्दोलन के रणनीतिक अंग के रूप में भी देखने की आवश्यकता है।
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